सोमवार, 10 दिसंबर 2018

मंचनक समस्या


मिथिलामे एकटा कहबी छैक – जे सबस’ छोट, से उञ्चास हाथक । ई गप्प हम अपना सम्बन्ध मे नहि कहि रहल छी, आजुक गोष्ठीक विषय के संबंध मे कहि रहल छी । पहिल दिनक विषय छल – “नाटक किएक नहि लिखाइत अछि ?” आ तेसर दिनक विषय अछि – “ग्रामीण क्षेत्र सँ विलुप्त होइत नाटक” । दुनू दिनक विषय खूब नीक जेना बेक्छाओल अछि । आमंत्रित वक्ता लेल अपन विषयक प्रति कोनो प्रकारक शंका नहि । मुदा आजुक विषय दुनू दिनक अपेक्षा सबस’ छोट मात्र दू शब्दक – ‘मंचनक समस्या’. नाटक आ रंगमंच लेल ई दूटा शब्द सबस’ बेसी ओझरौटी बला अछि । एहि मे दुनू पछिला दिनक आ अगिला दिनक विचार स्वयं समाहित भ’ जाइत अछि । आयोजक द्वारा खूब नीक जेना सोचि विचारि क’ ई दू टा शब्द हमरा सभहक जिम्मा आयल अछि । जाहि मे सम्पूर्ण नाटकक परिदृश्य स्वयं आबि जाइत छैक । एहना स्थिति मे हमरा आगू दूटा बाट देखाइत अछि –  



पहिल बाट – नाटक तैयारी स’ मंचन धरिक समस्या ? वा
दोसर बाट – तैयार नाटकक मंचनक समस्या ?  
नाटक आ रंगमंच लेल ई दुनू समस्या अपना मे विशाल अछि । एहि ठाम हम दुनू प्रक्रिया दिस जाय चाहब । यानी नाटक मंचन स’ पूर्व आ मंचनक पश्चातक समस्या ।

मैथिली नाटकक मंचनक समस्याक अनुभव हमरा आगू दू प्रकार स’ अबैत अछि । पहिल त’ ओहन समस्या जे हम अपन रंगकर्मी मित्र सब स’ सुनैत छी । दोसर ओहन समस्या जकरा हम व्यक्तिगत रूपे अनुभव करैत छी । अपन रंगकर्मी मित्र सभ स’ सुनल गेल समस्या स’ अहूँ सब नीक जेना अवगत होयबे करब । ई प्राय; सबहक एक रंगाहे जेना छन्हि । किछु समस्या जे सास्वत अछि –
नाटक करनिहारक घोर अभाव,
महिला रंगकर्मीक अभाव,
नाटक करबाक लेल धनक अभाव आदि आदि ।


उपर्युक्त सब समस्या हमरा लग बिकराल रूप मे परसल जाइत अछि । एहन सभ तथाकथित ‘बिकराल समस्या’ हमरा सतही समस्या बुझना जाइत अछि । हम जहिया स’ नीक जेना रंगकर्म स’ जुड़लहुँ यानी वर्ष 1995 ई. स’ उपर्युक्त तथाकथित बिकराल समस्या स’ हम व्यक्तिगत रूपे कहियो प्रभावित नहि भेलहुँ । चाहे ओ हमर गाम घोंघौरक रंगमंच हो, हमर प्रखण्ड राजनगरक रंगमंच हो, चाहे हमर जिला मधुबनीक रंगमंच हो वा आब चाहे ओ दिल्लीक रंगमंच हो । हम सभ स्तर पर रंगकर्म केलहुँ अछि तेँ मंचनक एहन समस्या, जकरा हम स्वयं नहि भोगने छी ताहि पर कोनो प्रकारक विचार – व्यक्त करब हमरा लेल कठिनाह अछि । आ उपर्युक्त सभ समस्या अपन अकर्मन्यताके नुकेबाक लेल मनगढ़ंत बेसी बुझना जाइत अछि । 

वर्ष 2007 मे श्रद्धेय नाटककार श्री महेन्द्र मलंगिया राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय स’ प्रकाशित राष्ट्रीय स्तरक रंगमंचीय पत्रिका ‘रंग प्रसंग’ मे लिखैत छथि – “रंगकर्म मे संगठनात्मक क्षमता का विशेष महत्व है : प्रकाश जिनता ही अच्छा अभिनेता एवं निर्देशक है, उतना ही अच्छा एक सफल संगठनकर्ता भी” ।    

आजुक स्थिति मे हमरो लगैत अछि – “जिनका मे संगठनात्मक गुण छन्हि हुनका सभकेँ उपर्युक्त समस्या प्राय: नहि होइत हेतन्हि ।”

मंचनक एहन समस्या जकरा व्यक्तिगत रूपे अनुभव केलहुँ अछि वा क’ रहल छी ताहि दिस अहूँ सबहक ध्यान ल’ जयबाक प्रयास हम करब । एहि मे कोनो शक नहि जे मैथिली रंगमंच पिछला पचास साल मे एक स’ एक प्रतिमान ठाढ़ केलक अछि, मुदा आइयो नाट्य मंचन लेल किछु समस्या ओहिना के ओहिना बिकराल रूप धेने आगू मे देखाइत अछि ।

पहिल समस्या अछि : मंचनक लेल नाट्यालेखक अभाव । हमरा लग बेसी स’ बेसी विकल्प नहि भेटैत अछि नाटकक लेल । मिथिला क्षेत्रक जे सब मौलिक समस्या अछि ताहि पर बहुत कम आलेख उपलब्ध अछि, बल्कि नहिए जेना । जखन आलेखे नहि तखन विकल्प ताकब कोना संभव होयत ? मिथिला मे बाढ़ि प्रमुख समस्या थिक – मुदा एहन विषय के केन्द्र मे राखि नाटक नहि के बराबर रचल गेल अछि एखन तक । मिथिला मे कतेको राजपरिवार भेल, कतेको महंथ भेलाह हुनका सबहक बीचक द्वंद नाटक मे एखन तक नहि आबि सकल अछि । जातीय संघर्ष, सामाजिक अंतरविरोध, लोक देवी देवता पर, रचनाक घोर अभाव अछि । जँ किछु रचना अछियो त’ ओहि मे बेसी स’ बेसी गुणगाने अछि । एहन रचना मे रंगकर्मीक अभिनयक विविधताक परिचय होयब मुश्कित जेना होइत अछि । रचना अभिनेते के प्रभावित नहि क’ पबैत अछि त’ प्रेक्षक के की प्रभावित करतन्हि ? एहना स्थिति मे दू प्रकारक नव समस्या उत्पन्न भ’ जाइत अछि । जँ नाटक छोड़ि कविता वा कथा वा उपन्यास वाकि अनुवाद दिस जायल जाइत अछि त’ आरोप लगैत अछि जे – मौलिक रचना किएक नहि करैत छी ? दोसर जँ  किनको लग एहन स्थितिक चर्च वर्च कयल त’ ओ भरिए राति मे नाटक लिख देबाक लेल तैयार भ’ जाइत छथि । आब अहीं सभ कहू जे भरि राति मे लिखायल नाटकक मंचन हमर प्रेक्षक कतेक गंभीरता स’ देखताह ? तेँ हम सब प्राय: चुप्पीक सहारा लैत छी आ अपन रंगकर्मीक हिसाबे नाट्य मंचन दिस अग्रसर होयबा लेल बाध्य होइत छी । किछु हरबड़िया लेखक अपन रचनाक समीक्षा करबाअक बदला किछु अनाप सनाप उदाहरण देब’ लगताह जेना – जयशंकर प्रसादक कथन छलन्हि – “नाटक के लिए रंगमंच होना चाहिए न कि रंगमंच के लिए नाटक ।” मुदा, हुनका सभ केँ जयशंकर प्रसादक दोसर कथन के सेहो ध्यान देबाक चाहियन्हि – “यदि हिन्दी भाषा का व्यापक स्तर पर प्रचार – प्रसार करना है, तो यह नाटक जैसे माध्यम से ही सम्भव हो सकता है ।” एकरा मैथिलीक संदर्भ मे सेहो देखल जा सकैत अछि ।


                                                              
नाटकक तैयारी लेल पूर्वाभ्यास स्थलक अभाव :  जखन कोनो नाटक तैयार करबा लेल आलेख भेट जाइत छैक तखन शुरु होइत अछि ओकर पूर्वाभ्यास । एहि लेल पूर्वाभ्यास स्थलक बेगरता होइत छैक जकर घोर अभाव अछि । कोनो संस्था लग एहन सुरक्षित स्थान नहिए जेना छन्हि । हमरा आगू 25 – 30 साल पुरान संस्था सभ अछि, मुदा हुनको सब लग एकर समस्या बनल छन्हि । कोनो नाटक तैयार करबा मे प्राय: 30 – 45 दिन लगैत अछि । संगहि नाटक लेल बहुत तरहक साज – सज्जा, वस्त्र सज्जा वा मंच सामग्री आदि रखबाक बेगरता होइत छैक । एहरा लेल अप्पन स्थान चाहबेटा करी । कोनो स्कूल, कोनो कॉलेज वा किनको दलान या कि किनको छत स’ एहि समस्याक तत्काल समाधान त’ भ’ जाइत छैक मुदा ई रंगमंच के स्थायित्व नहि द’ पबैत छैक । समूह लेल किछु स्वज्जन वा संस्था ई व्यवस्था करबेबो करैत छथि त’ हुनका भीतर एक प्रकारक दम्भ उत्पन्न भ’ जाइत छन्हि, जे ई सबटा रंगकर्मी हमर शागीर्द भेल, जेना हम कहबै से ई सब करत । जखन कि रंगकर्मीक लेल एहन परतंत्रता त’ दु:श्कर अछि । हमर समाज एहि दिस व्यवस्था त’ छोड़ू सोचबो प्रारम्भ नहि केलक अछि । जखन की एहन व्यवस्था गाम गाम होयबाक चाही छल ।

हाँ ! एकर दोसर एकटा पक्ष आरो छैक । जे हम अनुभव केलहुँ अछि । जँ हमर रंगकर्मी के कोनो स्कूल वा कॉलेज वा कोनो स्थान तत्काल भेटियो जाइत छन्हि त’ ओ लोकन्हि एहन स्थान के बेसी दिन धरि सम्हारि क’ नहि राखि पबैत छथि । चूँकी ई सामूहिक कार्य थिक तेँ किछु रंगकर्मी एहन स्थान अपना समूह लेल कोहुना क’ क’ व्यवस्था करबैत छथि त’ ओही समूह मे स’ किछु रंगकर्मी अपन आचार, व्यवहार वा कूसंस्कार स’ एहन स्थान समूह स’ छिनबा दैत छथि । जकर प्रभाव सम्पूर्ण नाट्य जगत पर दूरगामी पड़ैत अछि ।

नाटक मंचनक लेल प्रेक्षागृहक अभाव : कोनो व्यवस्था बात स’ जँ नाटक तैयार भ’ गेल त’ आब ओकर मंचन क’ त’ कयल जाय ? यानी प्रेक्षागृहक समस्या । गाम त’ छोड़ू, प्रखण्ड छोड़ू, जिला सेहो छोड़ू आब त’ राज्यक राजधानी के सेहो छोड़ू । पटना मे आयोजक संस्था ‘चेतना समिति’ लग अछैत प्रेक्षागृह नाटक लेल हमरा सब के कालिदास रंगालय आब’ पड़ि रहल अछि । यैह वर्तमान स्थिति छैक, प्रेक्षागृहक । कोनो दोसर हॉल मे नाटक करब बेजाय बात नहि मुदा अप्पन त’ अप्पन होइत छैक । चाहे जेना होइ अपन प्रेक्षागृह के नाट्यानुकूल बनाओल जेबाक चाही । पटना शहर मे दूटा हॉल कालिदास रंगालय आ प्रेमचन्द रंगशाला ।  क’ त’ होयत नाटक ? कोना होयत नाटक ?   

बेगूसराय जिलाक एकटा गाम अछि ‘गुदरगामा’ । हमरा सबक आगू एकटा प्रतिमानरूप मे ठाढ़ अछि, जाहि ठाम गाम मे नाटक लेल अप्पन प्रेक्षागृह छैक । जाहि ठाम रतन थियाम तक अपन नाटक प्रस्तुत क’ चुकल छथि । एहन स्थिति आर ठाम कहाँ अछि । की; मिथिलाक दोसर गाम मे धनक कमी छैक ? नहि; हमर धनाढ़्य सबकेँ अपन कलाक प्रति आँखिक नजरि मे दोष स्वीकारक चाहियन्हि । 


नाट्य प्रस्तुतिक पुनरमंचन लेल स्थान नहि भेटब : इहो एकटा समस्ये अछि । कतौ एकटा नाटक कोनो समूह तैयार केलक अछि, कोहुना क’ क’ एकटा प्रस्तुति क’ लेलक अछि मुदा ओकर पुनरमंचन बहुत कम भ’ पबैत अछि । एक गामक वा शहरक नाटक दोसर ठाम नहि भ’ पबैत अछि । तेँ नाटक मे परिपक्वता नहि आबि पबैत छैक । आन आन संस्था अपना आयोजन मे नाटक मंचित नहि करबैत छथि । हुनका सबके नाटक स’ बेसी आसान डॉस प्रोग्राम आ गीत – नाद बुझाइत छन्हि । ओना एहन बात छेब्बो करै । नाटक लेल बहुत सरंजाम क’ र’ पड़तन्हि । गीत गौनिहार के भले ही लाख टका द’ देताह, मुदा नाटक लेल पचासो हजार भारी बुझना पड़ैत छन्हि । दोसर नाटक त’ भरि रातिक आयोजन नहि हेतन्हि । एत’ एकटा बात आर कहब – मैथिल मे लसड़ि बेसी जल्दी लगैत छन्हि । चेतना समिति ‘विद्यापति समारोह’ आयोजन शुरु केलक । त’ लसड़ि जेना गामे गाम ई आयोजन भ’ गेलई । मुदा, चेतना समिति ‘विद्यापति समारोह’ मे दोसर दिन नाटको करबैत अछि ई लसड़ि बाँकी आयोजक के नहि लगलन्हि । तकर दूरगामी प्रभाव ई पड़लैक जे आब आम जन ‘विद्यापति समारोह’ नाम सुनितहि भड़ैक जाइत छथि । आई जँ सब ठाम दोसर राति नाटकक आयोजन होइतैक त’ सोचू मैथिली नाट्य मंचन मे कतेक प्रगति भ’ एल रहितै । एहि स’ बेसी पैघ उदाहरण आर की होयत जे हमर संगठन वर्तमान समय मे  सबस’ बेसी सक्रिय अछि आ एहि ‘चेतना रंग उत्सव’ मे ओकर नाटक नहि भ’ पाबि रहल छैक । कारण जे भी रहल हो । हम ओहि पर नहि जायब । मुदा पुनरमंचनक समस्या त’ छैहे ।

नाट्य संस्था द्वारा लक्ष्य निर्धारणक अभाव : नाटकक जे कोनो संस्था वर्तमान मे वाकि पहिनहियो बनल तिनका लग दूरगामी लक्ष्य नहि रहलन्हि । हुनका सबहक योजना मे साल मे एकटा वा कि दूटा नाटक मंचन क’ लेबाक मात्र लक्ष्य रहल । ई लक्ष्य पूरा भ’ गेल बुझू बाँकी समयक लेल संस्था मृत्यप्राय भ’ गेल । संस्था सभ मैथिली रंगमंचक विहंम योजना नहि बनौलक । एहना स्थिति मे मंचनक समस्या त’ रहबे करत । संस्था अपना लग आयल युवा रंगकर्मी के कोना क’ सम्हारि क’ राखि सकताह ताहि लेल कोनो योजना नहि बनौलाह । परिणाम भेल जे नाटक मंचन बाद युवा रंगकर्मी फेर स’ रनेबने बौआइत रहलाह । बीच मे कोनो दोसर ठाम संलग्न भ’ गेलाह त’ हुनक रंगकर्म बुझू छुटिए जेना गेलन्हि । पुन: रंगकर्म दिस आयब ओहन रंगकर्मी लेल कठिनाह होइत गेल । एहि दिस रंग संस्था के सोचब आवश्यक अछि ।    


अगल आदर्शक स्थापन : रंगमंच एकटा शापित कर्म थिक । ई विधा बाहर स’ जतबे हल्लुक बुझाइत अछि, भीतर स’ ओतबे जटिल अछि । किछु युवातूर एक दूटा नाटक क’ लैत छथि कि हुनका लाग’ लगैत छन्हि जे आब नाटकक सब किछु त’ सिखिए लेलहुँ, अपने नाटक शुरू क’ दी । किछु गोटेक संगौर क’ लैत छथि आ अपन आदर्श स्थापन मे लागि जाइत छथि । एहन लोकन्हि के रंगमंच आंतरिक विरोधी किछु लोकक क्षणिक समर्थन सेहो भेटि जाइत छन्हि । एहि स’ सबस’ बेसी नाट्य मंचन प्रभावित होइत अछि । कारण, एहि प्रवृत्तिक रंगकर्मी मे व्यक्तिगत आदर्शक स्थापन बेसी रहैत छन्हि, सामूहिक कम । एक दू साल धरि एहन लोकन्हि लागल रहैत छथि, फेर गायब भ’ जाइत छथि । एहना स्थिति मे हुनका संग लागल बाँकी रंगकर्मी के बहुत हानि होइत छन्हि आ ओहो लोकन्हि मजबूरी बस मैथिली रंगमंच स’ दूर भ’ जाइत छथि ।  

प्रशिक्षण स’ दूर रहब : नाटक के हमर समाज एखनो तक खेलबे बूझैत छथि । नाटक खेलायब विधा अछि । जखन कि आब ई विधा बहुत आगू निकलि गेल अछि । रोजगारक साधन उपलब्ध क’ रहल अछि । आब एहि लेल प्रशिक्षण अतिआवश्यक भ’ गेल छैक । ओ चाहे लेखनक स्तर पर हो, अभिनय के स्तर पर हो वा निर्देशनक स्तर पर हो वा मंचक पाँछा के कार्य प्रणालीक स्तर हो । हम सब बेसी स’ बेसी प्रशिक्षण दिस नहि जाय चाहैत छी वा ई कही जे हमर नाट्य संस्था सभ अपन रंगकर्मी के प्रशिक्षण हेतु उत्तेजित नहि क’ पबैत छथि । तेँ आइयो हम सब एक ठाम आबि क’ ठमकि गेल छी । जखन हमर रंगकर्मी प्रशिक्षित नहि रहताह त’ मंचन मे समस्या त’ रहबे करत । मंच पर किछु प्रस्तुत क’ देब उपलब्धि भ’ जाइत अछि । ओकर कोनो प्रकारक विश्लेषण नहि करैत छथि, कारण ओ प्रशिक्षित रहिते नहि छथि ।


नाट्य द्वारा अपन प्रेक्षक के मूर्ख बूझब : इहो बड़् पैघ समस्या थिक ।  मैथिलीए नाटक छैक किछु क’ देबैक दर्शक के नीक लगबे करतन्हि बला सोच बहुत घातक भ’ गेल अछि । संगहि सबटा नाटक मैथिली मे नीके होइत अछि बला प्रवृत्ति सेहो अजीब अछि । हमरा सब के दुनू रूपे समीक्षात्मक दृष्टिकोण राख’ पड़त । नीक के नीक आ खराब के खराब क’ ह’ पड़त । हमर प्रेक्षक के सेहो बाज’ पड़तन्हि । प्रेक्षकक मौन मैथिली नाट्य मंचन के सेहो मौन क’ रहल अछि । प्रेक्षकक मौन के हमर रंगकर्मी वा कि निर्देशक अपन विशेषता बुझि लैत छथि जखन कि प्रेक्षक मौन ओहि रंगकर्मी वा कि निर्देशक लेल विफलता रहैत अछि ।

व्यक्तिगत चारित्रिक दोष जाहि स’ समाज स’ कटल रहब : नाट्य मंचनक समस्या मे प्रमुख समस्या रंगकर्मीक व्यक्तिगत चारित्रिक दोष सेहो अछि । रंगकर्मी द्वारा कोनो बनल बनाओल नियम के तोड़ब आ नव नियम ठाढ़ करब के रंगकर्म मानि लेब, धातक अछि । ई सत्य अछि जे रंगमंच नियम संग टकराइत अछि, मुदा केहन नियम संग टकरेबाक अछि, केहन प्रयोग करक अछि, तकर संज्ञान हरदम रंगकर्मी के रहब जरूरी छन्हि । आब अपना स’ पैघ केँ आदर करब हमर सबहक नियम अछि, संस्कार अछि, मुदा हम हुनका अनादर करबनि किएक त’ हम रंगकर्मी छी, हम प्रयोग करै छी त’ एहन प्रयोग के कोन समाज स्वीकारत ? तहिना हमर किछु रंगकर्मी व्यक्तिगत ह्रास केलथि अछि – जेना समाज स’ अलग देखेबा लेल केसे हिप्पी टाइप बना लेब, सड़क पर तथाकथित स्टाइल मे चल’ लागब, हाथ मे सिगरेट राखब फैसन बूझब, आ सार्वजनिक स्थान पर रंगीन तरल पदार्थ ग्रहण क’ क’ वरीष्ठ रंगकर्मीक टीक मे तेल देब’ लागब, समूह मे आयल महिला रंगकर्मी के कोनो ने कोनो बहन्ने आकर्षित करबाक प्रयास करब, महिला सहकर्मी संग अभिनय के बहन्ने अश्लिलता करब आदि आदि... । ई सब स्थिति हमर मैथिली मंचनक समस्या मात्र नहि अछि, प्राय: सब ठामक समस्या भ’ रहल अछि । एहि कारण सेहो रंग विधा स’ बहुत पैघ समाज कटल जा रहल अछि ।            


उच्च मध्यम वर्ग स’ समस्या : एहन वर्ग जे लोकन्हि मात्र नौकरी प्राप्त करबाक लेल पढ़लथि अछि हुनका सबस’ सेहो नाट्य मंचनक बहुत समस्या अछि । ई लोकन्हि मैथिली साहित्य ज्ञान स’ बहुत बेसी कटल रहैत छथि । हिनका सभ मे एकटा अजीब घमण्ड होइत छन्हि । अपन सरकारी कार्यालय स’ निकलि सोफा मे बैसि, आगू राखल पनबट्टी आ चलैत टी.वी.  स’ बेसी किछु नहि सोचि पाबि रहल छथि । एहन बहुत पैघ समाज अछि जिनका लेल पढ़ब मात्र नौकरी प्राप्त करबाक लेल होइत छन्हि, ज्ञान अर्जन लेल नहि । एहन समाज कोनो कला के लेल नहि सोचि पबैत छथि । तेँ आजुक मिथिलाक कोनो कला अपन प्रगति पथ पर नहि दौड़ि पाबि रहल अछि । एहन वर्ग केँ मैथिली रंगमंच स’ जोड़ब आवश्यक अछि । एहन लोकन्हि जँ कहियो किनको प्रयास स’ अपन घरक सोफा स’ उठि क’ नाटक देखबा लेल प्रेक्षागृह आबियो जाइत छथि त’ ओ लोकन्हि नाटक के सेहो अवरोधिते करैत छथि । जेना हुनकर मोबाइल चलिते रहतन्हि, बीच नाटक मे कतेको बेर उठि उठि पानक पीक फेकबा लेल बाहर जेब्बे करताह, चलैत नाटक मे मित्र संग गप्पे क’र’ लगताह । नाटक शुरू होइ स’ पहिने नहि औताह, आ बाद मे आबि क’ बीच मे घुसबाक प्रयास करताह । यानि एहन व्यक्ति के नाटक के गरिमा स’ कोनो लेनी देनी नहि होइत छन्हि । एहना स्थिति मे अभिनेता भीतरे भीतर कुण्ठित होइत रहैत छथि । हुनकर अभिनय प्रभावित होइत रहैत अछि । तेँ बहुतो स्थापित अभिनेता के कहैत सुनैत छी जे मैथिल दर्शक हमर काज के गम्भीरता स’ नहि लैत छथि तेँ हम मैथिली नाटक स’ कटि रहल छी । एकरो मंचनक समस्या स’ जोड़ल जयबाक चाही ।      


एहन नहि अछि जे उपर्युक्त समस्या मात्र मैथिली रंगमंचक लेल अछि, एहन समस्या प्राय: सभ भाषाक रंगमंचक लेल अछि ।  मुदा, मैथिली मे आइ तक एहि व्यावहारिक बात सब पर गम्भीरता स’ विचार विमर्श नहि भेल, जँ कहियो कोनो चर्च वर्च भेबो कयल अछि त’ ओहि स’ कोनो सकारात्मक परिणाम आगूओ नहि आयल अछि । समस्या ओहिना के ओहिना अछि ।

मैथिली नाटक लेल गंभीरता स’ काज केनिहार व्यक्ति वा संगठन के व्यक्तिगत संबंध वा वैचारिकताक आधार पर नाट्य संबंधी आयोजन वा विचार विमर्श स’ दूर राखब वर्तमान समय मे मैथिली नाट्य मंचन के अत्यधिक प्रभावित केलक अछि । नाटक लेल गंभीर व्यक्ति वा संगठन एहन प्रकारक उदासीनता स’ धीरे धीरे मैथिली नाट्य लेखन / मंचन स’ दूर होइत गेलाह अछि, अपना आप के दोसर दिशा मे मोड़ि लेलाह अछि वा मोड़बा मे लागल छथि । महोत्सव मे / आयोजन मे / सामाजिक सम्मान मे ओहन संगठन जे स्वयं नाटक नहि करैत छथि मुदा अपना आयोजन मे रंगकर्म के मूल धारा मे लिप्त व्यक्ति वा संस्था के छोड़ि मैथिली रंगमंचक कछैड़ मे ठाढ़ रहनिहार व्यक्ति वा संस्थाके बेसी सम्मान वा स्थान दैत छथि एहन लोकन्हि वा संस्था मैथिली नाट्य मंचन लेल नव नव समस्या ठाढ़ क’ रहल छथि । एहन स्थिति मैथिली रंगमंच के आरो कमजोर करबाक प्रयास कहल जायत । नहि की समृद्धिक इतिहास बनत । एहन कतेको उदाहरण हमरा आगू ठाढ़ अछि । एकर परिणाम मैथिली नाटक मात्र लेल नहि सम्पूर्ण मैथिली साहित्य लेल घातक अछि । एहन तरहक काज करनिहार सामर्थवान व्यक्ति वा छोट मोट संस्थाक नाम एखन नहि लेब, मुदा सबस’ बेसी ज़िम्मेदार अछि - साहित्य अकादेमी । अस्तु... ।     


- प्रकाश झा (डॉ.)
( सीनियर फेलो, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार )
प्रकाशन विभाग; राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भगवानदास रोड, नई दिल्ली – 01.