शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

शताब्दी प्रवासक बाद घर घूरल ‘हरिश्चन्द्रनृत्यं’



दरणीय डॉ. नरेन्द्र झा जीक सत्प्रयाससँ ‘रामभद्रशर्माकृत हरिश्चन्द्रनृत्यं मल्लकालीन मैथिली नाटक’क पुस्तक प्राप्त भेल । पुस्तकक सांगोपांग प्रथमद्रष्टा अध्ययन कयल । अंत तक जाइत – जाइत मोन चकित होइत रहल जे- की, कियो व्यक्ति 46 वर्ष धरि कोनो एक पाँति के सूत्र बना एकाग्रचित्त रहि सकैत छथि ? ओहि एक पाँति संग निरंतर अपन शोध प्रक्रिया प्रवाहित राखि सकैत छथि ? जखन कि जीवनक आन – आन जरूरी जिम्मेदारीकेँ बखूबी निभाबैतो रहलथि अछि । वर्ष 1973 ई. मे कतौ पढ़ल पाँति जे- “भारतेन्दु हरिश्चन्द्रक लिखल नाटक ‘सत्य हरिश्चन्द्र नाटक’पर 1651 ई. मे रचित ‘हरिश्चन्द्र नाट्यम्’ (नृत्य) नामक मैथिली नाटकक प्रभाव अछि” – तकर अंन्वेषणमे अपन जीवनक 46 वर्ष लगा, समुद्र मंथनक’ मणिदीप निकालताह आ अपन भाषा संग नव पीढ़ीक माथ ऊँच करेताह । एहन महान व्यक्ति; अंवेषक डॉ. रामनंद झा ‘रमण’केँ मैथिली नाटक व रंगमंच दिसस’ शत – शत नमन । हिनका संदर्भमे सर्वश्री पं. गोविन्द झाक कहब छन्हि – “प्रस्तुत पुस्तकक एकमात्र हस्तलेख जर्मनीमे सुरक्षित छल । ऑगस्त कॉनरेडी साहेब विवेचनात्मक भूमिका संग 1891 ई. मे प्रकाशित करौलन्हि तकरा गवेषनापरायण डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’ अपन घरक एहि पुस्तककेँ सए वर्षक दीर्घ प्रवाससँ 1991 ई. मे अपन घर घुराए अनलनि ।” रमण सर अपने सत्ते लगाड़ी आ कर्मनिष्ठ छी ।

संदर्भ अछि विश्वम्भर फॉण्डेशन, राँचीसँ डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’ जीक (संकलन-सम्पादन) हालहिमे प्रकाशित पोथी ‘रामभद्रशर्माकृत हरिश्चन्द्रनृत्यं’ (मल्लकालीन मैथिली नाटक) । एहि पोथीक पहिल संस्करण 1891 ई. मे जर्मनीस’ प्रकाशित भेल, ई एकर दोसर संस्करण थिक, जे 2019 ई. मे प्रकाशित भ’ आई हमरा सबहक समक्ष साकार उपस्थित अछि ।

आइ – काल्हि क्रोनोलॉजीक बहुत चर्च छैक, त’ एहि पुस्तकके सेहो क्रोनोलॉजीमे देखल जा सकैत अछि । 1651 सालमे एकर रचना भेल, 1891 सालमे एकर प्रथम प्रकाशन जर्मनीमे भेल, 1991 सालमे ई पुन: मिथिलाधाम वापस आयल, लगभग 368 साल बाद 2019 सालमे ई अपन मूल भाषा मैथिलीक भ’ प्रकाशित भेल अछि । आब एकर मंचन जहिया होयत तकर दिनांक निश्चितक’ एहि नाटकक चक्रकेँ पूर्ण कयल जा सकत ।
  
जखन पुस्तक हमरा हाथ लागल तखने उंटा पुनटा क’ देखल । मुद्रकपर तामसो उठल, जे लगभग 200 पेजक सामग्रीकेँ गोंजि – गाँजिक’ मात्र 125 पेजमे ठाँसि देलक अछि आ कोनोटा सबहेडिंग बोल्ड नहि अछि । पाठकक मोनमे कोनो आकर्षण नहि उपजैत अछि । बल्कि बोझिल बुझाइत अछि । 1891 ई. मे छपल पहिल संस्करणकेँ देखियोक’ नबका संस्करणकेँ छापक चाही छल । भारतक मुद्रण आब एतेक पाछू त’ नहिए अछि । संगहि जखन एहि 125 पेजक पेपरबैक पोथीक दाम (मूल्य) 500/- टाकापर ध्यान गेल तखन छगुंता आर बेसी भ’ गेल । मुदा, पुस्तकमे छपल आलेखक गुणबत्ता आ ऎतिहासिक महत्वकेँ अकानलहुँ त’ उपरका सभ अवगुण क्षम्य भ’ गेल ।

पुस्तकक पहिल पाठ ‘मल्लकालीन मैथिलीक एक नाटक’ शीर्षकमे श्री रमणजी कतेको प्रकारें चर्च-वर्च करैत ‘हरिश्चन्द्रनृत्यं’केँ केन्द्रमे रखैत छथि । एकर रचना ललितपुर/पाटन शाखाक श्रीसिद्धिनरसिंहमल्लके आशीर्वादस’ रामभद्र शर्माद्वारा 1651 ई. मे भेल - से स्थापित करैत छथि । एहि पुस्तकक अंवेषण प्रक्रिया आ एकर ऑगस्त कॉनरेडीद्वारा जर्मनमे सम्पादित तथा संयोगसँ फ्रेंच भाषाक कोपेनहेगेन विश्वविद्यालयमे हिन्दीक प्राध्यापक डॉ. रेन्नर एलमारसँ भेटब, हिनकाद्वारा जर्मन भूमिकाक अंग्रेजी अनुवाद करब, फेर तकर मैथिली अनुवाद प्रक्रिया आदि अत्यंत रोचक आ मारुख अछि ।

संगीतशास्त्रक मर्मज्ञ स्व. प्रो. आनन्द मिश्र ‘हरिश्चन्द्रनृत्यं’मे संगीत विषयस’ दोसर पाठ लिखथि अछि । प्रो. मिश्र अपन तीन पेजक आलेखमे नीक जेना स्थापित केलाह अछि, जे एहि नाटकमे उत्तर आ दक्षिण भारतीय संगीत – दुनू पद्धतिक प्रयोग भेल अछि । जे नाटकक विशालताक परिचायक छैक ।

पं. गोविन्द झा तेसर अध्यायमे ‘हरिश्चन्द्रनृत्यं’ आ ओकर भाषापर फरिछाक’ चर्चा केलथि अछि । जाहिमे नाटककार, आश्रयदाता, लिपि, भाषा वैविध्य, भाषाक स्थितिमे-  आक्षरिकी, सर्वनाम, क्रियापद, अंविति आदिपर भाषाविद् दृष्टिए विवेचन केलाह अछि  । नाटकमे प्रयुक्त किछु रोचक शब्द जेना – विजय, बहिआ, नौड़ी, बेगार, नफर, मजूरी, कोड़ा, दोकड़ा, गरि आदिक वर्णन सेहो केलाह अछि । नाटकक सामान्य परिचय आ मैथिली अनुवादकक वक्तव्य सेहो सविस्तार लिखलाह अछि ।


ऑगस्त कॉनरेडी साहेबद्वारा जर्मनमे सम्पादित आलेखक डॉ. रेन्नर एलमारद्वारा अँग्रेजीमे कयल गेल अनुवाद सेहो पुस्तकमे मुद्रित भेल अछि ।  अंतमे नाटकक नवरूप आ मूलरूप दुनू छापल गेल अछि । एहि ठाम इहो कहि दी जे वर्तमान रूपक मुद्रणक अभिकल्पन बहुत खराब अछि, जाहि स’ बहुत रास भ्रम उत्पन्न हेबाक संभावना छैक, ओत्तहि मूल रूपक मुद्रण अपेक्षाकृत सुन्दर आ बोधगम्य । 

बहुत दिनक बाद हमरा सबकेँ खासक’ मैथिली नाटकसँ जुड़ल लोककेँ एकटा एहन पोथी हाथ लागल अछि, जकर महत्व अकानब कठिन अछि । जखन हमर अग्रज एतेक मेहनतस’ हमर हेरायल नाट्यकृतिकेँ जर्मनीसँ वापस आनि देलाह अछि त’ आब रंग संस्था आ रंग निर्देशक लोकन्हि अपन कर्तव्यकेँ शिरोधार्य करैथ आ एकर मंचन वर्तमान स्वरूपमे राखि अवश्य करथि । तखने ई कृति सम्पूर्णता ग्रहण करत ।  एकबेर पुन: प्रकाशक नवीन कुमार झा आ सम्पादक डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’ संगहि डॉ. नरेन्द्र झा केँ हृदय स’ आभार । 

पुस्तकक नाम :   रामभद्रशर्माकृत हरिश्चन्द्रनृत्यं (मल्लकालीन मैथिली नाटक)
सङ्कलन-सम्पादन : डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’
दाम : 500 टाका.
कुल पृष्ठ : 125.
प्रकाशक : विश्वम्भर फॉण्डेशन, 03 ए, कुंज विहार, अरगोड़ा, हिनू, राँची, झारखण्ड-02.
मो. : 09471711557. ई-मेल: bishwambherfoundation7591@gmail.com

      
- प्रकाश झा
( पीएच-डी.; नेट; सीनियर फेलो, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार )
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भगवानदास रोड, नई दिल्ली – 01.
मो. + 91 9811774106, फोन : 011 23389138.


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