शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

पत्रिका 'सांध्य गोष्ठी' क दिसम्बर' 12 अंकमे 'मैलोरंग'

पत्रिकाक मुख्य पृष्ठ
सांध्य गोष्ठी [ सांस्कृतिक साहित्यिक एवं सामाजिक चेतनाक संवाहक; चारिम पुष्प ; दिसम्बर, 2012 ]
रंगमंच विमर्श विशेषांक

एहि पत्रिका के रंगमंच पर केन्द्रित कयल गेल अछि ।  एहि पत्रिकाक मुख्य पृष्ठ पर मैलोरंग रेपर्टरीक चित्र छपल गेल अछि । पत्रिकाक द्वारा ई सम्मान पाबि हम सब हर्षित छी । प्रत्रिकामे प्रकाशित लगभग सब आलेखमे मैलोरंग अपन सकारात्मक उपस्थिति बनौने अछि । निश्चित ई मैलोरंग संग जुड़ल प्रत्येक रंगकर्मीक अथक प्रयासक परिणति अछि । पत्रिकामे छपल आलेखमे मैलोरंगक उपस्थितिक किछु बानगी एहि ठाम संग्रहित क रहल छी :




... मैथिली नाटक ओ रंगमंचक ख्याति देशक राजधानी दिल्ली धरि पहुँचल अछि । दिल्लीयोमे आइ मैथिली रंगमंच सक्रिय भेल अछि । ओहिठामक उर्जावान युवक सभ सँ एक नव भरोस जनमल अछि । प्रकाश झा आ हुनक संगोरसँ से विश्वास उपजल अछि । ई एक नीक लक्षण थिक । ...  
-         अशोक [ सांध्य गोष्ठी, दिसम्बर 2012 / 9 ]

... दिल्लीक मैलोरंग प्रदर्शनक निरंतरता ओ स्तरीयता बनौने अछि । प्रकाश एवं हुनक दल एहिमे सक्रिय अछि । ...
- छत्रानन्द सिंह झा [ सांध्य गोष्ठी, दिसम्बर 2012 / 11 ]

 ... एहि वर्ष दिल्लीमे सक्रिय प्रसिद्ध संस्था मैथिली लोक रंग (मैलोरंग) गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोरक एकटा बंगला नाट्य कृतिक मंचन मैथिलीमे कएलक... ...मैलोरंगक संबंधमे तँ तैयो सुनल अछि जे ओकर किछु कलाकार आ कार्यकर्ता पूर्णकालिक छथि आ एकरे अपन आजीविकाक साधन बना लेने छथि । जँ एहन अछि तँ तखन विचार करबाक दिशा बदलय पड़त । ...
- किशोर केशव [ सांध्य गोष्ठी, दिसम्बर 2012 / 23 ]

... दिल्लीमे मैलोरंगमिथिलांगन नाटक संस्था काज क रहल अछि । वर्तमानमे एकमात्र संस्था मैलोरंग अछि । ...
 - कुमार गगन [ सांध्य गोष्ठी, दिसम्बर 2012 / 37 ]

... साधारण मध्यवर्गक युवकक पलायन राजधानी दिल्ली तरफ बेसी भेल । एकर एकटा   साकारात्मक परिणाम भेल मैथिली रंगकर्मक क्षेत्रमे । मैलोरंगमिथिलांगनक स्थापना एकरे परिणाम थिक । मैलोरंग समस्त युवा टीमक रंगसंस्था अछि, आब तँ एकर अपन रैपर्टरी बनि गेल छैक । ...
 - कुमार गगन [ सांध्य गोष्ठी, दिसम्बर 2012 / 38 ]

 ... मैथिलीमे एखन रंगमंच क्रियाशील छै ओ हमरा सूचनानुसार एक मात्र दिल्लीमे अछि मैलोरंग ... ।

- विभूति आनंद [ सांध्य गोष्ठी, दिसम्बर 2012 / 43 ]

 ... लेकिन नियमित जकरा कहबै से एकमात्र रंगमंचक लेल समर्पित छै ओ थिक मैलोरंग, दिल्ली, जे गंभीरतापूर्वक मैथिली रंगमंचकेँ अपन एकटा ठामपर पहुँचेबामे लागल अछि, जे काज पूर्वमे अरिपन, पटना कयलक पश्चात भंगिमा । ...

- विभूति आनंद [ सांध्य गोष्ठी, दिसम्बर 2012 / 43 ]

... भंगिम थस लेलक... आब मैलोरंग काज क रहल अछि । ओ आब एकटा रेपुटेड संस्था भ गेल छै । अखिल भारतीय स्तरपर ओकर ऑफिस छै... ओ सेमीनार करइए... तँ वर्तमानमे कोनो एकटा मैथिली रंगमंचक अछि तँ ओ थिक मैलोरंग । ... 
- विभूति आनंद [ सांध्य गोष्ठी, दिसम्बर 2012 / 44 ]

... आर बहुतो लोक छथि जे जुड़ल छथि रंगमंचसँ, नीक-नीक संस्थासँ जेना प्रकाश झाकेँ लिय ओ जुड़ल छथि मैलोरंगस नीक नीक काज होइत छै । हुनकामे एकटा छनि जे ओ अपन भाषाक काज क रहल छथि, लेकिन नव नव जे कलाकार छथि हुनका सभकेँ ई अपेक्षा रहैत छनि जे हमरा सिरियल भेट जाय ओ कोनो भोजपुरिये किएक ने रहय । ...
- विभूति आनंद [ सांध्य गोष्ठी, दिसम्बर 2012 / 46 ]


                                    मैलोरंग प्रति अहाँ सबहक सदाशयताक हम सब आभारी छी.

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

सुन्दर संयोग : प्रक्रिया, प्रस्तुति एवं परिणति


अनिल मिश्रा तथा नीरा झा
बीसवीं शताब्दी के शुरुआत में जीवन झा ने मैथिलीनाट्य साहित्य के परम्परा में अभूतपूर्व क्रांति की शुरुआत की । कीर्तनिया नाट्य परम्परा के नींव पर जीवन झा ने प्रथम आधुनिक नाटक सुन्दर संयोग की रचना किया । जीवन झा (1848 - 1912) को कविवर की उपाधि से सम्मानित किया गया था । अपनी रचनाओं में जीवन झा ने मिथिला के परम्परा को साथ लेते हुए आधुनिक रूप में सृजित किया है । इनकी रचनाओं में तात्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक सामाजिक स्थिति का विश्लेषण मिलता है । उस समय मिथिला में वैवाहिक स्थिति एक विकराल समस्या के रूप में फैल चुका था । जीवन झा ने अपनी नाट्य रचना के केन्द्र में इसी वैवाहिक समस्या को रखा । मिथिला समाज में तिलक दहेज प्रथा, जाति पाँजि के नाम पर कन्या पर हो रहे अत्याचार एवं अन्य सामाजिक कू-प्रथा पर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में अपनी आलोचनात्मक दृष्टिकोण से अपनी नाट्य रचना की । सामाजिक पृष्ठभूमि को आधार बनाकर मैथिली में नाट्य-लेखन का शुभारम्भ जीवन झा से ही होता है ।  कविवर जीवन झा ने तीन सम्पूर्ण नाटक;
ज्योति झा एवं बबीता प्रतिहस्त
सुन्दर संयोग (1904),
सामवती पुनर्जन्म,
नर्मदा सागर सट्टक

की रचाना किया । वस्तुतः इन नाटकों में मिथिला समाज में व्याप्त विश्वास एवं संस्कार की प्रतिविम्ब मिलता है । प्राय: सभी नाटकों में विवाह समस्या में व्याप्त वासना, प्रेम, मिलन तथा विरह वेदना को आपने कथ्य बनाया है । इन समस्याओं का समाजशास्त्रीय एवं भाषाशास्त्रीय अध्ययन आज भी आपेक्षित है । नाटक में मनोरंजन एवं जीवन की गम्भीर समस्याओं को समान अनुपात में प्रस्तुत किया गया है ।

प्रथम आधुनिक नाटक : सुन्दर संयोग

सुन्दर संयोग नाटक की रचना सन् 1904 ई. में कविवर जीवन झा द्वारा हुई । नाटक का कथ्य तात्कालीन मिथिला में व्याप्त विवाह समस्या को केन्द्र में रख कर रचा गया है । नाटक में मिथिला के पारम्परिक नाट्य परम्परा कीर्तनिया शैली का प्रभाव है । नाटक का मंचन इससे पहले कभी हुआ है या नहीं इसका कोई भी प्रमाण या संदर्भ उप्लब्ध नहीं है अत: यह आवश्यक है कि इस नाटक का मंचन मिथिला के पारम्परिक संदर्भों में किया जाय ।

सुन्दर संयोग नाटक मनोरंजन के साथ ही जीवन के गम्भीर समस्याओं के बीच सामाजिक द्वन्दों को उभारा है, जो की आज के संदर्भ में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना अपने रचना काल के समय था । नाटक का मूल कथ्य मिथिला के परम्परागत कुलीनप्रथा को प्रदर्शित करता है । समाज में व्याप्त जाति-पाँजि, दहेज प्रथा, बहु-विवाह तथा पत्नी-परित्याग जैसे विकृतियों को समेटा गया है ।  

लगभग एक घंटा तीस मिनट का यह संभावित नाटक मिथिला के पारम्परिक नाट्य शैली, नृत्य शैली एवं पारम्परिक संगीत से भरा पुरा है । लगभग एक सौ सात साल पहले लिखे गए इस नाटक की प्रस्तुति रोमांचक अनुभूति प्रदान करेगा । 

प्रथम आधुनिक नाटक सुन्दर संयोग : प्रस्तुति प्रक्रिया

एक सौ सात साल पहले कविवर जीवन झा द्वारा रचित प्रथम आधुनिक नाटक सुन्दर संयोग के मंचन का शोध प्रमाण अभी तक व्याप्त नहीं हो सका है । पर अपने कत्थ एवं शिल्प के रूप में इस नाट्य कृत्ति को प्रथम आधुनिक मैथिली नाटक से सम्मानित किया जा चुका है । पर, आश्चर्य यही है कि विगत एक सौ सालों में इसका मंचन नहीं हो सका था । अत: अब यह आवश्यक हो गया था कि इस नाट्य कृत्ति का मंचन किया जाय तथा इसके शिल्प पर एक बार फिर शोध कार्य को आगे बढ़ाया जा सके । 

·            सुन्दर संयोग को मंचित करने के लिए इसके आलेख को आज के संदर्भ में एक बार फिर से पुर्णलेखन किया जाना अति आवश्यक होगा था ताकि प्रेक्षक इसके समकालीनता को अपने साथ आत्मसाथ कर सके ।

·            नाटक के आलेख में तात्कालीन भाषा का समुचित उपयोग किया गया है । अत: यह भी आवश्यक था कि आलेख में उपयोग किए गए उन शब्दों के समान अर्थ वाले वर्तमान शब्दों का अधिक से अधिक उपयोग हो ताकि अभिनेता के साथ प्रेक्षक भी आसानी से समझ सकें ।

·            नाटक में प्रयुक्त नाट्य शैली के वर्तमान स्वरूप को रखना भी आवश्यक था ।  इसके लिए मिथिला के विभिन्न गाँवों में प्रस्तुत हो रहे नाट्य शैलियों के प्रस्तुति कर्ता के साथ रंगमंडल के अभिनेताओं को प्रशिक्षण देना अति आवश्यक था । इस प्रक्रिया से ही लोक शैली एवं आधुनिक नाटक का एक समिश्रण तैयार हो सका ।
prakash jha