बुधवार, 21 सितंबर 2022

संवेदनहीन कलाकार'क कारणेँ फूहड़ता सँ भरल जा रहल अछि मैथिली'क मंच : डॉ. प्रकाश झा

कहियो भाषायी आ सांस्कृतिक जागरण लेल आरम्भ भेल विद्यापति स्मृति पर्व किंवा मिथिला विभूति पर्व'क स्वरूप आब अधोगति दिसि अग्रसर अछि, जे एहिठामक गौरवशाली संस्कृति लेल घून समान सिद्ध भ' रहल अछि । उक्त वक्तव्य मैपुप्र प्रतिनिधि सँ गपशप्प'क क्रम मे मैथिली'क सुप्रसिद्ध युवा रंग-निर्देशक आ भारत सरकार'क राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय मे कार्यरत डॉ. प्रकाश झा कहलन्हि । अपन बात रखैत ओ कहलन्हि जे जाहि मंचपर कहियो रवीन्द्र-महेन्द्र, मायानन्द मिश्र, सरस-रमेश, नन्द-नवल आदि सन भाषा-संस्कृति प्रति गम्भीर लोक बागडोर सम्हारैत माटि-पानि सँ भीजल प्रस्तुति दैत छलाह, से मंच आब आयातित आ फूहड़ गीत - संगीत परसनिहार अगम्भीर कलाकार सभक हाथमे चलि गेल अछि । आइ-काल्हि एकटा गीतक प्रस्तुतिमे गायक-गायिका लोकनि दस बेर कामेन्ट्री करैत थोपड़ी बजेबाक अपील करैत टाइमपास करैत छथि मंच पर । पहिने कलाकार'क गीत चयन आ प्रस्तुति सँ दर्शक-श्रोताक आत्मा स्पन्दित भेल करैत छल आ तकर विपरित आइ काल्हिक तथाकथित स्टार कलाकार'क प्रस्तुति आ भाव-भंगिमा सँ देहमात्र उत्तेजित होइत अछि । एकरा सांस्कृतिक क्षरण नहि तँ आर की कहल जेतैक


मैथिली मंचक वर्तमान दु:स्थिति पर आगू डा. झा कहैत छथि, जे एहि लेल कार्यक्रम सभ'क आयोजक लोकनि सेहो ततबे दोषी छथि । हुनका लोकनि केँ विद्यापति सन युगपुरुष'क नाम पर कयल जा रहल आयोजनमे न्यूनतम मंचीय मापदण्ड तँ निर्धारित करबाके टा चाही, अन्यथा फूहड़ता भरल कार्यक्रम'क आयोजन सँ मिथिला'क हानि छोड़ि लाभ तँ नहियें सम्भव अछि । ओ आगू कहलन्हि जे मैथिली'क रंगमंचक परिदृश्यमे सेहो एहि तरह'क खतरा सम्भाव्य अछि, जकरा समय अछैत रोकल जयबाक समवेत प्रयास आवश्यक अछि ।



ओ कहलन्हि जे हालहि मिथिलाक विराट व्यक्तित्व बटुक भाइ नहि रहलाह । ओ जतबे रंगमंच आ साहित्य'क छलाह, ततबे मैथिली सांस्कृतिक मंचमे उद्घोषकीय योगदान देने छथि, मुदा सोशल मिडियाइ जगतमे हुनका प्रति श्रद्धांजलि भरल पोस्ट सभमे अपनाकेँ मैथिलीक महान मंचीय कलाकार घोषित कयनिहार एक्कोटा कलाकार'क शोक-संवेदना'क एक्कोटा पाँति नहि अभरत । ई संवेदनहीनता आ अगम्भीरता'क उदाहरण मात्र थिक । मैथिलीक निजगुत संस्कृति केर संरक्षण-संवर्द्धन लेल मैथिलीक सांस्कृतिक मंच'क अधोगति पर लगाम लगेबाक बेगरता अछि, अन्यथा बिहार'क आने भाषाक गीत-संगीत जेना मैथिलीक स्थिति अवश्यम्भावी अछि ।

गुरुवार, 25 अगस्त 2022

खुरचन भरि सम्मान

प्रकाश झा

 

वर्तमान परिदृश्यमे कहल जा सकैत अछि जे – वीणाक टूटल तारक कर्कस ध्वनि सँ कछमछाइत साहित्यक स्तम्भपर विराजमान अशोक चक्र उड़न-छू होइत खुरचनमे आश्रय लेलाह अछि । वा इहो कि सालो सकछमछाईत खुरचन भाई, अकादमीक सम्मान लउड़न-छू भेलाह । आ से जँ नहि तशेरक तरबाक तर दबल अशोक चक्र उड़न-छू भय खुरचनमे प्रविष्ठ भेल । अपनेकेँ जे मोन हुए से कहि सकैत छियैक । मुदा, एहि बेर हमरा ई खुरचन भरि सम्मान लगैत अछि ।  हम कारण अवश्य कहब... मुदा साहित्यकार लोकनि सार्वजनिक स्वीकार नहि करी से आग्रह । अपनेक सार्वजनिक स्वीकृति अकादमीक लिस्ट सँ नाम बाहर करबा लेल पर्याप्त प्रमाण होयत । अस्तु...

 

जहिया अकादमीक अनुवाद पुरस्कार सँ तरंगित अविरल वीणाक झंकार, अकादमीक सर्वे-सर्वाक कर्ण परिसरमे प्रविष्ठ भेल रहनि, तहिए सँ अकादमीक चक्रधारी केँ एहि स्थिति – परिस्थिति सँ कछमच्छी लागि गेल रहनि । मुदा, वर्तमानमे साहित्यिक वीणाक टूटल तारक तरंग सँ मुक्ति पायब ओहिना अछि, जेना दावानलमे खुरचन सँ पानि ढ़ारब । मुदा, तैयो एहि बेरक लुक्खी (गिलहरी) प्रयास सँ प्रदत्त, युवा आ बाल साहित्य सम्मान, समुच्चा साहित्य अकादमीक आगामी संभावित विभिन्न सूची नामधारी लोकनिमे, खुरचनक मुँहमे स्वाति नक्षत्रक बूंदक सन अवतरित भेल छनि । एहन लोकनि जहिना अनुवाद पुरस्कार लेल अपन बधाई शब्दकेँ जाहि तीव्र वेगसँ धरती लोकसँ ऊड़न-छूस्वर्ग लोक पठेने रहथि, एहि बेर ओकर दुन्ना स्पीड सँ एहि मृत्वलोकक सोसल साईट पर हन-हना देलनि अछि । चारूकात वीणाक तानपर राग मल्हार गनगना रहल अछि । वातावरण सुरभित पुष्पित भेल अछि । साहित्य चक्रधारी अपन अविचल मुस्की संग अपन नगरीक गोवर्धन पर्वतपर बैसि, हत्प्रभ भेल पुरस्कृत रचनाकारक किंमकर्तव्यविमुढ़ भेल मुद्राक अवलोकन करहल छथि, क्षण – प्रतिक्षण अवतरित विभिन्न मुद्रा रेखा के निहारि रहल छथि, ‘आब कहू मोन केहन लगैए गीत गुनगुना रहल छथि ।

 

एहि बेर एक्के झपतल्लामे सभ चितंग । सम्मान लेनिहार चितंग । सम्मान पर टीका – टिप्पनी करनिहार चितंग । सम्मानित रचनाकारक रचना कर्मक एहन बलि प्रदान किएक ? मुदा, सम्मान रूपी भगवतीक आगू बाजि रहल ढोल – पिपहीक एहि कोलाहलमे रचनाकारक चित्कार केँ, के सुनत ? आइ नहि तकाल्हि, जिनक रचना मूल अकादमी सम्मानसँ सम्मानित होबाक चाही छलनि, तिनक रचना केँ बाल रचनाकारक खुरचन भरि सम्मानचक्रधारी कोना नहि मुस्कीएताह ?  रचनाकार कोना नहि विस्मित हेताह ? रचनाकार आब चुप्पी साधि लिखैत रहथुकलमक तरुआरि भँजैत रहथु... खुरचन भरि सम्मानअपन गाँज घर करथु । अकादेमिक अगिला कोनो सम्मानक आस छोड़ि देथु । यैह सत्य अछि, यैह महाजनक निर्णय अछि ।

 

प्रसंग दू –

हेल्लो... मैं अकादमी से । जी कहिए... । सर... प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी कुछ माँगना है आपसे... । माँगना है ? क्या ? अच्छा ओ... खुरचनभाई। जी....  । हा...हा...हा... क्या करेंगी लेकर, सम्मान तो मिलेगा नहीं फिर क्यों... । सर, हमें भी आश्चर्य होता है कि यह कौन सी किताब है, जो सालों से आती रही है, पर सम्मानित नहीं हो पाती है... ।

अकादमीक जूड़ी वर्ष 2015-16 सँ खुरचनभाइक कछमच्छी के पढैत रहलाह, गुनैत रहलाह, ऊँच – नीच सोचैत रहलाह । छ: – सात वर्ष बाद यानी 2022 मे हुनका सबकेँ ज्ञात भेलन्हि, जे ई तनीक व्यंग्य छै, सम्मान देबाक चाही । ओहिना जेना जनश्रुति अछि, जे कोनो सरदारजी चुटुक्का सुनलाक छ: – सात दिन बाद हँसैत अछि । तहिना खुरचनभाइक कछमच्छीक व्यंग्य अकादमीक जूरी छ: – सात वर्ष बाद बुझि सकलाह अछि । एहि छ: – सात सालमे लेखक बेचारे यूवा सएक बच्चाक पिता भगेलाह । लेखनमे सेहो युवा सँ आब पकठोस भगेलाह । आनंदक समय बीत गेला बाद खुरचन भरि सम्मानआनंदित होइत हेताह । कखनो अपना केँ, कखनो अपन खुरचनभाइकेँ आ कखनो अकादेमी के देखैत हेताह । किछु नव सृजन करबाक लेल उद्यत होइत हेताह ।

खुरचन भरि सम्मान अर्पित क’, ‘खुरचन भरि सम्मान ग्रहण क’, एहि खुरचन भरि सम्मानक लेन – देन देखैत मुग्ध छी हम, दग्ध छथि किछु साहित्य समाज, मस्त छथि किछु साहित्य समाज । जूरीक सूची देखि चिंतित छथि साहित्य समाज । दुखमोचन झा, मुनींद्र झा, राजन सिंह जीक मैथिली अवदान हेरि रहल अछि साहित्य समाज । किछुए दिन बाद दू भागमे बँटि जायत ई साहित्य समाज । किछु गोटे अपन नाम कटेता त किछु गोटे अगिला सेमिनारमे अपन नाम लिखेबे करताह । फेर नवम्बरमे खुरचन भरि सम्मानबॉटल जायत । खाली सिंहासन पर  कोनो बधिया कयल छागड़ बैसाओल जायत । 

सम्मानित पुस्तक उड़न-छूके रचनाकार आदरणीय श्री वीरेंद्र काका केँ आ खुरचनभाइक कछमच्छीक लेखक प्रिय अनुज श्री नवकृष्ण ऐहिक यानी रुपेश त्योंथ केँ हृदय सँ बधाई ।

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शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

अविचल वीणा बाजि उठल

हमरा तबड्ड अशोकर्य होइत अछि, जे अपने लोकनि बिना पढ़ने, मात्र आलेखक हेडिंग देखिए कअंदाजा लगा लैत छियै, जे ई आलेख फल्लां विषयपर होयत । एहि हेडिंगमे अविचलवीणामात्र दूटा शब्द के आधार पर कोना अहाँ लोकनि कहि सकैत छी जे ई लेख पक्का साहित्य अकादमीसंबंधित होयत ?

 

हयौ... हम वीणारूपी एहि साहित्यिक समाज सबहिष्कृत तनहिए ने छी । अपने लोकनिक वीणारूपी विश्वासपर हमहूँ अविचलरहबाक प्रमाण देबे करब । तेँ ठीके ई आलेख वर्तमान साहित्य अकादमीए पर थिक । अहिसँ पहिने साहित्य अकादमी सम्मानपर हमर लिखल एकटा टिप्पणी सेहो अहाँ सबके मोन होयत । शीर्षक छल पंगु दृष्टिए पंगुके निहारैत पंगु साहित्य समाज ।

 

आब जे अहाँ सब ई कहब जे एहि नवका लेखकक शीर्षक ओही तर्जपर – ‘वीणाक शिखा सँ स्मरणगाथाकरसास्वादन करैत साहित्य समाजहोबाक चाही तबाबू हमरा माफ़ कदिय। एहि बेर हम ई शीर्षक नहिएटा राखब । एहि बेर रहत - अविचल वीणा बाजि उठल ।

 

हँ... तनबका साहित्य अकादमीक अनुवाद पुरस्कारक चर्च-वर्च खूब भरहल अछि । एकर कतेको कारण छैक बाला साहेब ठाकुर जीक मराठी मानुषक मातृभाषाक उपन्यास, जकर लेखक छथि गोनी बाबा (सावधान - गोनू झा बला नहि) यानी गो.नी. दांडेकर । तकर अनुवाद केनिहारि चण्डीगढ़ निवासी स्व. शिखा गोयल जी; जतक मूल भाषा पंजाबी अछि । कहल जा सकैत अछि जे ई कृति मराठी, पंजाबी आ मैथिलीक तिलासंक्रांतिक खिच्चैड़ थिक आ ताहि पवित्र खिच्चैड़ के सम्मान नहि देल जाय, ई सम्भव तनहिए होबाक चाही । ई पोथी अपन मूल भाषामे सम्मान त' अर्जित कयने अछिए । तेँ एकर कथ्य नीक हेबे करत । रहल एकर अनुवादक भाषा मैथिलीक उत्कृष्ठ्ताक त' से निर्णायक लोकनि पढ़नहि हेताह । शिखा जी कहादनि छ: साल पहिने स्वर्गवासी भगेलीह त' अवश्ये ई पोथी कम स' कम सात साल पहिने अनूदित भेल होयत । सुनै छी जे शिखा जीक पतिक हिसाबे ओ कहियो साहित्य रचना स' जूड़ल नहि रहलीह, मुदा तैयो हुनका नाम स' अनूदित ई पोथी साहित्य अकादमी स्वयं प्रकाशित कयने अछि । कोनो मैथिली पत्र पत्रिकामे कहियो हुनक रचना प्रकाशित नहि भेल । मुदा एक्के फुक्के चानी बला कहाबत के चरितार्थ करनिहारि स्व. शिखाक विद्वता केँ साहित्य अकादमीए चिन्हलक । ओ बेचारी एक मात्र पोथी अनुवाद क' देवलोक दिस प्रस्थान क' गेलीह तेँ हुनक स्मरणके माधुरीसुगंध संग अमररखबाकलेल साहित्य अकादमी बासुकीबनि हुनक स्मरणगाथाकेँ मैथिली साहित्य समाजक अशोकस्तम्भपर टिकली-सिंदुर लगा स्थापित केलक अछि । एहन उत्कृष्ठ काज करनिहारक अहिबात अजर रहनि, अमर रहनि, अविचल रहनि से कामना मैथिलीक सभ साहित्यकार केँ करक चाहियनि ।

 

एक एहि पोथीक सम्मान समैथिली सम्मानित भेलीह अछि, मराठी सम्मानित भेलीह अछि, पंजाबी सम्मानित भेलीह अछि । एतबे नहि एहि पृथ्वीलोक संग संग स्वर्गलोक सेहो आइ प्रसन्नचित्त भेल अछि । तेँ एहि अदभुत कर्म लेल अमरनाथ बाबूक, बासुकीनाथ बाबूक, माधुरी देवीक, अशोक बाबूक आ अंतमे पूर्व संयोजिका परम आदरणिया वीणा ठाकुर जीक मैथिल साहित्य समाज चरण वंदन करथु, माथा टेकथु, सम्मानक पांतिक अगिला मेम्बर हेतु लोलुप बनल रहथु ।

 

जाहि साहित्य अकादेमीक स्थित परिस्थिति पर सबकियो चुप्पी सधने छलाह तकर तार आई मात्र एकटा उत्कृष्ठ निर्णय सतरंगित भगेल अछि, झंकृत भगेल अछि । तेँ एहन स्थितिक लेल कहब जे अविचल वीणा बाजि उठल उचित अछि, सत्य अछि, समिचीन अछि । एहि लेल स्वर्ग लोकमे बैसल शिखा जीकेँ बधाई छनि, पृथ्वी लोकमे बैसल हुनक सर-संबंधी केँ बधाई छनि, दुनू नाथ बंधु यथा - अमरनाथ जी व बासुकीनाथ जीकेँ बधाई छनि, निर्णायक मंडलमे एक मात्र महिला निर्णायक श्रीमती माधुरी झा द्वारा स्वर्गलोग ससमगोत्री शिखा गोयल जी केँ हेरनिहारि तथाकथित विदुषी केँ अषीम बधाई छनि । आ अंतमे अपन कार्यकालमे एक सबढ़ि कएक निर्णय करैनिहार आदरणीय डॉ. अशोक अविचल सर केँ हृदय सँ बधाई छनि ।

 

एहि सब महान विभूति केँ मैथिली साहित्यलेल ऐतिहासिक कर्म करबाक लेल अबै बला पीढ़ी हरदम मोन रखतनि । मैथिलीमे एकटा कहाबत छै कुकर्मिये नाम कि सुकर्मिये नाम । हिनको सबहक नाम हेबे करतनि । ई अबै बला पीढ़ीपर अछि, जे हिनका लोकनिक कर्म के पहिने की लगौताह – ‘सुवाकिकु। अगिला सालक साहित्य अकादेमीक सम्मान तक विराम ।

  

- प्रकाश झा

( पीएच-डी.; नेट; सीनियर फेलो, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार )

प्रकाशन प्रभारी; राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भगवानदास रोड, नई दिल्ली – 01.

मो. + 91 9811774106, फोन : 011 23389138.

सोमवार, 21 मार्च 2022

भाई श्रीधरम जी केँ अग्रिम शुभकामना संग बधाई

 

बधाई... बधाई... बधाई...

भाई श्रीधरम जी केँ अग्रिम शुभकामना संग बधाई

जहिना हम कहने रही तहिना श्री रमण कुमार सिंह जीक होलीक मालपूआ खेलाक बाद श्रीधरम भाई भंगियाल मोने हनि कलिखलाह आ अगिला तीन-चारि साल लेल दिल्लीक प्राय: सभ आगामी आयोजनक मुख्य अतिथि / मुख्य वक्ता / मुख्य विमर्शकर्ताक कुर्सी हथिया लेलनि अछि । तेँ भाई केँ हार्दिक शुभकामना संग बधाई ।  

पिछला कतेको साल सअंतिका सन श्रेष्ठ पत्रिकाक सैकड़ो पेज के अपन ब्राह्मण विरोधी रचना सभरनिहार मित्रवर श्रीधरम जीकेँ एखन तक श्री ललितेशजी के छोड़ि कियो संज्ञानमे नहि लैत छलनि । कतेको बेर मैथिलीमे महंथबादके आरोप लगबति लगबति थाकि गेल छलाह । कतेको गोटे हिनका लेल तरह तरह सपीच आ गेंद बदलि बदलि कबैटिंगो केलाह मुदा कोनो असरि नहि भेल छल ।

मुदा, आब एकहि झटहा के तेना ने समधानिकमारलाह अछि जे आगामी तीन – चारि साल तक राजधानीक सभ कुर्सी के श्रीधरम जी शोभायमान करताह से सुनिश्चित अछि ।  तेँ भाई के बहुत बहुत शुभकामना ।

भाई ! अपनेक एहि आलेख सँ बहुत ज्ञान हमरा सन असाहित्यिक लोक के सेहो भेटलैक अछि । आभारी छी । अपनेक कहब अछि जे –  “असल मे मैथिलीक समकालीन स्त्री-लेखनक लेल जाहि स्त्री-संवेदना सं युक्त आँखि के जरूरत छै से समकालीन मैथिलीक बौद्धिकी लग नहि छै । जाहि मे ललितेश मिश्र आ रमण कुमार सिंह सेहो शामिल छथि” ।

हमरा विश्वास अछि जे अपनेक ग्रामर केँ आब सब समीक्षक गीड़ह बान्हि लेताह जेना ‌ -

स्त्री लेखन के समीक्षा लेल स्त्रीयैन आँखिक जरूरत छैक । जेना श्रीधरम भाई लग छनि, तहिना दलित लेखन के समीक्षा लेल दलितैन’, पुरुषक लेखन के समीक्षा लेल पुरुषैन’, बाल लेखन के समीक्षा लेल बलकैन’, महानगरक लेखन के समीक्षा लेल महानरियैन’, गामक रचनाकारक लेखन के समीक्षा लेल गमैन आँखि होबाक चाही । श्रीधरम भाईक एहि फर्मूलाक अनुसार तआरो आगू बढ़ल जा सकैत अछि, जेना मधुबनीक रचनाकारक रचना मधुबनियैन आँखिए देखल जाय तदरभंगाक रचनाकारक लेल दरभंगियैन’, सहरसाक लेल सहरसियैन’, नेपालक रचनाकार लेल नेपलियैन आँखिए देखल जेबाक चाही । अहिना जातिगत रचनाके सेहो ब्राह्मनियैन’, ‘कायस्तियैन’, ‘यादबियैन’, ‘राजपुतियैन आँखिए देखबाक चाही । भाई यौ ! हमरा कनी ओझरौठी बुझा रहल अछि । अहाँक एहि फार्मूला के हिसाबे सुपौलक कोनो दलित स्त्रीक रचनाकारक रचनाके कोन हिसाबे समीक्षा करक चाही ? अहाँक फार्मूला के हिसाबे तएहन रचनाके एक संग सुपौलियैन + दलितियैन संग स्त्रीयैन नजरिक जरूरत हेतैक ने ?

धत्त... अहाँ सन एतेक नजरिक चश्मा कअनताह  ई ललितेशजी, रमणजी, रमेशजी, रमानंदजी, कमलानंद विभूतिजी आदि लोकनि । अपनेक सुझाव हिनका सब लेल बुझू जे रामवाण छनि । आब लिखैत रहथु अपन चश्मा बदलि बदलि क

भाई श्रीधरमजी, अहाँक तामश उचिते अछि । पिछला किछु साल सप्राय: सब कविता पाठमे अहाँक परम मित्र रमण कुमार सिंहजी अपन चारि पाँतिक कविता लपहुँच जाइत छलाह । अपनेक एतेक पैघ पैघ लिखल कथाक वाचन लेल कोनो आमंत्रण नहि । कारण कविताक आयोजन तसप्ताहमे तीनटा भजाइत छैक, आ कथाक तकोनो अकादेमी कसकैत अछि । नीक केलहु... हनि कलिखलहुँ... आब करैत रहथु रमणजी रचना... स्त्री विरोधी रचनाकार ससंग्यापित कनीक जेना अपने हिनक रचनाक हत्या केलहु अछि भाई... बधाई... ।

रहलाह श्री ललितेश जी तहुनको पर अहाँ बहुत दिन सकनखरल रही, जहिया ओ अपन तीन तीनटा किताबक लोकार्पण लेल प्रेस क्लबमे अहाँके कतेको दिन सबजबाक लेल आमंत्रित कयने रहथि आ आयोजनमे बजबाक मौका नहि देलनि । चोट तहुनको देब जरूरी छल । भाई, अहाँक आँखि धोखा कोना खा गेल हमरा बेरमे ? भाई, हम पुरुख छी ने यौ .., हमरा तकम सकम अपन फॉर्मूला के हिसाबे पुरुखाह आँखिए देखतहुँ । रंगकर्मी लिख देलियै... भाई हमर नाम मे रंग नायकलिखल करू । रहल स्त्री विमर्शक बात तअपने कहियो हमर यूट्यूब चैनल पर जा कस्त्रीयैन आँखिए किछु नाटक देखल करू, प्रेक्षागृहमे आयब तअहाँ सन व्यस्त लोकनि के दिक्कत होइत अछि । किछु नाम अछि – आब मानि जाउ, धूर्त्तसमागम, विलाप, सुंदर संयोग, मैथिल नारी : चारि रंग, घाट पर जाति आदि आदि । खैर... भाई गछने छी अहाँ जे सपरिवार आयब माँछ खयबाक लेल... तहिये सहम मछैन दृष्टिए रस्ता हेर रहल छी भाई । अहाँक मर्जी... । आगामी आयोजन सबहक मुख्य अतिथि / मुख्य वक्ता / मुख्य विमर्शकर्ताक कुर्सीपर विराजमान होयबाक लेल एक बेर पुन: शुभकामना भाई ।

 

 

 

 

 

रविवार, 13 मार्च 2022

पंगु दृष्टिए ‘पंगु’ के निहारैत पंगु साहित्य समाज

किछुए साल पहिने हमर सबहक किछु ओजस्वी मित्र लोकनि भारत सरकारक संस्था साहित्य अकादेमी के पंगु संस्था घोषित करैत एकटा तथाकथित सशक्त संस्था ‘समानांतर साहित्य अकादेमीक’ निर्माण केलनि । अफरातफरी मे पंगु भेल साहित्य अकादेमीक ‘पंगु सम्मान’ के निम्न स्तरीय कहि नकारैत, एकटा सबल सम्मान ‘समानांतर साहित्य अकादेमी सम्मान’ के घोषणा कयल गेल । एहन सबल आ निश्पक्ष प्रथम ‘समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान’ स’ सम्मानित भेल रहथि आदरणीय श्री जगदीश प्रसाद मण्डल । हमरा जनैत एहि समानान्तर अकादेमीके शायद दोसर मैथिली साहित्यकार फेर नहि भेटलनि, जिनका एतेक पैघ सम्मान स’ सम्मानित कयल जानि । श्री जगदीश बाबू पहिल आ अंतिमे बुझू ।

 

जहिया भारत सरकारक पंगु घोषित साहित्य अकादेमीक अकादेमी सम्मान लेल श्रीमान जगदीश प्रसाद मण्डल जीक नामक घोषाणा भेलनि तअनयासे मोन पड़ि गेल समानांतर साहित्य अकादेमी संस्था द्वारा प्रदत्त हिनक सम्मान । विचार अभरल जे जाहि साहित्यकार केँ एतेक पैघ सम्मान प्राप्त भैये गेल छलनि से आब तथाकथित पंगु साहित्य अकादेमीक ई तुच्छ  सन सम्मान किएक आ कोना लेताह ? अही पंगु सम्मानक एवज मे तहिनका मैथिली साहित्यक सबसपैघ सम्मान सस्म्मानित कयल गेल छलनि । ई तओहिना भेल जेना शहनाई वादक पं. बिस्मिल्ला खान के जखन सैंसे विश्व ससम्मान भेट गेलनि, देशक सर्वोच्च सम्मान भारत रत्नतक भेट गेलनि तखन हुनका बिहार सम्मानदेलकनि । तेहने दोसर उदाहरण ई सम्मान लागल ।

 

मुदा हौ बाबू ! हद्द ततखन समाचार पढि कलागल जे पूर्वमे घोषित पंगु साहित्य अकादेमी श्रीमान जगदीश प्रसाद मण्डल जी केँ हुनकर लिखल पंगुउपन्यासे के सम्मान देलकनि अछि । मतलब दूटा पंगु एक संग सोझा आयल ।

 

पूर्वमे साहित्य अकादेमी सम्मान के घोषणा सदू – तीन मास पहिने आ घोषणाक दू – तीन मास बाद धरि साहित्य समाजमे एहि सम्मानक धम्मक रहैत छल । पुरजोर गहमा गहमी । कियो रुष्ठ तकियो प्रसन्नचित्त । कियो ताल ठोकथि तकियो अप्पन सशक्त रचना केँ आद्र दृष्टिए तकैत । अलगम – अलग साहित्य खेमा मे अलग अलग समीकरण पर चर्च वर्च । अनकर सोंगर पर नाम कमेनिहार साहित्यकार लोकनि सेहो अपन कांख तर बैसाखी फँसा, तनि कठाढ़ भनिर्णायक लोकनि के होलियाबैत रहैत छलाह । कतेक गोटे तहुनकर होलियेनाइक भाषा के कारण मैथिली साहित्यकार द्वारा चानन लगा साहित्यिक खेमा के उच्च पद पर आसीन तक भजाइत छलाह । मुदा, एहि बेर सब चुप्प... नि:शब्द । पूर्व जेना – तेना किछुओ नहि भान लागल । फेसबुक सन साहित्यिक अखाड़ा रणभूमि पर सेहो पंगु बनल पहलवान सब पंगुलेल बधाई शब्द सकनी आगू अशेष बधाई मात्र तक पहुँच सकलाह ।  एहन चुप्पी किएक ?  यदि आइ सम्मानक आगा कथाकार अशोक, सुभाष चंद्र यादव, श्रीनिवास, तारानंद वियोगी, प्रो. देवशंकर नवीन’, वीभा रानी, महेंद्र मलंगिया, महेंद्र नारायण राम, वीरेंद्र मल्लिक आदि मे सकिनको नाम रहितनि तखन की साहित्यक मार्केट गरमायल नहि रहितै ? कियो ब्राह्मणवाद कहितथि, कियो पचपनियाँ, कियो चमचयि, कियो झाँपन आदि आदि संज्ञा संग सोझाँ अबितथि । सेहो सब चुप्प... ।

 

मुदा, ‘पंगुक रचनाकारक सोझाँ सभ गोटे पंगुए बुझि पड़लाह । समानांतर साहित्य अकादेमी के सृजक लोकनि सेहो पंगु बनि पंगु साहित्य अकादेमीक सम्मान लतृप्त भगेलाह । समांनांतर सम्मानक गाँझ आब कोठी कान्ह पर... । ई पंगु शब्द अपन व्यापकता मे कतेको गोटेक पंगुपन के देखार कदेल ।

  

अही बेर हिंदी भाषा लेल साहित्य अकादेमी सम्मान हथियेनिहार श्री दया प्रकाश सिंहा जी राजा अशोक लेल अपन टिप्पणी सबेस चर्चा अर्जित कयलनि । अतनुसार साहित्य अकादेमीक मैथिली भाषारूपी रथ के समंवक श्री अशोक सर एवं हुनकर सारथी लोकनि तेहन ने समधानि कअविचल झटहा फेकलाह से सम्पूर्ण मैथिली साहित्य समाज नीक जेना पंगु बनि अपन पुआरक गद्दा सउठि नहि सकलाह । गजब शॉट लागल... ।

 

एहि पंगु सपंगुआयल फगुआक माहौल मे एकटा विंदु आरो स्थापित भेल अछि । वर्तमान मे मैथिली साहित्यक स्थापित साहित्यकार, जिनका हाथमे मैथिलीक सबसपैघ झंडा छनि यानि साहित्य अकादेमीक मैथिली परिषदक कंवेनर प्रो. अशोक अविचल जी सत्यापित कदेलनि अछि जे ई पंगु उपन्यास बाबा यात्री जीक बलचनमा सदू धाप आगूक रचना थिक । एहि तथ्य के गीरह बान्हि, अपना बाँहि पर जंतर बना लटकालौथ पहलवान साहित्यकार लोकनि आब । हिनका सबहक सबटा रचना पंगु बनि गेलनि अछि आब । आजुक तारिख सहिनक रचना श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीक रचना पंगुतौलल जेतनि । जेना प्रो. अशोक अविचल जीक रचना पंगुपाछू छ्नि आ कि पंगुआगू । तहिना आनो साहित्यकार लोकनिक रचना सेहो ।

 

एखन तक पंगु... पंगु... पंगु पढैत पढैत अहूँ लोकनि पंगुआ लेल होयब । तेँ सबसएक बेर आग्रह जे तथाकथित पंगु साहित्य अकादेमी ससम्मानित एहि पंगु उपन्यास के अवश्य पढी । हँ ! हिनकर पोथी बाजारमे नहि भेटत, विशेष आग्रह कयला बादे एकर प्रिंट निकालल जायत आ तखने अपनेक हाथ आओत ई पंगुउपन्यास ।

 

पंगु उपन्यास के सम्मान देला बाद साहित्य अकादेमी आ पंगु लेल सम्मान ग्रहण कश्री मंडल जी समामांतर साहित्य अकादेमी के अवश्य पंगु घोषित कदेलाह अछि ।

 

जय हो पंगु उपन्यासक, जय तो पंगुक रचनाकारक, जय हो पंगुके चयनकर्ताक, जय हो पंगुरूपे पूर्व मे घोषित साहित्य अकादेमीक, जय हो आब पंगु बनल समानांतर साहित्य अकादेमीक आ अंतमे जय हो पंगु बनल मैथिली साहित्यकारक ।

 

अस्तु; हमरा व्यक्तिगत रूपे ने आदरणीय श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक विद्वता पर कोनो शंखा अछि, ने आदरणीय श्री अशोक अविचल जी आ सम्मान चयन कर्ता पर कोनो शंखा अछि आ ने पंगुउपन्यासक पात्रता पर संदेश अछि । हँ ! समानांतर साहित्य अकादेमी आ ओहि सउपजल स्थिति – परिस्थिति पर अवश्य दृष्टि अछि ।

 

आब हम अपना पर पंगु वाण प्रहार सबचबाक लेल सेहो पंगु कवच धारण कलैत छी । उम्मीद अछि ओ लोकनि जे एखनो तक अपना के एहि पंगुपन ससुरक्षित रखने छथि से अवश्य वक्र दृष्टिए कोनो ने कोनो ईमोज़ी रखताह ।

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शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

‘कुछ लिखा ही नहीं’ कहकर सबकुछ लिख देना

डॉ. प्रकाश झा  

शतपर्णी 
सुखद संयोग ही है की पिछले लगभग दो–तीन वर्षों में किसी–न–किसी सार्वजनिक पटल पर यदा–कदा श्रीनारायण झा रचित काव्य–कृति पढ़ने का सुअवसर प्राप्त होता रहा है । पर, अभी–अभी एक साथ श्री झा रचित  लगभग एक सौ कविता पढ़ने का अवसर भी मिला ।  

सफल कविता उसे ही कहा जाता है, जो हृदय तथा मस्तिष्क दोनों को स्पंदित कर दे, भले ही बात वर्तमान का करे पर प्रभाव दूरगामी हो । साहित्य सृजन सदा से ही सामाजिक व्यवस्था के मंगलकारी परिवर्तन का कारण बनता रहा है । इस प्रकार साधारण जनसमूह के जीवनयापन से इस सृजन का गंभीर संबंध बन जाता है । जब साहित्य रचना समकालीन समाज का अनुषंगी बनाकर रची जाती है, तो वह निश्चित ही महत्वपूर्ण और कालजयी हो जाती है ।

ऐसी ही काव्य रचना श्रीनारायण झा के कलम से अवतरित हुई लगती है । इनकी रचना में मानव जीवन और प्रकृति के छोटे–से– छोटे क्षण को भी भाषा और भाव की भंगिमा का जामा पहनाकर प्रस्तुत किया गया है । जैसे, रोड पर मोटर गाड़ी के नीचे आकर मरे एक कुत्ते के पास बैठे उसके छोटे से असहाय बच्चे की तस्वीर देखकर कलम से निकले एक–एक शब्द पाठक के लिए कर्णभेदी गूंज में बादल जाती है, जब वह सुनता है – “नहीं पापा ! नहींऐसे न जाओ । उठो पापा !”…   


पुस्तक में संकलित कविता के प्राय: प्रत्येक छंद का संगीत समतल और सरल है । पंथी रे शीर्षक की पंक्ति किस नगरी से आया पंथीकिस नगरी है जाना रे !कभी आपको बांग्ला के बाउल संगीत की झलक दे जाती है, तो कभी निर्गुण का भान यह कहते हुए की - जाने भी दो, जो कुछ मेरे साथ हुआ सब अच्छा था ।

अतीत और आधुनिक दोनों का स्वाद और चमक मौजूद है इनकी काव्य रचना में । सहज संप्रेषणीयता इनकी रचना का प्रथम व्याकरण है । उपदेशात्मक अवगुण से दूर, सहजता से आपके मन में कब प्रवेश पा जाती है पता ही नहीं चलता ।

आमजन जिस तरह की भाषा आसानी से समझते, बोलते हैं उसका निखरा हुआ काव्यमय रूप का स्वाद यहाँ प्राप्त होता है । जब आप तेज हवा से गुजरते हैं, तो ऐसी ही भाषा से रूबरू होते है - “बचे हैं हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई उड़ा के ले गई वो प्यार, बहुत तेज हवा  या फिर - “इस दुनियाँ ने जाने कैसे कैसे सबक सिखाये रे ! पूनम और अमावस दोनों ही हमको दिखलाये रे! बेहद सजग और जागृत सामाजिक एवं व्यक्तिगत चेतना से लवरेज कविता रचते हैं श्री झा । 



ऐसा कभी नहीं लगता की श्रीनारायण झा रचित काव्य ज़बरदस्ती लिखा गया है वा किसी अनुरोध वा आयोजन के लिए हड़बड़ी में शब्दों को पिरोया गया है । प्राय: सभी कविता मन के विस्तार के साथ स्वत:स्फूर्त शब्दों का घरौंदा लगता है । कोई भी कविता बोझिल नहीं लगती । कविता ऐसी जो आपके मन:स्थिति में सुंदर चित्र सृजित करती रहे । प्रत्येक पंक्ति मन को उद्वेलित एवं तरंगित करती रहे, कविता का एक एक शब्द ऐसा जो प्रेम, द्वंद एवं अपनत्व का सुगंध इर्द–गीर्द बिखेरती रहे । इनकी काव्य रचना का शिल्प बहुत ही खुला – खुला सा अपनापन लिए हुए है ।

व्यक्तिगत सी लगती रचना अपने भीतर सफ़ेद सत्य को इस तरह गर्भित की हुई है की वह व्यक्तिवाचक से निकल कर समूहवाचक संज्ञा का रूप धारण कर लेती है और अपनी मौन गर्जना से पाठक के हृदय पर प्रहार किए बिना नहीं रह पाती, जब आप दिवंगत’, ‘अगर ऐसा हुआ होता’, ‘अर्धांगिनी’, ‘चाँद और तुम’, ‘असफल दांपत्य की राह से गुजरते हैं ।

 

काव्य कृति के अंत में कवि अपने सुखानुभूति से अस्तित्वबोध के साथ पूरी समग्रता से नियति को ही आदमी की दास्तांमानते हैं और मालिक से’, ‘अवरुद्ध कंठहो आह्वान करते हुए विदाई के साथ कहते हैं कि कुछ लिखा ही नहीं । यही सहजता इन्हें अप्रतिम बना देता है ।


मुझे पूरा विश्वास है कि यह काव्य कृति हिन्दी के पाठकों के मानसिक संवेदना को उद्वेलित करेगा । अपने श्रेष्ठ अग्रज श्रीनारायण झा जी को उनके इस प्रथम पुष्प कुछ लिखा ही नहीं के लिए बहुत बहुत बधाई ।   


डॉ. प्रकाश झा

(सहायक संपादक, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, नई दिल्ली) 

-          04.05.2021