गुरुवार, 18 जुलाई 2013

विद्यापति कृत नाटक मणिमंज्जरी के प्रदर्शन स्क्रिप्ट :


 
मैलोरंग रेपर्टरी नव नाट्य प्रस्तुति

विद्यापति विरचित नाटक

मणिमञ्जरी

 

पुणर्लेखन : प्रकाश झा

मथिली अकादेमी, पटना द्वारा प्रकाशित

डॉ. चन्द्रधर झा द्वारा सम्पादित पुस्तकपर आधारित

निर्देशन : प्रकाश झा

समय : सायं 06.30 बजे

दिनांक : 25 अगस्त, 2013[रविदिन]

स्थान : श्रीराम सेंटर, मण्डीहाउस, नई दिल्ली ।

 

पात्र परिचय :

            नट : प्रवीण कश्यप / संतोष कुमार

            नटी : प्रियदर्शनी पूजा / ज्योति झा

राजा चन्द्रसेन : मुकेश झा

मित्र माकन्द : जितेन्द्र झा

            मणिमञ्जरी : प्रियदर्शनी पूजा

कनकलता: नीरा झा

रानी पद्मावती : ज्योति झा

कुन्दलतिका : पलक

कलकण्ठिका : नीरा झा

प्रियवद कञ्चुकी : संतोष कुमार / प्रवीण कश्यप

राजा वसंतराज : मनोज कुमार

प्रतिहारी : रमण कुमार, चंरकांत झा, अमित कुमार, विपुल कुमार 

चन्द्रकांत : प्रवीण कश्यप / चन्द्रकांत झा

संगीत : दीपक ठाकुर, राजीव रंजन झा

नृत्य : रमण कुमार, प्रियदर्शनी पूजा

वस्त्रविन्यास : प्रेमलता

मंत्रपरिकल्पना : प्रकाश झा, दीपक ठाकुर 

मुख सज्जा : मुकेश झा, ज्योति झा

प्रस्तुति प्रबंधन : मुकेश झा

 

प्रथम अंक [ स्वप्न निवेदन]

1. दृश्य :

 

आकाशवाणी
:
आनन्द मंथर, नवोत्सुकताक भावेँ
साम्मुख्य गेल, पुनि लज्जित जे स्वभावेँ ।
ओ कर्णफूल घुमबैत, उमा-महेश
दृष्टि प्रपात, हरओ सब विघ्नलेश ॥
 
नट
:
बेसी आडम्बर व्यर्थ । सभाक आज्ञा भेल अछि जे आइ विद्यापति कविक मणिमञ्जरी नाटकक मंचन कयल जाय । तेँ पहिने प्रिया केँ बजाय संगीतक आयोजन करैत छी ।
 
आँई यै... ! कनेक एम्हर आउ ने .... ।
नटी
:
आज्ञा दिअ आर्य । आब हमरा कोन काज मे लगयबाक कृपा कयल अछि
 
नट
:
आर्ये ! भगवान जगन्नाथक यात्राक प्रसंग मे अनेक दिस रहनिहार चतुर लोकक मण्डली सँ ई सभा शोभित अछि । हिनका सबहक समक्ष हमरा लोकनि अभिनय करबाक प्रयास कयल अछि ।
नटी
:
आर्य ! झूठ जुनि बाजू । अपन अपन काज स निवृत्त भेलाक बाद आ हमर सबहक प्रति प्रेमक कारणे दिल्लीक विभिन्न भाग मे रहनिहार कला प्रेमी लोकनि स ई प्रेक्षागृह भरल अछि ।
नट
:
आ हा...हा...हा... एना हमरा लज्जित नै करू आर्ये । से त हम जनैत छी । हम त एखन विद्यापतिक नाटक मणिमञ्जरी मे लिखल पाँती बाजि रहल छी । 
नटी
:
मुदा आर्य ! नाटक मंचन त आजुक समय मे दिल्ली मे भ रहल अछि तेँ किछु त जोर-तोड़ करैये पड़त ।
नट
:
आर्ये... मोन मे आयल सब गप्प बाजब उचित नै होइत छैक । किछु गप्प गुप्तो त रह दिअ 
नटी
:
हाँ...! त ठीक अछि । समय अवश्य बदलि गेल अछि मुदा आइयो स्थिति ओहिना छैक ।
नट
:
एना नै ने बाजू, आइयो बेसी प्रेक्षक पुरुषे छथि । ई गप्प हिनका सबके खराब लगतन्हि ।
नटी
:
से किएक ? हम त बेसी दोषी स्त्रीए के कहैत छियन्हि । स्त्री लोकनि धन के आकर्षण मे तहियो गलती केलथि आ आइयो करैत छथि ।  
 
नट
:
आ... हा...हा...अहाँ सबटा काज शुरु होइ स पहिने भण्डुल करबाक फेर मे रहैत छी । छोड़ू ई बतकट्टी । वंदना प्रारम्भ करू ।
नटी
:
अबैत जाइ जाउ... वंदना प्रारम्भ करी ।
 
सब कलाकार
:
रसक धार मग्न चित्त, बुध जनक सुखनिमित्त ।
श्रेष्ठ कविक बानि लेल, ई हमर काव्य भेल ॥
काव्य-मार्ग-विज्ञलोक, ध्यान देथु से कतोक ।
नाटिका हमर नव्य, जाहि सञो बनए भव्य ॥
कलाहीन पुनि दोषाकर ओ, अधिक विकास विहीन ।
बाल-उदित इन्दु सम देखथु, सज्जन नाट्य नवीन ॥
 
नट
:
हे सभासद लोकनि । त हम सब प्रारम्भ करी नाटक मणिमञ्जरी
आकाशवाणी
:
हमरो लोकनि के मन एहि नवीन नाटक केँ देखबाक हेतु उत्कण्ठित अछि, तेँ अहाँक अनुरोध स्वीकार कयल ।
नट + नटी
:
हम सब अनुगृहित भेलहुँ ।
नटी
:
चन्द्रमा केँ छोड़ि आन कुमुदिनी केँ जे अलंकृत करैत छथि-से छथि राजा चन्द्रसेन ।
नट
:
हे... आर्ये ! मणिमञ्जरीक विरह मे म्लान, रससुधाक सरोवर मे डूबल हृदयश्रेष्ठ राजा चन्द्रसेन एकांतवास लेने छथि । 
नटी
:
आर्य ! ओ स्त्री धन्या थिकीह जनिका कामदेव सन शरीरधारी चन्द्रसेनो हृदय मे स्थान देने छथि ।
नट
:
प्रिये ! चाहैत छथि, ई की कहैत छी ? ई कहू, जिनक विरह व्यथा सँ राज भवन के छोड़ि, उद्यानक, कात मे अपन मित्र केँ संग ल व्यथित भेल देखा रहल छथि ।
नटी
:
लगैत अछि, मित्र माकन्दक संगे किछु विचार करैत महाराज एही दिस आबि रहल छथि । चलू, आब अपनो सब नेपथ्यक कार्य सम्पन्न करी ।
 
 
 
[प्रस्थान]

 

 

  2. दृश्य :

 

राजा चन्द्रसेन
:
मित्र माकन्द ! स्वप्न मे ओकर पश्चात हम देखल जे अकस्मात अपन सखीक संगे अतिशीतल अपन अवर्णनीय रूप लावण्य सँ सखी सबहक कांतिक तिरस्कार कयनिहारि ओ सरोवर मे अयलीह । 
मित्र माकन्द
:
आगू की भेल मित्र
राजा चन्द्रसेन
:
अकस्मात हुनका देखबाक कारणेँ हमर चित्त अस्थित भ गेल । कोनहुना हुनक प्रभावशालिनी सखी केँ पुछलियन्हि :
 
हे कल्याणी ! ई अहाँक स्नेहक पात्रा कोन कुलक भूषण थिकीह, के पुण्यवान हिनक पिता थिकाह, ई किएक विरह-पिड़ित-हृदया जेकाँ देखि पड़ैत छथि
कनकलता 
:
हे आर्य ! हमर ई प्रिय सखी चन्द्रकांत वैश्यक कन्या मणिमञ्जरी थिकीह । ई कहियो रात्रि शेष मे शय्या पर सूतल स्वप्न मे महापुरुष राजा चन्द्रसेन केँ देखलन्हि । ओही दिन स निष्ठुर चन्द्रसेनक पता के नहि पाबि, हुनक विरह व्यथा केँ नहि सकैत, हुनक अभिलाषेँ बढ़ल काम सँ एहि अवर्णनीय अवस्था के प्राप्त कयने छथि ।
 
गीत
:
कयल पसाहनि केर उपेक्षा, व्यंग्य वचनहुक गेल अपेक्षा ।
सखी-सभा-मध्य-विश्राम छोड़ि, कयल एकांत विराम ॥
कतहु कपोल हाथ पर रोपि, हाथहु मे थिरताकेँ लोपि ।
केवल हुनके चिंता-लीन, चेष्टा आन कयल अति छीन ॥ 
 
मित्र माकन्द
:
मित्र अहाँ स्पष्टे किएक नै कहैत छी जे ओ अहींक समागमक इच्छा करैत अहींक बाट तकैत छथि ।
राजा चन्द्रसेन
:
पश्चात, अत्यंत मंदभाग्य हम प्रात:कालीन वाद्य ध्वनि सुनि जागि गेलहुँ आ हमर स्वप्न अधूरे रहि गेल ।
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! जँ ओहि मान्या मे यथार्थे एहन भाव छन्हि तखन हुनक समागम दुर्लभ नहि रहत ।
राजा चन्द्रसेन
:
दुर्लभ नहि, ई की कहैत छी मित्र ? कोनो विषय सुलभ नहि मित्र !
की पुनि कोनो वधु पवित्र । ताहू पर रूपक आगर- तादृश-प्रिया-प्रसंग अपार ॥
तखन कहू अहीं, एखन आत्माक तुष्टि कोना प्राप्त करी
मित्र माकन्द
:
चलू मित्र भनसा घर जाय, शक्कर पूआ खाई ।
राजा चन्द्रसेन
:
नहि मित्र, मोन नै रूचैत अछि । अतिशीत चंचल तरंग सँ सम्पृत, चंचल फूलक पराग सँ पूरित, लता सभक मण्डपवला एहि प्रमदवन केँ छोड़ि मनोविनोदक दोसर कोन स्थान होयत
मित्र माकन्द
:
[स्वगत] ई भूतक लाँघल जेकाँ शून्य हृदय भेल एम्हर-ओम्हर घूमैत अभागलक बेटा हमरहु बताह बनाओत । दोसर कोनो उपाइयो नै अछि ।
 
[प्रकाश] हे मित्र ! एहि मार्गे इम्हर आऊ । देखू, मकरंद सँ मातल भ्रमर, कोकिलक कूँजन, सुन्दर आमक गाछी, हँसैत मालतीक सुगन्धक प्रसार सँ मोहक प्रमदवन मे विचरण कयल जाय । 
राजा चन्द्रसेन
:
खेद अछि मित्र, खेद ! मन्दभाग्य हम कतय जाऊ
 
हमर प्रिया-रहित एहि वनमे, उचिते मदन सतावय मनमे ।
हमरे सन हुनको नहि वाम, खेदय, से अछि खेद सुठाम ॥
 
प्रियतमाक आकृतिक अनुकरण कयनिहारि लतो हुनका देखबाक कौतुक सँ जेना-तेना हमरा बहटारि रहल अछि ।
 
गीत
:
भवरा चंचल भौंह समान, किसलय देखि अधर हो भान ।
पुष्प-गुच्छ-छवि तुलय अशेष, स्तनक उच्चताकेँ सविशेष ॥
एहि तरहेँ तटलता लखाय, अति प्रिय हुनक शरीर देखाय ।
एहीसँ किछु हो हे मीत ! दुखी हमर मन कने पिरीत ॥
 
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! जखन स्वयं कामदेवे हुनका अहाँक हृदय मे प्रविष्ट करबैत छथिन्ह तखन अनेरे उलहन किएक दैत छिअन्हि
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र ! केवल वेदनाक हेतु, वास्तविक रूपे नहि ।
मित्र माकन्द
:
जँ ई बात छैक तँ हृदय मे कसि केँ बान्हि दिऔन एहि दुष्ट कामदेव केँ ।
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] आश्चर्य ! एहि मूर्ख के सबटा अपनहि समान बुझि पड़ैत छैक ।
 
[प्रकाश] अहाँ नहि जनैत छी जे भगवान कामदेव अशरीर छथि । 
मित्र माकन्द
:
जेनह होथि तेहन रहथु । हुनक विचार सँ कोन फल ? अपने भनसा चलू जतय दही शक्कर खायब ।
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र ! हँसीक कोन प्रयोजन
मित्र माकन्द
:
अहाँ केँ हँसी बुझि पड़ैत अछि; हमरा तँ भूख स मरन समान स्थिति भय रहल अछि ।
राजा चन्द्रसेन
:
फूलक धनु ओ फूले वान, फेँकथि अतनु काम भगवान । 
मन अति चंचल बेधि सताबथि, हा ! हा ! विधि की-की ने कराबथि ॥
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! की अहाँ काम विरह सँ व्याकुल छी ? तँ बिलमू कनेक, महारानी के नेने अबैत छियन्हि ।
राजा चन्द्रसेन
:
विरह व्याकुलता की
 
 
[पद्मावती आ कुन्दलतिकाक प्रवेश]
 
रानी पद्मावती
:
आर्यपुत्र बेर बेर विजयी होथु ।
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] एँ, पद्मावती ! आश्चर्य ! मनोरथ प्रियाक आ उपस्थित भेली पद्मा ?
[प्रकाश] प्रिये पद्मावती ! आई वसंतक समय मे हमरा मन पाड़ि अहाँ अति सुन्दर कार्य कयल । तेँ आऊ समीपस्थ, वसंतक मधुर माधवी लताक मण्डपमे किछु काल सटि क बैसैत छी ।
रानी पद्मावती
:
जे अहाँ के नीक लागए आर्य ।
कुन्दलतिका
:
[स्वगत] यावत ई सभ मण्डप मे प्रवेश करैत छथि ताबत हम रानीक पार्वती व्रतक हेतु फूल लोढ़ि लैत छी ।
राजा चन्द्रसेन
:
भीतर जकर रसपूर्ण अछि लीला विविध, ई मुख कहू,
अपना समान कहाय से चाहैछ, , की चुप रहू ।
रानी पद्मावती
:
आर्य पुत्र ! ई की अभद्र आचरण करैत छी
राजा चन्द्रसेन
:
प्रिये ! ई की प्रतिकूल व्यवहार करैत छी
अहाँ अपन लावण्य मात्रयुत गात्र विशेष न देखी,
तेँ हम कहइछि, छोड़ू साहस, एहन पुण्य नहि लेखी ।
रानी पद्मावती
:
आर्यपुत्र, ई उचित कहैत छी अहाँ, किंतु कोनो व्रत केँ ठानि ओकरा छोड़ब ठीक नहि, तेँ महाराज एखन हमरा अनुमति दिअ । 
राजा चन्द्रसेन
:
प्रिय, व्रत केँ रोकबा मे हम असमर्थ छी, किंतु आगुओ हमर एही तरहेँ ध्यान राखब अहाँ ।
रानी पद्मावती
:
कलकण्ठिका ! अहाँ आगू हउ ।
 
[प्रस्थान]
 
गीत
:
कर्णकटु मधुकर रटओ, पुनि हृदयमे हमरा करओ ।
काम वाण प्रहार, सहसा आम्रतरु माँजरि धरओ ॥
प्रत्यंग मे पीयूष भानुक किरण दाह जनावओ ।
यदि चितमे छी अहँ प्रिये तँ जन्म धन्य कहाबओ ॥
 
राजा चन्द्रसेन
:
प्रति दिन कारी भऊँह-युत- , प्रिया वियोग विचार ।
मित्र ! बाहु भूषित हौअय, नोर-मोति बहु धारि ॥
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! अपना केँ अधीरताक प्रसार सँ रोकू । की अहाँक सन लोक एहन होइत अछि ? संख्याकालक सूचना भय रहल अछि । तेँ, आउ दुनू गोटए सायंकालिक विधिक हेतु प्रस्थान करी ।
 
 
[प्रस्थान]

 

द्वितीय अंक

 

  3. दृश्य :

 

कुन्दलतिका
:
सखि ! नाच घर सँ अबैत स्फटिक मण्डप मे महाराज केँ कामावस्था सँ दुखी जेकाँ देखि, कौतुक सँ रुकि गेलहुँ । जखन काम विरह केँ नुकेबाक उद्येश्य सँ महाराज मचान दिस गेलाह तखने एतय आयल छी ।
 
कलकण्ठिका
:
एतबहि दिन रानीक व्रत मे रहबाक कारणेँ महाराजक एहन स्थिति भए गेल ?
 
कुन्दलतिका
:
हे सोझमति ! रानीक नामो लैत छथिन्ह ?
 
कलकण्ठिका
:
आर ककर नाम लैत छथिन्ह ? 
 
कुन्दलतिका
:
सखि ! राज विरुद्ध बात थिकैक तेँ यदि ककरो नहि कहक तँ हम कहियहु ।
 
कलकण्ठिका
:
हय, तोरे देहक सप्पत जे ककरो हम कहियौक ।
 
कुन्दलतिका
:
जहिया सँ महाराज मणिमञ्जरी नामक कन्या केँ स्वप्न मे देखलन्हि तहिया सँ ओकर संगमक अभिलाषा मे सतत काम विरह सँ विक्षिप्त जेकाँ रहैत छथि, केवल रानीक आँखिक लाथे शारीरिक क्रिया मात्रक पालन करैत छथि ।
 
कलकण्ठिका
:
[चुटकी बजाय] हय तूँ सत्ते कहैत छह : एही कारणे प्रमदवन मे महाराज स्वामिनी केँ मनबैत विरह-विक्षिप्त जेकाँ छलाह । हुनक धीरताक कारणेँ केवल लक्षित नहि भेलन्हि । एँ हइ, ओ मणिमञ्जरी अयलन्हि वा कि नहि ?
 
कुन्दलतिका
:
सुनैत छी महाराज ओकरा लाबि रहल छथि ।
 
कलकण्ठिका
:
सखि, हम त आई पार्वती व्रतक समाप्ति मे लागल रानीक आज्ञा सँ महाराज केँ आनय जाइत छी ।
 
कुन्दलतिका
:
तँ जाह तोँ ओतहि । हमहूँ रानीक समीपवर्तिनी होयब । 

 

4. दृश्य :

 

 
 
[राजा चन्द्रसेन, मित्र माकन्द तथा परिजनक प्रवेश]
 
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र ! व्रतक समाप्ति मे देवीक प्रणामक निर्वाह कयल ।
 
मित्र माकन्द
:
आब आगू की आज्ञा अछि मित्र
राजा चन्द्रसेन
:
बहुत काम पीड़ा अछि, तेँ आउ प्रमदवन जाय कोनो एकांत स्थान मे बैसी, जतय निश्चिंत रूपेँ मणिमञ्जरी प्रियाक वर्णन सुख सँ मन बहलाबी ।
मित्र माकन्द
:
जे अहाँ केँ रूचै मित्र, सैह कयल जाय । [प्रमदवन मे प्रवेश]
राजा चन्द्रसेन
:
मधु टपकैत रसाल लत, हिलबय जे स्वच्छन्द ।
पवन, सेहो नहि मन हमर, करय कने सानन्द ॥
 
मित्र अहीं कहू जे कोन प्रकारेँ आनन्ददायिनी हुनका प्राप्त करी ?
 
मित्र माकन्द
:
मित्र अहाँ अति बेदनायल छी । तावत एहि ठाम विलमू, अहाँक समागमक उपाय हम सोचैत छी ।
 
[स्वगत] जा धरि हिनका कोनो दोसर कर्म मे नै ओझरायब, ई हमरा कनियो आँखि नै झपकाब देताह ।
 
[प्रकाश] मित्र ! अहाँ एहि चित्र पट्ट पर अप्पन प्रियाक चित्र पारू आ हुनके देख देख मन बहलाबू ।
 
गीत
:
हुनक संगम पूर्ति-मनोरथेँ,
मथल चित्त न शांति पबैछ ई ।
न पुनि चित्र पटो बिच चित्रकेँ,
लिखि सकै छी, करै छिअ यत्न की ?
 
 
 
[रानी पद्मावती तथा कुन्दलतिका के प्रवेश]
रानी पद्मावती
:
हय लतिका कह कह की ई सत्ये थिक, जे कोनो आन स्त्रीक ध्यान हृदय मे करैत ओकरे विरह सँ आर्यपुत्र झीण भय रहल छथि ?
कुन्दलतिका
:
हे स्वामिनी हमरा फूसि कहि क की होयत ? हम महाराजक प्रियमित्र माकन्दक मुँहे सुनल जे राजकार्यक पुछारी कय महाराज पुन: प्रमदवनहिँ जयताह । तेँ जे हम कहल से स्वामिनी स्वयं देखि लेल जाय ।
रानी पद्मावती
:
तोहर विचार नीक छहु, तेँ चल हमरा प्रमदवन ल चल
कुन्दलतिका
:
एम्हर आउ स्वामिनी, यैह थिक प्रमदवन ।
रानी पद्मावती
:
लतिका, तोँही पहिने आगू भय केँ बूझह जे स्वामि कोन ठाम छथि ?
कुन्दलतिका
:
देखू देखू स्वामिनी ! महाराजक अवस्था देखू ।
रानी पद्मावती
:
नहि देखैत छियैन्ह, तेँ स्थिर भय कहह जे कोन ठाम आर्यपुत्र छथि ?
कुन्दलतिका
:
स्वामिनी ! ई जे आगू मे अशोकक गाछ देखि पड़ैत अछि तकर दक्षिण-पश्चिम कोण मे अपन मित्रक संग महाराज विरह वेदनाक निवारणक हेतु शीतोपचार मे लागल छथि ।
 
रानी पद्मावती
:
लतिका, तोँ ठीकेँ देखलह ।
कुन्दलतिका
:
स्वामी ओतहि छथि, तेँ स्वामिनी हुनका समीप जाथु ।
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] एँ की ई पद्मावती थिकीह ? अहो... एहि कष्ट केँ धिक्कार । दु:खक संग दु:ख लागले रहैत अछि ।
 
[प्रकाश] प्रिय पद्मावती, आबू, एहि आसन पर बैसि हमरा कोर केँ अहाँ शोभित करू ।
रानी पद्मावती
:
हे, सौभाग्यवान ! हम अहाँक कोर मे चढ़बाक योग्य नहि छी ।
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] गुप्तो बात प्राय: रानी जानि गेलीह । हिनका मनाब पड़त ।
 
[प्रकाश] रानी अहाँ एना नहि बाजू ।
 
यदि मन हमर आन-जनि लागल, अहाँ बुझै छी हे सरले ।
हरि ! हरि! विषम भाग्य स मारल, हम भेलहुँ पुनि निश्चित मरले ॥
रानी पद्मावती
:
मुँह मात्र सँ मधुर भाषी, अहाँक कहब उचित, यदि विरह वेदनाक निवारणक हेतु शीतोपचार नहि होइत रहैत तखन ।
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] धिक्कार, मित्र ई प्रमादी छथि, फेर मनेबाक प्रयास करैत छी ।
 
[प्रकाश] रानी, विपरित शंका व्यर्थ थिक । आई हम वाटिका मे घुमबाक परिश्रम सँ शिथिल-शरीर भय, विश्रामक हेतु लता मण्डप मे आयल छी ।
रानी पद्मावती
:
अनिष्ट सँ हृदयक रक्षा करब उचिते थिक । लतिका, एहि ठाम आब हमरा रहला सँ आर्यपुत्र केँ बाधा होइत छन्हि, तेँ आबह, जाइत जाई ।
कुन्दलतिका
:
स्वामिनी, एम्हर द आउ... ।
 
 
 
[दुनूक प्रस्थान]
 
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] तमसायले चलि गेलीह । जे रुचैन्हि से करौथ ।
 
[प्रकाश] मित्र, प्रिय रानी पद्मा से हो क्रुद्ध भ गेलीह आ प्रिय मणि सेहो नै भेटलीह ।
एहन विषम स्थिति मे की कयल कयल जाय मित्र ? 
मित्र माकन्द
:
हे मित्र संयोग सँ बसंतराज हमर कर देनिहार छथि । तेँ हुनक श्रीपुरनामक नगर पत्र लिखि ककरो पठाय दियौन ।
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र एहि हेतु पहिनहि हम प्रियंवद कञ्चुकी केँ पठाय चुकल छी ।
मित्र माकन्द
:
[स्वगत] सभ व्यवस्था पहिनहि केने छथि ।
 
[प्रकाश] तखन तँ उचिते कर्तव्य कयल अछि मित्र ।
राजा चन्द्रसेन
:
सत्य तँ ई थिक जे ओहू हेतु माँगब लज्जाजनक बुझैत, हमरा कनेको उत्साह नहि अछि ।
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! ओहि माननीयाक प्रति अनुरोधक पद लिखने छियन्हि की नहि ?
राजा चन्द्रसेन
:
ओहि समय हुनक अनुस्मरणक उल्लास सँ किछुए पद लिखलहुँ ।
मित्र माकन्द
:
पद केहन अछि, से सुनबा लेल हमर कान उत्कण्ठित अछि ।
राजा चन्द्रसेन
:
हे हमर मनकेँ विनोद देनिहारि, हम एतय अहाँकेँ देखबाक कौतुक सँ ओहि अवस्था के प्राप्त भेलहुँ; अहाँ कियैक ने कनेको उनमुनाइत छी ?
 
गीत
:
चन्दहिँ निन्दि, न चन्दनो सहि सकै, माला न देखै कने
शय्या पै नलिनी दलो दलित हो-प्रत्यंग आलोड़ने ।
तापो जे विराहाग्नि सोँ अहँक हो से आर्द्र पद्मानिलेँ,
शांतो भेल, परंतु चण्डि ! कनिको नै छी अहाँ चञ्चले ॥
 
मित्र माकन्द
:
हे मित्र, आब व्याकुलता व्यर्थ थिक । शीघ्रे हुनका संग समागम होयत ।
 
[स्वगत] हिनक अभिलाषा-पूर्ण तन्द्राक वेग बहुत दूर धरि बढ़ि गेल छन्हि, तेँ आन दिशिकेँ हिनका घुमबैत छी ।
 
[प्रकाश] हुनक रूपसम्पत्ति केहन छन्हि ? 
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र, ई नीक प्रस्ताव कयल । ओ असाधारण रमणीयता थिकीह ।
मित्र माकन्द
:
अहाँक सन श्रेष्ठक अनुरागे हुनक असाधारण रमणीयताक प्रमाण थिक ।
राजा चन्द्रसेन
:
रतिक कथा नहि, शची वृथा छथि उर्वशिओ के चर्चा व्यर्थ
एहि सँ बढ़ि सुषमा नहि जगमे ककरो, जे उपमा नै समर्थ ॥
मित्र माकन्द
:
हे मित्र, हमर स्नानक समय बीति रहल अछि तेँ एखन आश्रम जाइत छी । 
राजा चन्द्रसेन
:
आह... दिन एतेक उपर चढ़ि आयल ? आश्चर्य ? चलू मित्र... हमरो महल ल चलू । 
 
 
 
[सबहक प्रस्थान]

 

 

तेसर अंक

5. दृश्य :

 

प्रियवद कञ्चुकी 
:
लगैत अछि माननीय वसंतराजक नगर आबि गेल छी । आश्चर्य ! भाग्यवान भेलहुँ ।
राज दरबार मे बिना आज्ञाक प्रवेश करब उचित नहि अछि । एतहि किछु काल धरि राजाक समीप जयबाक अवसरक प्रतीक्षा करैत छी । एहि घरक अंत:पुर मे परिचर सभ मिलि उत्तम ओछाओन करबामे लागल अछि । निश्चित रूपेँ ई बैसिकीक तैयारीक समय होयबाक चाही । एही ठाम राजाक अयबाक प्रतीक्षा करैत छी ।
 
 
[राजा, मंत्री तथा आवश्यक परिजनक प्रवेश]
प्रतिहारी
:
स्वामी ! महाराज चन्द्रसेनक पठाओल एक सज्जन दुआरि पर ठाढ़ छथि, हुनका आनल जाय वा कि रोकि देल जाय ? 
राजा वसंतराज
:
शीघ्र प्रवेश कराओल जाय ।
प्रतिहारी
:
जे आज्ञा स्वामी ।
 
 
[प्रवेश; प्रियवद कञ्चुकी ]
प्रियवद कञ्चुकी 
:
[स्वगत] आश्चर्य ! सभाक बैसबाक क्रम बड़ रमणीय अछि ।
राजा वसंतराज
:
एहि आसन पर अहाँ बिराजमान हउ ।
श्रीमान चन्द्रसेन कुशल छथि !
प्रियवद कञ्चुकी 
:
प्रतिदिन बढ़ैत अपनेक मित्रता सँ कुशल छथि । हे राजन ! महाराज चन्द्रसेनक एकटा विशेष संदेश छन्हि, से अपनेक सुनबाक योग्य अछि ।
राजा वसंतराज
:
सावधान छी, ओ माननीय की आज्ञा देने छथि ।
प्रियवद कञ्चुकी 
:
महाराज चन्द्रसेन नमस्कार पूर्वक, अपनेकेँ सूचित करैत छथि जे, तत्काल, पूर्ण मित्रताक संग चन्द्रकांतक ओहि कन्यारूप रत्नकेँ अपने पठाय दिअ, ओकर पारितोषिक रूपेँ एहि सालक कर छोड़ि देल जायत
राजा वसंतराज
:
आहा... ई त उत्तम विचार अछि । मुदा, एहि हेतु कन्याक पिता श्री चन्द्रकांत केँ बजाओल जाय । प्रतिहारी जाह, चन्द्रकांत वैश्य केँ आदर सहित दरबार मे नेने अबियौन ।
प्रतिहारी
:
जे आज्ञा महाराज ।
 
 
[चन्द्रकांतक प्रवेश]
चन्द्रकांत
:
महाराज विजयी होथु ।
राजा वसंतराज
:
[स्वगत] पहिने ओही राजाक नाम सँ हिनका हम उत्साहित करी ।
 
[प्रकाश] चन्द्रकान्त ! महाराज श्री चन्द्रसेन अहाँकेँ सूचित करैत छथि - 
चन्द्रकांत
:
की आज्ञा दैत छथि ?
राजा वसंतराज
:
, जे अहाँक कन्यारत्न मणिमञ्जरी सँ...
चन्द्रकांत
:
आश्चर्य ! आश्चर्य !! ई त बड्ड पैघ कृपा थिक ।
राजा वसंतराज
:
[प्रियवद कञ्चुकी सँ] तेँ अपने एखन गेल जाओ, हम ओहि भेनिहारि राजपत्नीकेँ शीघ्रे पहुँचबाय देब, अथवा ओ त प्राय: अपनहुँ केँ देखबाक हेतु इष्ट होइतीह ? 
प्रियवद कञ्चुकी 
:
विशेष की, अपने सर्वज्ञे छी ।
राजा वसंतराज
:
चन्द्रकांत ! अहाँ हिनका अपना ओहिठाम पहुँचाय दिऔन्हि ।
चन्द्रकांत
:
जे आज्ञा राजन ! एहि बाटेँ, अहाँ आउ ।

 

 

6. दृश्य :

 

 
 
[मणिमञ्जरी एवं कनकलताक प्रवेश]
मणिमञ्जरी
:
हय कनकलता, आए हमर बामा आँखि बहुत फड़कैत अछि ।
कनकलता
:
अय, शीघ्रे अहाँ के राजर्षि चन्द्रसेनक दर्शन होयत ई तर्क करैत छी ।
मणिमञ्जरी
:
हय, एहनो भय सकैछ जे हमर पिआसल आँखि हुनक मुखमण्डल केँ देखत ?
कनकलता
:
किएक नहि भ सकैत अछि ? विशेष सुन्दरि अहाँ छीहे आ महाराजो गुणक ग्राहक छथि।
 
 
[प्रियवद कञ्चुकीक प्रवेश]
प्रियवद कञ्चुकी  
:
[स्वगत] एँ, ई अपूर्व सौन्दर्यक केन्द्रस्थली के छथि ? लगैत अछि इएह ओ मणिमञ्जरी होइतीह जे हमर स्वामीक भावी पत्नी थिकीह । हिनक भेंट करबाक इएह अवसर नीक अछि । 
कनकलता
:
आर्य, कतय सँ आयल छी !
प्रियवद कञ्चुकी  
:
राजा चन्द्रसेनक ओतय सँ ।
मणिमञ्जरी
:
हय कनकलता, पुछहुन्ह जे कतहु अनतय ई जाय रहल छथि अथवा एतय कोन प्रयोजनेँ आयल छथि ।
प्रियवद कञ्चुकी  
:
[स्वगत] सत्ये ई मणिमञ्जरी थिकीह, अन्यथा राजाक नामे सुनि एना उत्कण्ठित कियैक होइतथि ।
 
[प्रकाश] एतहि, महाराजा चन्द्रसेनक पठाओल, हिनका देखबाक हेतु आयल छी ।
मणिमञ्जरी
:
[स्वगत] की ई सत्य थिक ?
 
[प्रकाश] हय कनकलता, फेरि हिनका पुछहुन्ह जे हिनका पठयबाक कारण ककरहु कहबाक योग्य होइक तँ स्पष्ट रूपेँ कहथि ।
प्रियवद कञ्चुकी  
:
कियैक नहि कहबन्हि; किंतु दू बेरि कहब व्यर्थ । ई पत्र पढ़ि लेल जाय ।
 
[प्रत्र पढ़ैत अछि]
मणिमञ्जरी
:
हा धिक्कार, एहेन मन्दभाग्य हम छी जकरा विरह सँ एहि रूपेँ महाराज क्लेशित भेलाह ।
प्रियवद कञ्चुकी  
:
कनकलता, अहाँक प्रियसखीक विरह व्यथा सँ, दु:खी मन रहबाक कारणेँ महाराज केँ कनेको विश्राम नहि छनि । अत: क्षणो भरिक विलम्ब उचित नहि; एहि हेतु हमरा जे आज्ञा हो से दय ई विदा करथु ।
मणिमञ्जरी
:
आश्चर्य ! की जयबाक हेतु आर्य आरूढ़े भय गेलाह ।
ककनलता
:
अय, अहूँ अपन स्थितिक अनुसार किछु महाराज केँ लिखिअन्हु ।
मणिमञ्जरी
:
हा धिक्कार ! लिखब शुरू करितहिँ हमर शरीर अत्यंत काँपय लागल ।
ककनलता
:
सखि, हमरा पर ओंगठि केँ लिखू ।
 
गीत
:
नामो अहँक भजै छी हम यदि, चन्दा दक्षिण वात ।
नाथ तपै अछि अति, अहँ हिय सँ जाइ न, से आघात ॥
 
प्रियवद कञ्चुकी  
:
हे कनकलता, अहाँ अपना सखी केँ कहिअन्हु जे हमरा जयबाक अनुमति देथि ।
मणिमञ्जरी
:
आर्य जाथु, पुन: भेँट देथि ।

 

 

7. दृश्य :

 

 
 
[मित्र माकन्द, राजा चन्द्रसेन]
मित्र माकन्द
:
आश्चर्य ! बहुत समय पर प्रियमित्रक मनोरथ-वृक्ष फड़ल अछि, जेँ मान्या मणिमञ्जरी कलकण्ठिकाक संग प्रमदवन मे आनल गेल छथि । एखन आब रानी पद्मावतीक कोप मात्र विघ्न छन्हि ।
 
 
[राजा चन्द्रसेनक प्रवेश]
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! पहिनहिँ जेकाँ एखनहुँ भ्रम मे पड़ल आवेग सँ अभिभूत होइत छी । 
राजा चन्द्रसेन
:
पहिने सँ एखन की भेद भेल अछि ?
मित्र माकन्द
:
हुनका सँ भेँट करबा मे केवल पटरानीक क्रोधटा बाधक अछि ।
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र ठीके बुझलहुँ, हम ओही तरहक स्थिति मे छी । पहिनहि जेकाँ एखनहुँ हुनक प्राप्ति मे अहीँ कारण छी । मित्र ! यदि पटरानी विरोधिनी नहि होथि ।
मित्र माकन्द
:
अनुमान करैत छी जे सुखक हेतु विदा भेल लोकक समक्ष पटरानी होइतीह ।
राजा चन्द्रसेन
:
आबहुँ व्यर्थ संतोष प्रकट कय की फल ? मित्र प्रमदवन चलि प्रिय मणिमञ्जरी के देखबाक उत्कण्ठा भ रहल अछि । 
मित्र माकन्द
:
जे आज्ञा मित्र ! चलल जाय प्रदवन ।
 
 
[पाजेबक ध्वनि सुनाइत अछि]
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र माकन्द ओहि दिस पाजेबक ध्वनि सुनबा मे अबैत अछि, प्रायश: पटरानी पद्मा होयतीह । 
मित्र माकन्द
:
मित्र सचेष्ट होयब उचित अछि । हम ता प्रमदवन मे विचरण करैत छी ।
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] रानी पद्मा हमर अनादर करबाक कारणेँ, स्वभाबेँ लज्जित हृदय भय अनुकूल आचरणक हेतु आयल होइतीह ।
 
 
[ रानी पद्माक प्रवेश ]
राजा चन्द्रसेन
:
[नत मस्तक भय ] मानिनि मान छोड़ू, चंचल दृगेँ क्रुर दृदय मम हेरू ।
मलिन कलाधर होथु, विहुँसिकय, सुधावर्षि ! मुँह फेरू ॥
रानी पद्मावती
:
आर्य माकन्दक हाथ मे केहन पत्र देखैत छियन्हि ?
राजा चन्द्रसेन
:
हे देवी ! आई मित्र माकन्द अपनहि गीत रचि पत्र मे लिखने छथि ।
मित्र माकन्द
:
अपने हमरा मूर्ख बुझैत छी ?
रानी पद्मावती
:
हय ललिता, पत्र पढ़ त । यदि सुनबाक योग्य होइक तँ सुनैत जाइ ।
कुन्दलतिका
:
पूर्वोदित अनुराग केँ, झट नहि विसराय पाव ।
संतापिनि मरणोन्मुखी, शशि ! कुमुदिनी किअ भाव ॥
रानी पद्मावती
:
[क्रोध मे] आर्यपुत्र हम बुझिए गेलहुँ ।
राजा चन्द्रसेन
:
हे प्रिये की बुझलहुँ अहाँ ?
रानी पद्मावती
:
नहि किछु नहि । ललिता आगू होअह । चलह एहि ठाम स ।
कुन्दलतिका
:
हे स्वामिनि, जायब उचित नहि, स्वामीक आदर करिअन्हु ।
रानी पद्मावती
:
[अति क्रोध मे] हय अज्ञानी, तोँ नहि जनैत छह, ई गीत आर्यपुत्रक ओहि जीवित प्रियतमा सँ पठाओल गेल होयत । आर्य माकन्दक पाण्डित्य तँ तोहूँ जनितहि छहुन्ह ।
कुन्दलतिका
:
स्वामिनि ! एकरा असम्भव बूझल जाय !
रानी पद्मावती
:
हय सोझमतिया ! यदि से नहि तँ ओ पहिल उत्पन्न अनुराग केँ छोड़बाक आग्रह कियैक छन्हि ?
मित्र माकन्द
:
हे मान्ये ! एना विपरीत कियैक बुझैत छी ? हम सप्पत खा क कहैत छी जे यदि हम मित्रक आगू ई गीत नहि पढ़ने होइ ।  
रानी पद्मावती
:
[हँसि क] ललिता ! आर्य माकन्द जन्मे सँ याज्ञिक छथि तेँ आबह जाइत जाइ । 
कुन्दलतिका
:
[स्वगत] कोन गति । [प्रकाश] एम्हर दने आबथु स्वामिनी ।
 
[प्रस्थान]
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र अत्यंत कष्टक अनुभव करैत छी । हिनक क्रोध पराकाष्ठा पर पहुँचि गेल, तेँ आउ जाय पटरानिञेँ केँ प्रसन्न करी ।
मित्र माकन्द
:
जे आज्ञा । चल जाय । [प्रस्थान]
गीत
:
देवी अपन पैर पर लगलो जे हमरा विलगाय,
कँपैत अधरहि अस्फुट उत्तर दय गेली विसराय ।
केहि विधि से, पुनि ई सुमुखि जे प्रातशीतक रेख,
सदृश विखिन्न होथि से कोना मित्र जाय ई देख ॥ 

 

 

चतुर्थ अंक

 

  8. दृश्य :

 

कुन्दलतिका
:
की सखी, कुशल छी ?
कलकण्ठिका
:
कुशल कतय सँ रहब ?
कुन्दलतिका
:
से कियेक ?
कलकण्ठिका
:
सखी, पटरानी सँ रक्षाक हेतु मणिमञ्जरीक परिचारिकाक रूप मे गुप्त रूपे हमरे नियुक्त कयल गेल अछि । स्वामिनिक अपराध सँ शंकित भय आत्मा क्षणो भरि स्थित नहि रहैछ ।
कुन्दलतिका
:
हे सखी ! आब अहाँ निश्चिंत रहू । कारण, आइ स्वामी कृपा कय स्वामिनीक मानग्रंथि छोड़ओलन्हि अछि, आओर स्वामिनि बजलीह अछि जे मणिमञ्जरी हुनक छोट बहिनि जेना थिकीह तेँ हुनका पर कोनो क्रोध नहि ।
कलकण्ठिका
:
हे सखी, की ई बात सत्य थिक ?
कुन्दलतिका
:
की प्रिय सखी केँ हम मिथ्या कहब ?
कलकण्ठिका
:
हँ, एकर कोनो प्रतीकार नहि अछि ई जानि पटरानी एना बजलीह अछि; अन्यथा ओहि तरहेँ दु:खी मन एना कोना प्रसन्न होइतन्हि ? हे सखी अपन काजक सिद्धिक हेतु जाथु, हमहूँ आब नि:शंक भय जाइत छी ।
कुन्दलतिका
:
[प्रस्थान]

 

 

  9. दृश्य :

 

राजा चन्द्रसेन
:
मित्र माकन्द, प्रियतमा केँ बिनु देखनहि तखन घुमि अयलहुँ ताहि हेतु पश्चाताप कनेको नहि छुटैत अछि, तेँ आउ ओतय जाय हुनक सत्कार करी ।
मित्र माकन्द
:
जे अहाँ के रूचय सेह करू राजन ।
राजा चन्द्रसेन
:
फेर स प्रमदवन दिस प्रस्थान कयल जाय ।
 
गीत
:
चिर विरही नयनेँ हम देखब, चन्द्रमुखी दयिता केँ रेखब ।
एहि आनन्द-बाढ़ि मन विह्वल, सकल बाहरी विषयहिँ बिसरल ॥
ओहि मनोरथ आनलि धनिकेँ, कय उदेस हम चललहुँ बनिकेँ ।
तखनहिँ जड़िसँ धैर्य उपाड़ि, भीतर उठय बिकार पछाड़ि ॥
 
मित्र माकन्द
:
इएह आबि गेलहुँ ।
कलकण्ठिका
:
हे सखि, अहाँक प्रिय वस्तु हम देखाय रहल छी ।
सखी, पहिल-पहिल प्रिय-दर्शनक हेतु अहाँ हमर पारितोषित धारैत छी । 
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र इएह थिकीह प्रिय मणिमञ्जरी ।
एहन पहिने कतौ नहि देखल, ई लावन्यक सम्पत्ति थिकीह ।
 
[चिबुक उठाय] अपन अधीन कमल नयने ! हे प्रिये ! अनुग्रह मानिनाहर ।
हमरा पद्मावती प्रेमरत-जानि, करू नहि कठिन प्रहार ॥
 
 
[नेपथ्य मे हल्ला] 
मणिमञ्जरी
:
[भय स कम्पैत] रक्षा करथु महाराज, रक्षा करथु ।
 
[महाराजक देह मे लेपटि जाइत अछि]
राजा चन्द्रसेन
:
[स्पर्श सुखक अनुभव]
 
गीत
:
की थिक चानन केर प्रवाह ? की थिक चन्द्रकिरण संचार?
सकल अंगमे जलकण सरबे, चन्द्रकांतमणि की साकार ?
काम-सिद्ध केर की थिक कृत्या ? सकल विश्वकेम वश केनिहारि /
किंवा भीतर करथि महोत्सव, सुन्दरनयना ई सुकुमारि ?
 
 
 
[घबड़ायल पुरुष प्रतिहारीक प्रवेश]
प्रतिहारी
:
स्वामी ! एक दुष्ट महिषा हमरा सभसँ रोकल गेलहुँ मेदा देववनकेँ उजाड़ॅबामे लागल अछि । एकर निवारणमे अपनहि समर्थ छी ।
मित्र माकन्द
:
रे वनचर, जो हमरा आज्ञा सँ सेनापति के कहुन्ह जे एकरा अपना दुष्टताक फल देथि ।
प्रतिहारी
:
जे आज्ञा स्वामी ।
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] आश्चर्य, ई डर हमर मित्र थिक ।
 
 
[हल्ला आरो बढ़ि जाइत अछि]
राजा चन्द्रसेन
:
ई प्रसंग की एतेक बढ़ि गेल ? हम अपनहि एहि दुष्ट केँ दुश्चेष्टाक फल प्राप्त कराय दियैक । की अहूँ संग चलब ?
मित्र माकन्द
:
[थरथर कँपैत] ओतय जाय यदि दुष्ट महिषाक सींघ सँ बेधा जाइ तँ की होयत ?
राजा चन्द्रसेन
:
ओकरा बाद की होयत से त अहाँ जनिते छी ।
 
[दुनूक प्रस्थान]
मणिमञ्जरी
:
मन्दभाग्या हम हिनक अनुराग सँ मारल गेलहुँ । हे कलकण्ठिका ... 
कलकण्ठिका
:
हे सखि, आउ एहि लता मण्डप मे कामविषयक लिखना लिखि मनोविनोद करी ।
 
 
[प्रस्थान]

 

 

  10. दृश्य :

 

 
 
[लड़ाईक दृश्यक उपरांत]
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र, अकस्माद उपस्थित व्यवधानक कारणेँ क्षण भरिक हेतु हटल असंतुष्ट कामज्वर हमरा लग पुन: लौटि आयल ।
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! दुष्ट महिसाक विनाश स्म हम सभ आबि गेल छी । पटॅरानी आब हमरा सभक प्रति प्रतिकूल आचरण नहि करतीह ।
राजा चन्द्रसेन
:
आश्चर्य ! डरपोक होयबाक कारणेँ डेराइत छी, जे एतवहि सँ अहाँ अपना केँ भाग्यवान कहैत छी ।
 
 
[प्रियवद कंचुकी के प्रवेश] 
प्रियवद कञ्चुकी  
:
महाराज ! महारानी निवेदन करैत छथि जे आर्यपुत्रक स्नेहक अवहेलना करबाक समय सँ हुनका धैर्य नहि रहि रहल छन्हि तेँ अपनेक चरनक दर्शन हेतु आबि रहलीह अछि ।
राजा चन्द्रसेन
:
देवी केँ हमरा मे बड़ पैघ स्वाभाविक दया छन्हि । हुनका कहबनि जे हुनक कृपाक हेतु ई दास प्रार्थी अछि ।
प्रियवद कञ्चुकी  
:
जे आज्ञा महाराज । [प्रस्थान]
मित्र माकन्द
:
मित्र, हम पहिनहि कहल जे महारानी प्रतिकूल नहि रहतीह ।
 
[नचैत छथि] 
 
 
[महारानी पद्माक प्रवेश]
रानी पद्मावती
:
सखी, आर्यपुत्रक स्मरन कय उत्कंठित भग गेल छी । पैर पर खसल हुनक मान नहि रखबाक लाज सँ हमर हृदय आक्रांत भय रहल अछि ।
कुन्दलतिका
:
लाज वय्र्थ, स्वामीक समीप जाउ ।
राजा चन्द्रसेन
:
महारीनक हेतु स्वागत ।
रानी पद्मावती
:
आर्यक चरन-युगलक दर्शन सँ हम प्रसन्न छी । कुन्दलतिका...
कुन्दलतिका
:
स्वामी ! स्वामिनिक निवेदन करैत छथि जे स्री स्वाभावक लघुताक कारणेँ हुनका सँ जे अपराध भेल तकरा आर्यपुत्र आब क्षमा करथ्य ।
राजा चन्द्रसेन
:
लतिका, हम अपराधे नहि मानैत छी, जे क्षमा करी ।
कुन्दलतिका
:
आओर ई जे मणिमञ्जरी हुनक छोट बहीन तुल्य छथिन्ह तेँ हुनका पर कोनो क्रोध नहि, आर्यपुत्र सुखपूर्वक हुनका संग बिहार करथु ।
मित्र माकन्द
:
[वेग मे] आश्चर्य ! महारनी उदारचरिता छथि ।
 
[महारानी सँ] महारानी अहाँ अपनहि हाथे मित्र केँ मणिमञ्जरी दिऔन्हि ।
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] वाह मित्र, वाह । अवसर पर चतुत कार्य कयने छह ।
रानी पद्मावती
:
आर्य माकन्द ! नीक विचारलहुँ । हमर बहिनि आनलि जाथि, हमरहु एहिमे उत्कण्ठा अछि।
मित्र माकन्द
:
महारानीक आदेशक अनुकूल कयल जाय ।
राजा चन्द्रसेन
:
जँ अनुमति दी तँ एहि माधवीलता मण्डपकेम बैसबाक उत्सव सँ कृतार्थ कयल जाय ।
रानी पद्मावती
:
जे रुचैन महाराज केँ, सेह कयल जाय ।
 
 
[मणिमञ्जरीक प्रवेश]
रानी पद्मावती
:
हय मणिमञ्जरी, एतय बैसह ।
मणिमञ्जरी
:
हम प्रणाम करैत छी ।
रानी पद्मावती
:
आर्यपुत्रक वहुमान्या होथु आयुष्मती ।
मित्र माकन्द
:
[स्वगत] एहि मे महारानीक वाणीक परिश्रम व्यर्थ ।
रानी पद्मावती
:
[मणिमञ्जरीक हाथ राजाक हाथ मे राखि] आर्यपुत्र, ई बहिनी मणिमञ्जरी अहाँक हाथमे देल जाइत छथि ।
राजा चन्द्रसेन
:
स्वति ! देवी, अहाँक प्रसन्नाताक ई परिणाम हमरा अनुगृहित कय रहल अछि ।
 
गीत
:
सज्जन होथु निरापद राजा, विजयी होथु प्रजारंजनमे ।
व्राह्मण सब कल्याण पाबि ई, व्याकुलता नहि राखथु मनमे ।।
उचित समय पर बरिसथु जलदो, वर्णाश्रम सब होथु सुचित्त ।
धान्य सबहि सँ शोभित धरती, रहथु सदा सब सुखक निमित्त ॥

 
पुणर्लेखन : प्रकाश झा