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| प्रो. नामवर सिंह से प्रबोध साहित्य सम्मान ग्रहण करते हुए स्व. प्रो. मायानंद मिश्र |
आज मायानन्द मिश्र अपने पार्थिव
शरीर से तो नहीं, पर अपनी कीर्ति से हमारे बीच हैं, उनकी कीर्ति हमें सतत
प्रेरणा दे, यह प्रार्थना मैं उसी दिवंगत आत्मा से करता हूँ।
मैं कब और कैसे मायानन्द मिश्र
का निकटवर्ती हुआ, मुझे याद नहीं आता। मेरे किस आचरण और भक्ति के कारण उन्होंने
मुझसे कहा—सही अर्थ में मेरे जीवन-संघर्ष, निष्ठा,
साहित्यिक प्रतिबद्धता के वास्तविक उत्तराधिकारी महेन्द्र(प्रो. महेन्द्र,
मैथिली विभाग, सहरसा, बिहार) और तुम ही हो। उनका यह वक्तव्य जब मैंने उनके ज्येष्ठ
सुपुत्र विद्यानन्द भाई को सुनाया, तो उन्होंने कहा कि—सही तो बोले थे बाबूजी। अपनी सेवाकाल के अन्तिम दिन वे दिल्ली आए हुए थे।
सीधे मेरे कावेरी हॉस्टल, जे.एन.यू., रूम नम्बर 231 में पहुँचे। कमरे में पाँव रखते ही बोले—आइ हमर नोकरीक अन्तिम दिन थिक (आज मेरी नौकरी का अन्तिम दिन है)। उनके
चेहरे की उस वक्त की चमक आज भी जस के तस मेरी आँखों में बसी हुई है। दो दिन बाद जब वे वापस जाने की तैयारी करने लगे, तो
मैंने कहा—सर, रिटायर्ड आप हो चुके, रिटायरमेण्ट
के बाद लोग सन्तान के पास जाते हैं। शिष्य भी तो सन्तान ही होता है। जाइएगा
आराम से। बातें मैथिली में हो रही थीं। उन्होंने तपाक से कहा—हेहौ, से भइए गेलै। देखहक ने। सेवानिवृत्तक पहिल दिन तोरे संग रहिअ' ने
(हाँ, देखो न, वही तो हुआ, सेवानिवृत्ति
का पहला दिन तुम्हारे साथ ही बिताया)...। बहुत बात हैं कहने को, अभी तो इतना
ही ध्यान आ रहा है कि डेढ़ वर्ष पहले मेरे पिता का देहान्त हुआ। आज एक बार फिर
लग रहा है कि मैं पितृशोक में हूँ।
एक सभ्यता का प्रस्थान :
कुल उनासी वर्ष
चौदह दिनों की आयु पारकर मायानन्द मिश्र 31 अगस्त 2013 को साढ़े चार बजे सुबह
हमारे बी से चले गए, उनका यह प्रस्थान भारतीय साहित्य के लिए, खासकर मैथिली
साहित्य के लिए एक सभ्यता का प्रस्थान है, एक परम्परा का प्रस्थान है। उस
सभ्यता और परम्परा का प्रस्थान, जिसे उन्होंने बड़ी संजीदगी से अपने समवर्तियों
के साथ कोई साठ बरस पूर्व शुरू किया था। साठ के दशक में स्थगन का शिकार हुई मैथिली कथा
को ललित और राजकमल के साथ उन्होंने न केवल अपूर्व समृद्धि दी, बल्कि एक नया क्षितिज
भी दिया। बड़ी मुश्किल से हरिमोहन झा द्वारा बनाए गए विशाल पाठक वर्ग को इन तीनों
की टीम ने कथा-कौशल की नई-नई भंगिमाओं से परिचय कराया। मैथिली कथा अपनी सीमित परिधि
से बाहर आई। कथा और उपन्यास के अलावा निरन्तर रचनाशील मायानन्द ने एक तरफ मानवीय
संवेदनाओं को स्पर्श करते हुए मैथिली गीत को पुष्ट किया, तो दूसरी ओर मैथिली कविता
में अपनी विराट् छवि स्थापित की। हरिमोहन झा, यात्री (नागार्जुन), कांचीनाथ झा 'किरण' और उपेन्द्रनाथ
झा 'व्यास' के बाद मैथिली
उपन्यास लेखन को पूरे दम-खम से समृद्ध करने वाले मायानन्द मिश्र ने अपनी खास जीवन-दृष्टि से सृजनशीलता के नए-नए
रास्ते विकसित किए। इतिहास, समाज,
भाषा (खासकर मातृभाषा), संस्कृति, और मानवीय आचरण के जरिए उसके मन में प्रवेश—उनके चिन्तन-मनन का प्रिय क्षेत्र था।
विराट अध्ययन फलक के विशिष्ट
रचनाकार और अद्भुत मातृभाषानुरागी मायानन्द मिश्र (17.08.1934) का जन्म बिहार के
सहरसा जिले के बनैनियाँ गाँव में हुआ। वे विलक्षण
राष्ट्रीय चेतना और सूक्ष्म इतिहास-दृष्टि के रचनाकार थे। मैथिली और हिन्दी—दोनों ही भाषाओं में हृद्य और प्रामाणिक
सोच के वे विलक्षण रचनाकार हैं। दोनों ही भाषाओं में कवि, कथाकार, उपन्यासकार, चिन्तक के रूप में उनकी विशिष्ट पहचान है।
मंत्रपुत्र उपन्यास के लिए साहित्य
अकादेमी सम्मान, ग्रियर्सन सम्मान तथा
संपूर्ण साहित्यिक अवदान के लिए प्रबोध सम्मान से सम्मानित रचनाकार मायानन्द मिश्र
को उन गिने-चुने रचनाकारों में शुमार किया जाता है, जिन्होंने अपनी हर कृति से साहित्य में एक नया द्वार खोला है।
उनकी प्रमुख कृतियां हैं : मैथिली में भाँगक लोटा, आगि मोम आ पाथर, चन्द्रबिन्दु (कहानी संग्रह), बिहाड़ि पात पाथर, खोता आ चिड़ै, मन्त्रपुत्र, सूर्यास्त (उपन्यास),
दिशान्तर, अवान्तर (कविता संग्रह) हिन्दीमे माटी के लोग सोने की नैया, प्रथमं शैल पुत्री च, मन्त्रपुत्र, पुरोहित, स्त्रीधन (उपन्यास)।
उन्नत चेतना के साथ स्वातन्त्रयोत्तरकालीन
मिथिला समाज को गम्भीरतापूर्वक
रेखांकित करते हुए मैथिली साहित्य में जिस प्रखर प्रतिभाशाली टीम का आगमन हुआ
था, उसमें मायानन्द मिश्र का नाम अगली कतार में सुरक्षित है। आज का मैथिली
साहित्य यदि अपनी तीक्ष्ण नजरों से परिवेश में बहुत कुछ सूक्ष्मता से देख पा
रहा है, तो इसका श्रेय हमारे इस पूर्वज टीम के प्राथमिक उत्थान को ही जाता है।
तथ्य है कि मैथिली कविता और कहानी में राजनीतिक चेतना का उदय पहली बार
मायानन्द के यहाँ हुआ। स्वातन्त्रयोत्तरकालीन वैज्ञानिक उपलब्धि
से वंचित मिथिला के आम नागरिक के मन में बीसवीं शताब्दी के छठे दशक से ही
मायानन्द मिश्र गम्भीरता से झाँकने लगे थे, उन सबके मानसिक उद्वेलन को उनके
मौलिक व्यवहारों से जोड़ने लगे थे। व्यवस्था और समाज के पाखण्ड को उजागर करना उनके
लेखन का मुख्य लक्ष्य था। शिल्प की ताजगी, चित्रात्मकता, काव्यत्मकता और लयात्मकता उनके लेखकीय कौशल की मौलिक विशिष्टता थी, जो एक साथ उनकी रचनात्मकता में व्यंग्यात्मक
बिम्ब का चमत्कार भी भरती थी और भावकों को रोचकता का लोभ भी देती थी।
चन्द्रबिन्दु संग्रह से पहले तो उन्होंने अपनी
कहानी, कविता और उपन्यास के माध्यम से समाज व्यवस्था की विडम्बनाओं पर नजर
रखी, बाद के दिनों में वे इतिहास और मानव सभ्यता के दुर्ग में प्रविष्ट हुए।
मैथिली उपन्यास मन्त्रपुत्र उसी शृंखला की दूसरी महत्त्वपूर्ण
कृति है। साहित्य
और इतिहास की दीवार तोड़ती कृतियों की शृंखला के चार उपन्यास हैं-- प्रथमं शैल पुत्री च, मन्त्रपुत्र, पुरोहित, स्त्रीधन ।
इतिहास और ऐतिहासिक तथ्यों की आधारशिला
पर मैथिली और हिन्दी में अनेक कथात्मक कृतियां
आती रही हैं। इस तरह के उपन्यासों में अक्सर दो बातें अधिक महत्त्वपूर्ण होती हैं
-- लेखक की इतिहास दृष्टि और लेखक का सृजन कौशल। इन दोनों दृष्टियों से मायानन्द अपनी
इन चारो कृतियों में सबसे अलग हैं। मैथिली-हिन्दी के पाठकों के सामने ऐसे विषय पर
आज तक जितने उपन्यास आए, अधिकांश के कपोल कल्पना के कारण कृति की ऐतिहासिकता
नष्ट हो गई है, कपोलकल्पना से कुछ सीमा तक बचाव है भी, उनका आधार रामायण, महाभारत
के गढ़न्त संस्करण अथवा किम्बदन्तियाँ ही रही हैं। उदारण में कई नाम लिए जा सकते हैं।
जबकि मायानंद अपने चारो उपन्यासों में इतिहास की विश्वसनीयता के प्रति पूर्णत: सचेष्ट
और निष्ठावान हैं। अपनी सृजनशीलता पर अतिरिक्त तनाव डालकर भी उन्होंने ऐतिहासिक सन्दर्भों
की रक्षा की है, दीगर बात है कि इस कारण कथात्मक स्रोत को जीवन्त रखने में उन्हें
काफी परेशानी हुई है।
प्राचीन भारत पर लेखक की कथा-योजना
का पहला कृति-क्रम 'प्रथमं शैलपुत्री च', दूसरा 'मन्त्रपुत्र',
तीसरा 'पुरोहित', और चौथा 'स्त्रीधन' है। पहले में
ईसा पूर्व बीस हजार से ईसा पूर्व अट्ठारह सौ तक के कालखंड को कथा-सूत्र में बाँधने का प्रयास किया गया है। मनुष्य द्वारा 'हाथ
और माथ' का एक साथ उपयोग, आग का सन्धान और संग्राहक संस्कृति
का आविर्भाव--ये तीन मानव जाति की बड़ी उपलब्धियाँ हैं, जो हजारों वर्षों के संघर्ष से
प्राप्त हुई। 'प्रथमं शैलपुत्री च' इन्हीं उपलब्धियों
की विकास परम्परा को काफी ईमानदारी और निष्ठा के साथ प्रस्तुत करता है।
प्राचीन भारत पर उनका दूसरा कृति-क्रम
है 'मन्त्रपुत्र' आर्यावर्त की जन्म-कथा है। सरस्वती से यमुना तट तक
आर्यों एवं आर्य-संस्कृति के प्रचार-प्रसार की प्रक्रिया और आर्य-अनार्य के सहज मिलन
की घटना को चित्रित करने की आकर्षक शैली में प्राचीन इतिहास की स्थितियाँ सामने आती हैं। कबीलाई जीवन के सामाजिक सिद्धान्तों
के आधार पर राजा का निर्वाचन, निष्कासन, पुनराभिषेक प्रथा; विवाह संस्कार, कृषि-कार्य के प्रचार, नई पीढ़ी
की प्रगतिशीलता के आगे पुरानी पीढ़ी की रूढ़िवादिता का पराजय, सामाजिक रीति-रिवाज, नारी-जीवन
के विस्तृत परिचय, आर्य-अनार्य सम्बन्धों के व्याकरण आदि के मनोरम स्वरूप यहाँ मिलते हैं। सारांशत: मन्त्रपुत्र'
पूर्व वैदिक युग के उत्तरार्द्ध के अन्तिम
चरण की कथा है।
इतिहासपरक इस शृंखला का तीसरा उपन्यास
'पुरोहित' है। इस उपन्यास की काल सीमा उत्तर वैदिक युग का
पूर्व ब्राह्मण काल अर्थात् ई.पू. 1200 से ई.पू.1000 है। इस काल खण्ड के भारतीय समाज
का रेखांकन, आर्य-अनार्य संस्कृति की मिलन प्रक्रिया, सरस्वती नदी के सूख जाने से सरस्वती
पूजन के प्रारम्भ की तार्किकता इस उपन्यास की बड़ी विशेषता है। यह उपन्यास
उस कालखण्ड के शिक्षा-कर्म, पौरोहित्य-कर्म, कृषि-कर्म, राज-काज और मानवीय जीवन-दर्शन
का स्पष्ट चित्र खींचता है। इस मनोरम कथाकृति से तद्युगीन आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक
और सांस्कृतिक जीवन की जटिल गुत्थियों को सुलझाने में एक दृष्टि स्पष्ट होती है ।
सूत्र स्मृतिकालीन मिथिला के इतिहास पर आधारित
इस शृंखला
का चौथ उपन्यास 'स्त्रीधन'
मिथिला में राजतन्त्र की समाप्ति, जनक वंश के अन्तिम
राजा कराल जनक के अन्याय, दुराचार, नीतिविरोधी प्रवृत्ति, स्वेच्छाचार और एक कुँवारी कन्या के साथ
किए गए दुर्व्यवहार के कारण उसके पतन की कहानी है। उत्तर वैदिक काल के आरम्भ में
विभिन्न जनपदों के स्वरूप स्थिर होते होते आर्यीकरण के माध्यम से राज्यों का सीमा विस्तार
हुआ और समाज कृषि विकास से वाणिज्य की ओर उन्मुख होने लगा। नगरीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी।
वाणिज्य के लिए कैकेय से श्रावस्ती होते हुए चंपा और राजगृह तक की यात्रा जलमार्ग तथा
थलमार्ग से की जाती थी। इन्हीं ऐतिहासिक तथ्यों एवं साक्ष्यों के उपयोग से तत्कालीन
राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक स्थितियों और सांस्कृतिक विकास का
विवरण यहाँ प्रस्तुत किया गया है। एकपत्नीव्रत आदर्श, सामाजिक दण्ड, विवाहोपरान्त पति की सम्पत्ति में पत्नी
के अंश आदि की चर्चा यहाँ प्रमुखता से की गई है।
ऐतिहासिक विषय होने के बावजूद इन उपन्यासों
मे अन्धविश्वास और पाखण्ड को बल नहीं मिलता। उपन्यास का विषय हमें अपने इतिहास में
झाँकने की प्रेरणा देता है और विषय के साथ भाषा
शिल्प का वर्ताव इसे साहित्यिक उत्कर्ष देता है। ऐतिहासिक प्रामाणिकता एवं साहित्यिक
उपादेयता--दोनों ही दृष्टि से ये महत्त्वपूर्ण उपन्यास हैं।
दरअसल यह श्रेय मायानन्द की विलक्षण
भाषा-शैली और शब्द-योजना को जाता है कि शिथिल गति के कथासूत्र में भी निरन्तर
रोचकता बनी हुई है। मैथिली और हिन्दी के ऐसे अनूठे रचनाकार आज हमारे बीच नहीं
हैं। उनकी स्मृति को कोटिश: प्रणाम।
- डॉ. देवशंकर नवीन