गुरुवार, 25 अगस्त 2022

खुरचन भरि सम्मान

प्रकाश झा

 

वर्तमान परिदृश्यमे कहल जा सकैत अछि जे – वीणाक टूटल तारक कर्कस ध्वनि सँ कछमछाइत साहित्यक स्तम्भपर विराजमान अशोक चक्र उड़न-छू होइत खुरचनमे आश्रय लेलाह अछि । वा इहो कि सालो सकछमछाईत खुरचन भाई, अकादमीक सम्मान लउड़न-छू भेलाह । आ से जँ नहि तशेरक तरबाक तर दबल अशोक चक्र उड़न-छू भय खुरचनमे प्रविष्ठ भेल । अपनेकेँ जे मोन हुए से कहि सकैत छियैक । मुदा, एहि बेर हमरा ई खुरचन भरि सम्मान लगैत अछि ।  हम कारण अवश्य कहब... मुदा साहित्यकार लोकनि सार्वजनिक स्वीकार नहि करी से आग्रह । अपनेक सार्वजनिक स्वीकृति अकादमीक लिस्ट सँ नाम बाहर करबा लेल पर्याप्त प्रमाण होयत । अस्तु...

 

जहिया अकादमीक अनुवाद पुरस्कार सँ तरंगित अविरल वीणाक झंकार, अकादमीक सर्वे-सर्वाक कर्ण परिसरमे प्रविष्ठ भेल रहनि, तहिए सँ अकादमीक चक्रधारी केँ एहि स्थिति – परिस्थिति सँ कछमच्छी लागि गेल रहनि । मुदा, वर्तमानमे साहित्यिक वीणाक टूटल तारक तरंग सँ मुक्ति पायब ओहिना अछि, जेना दावानलमे खुरचन सँ पानि ढ़ारब । मुदा, तैयो एहि बेरक लुक्खी (गिलहरी) प्रयास सँ प्रदत्त, युवा आ बाल साहित्य सम्मान, समुच्चा साहित्य अकादमीक आगामी संभावित विभिन्न सूची नामधारी लोकनिमे, खुरचनक मुँहमे स्वाति नक्षत्रक बूंदक सन अवतरित भेल छनि । एहन लोकनि जहिना अनुवाद पुरस्कार लेल अपन बधाई शब्दकेँ जाहि तीव्र वेगसँ धरती लोकसँ ऊड़न-छूस्वर्ग लोक पठेने रहथि, एहि बेर ओकर दुन्ना स्पीड सँ एहि मृत्वलोकक सोसल साईट पर हन-हना देलनि अछि । चारूकात वीणाक तानपर राग मल्हार गनगना रहल अछि । वातावरण सुरभित पुष्पित भेल अछि । साहित्य चक्रधारी अपन अविचल मुस्की संग अपन नगरीक गोवर्धन पर्वतपर बैसि, हत्प्रभ भेल पुरस्कृत रचनाकारक किंमकर्तव्यविमुढ़ भेल मुद्राक अवलोकन करहल छथि, क्षण – प्रतिक्षण अवतरित विभिन्न मुद्रा रेखा के निहारि रहल छथि, ‘आब कहू मोन केहन लगैए गीत गुनगुना रहल छथि ।

 

एहि बेर एक्के झपतल्लामे सभ चितंग । सम्मान लेनिहार चितंग । सम्मान पर टीका – टिप्पनी करनिहार चितंग । सम्मानित रचनाकारक रचना कर्मक एहन बलि प्रदान किएक ? मुदा, सम्मान रूपी भगवतीक आगू बाजि रहल ढोल – पिपहीक एहि कोलाहलमे रचनाकारक चित्कार केँ, के सुनत ? आइ नहि तकाल्हि, जिनक रचना मूल अकादमी सम्मानसँ सम्मानित होबाक चाही छलनि, तिनक रचना केँ बाल रचनाकारक खुरचन भरि सम्मानचक्रधारी कोना नहि मुस्कीएताह ?  रचनाकार कोना नहि विस्मित हेताह ? रचनाकार आब चुप्पी साधि लिखैत रहथुकलमक तरुआरि भँजैत रहथु... खुरचन भरि सम्मानअपन गाँज घर करथु । अकादेमिक अगिला कोनो सम्मानक आस छोड़ि देथु । यैह सत्य अछि, यैह महाजनक निर्णय अछि ।

 

प्रसंग दू –

हेल्लो... मैं अकादमी से । जी कहिए... । सर... प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी कुछ माँगना है आपसे... । माँगना है ? क्या ? अच्छा ओ... खुरचनभाई। जी....  । हा...हा...हा... क्या करेंगी लेकर, सम्मान तो मिलेगा नहीं फिर क्यों... । सर, हमें भी आश्चर्य होता है कि यह कौन सी किताब है, जो सालों से आती रही है, पर सम्मानित नहीं हो पाती है... ।

अकादमीक जूड़ी वर्ष 2015-16 सँ खुरचनभाइक कछमच्छी के पढैत रहलाह, गुनैत रहलाह, ऊँच – नीच सोचैत रहलाह । छ: – सात वर्ष बाद यानी 2022 मे हुनका सबकेँ ज्ञात भेलन्हि, जे ई तनीक व्यंग्य छै, सम्मान देबाक चाही । ओहिना जेना जनश्रुति अछि, जे कोनो सरदारजी चुटुक्का सुनलाक छ: – सात दिन बाद हँसैत अछि । तहिना खुरचनभाइक कछमच्छीक व्यंग्य अकादमीक जूरी छ: – सात वर्ष बाद बुझि सकलाह अछि । एहि छ: – सात सालमे लेखक बेचारे यूवा सएक बच्चाक पिता भगेलाह । लेखनमे सेहो युवा सँ आब पकठोस भगेलाह । आनंदक समय बीत गेला बाद खुरचन भरि सम्मानआनंदित होइत हेताह । कखनो अपना केँ, कखनो अपन खुरचनभाइकेँ आ कखनो अकादेमी के देखैत हेताह । किछु नव सृजन करबाक लेल उद्यत होइत हेताह ।

खुरचन भरि सम्मान अर्पित क’, ‘खुरचन भरि सम्मान ग्रहण क’, एहि खुरचन भरि सम्मानक लेन – देन देखैत मुग्ध छी हम, दग्ध छथि किछु साहित्य समाज, मस्त छथि किछु साहित्य समाज । जूरीक सूची देखि चिंतित छथि साहित्य समाज । दुखमोचन झा, मुनींद्र झा, राजन सिंह जीक मैथिली अवदान हेरि रहल अछि साहित्य समाज । किछुए दिन बाद दू भागमे बँटि जायत ई साहित्य समाज । किछु गोटे अपन नाम कटेता त किछु गोटे अगिला सेमिनारमे अपन नाम लिखेबे करताह । फेर नवम्बरमे खुरचन भरि सम्मानबॉटल जायत । खाली सिंहासन पर  कोनो बधिया कयल छागड़ बैसाओल जायत । 

सम्मानित पुस्तक उड़न-छूके रचनाकार आदरणीय श्री वीरेंद्र काका केँ आ खुरचनभाइक कछमच्छीक लेखक प्रिय अनुज श्री नवकृष्ण ऐहिक यानी रुपेश त्योंथ केँ हृदय सँ बधाई ।

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शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

अविचल वीणा बाजि उठल

हमरा तबड्ड अशोकर्य होइत अछि, जे अपने लोकनि बिना पढ़ने, मात्र आलेखक हेडिंग देखिए कअंदाजा लगा लैत छियै, जे ई आलेख फल्लां विषयपर होयत । एहि हेडिंगमे अविचलवीणामात्र दूटा शब्द के आधार पर कोना अहाँ लोकनि कहि सकैत छी जे ई लेख पक्का साहित्य अकादमीसंबंधित होयत ?

 

हयौ... हम वीणारूपी एहि साहित्यिक समाज सबहिष्कृत तनहिए ने छी । अपने लोकनिक वीणारूपी विश्वासपर हमहूँ अविचलरहबाक प्रमाण देबे करब । तेँ ठीके ई आलेख वर्तमान साहित्य अकादमीए पर थिक । अहिसँ पहिने साहित्य अकादमी सम्मानपर हमर लिखल एकटा टिप्पणी सेहो अहाँ सबके मोन होयत । शीर्षक छल पंगु दृष्टिए पंगुके निहारैत पंगु साहित्य समाज ।

 

आब जे अहाँ सब ई कहब जे एहि नवका लेखकक शीर्षक ओही तर्जपर – ‘वीणाक शिखा सँ स्मरणगाथाकरसास्वादन करैत साहित्य समाजहोबाक चाही तबाबू हमरा माफ़ कदिय। एहि बेर हम ई शीर्षक नहिएटा राखब । एहि बेर रहत - अविचल वीणा बाजि उठल ।

 

हँ... तनबका साहित्य अकादमीक अनुवाद पुरस्कारक चर्च-वर्च खूब भरहल अछि । एकर कतेको कारण छैक बाला साहेब ठाकुर जीक मराठी मानुषक मातृभाषाक उपन्यास, जकर लेखक छथि गोनी बाबा (सावधान - गोनू झा बला नहि) यानी गो.नी. दांडेकर । तकर अनुवाद केनिहारि चण्डीगढ़ निवासी स्व. शिखा गोयल जी; जतक मूल भाषा पंजाबी अछि । कहल जा सकैत अछि जे ई कृति मराठी, पंजाबी आ मैथिलीक तिलासंक्रांतिक खिच्चैड़ थिक आ ताहि पवित्र खिच्चैड़ के सम्मान नहि देल जाय, ई सम्भव तनहिए होबाक चाही । ई पोथी अपन मूल भाषामे सम्मान त' अर्जित कयने अछिए । तेँ एकर कथ्य नीक हेबे करत । रहल एकर अनुवादक भाषा मैथिलीक उत्कृष्ठ्ताक त' से निर्णायक लोकनि पढ़नहि हेताह । शिखा जी कहादनि छ: साल पहिने स्वर्गवासी भगेलीह त' अवश्ये ई पोथी कम स' कम सात साल पहिने अनूदित भेल होयत । सुनै छी जे शिखा जीक पतिक हिसाबे ओ कहियो साहित्य रचना स' जूड़ल नहि रहलीह, मुदा तैयो हुनका नाम स' अनूदित ई पोथी साहित्य अकादमी स्वयं प्रकाशित कयने अछि । कोनो मैथिली पत्र पत्रिकामे कहियो हुनक रचना प्रकाशित नहि भेल । मुदा एक्के फुक्के चानी बला कहाबत के चरितार्थ करनिहारि स्व. शिखाक विद्वता केँ साहित्य अकादमीए चिन्हलक । ओ बेचारी एक मात्र पोथी अनुवाद क' देवलोक दिस प्रस्थान क' गेलीह तेँ हुनक स्मरणके माधुरीसुगंध संग अमररखबाकलेल साहित्य अकादमी बासुकीबनि हुनक स्मरणगाथाकेँ मैथिली साहित्य समाजक अशोकस्तम्भपर टिकली-सिंदुर लगा स्थापित केलक अछि । एहन उत्कृष्ठ काज करनिहारक अहिबात अजर रहनि, अमर रहनि, अविचल रहनि से कामना मैथिलीक सभ साहित्यकार केँ करक चाहियनि ।

 

एक एहि पोथीक सम्मान समैथिली सम्मानित भेलीह अछि, मराठी सम्मानित भेलीह अछि, पंजाबी सम्मानित भेलीह अछि । एतबे नहि एहि पृथ्वीलोक संग संग स्वर्गलोक सेहो आइ प्रसन्नचित्त भेल अछि । तेँ एहि अदभुत कर्म लेल अमरनाथ बाबूक, बासुकीनाथ बाबूक, माधुरी देवीक, अशोक बाबूक आ अंतमे पूर्व संयोजिका परम आदरणिया वीणा ठाकुर जीक मैथिल साहित्य समाज चरण वंदन करथु, माथा टेकथु, सम्मानक पांतिक अगिला मेम्बर हेतु लोलुप बनल रहथु ।

 

जाहि साहित्य अकादेमीक स्थित परिस्थिति पर सबकियो चुप्पी सधने छलाह तकर तार आई मात्र एकटा उत्कृष्ठ निर्णय सतरंगित भगेल अछि, झंकृत भगेल अछि । तेँ एहन स्थितिक लेल कहब जे अविचल वीणा बाजि उठल उचित अछि, सत्य अछि, समिचीन अछि । एहि लेल स्वर्ग लोकमे बैसल शिखा जीकेँ बधाई छनि, पृथ्वी लोकमे बैसल हुनक सर-संबंधी केँ बधाई छनि, दुनू नाथ बंधु यथा - अमरनाथ जी व बासुकीनाथ जीकेँ बधाई छनि, निर्णायक मंडलमे एक मात्र महिला निर्णायक श्रीमती माधुरी झा द्वारा स्वर्गलोग ससमगोत्री शिखा गोयल जी केँ हेरनिहारि तथाकथित विदुषी केँ अषीम बधाई छनि । आ अंतमे अपन कार्यकालमे एक सबढ़ि कएक निर्णय करैनिहार आदरणीय डॉ. अशोक अविचल सर केँ हृदय सँ बधाई छनि ।

 

एहि सब महान विभूति केँ मैथिली साहित्यलेल ऐतिहासिक कर्म करबाक लेल अबै बला पीढ़ी हरदम मोन रखतनि । मैथिलीमे एकटा कहाबत छै कुकर्मिये नाम कि सुकर्मिये नाम । हिनको सबहक नाम हेबे करतनि । ई अबै बला पीढ़ीपर अछि, जे हिनका लोकनिक कर्म के पहिने की लगौताह – ‘सुवाकिकु। अगिला सालक साहित्य अकादेमीक सम्मान तक विराम ।

  

- प्रकाश झा

( पीएच-डी.; नेट; सीनियर फेलो, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार )

प्रकाशन प्रभारी; राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भगवानदास रोड, नई दिल्ली – 01.

मो. + 91 9811774106, फोन : 011 23389138.