सोमवार, 20 अप्रैल 2020

विद्यानंद झाक सृजन ‘बिछड़ल कोनो पिरीत जकाँ’

प्रकाश झा


 वर्तमान समयमे मैथिली साहित्य रचनामे मैथली कविता रचनाक बहुलता अछि । सातटा रचनाकारमे छ:टा कवि छथि त एकटा साहित्यक अन्य विधामे रचना क रहलाह अछि । सियाराम झा सरस जीक पाँति छन्हि- “सात भाग नोरक सागरमे एक भाग मुस्कान जिनगी ।” तहिना छ:टा रचनाकारके नोरक सागर कहबाक हमरा हिम्मत त नहिए अछि, मुदा ई प्रश्न उठय लागल अछि, जे की काव्य रचना करब एतेक हल्लुक विधा होइछ, जे सातटा रचनाकारमे छटा काव्य सृजक बनि जाथि ? हमरा सभ केँ पढ़ाओल गेल छल जे शुरुआतीमे जुआनीक उन्मादक उठान-कालमे जखन प्रेमक वंशी मधुर मधुर सुरमे तान देब लगै छै तखन कविता निकलितेटा छैक । एकटा मास्साब कहने रहथि जे आदम्य मनोभावनाक सद्य:स्फुरण कविता थिक । मात्र तुकबंदी क लेब, मात्रा जोड़िक छंद बना देब मात्र कविता नहि होइछ । कविक अपन – अपन दृष्टि होइत छैक आ सभक लेखनी ओकर अपन स्वाभाविक अनुकरण करैत छैक, अपन आत्माभिव्यक्तिए रचनाकारक लेखनी स निकसैत छैक । मुदा ई त पुरान बात भेल । 
मुदा वर्तमानमे जखन छ्बोक रचनाकेँ सातम व्यक्ति छोड़ि छ्बो एक दोसराक भूरि भूरि प्रसंसा करैत होथि । दू चारी गोष्ठीमे हिनक रचना पाठ भैए जाइत छन्हि, टोले टोल विद्यापति पर्व समारोह होइत छैक जाहिमे धरोहि लागल कविमे एकटा हिनको आमंत्रण रहिते छन्हि, सरकारी आयोजन स्वतन्त्रता दिवस- गणतंत्र दिवसमे सेहो कोनो ने कोनो जोगाड़े कियो महिला होबाक कारण त कियो जातिगत आधारपर पहुँचिते छथि, विज्ञापन लेल छपाइत अनियमित पत्र-पत्रिकाक भोलामास्टर सन् अवैतनिक संपादक सेहो छपिते छन्हि । आ नै त फेसबुक पर हजारो हजार लाईक भेटिए जाइत छन्हि त आब की एकटा कवि होयबा लेल बच्चाक जान त नाहिए ने लेल जेतैक ?

एहना स्थितिमे अपन काव्यज्ञानपर शंका उचिते बुझना जाइत छैक । कारण, वर्तमानमे त बहुमते स सब किछु तौलाइत छैक ने । दिल्ली त राजधानीए थिक, तेँ उपर्युक्त छ: मे स पाँच दिल्लीए के होबक चाही । चूँकी ई राजधानी छैक आ एहिठाम प्रधानमंत्री जी रहैत छथि, तेँ  एहि ठामक पाँचो काव्यसृजक बाँकी ठाम स बेसी भेल्यू बला हेताह से सब गोटे के मानहि पड़त । हमहुँ सैह मानैत छी, उचित अछि काछु जेना अपन खोह स निकलक गरदनिके सुटका लेल जाय । तेँ ई जनैत जे नीके लिखने होयताह से सोचि अनुरागे काव्य पढ़ब के नमस्कारे क लैत छी । अस्तु...

एहना स्थितिमे हमरा भेटल बिछड़ल कोनो पिरीत जकाँ । कविताक संग अपन पुरान पिरित जकाँ हमहूँ एहि काव्य संग्रहके कोरोनाक वैश्विक लॉकडाउनमे मोनक लॉक खोलबाक लेल चाभी जेना ग्रहण केलहुँ । तकर कतेको कारण छल । पहिल, ई काव्य संग्रह विद्यानंद झाजी सस्नेह उपहार स्वरूप देने छलाह । दोसर, एहि काव्य रचनापर हरेकृष्ण झा, रामलोचन ठाकुर, उदयचन्द्र झा विनोद’, कुणाल, कथाकार अशोक, नारायण जी, केदार कानन सन वरिष्ठ साहित्यकार लोकन्हि अपन मनतव्य देने छथि त युवातूरमे सदन झा, विकास वत्सनाभ, धरणीधर नारायण सिन्हा, शारदा झा, अरुणाभ सौरभ सन युवा सेहो अपन अपन अभिव्यक्ति देलन्हि अछि । तेँ आश्वस्थ होइत काव्यक रसास्वादन लेल बैस गेलहुँ । प्रारम्भ स अन्तधरि साठियो कविता पढ़लाक बाद इएह निष्कर्ष बनल, जे स्व. हरेकृष्ण झा मात्र सत्रह पाँतिमेउत्सवक घड़ी मैथिली कविताक लेल शीर्षक स लिखने छथि । एहि पुस्तक लेल समीचीन समीक्षा छन्हि । अस्तु...

पुन: हमरा मोन पड़लाह वर्तमान सातमे ओ छटा कविहौआ लोकन्हि– की, हुनका लोकन्हि लग एहन एहन रचना कृति नहि पहुँचलन्हि अछि ? वा कि हुनका सबहक मन:स्थिति एहन रचनाक गंभीरता तक पहुँचते नहि छन्हि ? कतौ ने कतौ प्रश्नवाचक चिह्न त छैक ।

 श्री विद्यानन्द जीक कविता कखनो नहि लगइत अछि, जे ज़बरदस्ती लिखायल अछि वा कोनो अनुरोध वा आयोजन लेल हड़बाड़ीमे लिखल गेल होइ । प्राय: सब कविता मोनक विस्तार संग शब्द संकलित कयने अछि । कोनो कविता बारह पृष्ठ धरि विस्तार पौने अछि त कोनो मात्र आठ शब्दमे परिपूर्ण भ गेल अछि । कविता एहन  जे आँखिक आगू सम्पूर्ण चित्र ठाढ़ क दिए । कविताक पाँति एहन जे मन:स्थिति के उद्वेलित क दिए आ कविताक एक एक शब्द एहन जे अप्पन आ अपनत्वक सुगंध दैत बुझना जाय । किछु कविताक शीर्षक जेना – बरखा केँ सुनैत, ओछौन फूलक, जीवन खाली आमे जामुन टा तँ नइँ होइ छै, ओ चिड़ै बन चाहै छलीह, बैगनी रंगक बुस्सट, मुइल लोक केँ टेलीफोन आदि । उपर्युक्त शीर्षक पाठक केँ अनायास अपना दिस खींचैत अछि । एक एक शब्द अपन लगैत अछि ।     

अपन कवितामे विद्यानंद जी गामक माटि-पानि स विश्वक घटना – परिघटना के एक संग अपन कवित स तेना मिश्रण करैत छथि, जे दुनू के फराक करब मुश्किल होइछ । अपन खाँटी मैथिल शब्द लबान के मोन पाड़ैत समकालीन बाजारवाद पर अद्भुत शब्द प्रहार छन्हि नइँ लीखल रहै छै / पैकेट वा ठोंगा पर / जाहि मे बेसाहि बेसाहि / अबैत अछि आब अन्न / घर मे हमर अहाँ सबहक / कटनीक तारीख / आकि दौनीक दिन / कहिया ओसाओल गेल / आ सुखैल गेल कहिया / लीखल रहै छै मात्र / पैक करबाक तारीख...  


अपन बैगनी रंगक बुस्सट के बहन्ने कवि सम्पूर्ण वैश्विक स्थिति – परिस्थितिस पाठकक हृदय के झकझोड़ैत विवसक अपन आहार्य स स्नेह उत्पन्न क दैत छथि । मुइल लोक केँ टेलीफोन वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, विकास आदिक स्थितिक जानकारी विद्यानंद जीए द सकैत छथि ।      

जखन हिनक कलम राजनीतिक परिपेक्ष दिस बढ़इ छन्हि त सरकार आ वर्तमान राजनीति पर सेहो प्रहार करैत अछि आ से खूब संधानि क करैत अछि । ओकर मोंसि सोनितो स बेसी टुहटुह लाल भ जाइत छन्हि । तानाशाहक परिभाषा दैत छथि – मुदा / कैक टा धनपतिक धन / कैक टा सेनाक बल / रहितहुँ / डेरायल रहैत अछि तानाशाह... । निपत्ता शब्द के लोकल स ग्लोबल बनबैत कहैत छथि – एही सबहक बीच /  निपत्ता होइत छथि नजीब / जनिका ताकि नइँ पबैत छनि  / एक टा विश्वशक्ति देशक सरकार / सरकारक पुलिस... ।

भाइ आ बहीन के एक्के गाछक दू ठाढि स संज्ञपित करैत कवि बसातक सिहकी, कनियाँ पुतरा, आमक झक्का, खड़होरि, सेमार, पोखरि, फटलाहा सीरक, रौदी, दाही, कुचरैत कौआ, पूसक कनकनी, हिचुकी, बकौर संग डी.एन.ए ., ट्रेन, मोबाइल के जोड़ैत जखन बहीन लेल कहैत छथि – गेली एहन ठाम लागि जाइत छलनि देसाँस जत तखन कोनो सहृदय पाठक आद्रित भेने बिना नहि रहि सकैत छथि ।       

अंतत: विद्यानन्द जी वर्तनाम समयक अनिवार्य कवि छथि । हिनक रचना आम पाठक स बेसी जरूरी हुनका सभ लेल छन्हि, जे रचनाशीलतामे संलग्न छथि । सर ! एत्तेक गंभीरता संग रचना करबाक लेल बहुत बहुत आभार । 



बिछड़ल कोनो पिरीत जकाँ

रचनाकार : विद्यानंद झा


कुल पृष्ठ : 144.  मूल्य : 300/-

अंतिका प्रकाशन प्रा. ली.

शालीमार गार्डेन, एक्सटेंशन – II

गाज़ियाबाद, उ. प्र. – 201005। 



                  

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

कोरोनाक लॉकडाउनमे ‘सूर्यमुखी’क फुलायब




प्रकाश झा



किछुए दिन पहिने मैथिली लिटरेचर फ़ेस्टीवल-2019मे आरसी प्रसाद सिंह जीक सूर्यमुखी पुस्तकपर नजरि पड़ल । मैथिली अकादमी, पटना स 1981 ई.मे  प्रकाशित  एहि काव्य कृति केँ खरीद खुशी खुशी घर अनने रही । एहि बीच एक दू बेर पढ़बा लेल नियार कयबो कयलहुँ, मुदा लागल, जे एहि कृति के हड़बड़ीमे नहि पढ़ल जा सकैत अछि, तेँ पुस्तक कतेको महीना स टेबलपर रखले छल । एहि कोरोनाक लॉकडाउन नीक जेना घर बैसा देलक । जखन सौंसे दुनिया त्राहिमाम क रहल अछि तेहना समयमे सूर्यमुखीक फुलायब हृदयक आँखिके कतेक शीतलता प्रदान करतइ से ओ लोकन्हि अवश्य जनताह, जे सूर्यमुखीक फुलायल थोंकाके काहियो नीक स निहारने हेताह ।



कविवर आरसी प्रसाद सिंह जीक लिखल कथा हिन्दी पाठ्यपुस्तकमे पढ़ने रही, मुदा हिनक काव्यक रसास्वादन सेहो मैथिलीमे पढ़ब हमर पहिल अनुभव छल । एक स एक समीक्षक, समालोचक एहि काव्यक विश्लेषण कयने हेताह, मुदा हमर अनुभव रौदायल बटोहीकेँ कागजी नेबो देल सरबत पियब सन अछि ।



पुस्तकक प्रवेशिका सात भागमे बाँटल छैक । जाहिमेँ कवि महोदय स्वयम् लिखइत छथि जे- “हम हिंदीसँ मैथिलीमे आयल छी ।” स्वयम् केँ मैथिलीमे अयबाक लेल बहुत सुंदर कथाक प्रसंग लिखने छथि । एहि लेल हुनका स्व. अमरनाथ झाक ओ भाषण सेहो प्रेरित केलकन्हि जे अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलनक मंचसँ अध्यक्षीय भाषणमे निर्भीकता पूर्वक ओ बाजल छलाह जे मैथिली हमर मातृभाषा अछि आ हिन्दी राष्ट्रभाषा    



पोथीमे कुल 61टा  कविता आ 36टा मुक्तक संग्रहित अछि । सन् 1981 ई.मे  प्रकाशित एहि पुस्तकमे आरसी प्रसाद सिंह जी, जे किछु लिखलाह अछि, से आजुक समयमे सेहो अक्ष्ररस: ओहिना अछि । अपन रचना मे श्री सिंह लगभग सभ विषय केन्द्रित काव्य रचलथि अछि – जेना प्रकृति, समाज, युवा, देशभक्ति, मातृभूमि मिथिला, नैतिकता, आत्मचिन्तन, जन-जागरण आदि आदि । कविता चेतना-तरंगमे रंगमंच के केन्द्रित करैत लिखाइट छथि :  रंग-मंच पर उतरी गेल नट अनंग । छूबि गेल आइ कोस चेतना-तरंग ? । तहिना जखन सनातन पुरुष रचइ  छथि  बिना क्रिया पद केँ मात्र शब्दक संयोजन स सुंदर बिम्ब उभरि जाइत अछि :  ग्राम, नगर, पाथ, हमर मनोरथ, कला, सभ्यता, संस्कृति-ग्राहक । आगम, निगम, काव्य, स्मृति, दर्शन, नाटक, नृत्य केर संवाहक । आ जखन प्रकृति लेल शब्द गढ़इ छथि त हिनक कलम स निकलैत अछि : वर्षा-ऋतु आयल पुनि, नाचि उठल मन-मयूर । धानक नामक उपयोग तेना करैत छथि जे अगल बगल गमागमाय लागत :
आँगन मे हमर सुआपंखी गमकाइत धान । देसक एकता लेल हिनक विचार छन्हि : आइ भारत-भारती सम्पूर्ण, भारतवर्ष – भरिमे, भरी रहल अछि भावना, हम एक छी, हम एक छी । युवा तूरलेल लिखैत छथि : पुरा लै छै अपन प्रण रोपि, जे हठ ठानै छै ! युवा जे क्रांति – जीवी रक्त, की अवरोध मानै छै ! आ यौवन के परिभाषित करबा लेल कहैत छथि : अनंगक अंग, केशक रंग, ने आसंग – दर्शन छै ! मन: स्थिति जे परिस्थिति – मुक्त, तकरे नाम यौवन छै ! युवामे क्रांतिक जोश संग ललकारा दैत - मैथिलीक क्रान्ति – पूत जागी रहल छै ! करू वा मरूक लगन लागि रहल छै !  जखन मिथिलाक समाज अकाल ग्रस्त छल तखन कविक वेदना सेहो प्रकट होइट छन्हि : मंच पर शोकांत नाटक, अश्रु – विगलित भ रहल अछि । के एहन निर्मम विधाता, क्रूर अभिनय क रहल अछि ॥



एहि प्रकारे देखल जाय त आरसी प्रसाद सिंह जी अपन वर्तमानमे भ रहल सम्पूर्ण सामाजिक, राजनीतिक परिवर्तन, घटना – परिघटनाक लेल अपन काव्य रचना केलन्हि अछि ।




हिनक रचना मे मैथिली भाषा आ मिथिलाक ग्राम्य जीवन मे प्रचलित लोकोक्तिक सेहो खूब नीक जेना उपयोग केलथि अछि : लोकोक्तिक प्रयोग हिनक भाषामे आरो बेसी अपनत्वके भिजा देलक अछि । बहुतो लोकोक्तिमे किछू निम्न अछि : 1. सूरदास बुझतै घी तखने, जखन पात पर गड़गड़ेतै तखने, 2. बाड़िक पटुआ तीत, 3. गूड़क मारी जनै छै धोकरे, 4. ऊँच भ गेल बांह स खत्ता, 5. मोन चंगा, कठौती मे गंगा,  6. आगि लगे पर कूप खुनै-ए,  7. भोजक बेरमे कुम्हर रोपै आदि आदि ।  



अपने लोकन्हि स सेहो आग्रह जखन समय भेटय त आरसी प्रसाद सिंह जीक काव्य कृति सूर्यमुखी अवश्य पढ़ी ।





सूर्यमुखी

रचनाकारा : आरसी प्रसाद सिंह


प्रकाशक : मैथिली अकादमी, पटना

तृतीय संस्करण : 2011

मूल्य : 60/- टाका

कुल पृष्ठ : 157