शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

जाहि बाट पर काँट गरल अछि, ताहि बाट पर चल’ दिअ’... [ मैथिली गायनमे पवन नारायण ]

गायक पवन नारायण







 
























आदि काल स मिथिलामे कतेको परम्परा चलैत आबि रहल अछि । एहि परम्परामे एकटा समृद्ध परम्परा थिक पाण्डित्य परम्परा । मिथिलावासी कोनो ने कोनो विधामे ज्ञानक सिद्धहस्ता प्राप्त करैत छलाह आ ओही स धनोपार्जन क अपन आ अपना परिवारक भरन पोषण करैत छलाह । चाहे वेद होइ वा कि कोनो शास्त्र । सबमे अपन सिद्धांत स्थापित करैत छलाह । पाण्डित्य परम्परा समयक संग अपन रूप बदलैत रहल अछि । आधुनिक समयमे सेहो एहि मे परिवर्तन आयल । किछु साल पहिने मैथिल युवाक पसन्द छल इंजिनियरिंग आ मेडिकल । एहि दुनू मे मैथिल युवा लोकनि नीक जेना स्थापित भेलाह । तकरा बादक दौर आयल सिविल सेवाक। अहू मे मैथिल युवा एक स'  एक कीर्तिमान स्थापित केलाह । एकरा बाद समय आयल जर्नलीज्मक त' अहू मे मिथिलाक युवा स सौंसे देशक युवा पाछू पाछू रहलाह । किछु साल पहिने मैथिल युवाक झुकाव कम्प्यूटर दिस भेलन्हि त' अहू मे हम सब आगुए रहलहुँ । आजुक दौर आबि गेल अछि प्रजेंटेशनल विधाक । चाहे सिनेमा होई, वाकि रंगमंच, अभिनय होइ वाकि गायन, निर्देशन होइ वाकि आन कोनो टेकनिकल काज मैथिल युवा अहू विधामे आगू बढ़ि रहलाह अछि ।

गायक पवन नारायण संग अभिनेता दीपक ठाकुर
मिथिलाक एकटा एहने समृद्ध परम्परा अछि गायन । जकर की आस्वादन प्राय: सब मैथिलजन लैत आबि रहलाह अछि मुदा एखन तक एहि विधामे काज करनिहार लोकनि के साहित्यिक वा कि सांस्कृतिक धरोहरक रूपमे स्थापित नै कल जा सकल अछि । मिथिलाक कोनो समीक्षक वा कि समालोचक महोदय एहि विधाक आँकलन नै केलाह अछि । हिनका लोकनि के तहिया आँखि खुजैत छनि जहिया एहि युवा लोकनिक पहचान दोसर ठाम बेसी नीक जेना हुअ लगैत अछि । मुदा जखन कोनो स्थापित विधा वा कि व्यक्तिक सोहरत सौंसे दुनियामे पसरि जाइत अछि तखन हम सब हल्ला करैत छी जे ई त हम्मर विधा वा कि व्यक्ति छथि । आदि आदि... ।

मिथिलाक सैकड़ो युवामे गायन के क्षेत्रमे एक छथि पवन नारायण । कतेको साल स हम मिथिलावासी हिनक गायल गीत सुनैत आबि रहल छी । आजुक समयमे प्राय: सब सांस्कृतिक मंचक शोभा रहैत छथि पवन नारायणजी । मुदा हिनका बारेमे जानकारी प्राप्त क चाहलहुँ त मात्र एक्के आदमी द सकैत छलाह ओ ई स्वयं । कारण हमर समाज हिनका लोकनिक ध्वनि जतेक काल सुनैत छथि बस ओतबे काल ई लोकनि मोन रहैत छथिन । किछु दिन पहिने हम पवन जीक संग दू दिन बितेलहुँ । व्यक्तिगत रूपे सेहो हम प्रभावित भेलहुँ ।

मैथिल युवा गायक आ गीतकार पवन नारायण पिछला 19 साल [1993 ई.] स मैथिली गीत गायन क्षेत्रमे छथि । अपन बाल्याकाले स संगीत गायन स जूड़ल छथि पवन नारायण । मधुबनी जिलाक बच्छी गामक ई युवा वाद्य यंत्र तबला गिटारक नीक जानकार छथि । अपन बच्चा बाबा स जे किछु ज्ञान भेटलन्हि सैह हिनक संगीत प्रशिक्षणक मूल अछि । पवनजी गीतक सब विधामे हस्तक्षेप रखैत छथि मुदा, मिथिलाक पारम्परिक गीतमे खूब मोन लगैत छनि । ओना आम जनमे हिनक गाओल रोमांटिक गीत बेसी चर्चित अछि । जे कियो एहि विधा के रसिक छथि ओ लोकनि पवन जी के मिथिलाक उदित नारायण कहि क संबोधित करैत छथि । एकर कारण ई जे एहि दुनू गायक के आवाज मे बहुत अधिक मेल छनि । दुनू गोटे प्राय: रोमांटिक गीत गाबमे माहिर छथि । जहिना उदित नारायण जी हिन्दीमे चर्चित छथि त पवन नारायण मैथिली मे । उदित जी सेहो नारायण त पवन जी सेहो नारायण । पवन जी व्यक्तिक रूपमे सेहो सदाशयताक प्रतीक छथि । आजुक समयमे मैथिली गायिकीमे सुश्री रंजना झाक आवाज हिनका बड्ड पसिन छनि त हिन्दी गायिकी मे उदित जीक आवाज ।

विद्यापति गीतक प्रेमी पवन नारायण जी आजुक समयमे विद्यापति गीत के नव नव अंदाज होयबाक बेगरता बुझि रहलाह छथि । विद्यापति गीत जे कि स्थापित गिति लय अछि एहि मे प्रयोगक त खगता अछिए । बेसी स बेसी प्रयोग होयत तखने एहि गीतक आरो माँग होयत आ नव नव युवा सृजन लेल अग्रसर होयताह । मुदा, आजुक समयमे भ रहल अछि एकर ठीक उल्टा । जखने कोनो युवा विद्यापति गीतक स्थापित लय मे बदलाब केलन्हि कि आम जन तेना ने होहकारि क छूटल कि बेचारे विद्यापति गीत स अपना के लग्गी भरि दूर क लैत छथि ।  एहन स्थिति हमरा जनैत मैथिली संगीत परम्पराक सबस पैघ खामी अछि । गायक लोकनि सेहो एखन तक ई निश्चित नै क सकलाह अछि जे मैथिली श्रोता लोकनि की चाहि रहल छथि ? एहना स्थिति मे एकटा नीक मार्गदर्शनक खगता बेसी बुझना जा रहल अछि । एहि गप्प स पवन नारायण जी सेहो सहमत छथि । आयोजनक श्रोता लोकनि मैथिली पेरोडीमे बेसी रुचि लैत छथि । कोनो हिन्दी फिल्मक प्रचलित गीतक शब्दानुवाद मैथिलीमे सुनब बेसी गोटे के पसिन छनि । ई शब्दानुवाद जँ दूइ अर्थी हुए त आरो नीक । परिपक्व गायक लोकनि एहन गायन स अपना के दूर राख चाहैत छथि मुदा नवका गायक लोकनि जिनकर मात्र आवाज नीक छनि एहि विधाक ज्ञान कम छनि एहन गीत गाबि क परिपक्व गायकक कठिनाई आरो बढ़ा रहल छथि । 

 पवन नारायण आजुक समयमे कतेको मैथिली फिल्ममे गीत गयलाह अछि । जाहि मे प्रमुख अछि अहाँ छी हमरा लेल, चट मँगनी पट भेल विआह, खुर्लुची, एक चुटकी सिंदूर, धांधली, दबंग विधायक, सेनुरक मोल बड्ड अनमोल, रमौल बाली आदि आदि । एकरा अलाबे आरो बहुत रास फिल्म मे हिनकर आवाज आबि रहल अछि । मैथिली गीतक कतेको कैसेट बाजार मे उपलब्ध अछि । अपन आगामी कार्य योजनामे पवन नारायण जी विद्यापतिक किछु गीत पर गंभीर काज क रहलाह अछि ।

जँ अहाँक भेंट पवन नारायण जी' भेल आ अहाँ एकटा अपन पसन्दीदा गीत गाबक आग्रह हिनका स केलियन्हि त हुनका मुँह सँ सहजहि निकलि जाइत छनि -

जाहि बाट पर काँट गरल अछि, ताहि बाट पर चल दिअ
दुर्गति देख हमर जीवन के, टोकू नहि कियो, बढ़ दिअ

 एक्साइज सब इंस्पेक्टरक पुत्र गायक होयताह ओहो मिथिला मे ई गप्प सेहो अजगुत बुझना जाइत अछि । ई बात प्रामाणित क रहल अछि जे आब मैथिल युवा अपन व्यवसायिक क्षेत्र अपना रुचिक अनुसार चयन क रहलाह अछि । पवन नारायण जी आजुक समयमे रिषी बशिष्ठ, सियाराम झा सरस, बैजू चौधरी, महेन्द्र मलंगिया आदिक प्रसंसक छथि । अपना पर्वर्ती पीढ़ीमे आनन्द, सागर, कुमार सोनू आदि हिनक प्रिय शिष्य छनि, जिनका स आगू मैथिली गायन अपेक्षा कयल जा सकैत अछि ।
 
 
जहिना आन आन विधाक आब माहौल बनि गेल अछि तहिना मैथिली गायन लेल सेहो नीक माहौल बनेबाक खगता छैक । ओना फिल्म बेसी बनला स ई माहौल आब बहुत जल्दी बनबाक संभावना देखा रहल अछि ।  मैथिली गायन परम्परामे कतेको लोकनि लागल रहलाह अछि। आजुक समयमे सेहो पचास स बेसी युवा लोकनि लगातार एहि विधामे नीक स नीक काज क रहलाह अछि, मुदा एखन तक हिनका लोकनिक मिथिला साहित्य समाज वाकि बुद्धिजीवी समाज कोनो तरहक लिखित साक्ष्य बनेबाक बेगरताक अनुभव नै केलक अछि । समाजशास्त्री लोकनि चुप छथि । एहि विधामे अपन योगदान देनिहार लोकनिक प्रलेखन अति आवश्यक अछि । एहि लेल गायक लोकनि के सेहो स्वंम ध्यान देबाक जरूरी अछि । 
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मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

सामा चकेबा


मिथिला में भाई-बहन के बीच प्रगाढ़ता का एक मात्र पूजनोत्सव

                 नास्ति भ्रातृसमो बन्धुर्नास्ति भ्रातृसमं सुखम्।
                धन्यास्ता: कृत कृत्याश्च यासाभ्भ्रता सहोदरे॥
                                                                         -  पद्म पुराण

अर्थात्, भाई जैसा वन्धु दूसरा नहीं होता है । ऎसे ही भाई जैसा सुख भी दूसरा नहीं । वह धन्य तथा कृत-कृत होता है, जिसको सहोदर भाई होता है ।
                  यत्प्रसादा दहं मुक्ता सभ्राता मम जीवतु।
                                                                         - पद्म पुराण
अर्थात्, जिनके (भाई) कृपा से मैं मुक्त हुई हूँ मेरा वह भाई जीए।

लगभग पन्द्रह दिनों तक चलने वाला पूजनोत्सव सामा-चकेबा सम्पूर्ण भारत वर्ष का एक मात्र ऎसा पर्व है, जो भाई-बहन के बीच के संबंध के प्रगाढ़ता को दर्शाता है।


सामा चकेबा खेलाइत मैथिलानि
सामा-चकेबा मिथिला के प्रसिद्ध पूजा छठ के खड़ना (पंचमी) के रात्रि से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा के रात्रि तक चलता है। इस पूजनोत्सव में मुख्य रूप से नवविवाहिता तथा अविवाहित युवतियाँ भाग लेती हैं। इस अवसर पर चिकनी मिट्टी का सामा, चकेबा, चुगला, सतभैंया, ठोलिया, खड़रुचि, झांझी कुत्ता, बनतितर, वृन्दावन आदि बनाया जाता है। जैसे-जैसे दिन बीतता है उसी अनुरूप मुर्तियों को भी सजाया जाता है। पहले दिन गीले मिट्टी से मुर्तियों को आकार दी जाती है, फिर उसे रंगा जाता है, वस्त्रआभूषण से सजाया जाता है। और यह पूरी प्रक्रिया गीतों के लय के साथ चलता रहता है। बाँस से बने डाला (चँगेरा) में इन सभी मूर्तियों को सजाया जाता है। जो युवतियाँ खुद नहीं बना पाती वो कुम्हार के घर से बना-बनाया खरीद लाती हैं।
प्रथम दिन सामा का जन्म होता है। जन्म के बाद प्रत्येक दिन युवतियाँ रात में खाना-पीना से निश्चिंत होने के बाद एक साथ मिल-बैठकर सामा तथा भाई सम्बन्धित गीतों को गाती हैं। युवतियों द्वारा बैठना एक गोल घेरा में होता है। आँगन से सभी युवती अपने माथे पर डाला लेकर बाहर को जाती हैं। एक निश्चित स्थान पर बैठकर गीतों के साथ सामा खेलती हैं। वृंदावन का जराना तथा चुगला को झड़काना भी इसी क्रम में आता है। तत्पश्चात, युवतियाँ गीत गाते हुए ही अपने आँगन को वापस आती हैं। अंतिम दिन सामा का भसान होता है। इसे बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है। इसी दिन सामा श्राप मुक्त हुई थी। इस समय समूचे गाँव की युवतियाँ नए-नए/साफ वस्त्र पहन, सज-धज कर एक खाली खेत या मैदान में जमा होती हैं। गीतों की गूँज वातावरण को मोहित बना देती है। सभी डाला को गोल में रखा जाता है। कुछ युवतियाँ मोहक गीत गाती रहती है और उसके लय पर बाकी युवतियाँ कदम-ताल मिलाकर नृत्य करती हैं। यह एक लोक नृत्य का रूप धारण कर लेता है। युवतियों की अलग-अलग टोलियाँ होती हैं और गीत तथा नृत्य का अघोषित प्रतियोगिता-सी चलने लगती है। देर रात को युवतियाँ पूर्णिमा के उजाले में सामा का विसर्जन करती है। पुन: अपने-अपने भाइयों को नए धान का चूरा तथा नए ईख से बने गुड़ उनके गमछी या फाँड़ा में देती हैं। फिर खाली डाला लेकर बटगबनी गाते हुए अपने अपने घर को वापस आती हैं। 

इस तरह देखा जाय तो यह पर्व सामा-चकेबा मिथिला का एक कृषि उत्सव जैसा ही है। इस मधुरता के समाज मिथिला में सामा के साथ देवता की तरह व्यवहार किया जाता है।

इस पूजनोत्सव का कथानक कुछ इस तरह है:

श्री कृष्ण और जाम्बती की बेटी साम्बा (सामा) थी। प्रकृति प्रेमी साम्बा प्राय: घूमने-फिरने जंगल जाया करती थी। जंगल में ही रह रहे मुनि कुमार चारुवक्य से उसे प्रेम हो गया। वह प्रत्येक दिन जंगल में चारुवक्य से मिला करती थी। इधर कृष्ण का सामंत चुड़क था। चुड़क भी अंदर ही अंदर साम्बा को चाहता था। उसे साम्बा का चारुवक्य से इस तरह मिलना जुलना अच्छा नहीं लगता था। एक दिन उसने साम्बा और चारुवक्य के संबंध की खबर पिता श्री कृष्ण को बढ़ा चढ़ा कर कह सुनाया। इतना सुनते ही कृष्ण क्रुद्ध हो गए। साथ ही अपनी प्यारी बेटी साम्बा को श्राप दे दिया तुम चकबी चिड़ै (एक प्रकार की चिड़िया) बन जाओ और जंगल में ही विचरती रहो। श्राप के साथ ही साम्बा चकबी बन गई, पर, उसने भी चूड़क को श्राप दे ही दी - जिस मुँह से तुमने हमारी चुगली (शिकायत) की है, कलियुग में हमरी बहनें तुम्हारे उसी मुँह को झड़काएगी (जलाएगी)। इस श्राप से चुड़क तिलमिला उठा। साम्बा से बदला लेने के लिए सोचने लगा।


इधर साम्बा के वियोग में चारुवक्य बहुत दुःखी रहने लगा। साम्बा से पुनरमिलन के सारे रास्ते बंद देखकर चारुवक्य ने औढ़रदानी महादेव के तपस्या में लीन गया। तपस्या से महादेव प्रसन्न होकर चारुवक्य से वरदान माँगने को कहे। वरदान में चारुवक्य ने अपने को चकबा बना देने को कहा। भगवान महादेव के एवमस्तु के परिणाम स्वरूप चारुवक्य मुनिकुमार से चकबा चिड़ै बन गया तथा साम्बा के साथ चकबा-चकबी के रूप वृन्दावन में रहने लगा।

यह जान कर की साम्बा और चारुवक्य दोनों जंगल में फिर से एक साथ चकबा-चकबी के रूप में रहने लगा है चुड़क को यह अच्छा नहीं लगा उसने वृन्दावन जैसे सुन्दर जंगल में ही आग लगा दिया ताकि आग के साथ दोनों ही जल कर मर जाय। पर, अचानक ही बारिश शुरु हो जाती है और आग बूझ जाती है।

इधर साम्बा का भाई साम्ब, जब अपनी शिक्षा पुरी कर गुरुकुल से लौटता है तो अपनी बहन के चकबी बन जाने के कारण उदास रहने लगाता है। वह अपने बहन साम्बा को फिर से मानव रूप में लाने के लिए अपने पिता श्री कृष्ण से अनुनयविनय करता है। अंत में कृष्ण ने भी द्रवित होकर साम्ब को अपनी बेटी साम्बा के मुक्ति का मार्ग बताया। उसी अनुसार साम्ब ने द्वारिका के स्त्रियों से आग्रह कर अपनी प्यारी बहन को मानव रूप में पुन: पाने के लिए वैसा ही करवाया जैसा कि श्री कृष्ण ने कहा था, अर्थात सामा बनाकर रँगा गया, उसे डाला में सजाया गया, पुन: खेत में खेला गया। इस क्रम में ही वृन्दावन के मूर्ति  को जलाकर चूड़क के मुँह को झड़काया भी गया। इसके बाद ही भाई साम्ब की बहन साम्बा (सामा) तथा बहनोई (चारुवक्य) कार्तिक धवल पूर्णिमा की रात अपने मानव रूप को प्राप्त हुए। उसी दिन से तथा उसी विधि से आज भी मिथिला समाज में युवतियों द्वारा सामा-चकेबा का खेल-खेला जाता है।

सामा-चकेबा में गाए-जाने वाले गीत कई प्रकार के होते हैं। आँगन में गाने वाले गीतों में सामा के अवतार तथा भाई-बहन सम्बन्धी गीत गाए जाते हैं। जैसे :
अएलै कातिक मास हे, सामा लेल अवतार
कानि-खिझि चिठिया लिखौलनि फल्लों बहिनों
भेजलनि हजमाक हाथ ।

(कार्तिक का महीना आया है, सामा अवतार ली है। रूठकर रोकर फल्लीं (किसी बहन का नाम) बहन चिट्ठी लिखवाकर , हजाम के हाथ भिजबायी है।)

इसी तरह दूसरा :

सामा खेल गेलियै हौ भैया, फल्लां भैयाक टोल ।
डलबा हेराय गेलै हौ भैया, बिछिया लए गेल चोर॥

(सामा खेलने गई फल्लां (किसी भाई का नाम) भैया के टोल (मुहल्ला) में। हे भैया डाला भुला गई, बिछिया (एक प्रकार का गहना) कोई चोर ले गया)

भाई-बहन संबंधी कुछ और भी गीत आँगन में गाए जाते हैं। गाए जाने वाले गीतों की संख्या गीतगाइन के मन, समय तथा भाइयों के संख्या पर निर्भर करता है। यदि गाने का मन तथा समय है तो अधिक से अधिक गीतों में भाइयों के नामों को भरा जाता है, पर, यदि समय तथा मन नहीं है तो कुछ ही गीतों में भाइयों के नामों को भर कर समाप्त कर दिया जाता है।

अब बारी होती है बटगबनी की। बटगबनी यानी रास्ते में गाए जाने वाले गीत। यह आँगन और सामा खेलने के स्थान के बीच होती है। इसे दो बार गाया जाता है। पहली बार आँगन से खेलने के स्थान पर जाने के समय और फिर दूसरी बार वहाँ से वापस आँगन आने के समय। इस बटगबनी में अधिकांश गीत विद्यापति के होते हैं। आँगन से निकलने समय:

डाला ल बाहर भेली बहिनों से फल्लीं बहिनो
फल्लां भैया लेल डाला छीन, सुनु हे राम सजनी ...

सामा खेलते समय:

साम-चक साम-चक अबिह हे... अबिह हे...
कूर खेत में तू बैसिह हे ... बैसिह हे ...

वृन्दावन में आग लगाने के बाद :

वृन्दावन में आगि लागल केओ ने मिझाबै हे ...
हमरो से फल्लां भैया सेहे मिझाबै हे ...

चुगला के मुँह झड़काने के बाद:

चुगिला करे चुगिलपन बिलाइ करे म्याउँ ...
ला चुगिला के फाँसी दियाऊ ...  

 इसी तरह कई और गीतों को गाया जाता है। सामा-चकेबा में जितने भी गीत गाए जाते हैं वो सभी भाई-बहन के बीच का है, जो अलग-अलग स्थिति का चित्रण करता है। यह विशुद्ध रूप से एक पूजनोत्सव है, जिसमें बहन अपने भाई के दीर्घायु होने की कामना करती है। मिथिला की महिलाएँ सामा को नियम-निष्ठा से देखती हैं तथा देवता के रूप में पूजती हैं।
 


- सिमटता संसार के अगस्त, 2003  अंक में यह आलेख छप चुका है । पर्व कॉलम में पृष्ठ संख्या 37 पर।

  कुल शब्द- 1,379

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

रंगकर्मम् शरणम् गच्छामि...

[ संदर्भ : ई आलेख हुनका लेल अछि जे लोकनि रंगमंच व्यक्तिगत कारण स छोड़लथि आ आरोप दोसरा पर लगबैत छथि । आलेख किनको पर व्यक्तिगत नै अछि, एहन प्रकारक मानसिकता पर केन्द्रित अछि ]

रंगकर्म स लोक जुड़ैत छथि अपन व्यक्तिगत आपेक्षा वाकि आकांक्षा स । किनको सिनेमामे पर्दा पर जीबैत अभिनेता आकर्षित करैत छनि त किनको अपन साहित्यिक पात्र के मंचपर जीबैत देखबाक लोभ रहैत छनि । किनको संगी अनैत छनि त कियो एही कर्म के अपन जीवनक लक्ष्य बनेबाक दृढ़ संकल्प एहि विधामे खींच अनैत छनि ।

किछु समयोपरांत ;  जीवनक विभिन्न ज्वार भाटाक सामना करैत एहि विधामे तन्मयताक संग सक्रिय रहैत छथि । अपन उम्रक संग बढ़ैत बेगरता / आवश्यकता वा एहि क्षेत्रक कर्तव्यनिष्ठा आ माँगक प्रतिबध्यताक अपन सीमा के नीक जेना अकानि एहि विधा स अपना के शनै: शनै: फराक क लैत छथि । मुदा, जा धरि एहि विधा मे संलग्न रहैत छथि ता धरि जे किछु सिखैत छथि तकर नीक जेना दोहन दोसर विधा मे करैत छथि । अर्थात, अतिशीघ्र दोसर विधामे संबलता प्राप्त करैत छथि । कियो डॉक्टर, कियो मास्टर, कियो इंजीनियर, कियो सी.ए. कियो प्रोफेसर [अपना मिथिला मे लेक्चरार के नेम प्लेट पर सेहो प्रोफेसरे देखल जाइत अछि], कियो किरानी त कियो बड़ा बाबू, कियो पत्रकार त कियो सम्पादक आदि आदि बनि जाइत छथि । जीवनक सब भौतिक सुख पयबाक लेल हठ्ठा स खुजल बरद जेना घरमुँहा भ जाइत छथि ।

किछु साल धरि हिनक कोनो तरहक व्यक्तिगत बृद्धिक सूचना नै प्राप्त होइत अछि । सूचना ई भेटइत अछि नीक नौकरी प्राप्त क लेलाह अछि वा नीक ठाम विवाह भ गेलन्हि अछि < नीक ठाम जमीन खरीद लेलाह अछि < चारिपहिया गाड़ी भ गेलन्हि अछि < घर बान्हि लेलाह अछि < आब दू महला ठोकि लेलाह अछि < संतान के दिल्ली / मद्रास मे पढ़बैत छथि < पाइ द कोनो प्राइवेट कॉलेज स एम.बी.ए. / बी.सी.ए. करा रहल छथि < बेटा के कोनो विदेशी कम्पनीमे नौकरी लागि लेलन्हि अछि < घर के दुनू परानी चुप चाप ओगरि क बैसल रहैत छथि आदि आदि...

उपर्युक्त सब भैतिक सुख प्राप्ति केलाक बाद हिनका लोकनि के नीन्द खूजैत छनि कि चेहा क उठै छथि आ तखन मोन पड़ैत छनि मंच बजबाक लेल / भुकबाक लेल । संयोग देखू, तखने अपन विशाल हबेलीक आगू टाँगल लेटर बॉक्स मे भेटैत छनि कोनो सम्पादक पत्र । एहि स आसान काज की ? न हींग लगे न फिटकीरी... । बैसल बैसल किछु लिखू, सौंसे दुनिया नाम पसरि जायत, वर्तमान डिजिग्नेशन संग ।  आब लिखताह की ? त ओही विधा पर जकरा तिलांजलि देने छलाह : नाटक / मैथिली नाटक / मैथिली रंगमंच । नाटको मे सबस आसान कोन काज ? हम एहि कारण छोड़लहुँ त हमरा फल्लां ( जे लोकनि एखन तक लागल छथि ) भगा देलाह । एहने सन अनर्गल प्रलाप । किछु पत्रिका एहने एकालाप / प्रलाप वाकि बुद्धिहीनता स ग्रसित आलेखक संकलन बनि निकलि रहल अछि । अधिकांश लोकनि अपन आलेख मे मैथिली रंगमंचक ह्रास स उठैत छथि आ भंगिमा के संग आजुक मैथिली रंगशीर्ष श्री कुणाल जी पर अपन डिप्रेशन / फ्रशटेशन उतारि दैत छथि । ( हम एहि ठाम भंगिमाक वर्तमान आंतरिक स्थिति वा कि श्री कुणाल जीक व्यक्तिगत सबंध पर किछु नै लिखि रहल छी मुदा जे नाम बेर बेर आलेखक सृजक लोकनि लेलाह अछि ताहि के संदर्भ मे चर्चा क रहल छी । ) तामस ई जे जहिना हम छोड़लहुँ ई लोकनि किएक नै छोड़लाह, किएक लागल रहलाह । वर्तमान रंगकर्मी जे हमरा भगौड़ा कहत ताहि स पहिने हम स्वयं किएक ने आरोप लगा दी । आई रंगमंचक नाम पर किएक हिनके सबहक नाम होइत अछि ? आजुक युवा पीढ़ी किएक हिनके सबहक गुणगान करैत छथि ? तेँ एही लोकनि पर प्रहार कयल जाय । जाहि समय ई लोकनि रंगमंच छोड़लाह ताहि समयक अपन व्यक्तिगत स्थ्ति परिस्थितिक चर्चा किएक करताह ? जे लोकनि सब किछु त्यागि एहि विधा के अपनैलन्हि एक पेरिया पर रौद / बसात, बाढ़ि पानि मे उघारे देहे रंगपथ पर अग्रसर रहलाह तिनके पर आरोप प्रत्यारोप । एहि ठाम रंगदृष्टि स कठघरा मे ई लोकनि स्वयं ठाढ़ छथि । एहि लेल कतेको तर्क अछि ।

एहि सत्यता स किन्नौ नहि नकारल जा सकैत अछि जे सूर्यक रोशनी के सूप स झाँपल नै जा सकैत छैक । तहिना कोनो प्रतिभा के सेहो समाप्त नै कयल जा सकैत छैक । ई भ सकैत अछि जे प्रतिभा किछु समय लेल दबि जाय मुदा ओकरा आगू अयबा स कियो रोकि नै सकैत छैक । एकटा विद्वानक कथन छनि जे कोनो समूहमे आकर्षण स बहुत व्यक्ति जूड़ैत छथि मुदा समयानुसार अकर्मन्य व्यक्ति ओहि समूह स फराक हुअ लगैत छथि । बाद मे एहि सब अकर्मन्य व्यक्तिक सेहो एकटा संगोर बनि जाइत छैक आ एही अकर्मन्यक  संगोर स सकर्मी समूह के अदृश्य उर्जा सेहो प्राप्त होइत छैक । ई उक्ति अक्षरस: सत्य बैसैत अछि मैथिली रंगमंचक संदर्भमे । आई जे लोकनि एहन कलुशित भावना मोनमे रखैत छथि हुनको स हमर बाल प्रश्न अछि जे अहाँ जँ एतेक समृद्ध आ प्रतिबद्ध रही त जूड़ल रहितौं रंगकर्म स । दोसरे ठाम रंगमंच स्थापित क लितहुँ अपना मोनक अनुसार । जँ भंगिमा वा कि श्री कुणाल जी स द्वेस छल त हिनका लोकनि स पैघ लकीर सृजित करितौं । मत्त भिन्नता भेल भंगिमा स, श्री कुणाल जी स कि रंगकर्म स? ई आरोप प्रत्यारोप नीक नहि । गंभीर रंगकर्मी वा कि अबै वला रंगपीढ़ी अहाँक मानसिकता के नीक जेना आँकलित क सकैत छथि । 

हम स्वयं एकटा उदाहरण छी । आई मैलोरंग निश्चित रूपे हमर रंगदृष्टिक प्रतिफल अछि । मैलोरंग हमर आ हमरे सन सन रंगकर्मीक प्रतिबद्धताक परिणति अछि मैथिली रंगमंचक प्रति । हमरा कतेको मैथिली मंच स हटाओल गेल । कतेको मंच स हम स्वयं हटलहुँ तेँ कि हम रंगकर्म छोड़ि देलहुँ ? आकि ओहि सब मंच या व्यक्ति पर हम आरोप प्रत्यारोप करी ? हमरा जनैत ई उचित नहि अछि । हमरो संग कतेको गोटे काज केलाह अछि, अखनो तक प्रतिबद्ध रंगकर्मी संग छथि । कतेको गोटे एहिना अपन व्यक्तिगत कारण स छोड़िक चलि गेलाह । हुनको लोकनि स एहने प्रलाप हमरो सुनबा मे अबैत अछि । एहन प्रलापीक संख्या काल्हि आरो बढ़त, ताहू स हम रंगमंच स विचलित त नहि भ जायब ।  हमर एकटा मित्र के विश्वास छनि जे मैलोरंग रहै, चाहे सैलोरंग रहै, चाहे फैलोरंग रहै प्रकाश छथि त नाटक हेब्बे करतै ।  हमरा प्रति एहन विश्वासक हम आभीरी छी । की, एहन विश्वास अहूँ लोकनिक प्रति नहि होयबाक चाही छल ?

कतेको एहन उदाहरण हमरा सबहक समक्ष अछि । श्री अमिताभ बच्चन के इलाहाबाद रेडियो ध्वनि परीक्षा मे अनुतीर्ण क देने रहैन्हि, अभिनेता मनोज वजपेयी के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय चयन नै केने रहैन्हि । तेँ कि ई लोकनि एहि विधा के छोड़ि देलाह ? रंगमंच विशुद्ध कला थिक । ई कला अत्यंत कठोर छैक । हंस बनि क्षीर पानि के बिलगाबै मे माहिर अछि रंगविधा । अपने कोन दिस छी से स्वयं आँकि सकैत छी ।

 आदरणीय लोकनि अपन आजुक आमदनी के अपन व्यक्तिगत अधिकार बूझैत छथि मुदा रंगकर्म स जूड़ल व्यक्तिक आमदनीक हिसाब सेहो राख चाहैत छथि । एहना स्थिति मे आंतरिक व्यथित भेनिहार के सावधान होयबाक आवश्यकता छनि । आगू अबै बला भविष्य रंगमंचक स्वर्णिम भविष्य अछि । आब रंगकर्मी सेहो नीक घर खरीद सकैत छथि, कार पर भ्रमण क सकैत छथि, हिनको धिया पुता नीक ठाम शिक्षा दीक्षा ल सकैत छनि ।  तेँ एहि बीमारी स छुटकारा पयबाक लेल एक मात्र इलाज अछि । रंगकर्मम् शरणम् गच्छामि...। 
                                                                             - प्रकाश झा

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

समृद्ध मैथिली रंगमंचक समकालीन विहंगावलोकन


किछु दिन पहिने एक संग दूटा पत्रिका पढ़बाक मौका भेटल । दुनू पत्रिका मैथिली रंगमंच पर केन्द्रित । मुदा, पत्रिका पढ़लाक बाद मोन बिचलित भेल । पत्रिका त आजुक समयक अछि । एकर पाठक सेहो आजुक समयक छथि । कोनो पत्रिकाक मूल त आजुक समय आ दृष्टिक प्रस्तुतिकर्ता होइत अछि मुदा एहि दुनू पत्रिकामे छपल आलेख निराधार आ समकालीन स्थिति स कोनो सम्बन्ध नहि रखैत अछि । पत्रिका भले ही अपना गर्भमे रंगमंच के रखने होई मुदा एकर प्रकाशित रूप रंगमंचक घोर विरोधी अछि ।
पत्रिकामे जतेक आलेख रंगमंच पर अछि अधिकांश नकारात्मक सोचके आगू बढ़बैत छैक । सब आलेखक शीर्षके ऊर्जाहीन अछि रंगमंचक संबंधमे किनको प्रतिबद्धताक अभाव देखाइत छनि त कियो भित्ति देखैत छथि । किनको मैथिली रंगमंचक चिंता देखाइत छनि त कियो मैथिली रंगमंचक पटाक्षेप क देलाह अछि । रंगमंचमे किनको समस्ये समस्या सूझैत छनि त किनको एहि मे आधुनिकता नै देखाइत छनि । कियो भोतहा डॉक्टर बनि मैथिली रंगमंचक उंटा साँस गनैत छथि त कियो महिलाक स्थिति पर अपन तापमान बढ़ा रहल छथि । रंगकर्मी के आई आर्थिक स्वतंत्रता भेट रहल छै त हिनका लोकनि के अपन अर्थ पर संकट देखार भ रहल छनि । अहाँ अपना कर्म स पाई कमाउ से नीक रंगकर्मी अपना कर्म स पाई कमेताह त प्रश्नवाचक निशान । ई छनि तथाकथित समालोचकक समकालीन दृष्टि जिनका कान्ह पर समाजक प्रसस्तिकरणक जिम्मेदारी छनि । 
एहि स ठीक विपरित अछि आजुक मैथिली रंगमंच । युवा रंगकर्मी रंगकर्मक प्रति अपन प्रतिबद्धता स सराबोर छथि । एहन उदाहरण एक नै सैकड़ोमे अछि । रंगमंचके भित्ति देखेनिहार के अपन नव नव प्रयोग देखा रहल छथि मैथिली रंगकर्मी । उम्रक अपन अंतिम मैच खेलनिहार के भले ही मैथिल रंगमंचक चिंता आरो दुखित करैत होइन मुदा अखुनका मैथिली रंगमंच आब अपन समृद्धिक उदाहरण बनि रहल अछि, दोसर विधाक लेल । मैथिली रंगमंचक पटाक्षेप करनिहार लोकनि प्रेक्षागृह दिस समय पर आबथु आ मैथिली रंगमंचक उषाकाल के देखथु । मैथिली रंगमंचक समस्याक चिंता कयनिहार महानुभाव के बूझक चाही जे आजुक मैथिली रंगमंच हुनकर पारिवारिक  / सामाजिक चिंता के मंचपर नियमित प्रेषित क रहल अछि ।
ई हमरा घोर आश्चर्य लगैत अछि जे हम सब एना व्यक्तिवादिता दिस किएक बढ़ि रहल छी ? रंगमंच त अछिए समूहक कार्य । एहि मे सामुहिकता अछि । ई कखनो व्यक्तिवादिता स ग्रसित नै भ सकैत अछि । व्यक्तिवादी रचनाशील व्यक्ति कहियो रंगमंच के नीक दृष्टि स नै देखलाह अछि । उदाहरण स्वरूप हम अपन अनुभव कहैत छी । हमरा कतेको फोन अबैत अछि हम फल्लां बाबू बजैत छी, अहाँ सबहक कार्यक जानकारी भेटैत रहैत अछि । अहाँ लोकनि नीक जेना लागल छी । ई कहू जे एखन कोन कोन नाटक सब नव आयल अछि ? वाकि किछु मैथिलानीक नाम कहू जे एखन नाटक क रहलीह अछि ? वाकि एहि साल कोन कोन नव नाटक भेल अछि ?  आदि आदि । कारण पुछलाक बाद ज्ञात होइत अछि जे एहि विद्वान के मैथिली रंगमंच विषय पर होइ बला कोनो सेमिनारमे आलेख पढ़बाक छनि / किनको नाटक पर पुस्तक छपि रहल छै तै मे आलेख पठेबाक छनि आ नै त कोनो पत्रिका के कोनो कोन मे रंगमंच पर चारि पाँती लिखबाक छनि । हमर नाम हुए, हमरा किछु अर्थालाभ हुए, हमरा रंगमंचोक अनुभव अछि, एही बहन्नी कतौ यात्राक मौका भेट जाय आदि आदि व्यक्तिगत सोच चाहे हम एहि विधाके जनैत छी वा नै । एहन सोच किएक बढ़ि रहल अछि उपर्युक्त विद्वतगण मे ? बुझलौं जे अपने महान कवि छी, महान सम्पादक छी, महान कथाकार निबंधकार छी तकर माने ई त नै जे अपने आनो विधा पर अपन सिद्धहस्ता स्थापित करबे करी ।
हाँ, किछु व्यक्ति छथि जिनका बहुमुखी प्रतिभा छनि त ओ हुनकर लेखनी मे देखार होइत छनि । ओ लोकनि एना निराशवादी आ आरोप प्रत्यारोप मे अपन उर्जा नै प्रवाहित करैत छथि । किछु लेखक कनी बुधियार अपना आलेखमे किछु संस्थानक नामों लिखलाह अछि मुदा सब नाम गलती छनि । हिन्दी मे कहाबत छै अकल बढ़ाने के लिए नकल की आवश्यक्ता होती है, नकल करने में भूल हुई तो सकल बिगड़ जाती है । सैह स्थिति आलेख पढ़ला बाद होइत अछि । अपना जीवनमे कहियो रंगमंचक सम्पर्कमे अयलाह । पाछू स हुथकेला पर अपन पाट कोहुना केलाह आ आब ओकरे स्वर्णयुग मानि आजुक रंगमंचक स्थिति पर विचारो देबाक लेल सबस आगू बैसताह । एहन प्रवृत्ति पर रोक लागक चाही ।           
जे तथाकथित विद्वतजन लोकनि आजुक समयमे स्वयं नाटके के आधुनिक नहि मानैत छथि, एहि विधा स जुड़ल व्यक्तिके एखनो हीन भावना स देखैत छथि वैह लोकनि साहित्य अकादेमीक सेमिनारमे मैथिली नाटकक आधुनिकतापर अपन आलेख पढ़ैत छथि । आब एहना स्थितिमे नाट्य विधा स जुड़ल रंगकर्मी लोकनि हिनक एहन प्रदूषित आलेखक पन्ना के रद्दीमे बेचताह ताहिमे ककर गलती ?
आजुक समयमे एहन आलेख किएक लिखल जा रहल अछि तकरो किछु जबरदस्त कारण छैक । पहिने कोनो गामक युवा लोकनि वा शहरक युवा पूजा पाबनिमे अपन आ किछु तथाकथित गणमान्य लोकनिक मोनक रंजन करबाक लेल नाटक क लैत छलाह । फेर साल भरि अपन आन - आन काज धंधा देखैत छलाह । नाटक देखबाक लेल बेर - बेर अनुनय विनय करैत छलाह । आब एकर ठीक उल्टा स्थिति भ रहल अछि । आजुक युवा एहि क्षेत्रमे अपन कैरियर बना रहल छथि तेँ समुचित प्रशिक्षण ल रहलाह अछि । खुशामद क अपन नाटक देखबा लेल सादर आमंत्रण देताह ताहि स जरूरी होइत अछि एहि विधाक विशेषज्ञ के किएक नहि देखेताह जाहि स हिनकर प्रशिक्षणक उचित प्रतिफल भेटत । एहना स्थिति मे लिखार लोकनि त तामसमे एहिना एहि रंग विधाक अर्थी निकालताह ।   
हमरो स प्रश्न कयल जा सकैत अछि जे मैथिली रंगमंच पहिने स समृद्ध भेल अछि तकर की प्रमाण ? - आजुक मैथिल युवा लोकनि एहि क्षेत्रमे नीक जेना स्थापित भेलाह अछि । हमरा लग एहन युवाक संख्या पचास स बेसी अछि । एहि विधामे प्रशिक्षण देनिहार लगभग सब संस्थानमे एक स दू टा मैथिली भाषी प्रशिक्षण ल रहलाह अछि । अर्थ ई जे लगभग पचास युवा एहि विधाक प्रशिक्षुत छथि । लगभग नौ टा युवा एखन भारत सरकार स एहि विधामे छात्रवृत्ति प्राप्त क रहल छथि । पाँच गोटे के जूनियर फेलोशिप भेट रहल छनि आ एक गोटे के सीनियर फेलोशिप । हमरा ज्ञानमे पाँच विश्वविद्यालयमे मैथिली रंगमंच विषय के केन्द्रमे पी. एच. डी. शोध कार्य चलि रहल अछि । की, एहना स्थिति के मैथिली रंगमंचक समृद्धि नै मानल जयबाक चाही ?  
नकारात्मक प्रवृत्तिक व्यक्तिक कथन हेतनि जे बेसी नाटक मंचपर किएक नै देखाइत अछि ? श्रीमान नाटक मंचन देखला बाद यैह लोकनि बेचारे अभिनेता लोकनि के दसटा नसीहत ठोकि दैत छलाह । जखन कोनो गप्प होयत कि अपने गप्प क लगैत छलाह । कतेको बेर आग्रह केलाक बाद ई लोकनि प्रेक्षागृह तक टघरैत छलाह । प्रस्तुतिक बाद बेचारे रंगकर्मी हिनका लोकनि स आशीर्वचन सुनबा लेल नतमस्तक रहैत छलाह । हिनका लोकनिक एक्के ब्रह्म वाक्य हम जे ई नाटक केने रही त एहन महान काज भेल रहै, तूँ सब हरबरी मे क लैत छह, आरो मेहनति कर बेचारे रंगकर्मी मुँह लटकौमे स्व-स्थानम् गच्छ । जखन कि सत्य रहैत अछि एकर ठीक उल्टा । परिणाम भेल जे धीरे - धीरे रंगकर्मी लोकनि हिनका लोकनि के आग्रह पाती छोड़ि देलाह । एकर अर्थ ई लगाओल जा रहल अछि जे नाटक होइते नै छैक । किएक त नाटक शुरू होइ स पहिने आब दीप नै जरैत छैक, भाषणबाजी नै होइत छैक, अनाप सनाप विचार गोष्ठी नै राखल जाइत अछि । जे आम प्रेक्षक छथि ओ लोकनि खूब नीक जेना नाटक ग्रहण करैत छथि आ हॉल भरल रहैत अछि । ई तथ्य हम आजुक कतेको संस्थाक प्रमुख लोकनि आ रंगकर्मी स गप्प केलाक बाद लिखि रहल छी । 
मैथिली रंगमंच मैथिलीक कोनो आन विधा स बेसी मजबूत भेल अछि । एकरा सहर्ष स्वीकार करक चाही । एहि विधा स जुड़ल व्यक्ति मानसिक आ आर्थिक दुनू रूपे अत्यधिक समृद्ध भेलाह अछि । आम मैथिलजनमे कोनो विधा स बेसी लोकप्रिय भेलाह अछि मैथिल रंगकर्मी । मैथिली रंगमंच मिथिलाक संस्कृति आ साहित्य दुनू के आगू अनबामे अग्रणी काज क रहल अछि । आग्रह जे मैथिली रंगमंचक समृद्धि के अकानू । मैथिली रंगमंचक लेल अहाँक लेखनी आ तर्कमे विहंगम दृष्टि रखबाक प्रयोजन अछि । 
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