गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

मैलोरंग आयोजित "मलंगिया नाट्य महोत्सव" में आज 'छुतहा घैल'




27 दिसम्बर, 2012
छुतहा घैल
लेखक : महेन्द्र मलंगिया
मिथिलांगन, दिल्ली
निर्देशन : संजय चौधरी  

छुतहा घैल

आज से लगभग साढ़े छ: सौ वर्ष पहले मिथिला में गोनू झा नाम के एक व्यक्ति का जन्म हुआ था. गोनू झा मिथिली के राजा भवेश्वर सिंह के दरवार में पंडित के रूप में नियुक्त थे. उनकी बुद्धिमत्ता एवं प्रत्युत्पन्नमतिता के आगे कोई भी अपने आपको स्थापित नहीं कर पाता था. वे अपनी बुद्धि विवेक एवं तर्क से किसी भी हारी हुई बाजी को जीत में एवं जीती हुई बाजी को हार में बदल देने की क्षमता रखते थे. यही कारण था कि उनके प्रतिद्वन्दी उन्हें धूर्त कहने लगे थे. साथ ही कई लोक कथाएँ भी उनके माथे ही मढ़ दी गई. इन्हीं में से एक लोक कथा है छुतहा घैल. इसमें स्त्री के सामाजिक दयनीय स्थिति का चित्रण किया गया है. स्त्रियाँ एक कवि के लिए एक एक फूल हुआ करतीं हैं जिसके प्रत्येक पंखुरी को हटाया जाता है, एक भोगी व्यक्ति के लिए मात्र माँस का लोथड़ा बन जाती है, एक योगी के लिए पाप का खान हो जाती है तो पति के लिए वंश वृद्धि का मशीन. इन सभी का प्रमाण इस लोक कथा में मिलता है.
गोनू झा अपनी बुद्धि का उपयोग कर बेपारीलाल तथा कबुतरी देवी को आसान रास्ता से भटका कर उस रास्ते पर ले जाता है जिससे कि कबुतरी को अपनी पत्नी साबित करने के सभी प्रमाण जुटा सकें. इन्हीं प्रमाणों के आधार पर ग्रामपति [मुखिया] बेपारीलाल की पत्नी कबुतरी देवी को गोनू झा को पत्नी के रूप में अपना फैसला सुना देता है. अंत में अपनी पत्नी के साथ अच्छे व्यवहार करने के शर्त पर पुन: बेपारीलाल को उसकी पत्नी कबुतरी देबी लौटा दिया जाता है. साथ ही स्त्री को गोनू झी तीन मंत्र भी देते हैं अड़ना... लड़ना... एवं मरना...

मिथिलांगन :    

वर्ष 1992 ई. से मिथिलांगन दिल्ली में मैथिली साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक उत्थान के लिए सतत क्रियाशील संगठन है. अपने ऊर्जावान एवं समर्पित सदस्यों के बल पर ही मिथिलांगन लगातार बसंत पंचमी, मैथिली भाषा में बच्चों के लिए प्रशिक्षण, प्रत्येक वर्ष मैथिली लोक साहित्यविद् व्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म जयंती, कवि गोष्ठी, नाटक, सांस्कृतिक कार्यक्रम, त्रैमासिक पत्रिका मिथिलांगन का प्रकाशन, कई अन्य महत्वपूर्ण प्रकाशन जैसे कि मैथिली शुभ संस्कार एवं गीत , स्वास्थ शिविर, निर्धन छात्र-वृत्ति, रोजगार योजना आदि सफल आयोजन एवं संचालन में सलग्न है. मिथिलांगन द्वारा विगत वर्षों में कई महत्वपूर्ण नाटक प्रस्तुत किया गया है सामा-चकेबा, सोन मछरिया, नैका बनिजारा, उगना हॉल्ट, किंकर्तव्यविमूढ़, टुस्सा आ बांझी, छुतहा घैल, डालघर आदि प्रमुख हैं. 
 
 
 
 
निर्देशक : संजय चौधरी : 
मिथिलांगन, दिल्ली के आजीवन सदस्य एवं रंगमंच प्रभारी. स्कूल से ही अभिनय एवं निर्देशन की शुरुआत । आंगन (पटना) से विधिवत मैथिली रंगमंच की शुरुआत । संगीत नाटक अकादमी (बिहार सरकार ) एवं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली द्वारा आयोजित नाट्य कार्यशाला मे श्री रुद्रप्रसाद सेन गुप्त, ब ब कारांत, तपस सेन, अशोक सागर भगत एवं भानू भारती जैसे महान रंगकर्मी द्वारा प्रशिक्षित । अभिनय के लिए कई बार पुरष्कृत एवं सम्मानित । मैथिली रंगमंच के लिए पूर्ण समर्पित. सन 2003 दिल्ली में मैथिली रंगमंच के लिए विधिवत शुरुआत. निर्देशित मैथिली नाटक सामा चकेबा, सोन मछरिया, नैका बनिजारा, उगना हॉल्ट, टुस्सा आ बांझी, किंकर्तव्यविमूढ़, छुतहा घैल, डाकघर इत्यादि । समय समय पर हिन्दी रंगमंच में भी  रंगकार्य.  दिल्ली डी.ए.वी. स्कूल में  रंगमंच प्रशिक्षक के रूप में कार्य. हिन्दी में निर्देशित नाटक -  धोखा किसको, ठाकुर का कुआँ (प्रेमचंद रूपान्तरण संजय चौधरी), किंकर्तव्यविमूढ़, अंधेर नगरी चौपट राजा, मुक्त पंछी इत्यादि । चर्चित मैथिली फिल्म सिंदूरदान में अभिनय, ऐड फिल्म के लिए भी सक्रिय. दिल्ली में  मैथिली भाषा, संस्कृति एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम के प्रचार प्रसार के लिए समर्पित एवं कटिबद्ध ।

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

मलंगिया नाट्य महोत्सव [ तीसरा दिन ]


28 दिसम्बर, 2012
ओकरा आँगनक बारहमासा
लेखक : महेन्द्र मलंगिया  
मिथिला नाट्यकला परिषद, जनकपुर, नेपाल 
निर्देशन : रमेश रंजन

 
ओकरा आँगनक बारहमासा
 
ओकरा आँगनक बारहमासा में बिहार के मिथिलांगन क्षेत्र में रह रहे दलित समुदाय के मजदूरों के साल भर यानी बारह महीने की दयनीय आर्थिक विप्पन्नता की स्थिति का चित्रण है. यह चित्रण उस समय का है जब दिन भर की मजदूरी मात्र तीन किलो (लगभग) धान वा कोई दूसरा अन्न मिलता था. मजदूरी का कार्य भी प्रति दिन नहीं मिलता. उसी मजदूरी में कपड़ा लत्ता, दवाई दारू, मर मसाला खरीदना कठिन ही नहीं बल्कि असभंव था. अत: बिछावन के बदले में पुआल पर सोना, मालिकों से फटा पुराना कपड़ा माँगना, दो चार सेर अन्न याकि दो चार रुपया के लिए हाथ फैलाना उनकी नियति हो गई थी. जिसका उदाहरण नाटक का मुख्य पात्र मल्लर है. जैसे मरुभूमि में मृग पानी के तलाश में अपस्यांत हो कर मर जाता है वैसे ही इस समाज के लोग धन कमाने के लिए शहर जाते हैं और खाली हाथ लौट आते हैं. ऎसी विकराल परिस्थिति में कम उम्र में ही मल्लर जैसे लोग जो कि परिवार का मुखिया होता है, मर जाता है. इस दयनीय स्थिति में भी गाँव के मालिक उनकी बहु बेटियों की इज्जत हरण के लिए ललायित रहते हैं.

बीमार मल्लर जब मरनासन्न अवस्था में होता है तो उसकी एक ही इच्छा है कि वह छौंक लगी दाल चावल खाता, पर उसकी यह अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं हो पाती. इतना ही नहीं मरने के बाद जमीन, लकड़ी एवं नगदी के अभाव में मल्लर के मुँह में मुखबती मात्र लगा कर नदी में भँसा दिया जाता है. यही है उस दलित समुदाय के लगभग प्रत्येक परिवार का बारह महीना.    

 

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

मलंगिया नाट्य महोत्सव लेल शुभकामना -- मोहन भारद्वाज. ]


मोहन भारद्वाज

दिल्ली आवास
3.12.12
प्रिय प्रकाश,

मैलोरंग अपन वार्षिकोत्सवक सातम आयोजन महेन्द्र मलंगिया पर केन्द्रित क रहल अछि से जानि खूब खुशी भेल. विश्वास अछि, एहि अवसर पर प्रकाशित होमयवला स्मारिका संग्रहणीय होयत. हमर शुभकामना.

महेन्द्र मलंगिया मैथिलीक एकमुड़िया रचनाआर छथि. ओना, कथा आ अन्यों विधा मे रचना छनि, तैयो हिनक ख्याति अछि नाट्यकारक रूप मे. तकर कारण छैक. नाटक हिनक जीवन अछि. जीवन हिनक साहित्य अछि. जीवन अछि चलब आ नाटक अछि संग चलब. साहित्य भाव नाटकक नाभि नाल अछि. सम्मिलित स्वेच्छा प्रणोदित नाट्य रचनाक संग मलंगिया एकाकार भ गेल छथि.

हमरा जनैत महेन्द्र मलंगिया नाट्यकार छोड़ि आर किछु भइये नहि सकैत छलाह. नाट्यरचनाक परिचय अछि ओकर लोकपरकता. मलंगियाक चिन्हारय अछि हुनक बगय बानि, चालि ढ़ालि, बाजब बतिआयब, पढ़ब लीखब. ठेंठ जीवन, ठिकायल लेखन. लोकक स्थिति चिंता सँ विकास सेहंता धरिक निधोख निरूपण. पूर्णांक नाटक हो वा नुक्कड़ नाटक, रेडियो नाटक रहय कि एकांकी सभ ठाम थाप पड़ैत अछि आमलोकक दशा दिशा केँ देखार करबाक खगता आवश्यकता पर. आ से, विषय वस्तुए नहि, भाषा सेहो कहैत अछि. मलंगियाक रचना मे जनगण आ ओकर संस्कृति बजैत अछि. मैथिल स्नेह आ संघर्षक भंगिमा देखाइत अछि.

मैलोरंगक वार्षिकोत्सवक अवसर पर प्रकाशित होमयवला स्मारिकाक संग मलंगियाक कृतिक प्रकाशन, नाट्य रचनाक मंचन एहि प्रकारक सम्पूर्ण कार्यक्रम लोक संघर्षक अभियान केँ चड़िआयत से विश्वास अछि. बधाइ आ मंगलकामना.

अहाँक
मोहन भारद्वाज.
3.12.12
[ सुप्रसिद्ध चिंतक मोहन भारद्वाज जीक हम समस्त मैलोरंग रेपर्टरी दिस स' आभारी छियनि, जे हमर सबहक आयोजन लेल एतेक आत्मीय भ' शुभकामना देलथि अछि.]  

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

मलंगिया नाट्य महोत्सव [ दूसरा दिन ]

 27 दिसम्बर, 2012
 छुतहा घैल
 लेखक : महेन्द्र मलंगिया
 मिथिलांगन, दिल्ली
 निर्देशन : संजय चौधरी  
 
छुतहा घैल
आज से लगभग साढ़े छ: सौ वर्ष पहले मिथिला में गोनू झा नाम के एक व्यक्ति का जन्म हुआ था. गोनू झा मिथिली के राजा भवेश्वर सिंह के दरवार में पंडित के रूप में नियुक्त थे. उनकी बुद्धिमत्ता एवं प्रत्युत्पन्नमतिता के आगे कोई भी अपने आपको स्थापित नहीं कर पाता था. वे अपनी बुद्धि विवेक एवं तर्क से किसी भी हारी हुई बाजी को जीत में एवं जीती हुई बाजी को हार में बदल देने की क्षमता रखते थे. यही कारण था कि उनके प्रतिद्वन्दी उन्हें धूर्त कहने लगे थे. साथ ही कई लोक कथाएँ भी उनके माथे ही मढ़ दी गई. इन्हीं में से एक लोक कथा है छुतहा घैल. इसमें स्त्री के सामाजिक दयनीय स्थिति का चित्रण किया गया है. स्त्रियाँ एक कवि के लिए एक एक फूल हुआ करतीं हैं जिसके प्रत्येक पंखुरी को हटाया जाता है, एक भोगी व्यक्ति के लिए मात्र माँस का लोथड़ा बन जाती है, एक योगी के लिए पाप का खान हो जाती है तो पति के लिए वंश वृद्धि का मशीन. इन सभी का प्रमाण इस लोक कथा में मिलता है.
 
गोनू झा अपनी बुद्धि का उपयोग कर बेपारीलाल तथा कबुतरी देवी को आसान रास्ता से भटका कर उस रास्ते पर ले जाता है जिससे कि कबुतरी को अपनी पत्नी साबित करने के सभी प्रमाण जुटा सकें. इन्हीं प्रमाणों के आधार पर ग्रामपति [मुखिया] बेपारीलाल की पत्नी कबुतरी देवी को गोनू झा को पत्नी के रूप में अपना फैसला सुना देता है. अंत में अपनी पत्नी के साथ अच्छे व्यवहार करने के शर्त पर पुन: बेपारीलाल को उसकी पत्नी कबुतरी देबी लौटा दिया जाता है. साथ ही स्त्री को गोनू झी तीन मंत्र भी देते हैं अड़ना... लड़ना... एवं मरना...
 
आप सभी इस अनूठी नाट्य प्रस्तुति को देखने जरूर आएँगे, यह आग्रह है हमारा.
 


रविवार, 2 दिसंबर 2012

मलंगिया नाट्य महोत्सव; प्रथम दिवस [ 26 दिसम्बर, 2012 ]



26 दिसम्बर, 2012
गाम नइ सुतैए
लेखक : महेन्द्र मलंगिया
पंचकोसी, सहरसा
निर्देशन : उत्पल झा
गाम नइ सुतैए

असामाजिक कार्यों में व्याप्त युवकों से परेशान किसी एक ग्राम प्रदेश के कत्थ को समेटे हुए है गाम नइ सुतैए. चोरी डकैती, हत्या आदि कर्म एवं सामाजिक अनुशासन का उलंघन करना इन युवकों का मुख्य कर्म बन गया है. गाँव के कोई भी व्यक्ति डर के कारण इन युवकों से अपने आप को दूर रखना ही बेहतर समझते हैं. स्थिति यहाँ तक पहुँच जाती कि स्वयं पिता भी मंदिर जाकर भगवान से अपने बेटे के लिए 'मौत' की ही दुआ माँगते हैं. गाँव की ऎसी स्थिति का कारण क्या है ? इस प्रश्न के उत्तर के लिए जब गम्भीरता से विचार किया जाता है तो हमारे देश की सरकार ही पूर्ण रूप से दोषी करार दी जाती है, जो भ्रष्ट नेताओं द्वारा संचालित है. वह डिग्री तो देती है पर नौकरी नहीं दे पाती. परिणामत: प्रत्येक वर्ष लाखों युवक बेरोजगार होते जा रहे हैं. इन्हीं बेरोजगार युवकों का उपयोग नेतागण अपने लिए करते हैं. यही वजह है कि पुलिस एवं बाहुबलियों के बीच मैसेरे भाई जैसा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है. इस स्थिति में आम आदमी भागवान के भरोसे ही अपनी जिन्दगी जीते हैं. पर, जब सहशीलता का सब्र टूटता है तो सभी ग्रामीण एकजूट हो कर जोरदार विरोध करते हैं. इस संघर्ष से गाँव में अशांति आ जाती है. यही स्थिति नाटक के नामकरण गाँव सोता नहीं [ गाम नै सुतैए ] को सार्थक बनाता है. 
 
प्रस्तुति मैथिली भाषा में आयोजित है.
आप इस नाट्य प्रस्तुति को देखने के लिए आमंत्रित हैं.