बुधवार, 25 सितंबर 2013

पंचम वैदिक : सेमिनार के कुछ कथन


बोल कि लव आज़ाद हैं तेरे ...

मैं भी मुँह में जुवान रखता हूँ ...

कोई पूछा कि मुद्दा क्या है ...

अमृत मंथन स्वर्ग का पहला नाटक ...

जो दुनिया में नहीं होता वह दीखाई दे नाटक में ...

नाटक में अच्छा लगना जरूरी है...

आज के रंगमंच में इंस्टॉलेशन का दौड़ ...

जीवंतता, जीवंत उपस्थिति...   

अभिनेता की कला को आगे बढ़ाना ही अन्य कलाओं का कार्य है ...

राजनैतिक नाटक या नाटक में राजनीति ...
 

हमारी दुनिया बेहतर नहीं है अभी ...

नाटक सच को पहचानता है ...

नाटक वाले ही राजनीति नहीं कर रहे ...

रणनीति अपनाने की जरूरत है ...

बिना राजनीति के सहारे कोई नाटक नहीं टिक सका ...
 
 
 

प्रकट करने का माध्यम है रंगमंच ...

सच के सहारे डट कर खड़ा होना रंगमंच है ...

किंचित स्वाद के लिए बैठै दर्शक रंगमंच देखने आते हैं ...

संकुचित हो गई हैं कलाएँ ...   




 

 


 

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

कुमुद रूपी मैथिली स्वर मे ठुमरी

 
असावरी रेपर्ट्ररीक कथक नृत्य प्रस्तुति
यैह थिक दिल्लीक हृदयस्थली इन्डिया हेबिटेट सेंटर । जँ दिल्ली अयलहुँ आ एहि परिसर मे नै घुमलौं त’ बुझि लिय’ जे पूरा दिल्ली नै घुमलहुँ । अत्याधुनिक वास्तुशास्त्र आ वास्तुशिल्प स’ सुसज्जित एहि भवन के मुख्य प्रेक्षागृह स्टेन ऑडिटोरियम मे [ 18 सितम्बर, 13 ] चलि रहल अछि ललित – अर्पण उत्सव – 13. आयोजक अछि असावरी रेपर्टरी । असावरी एकटा रागक नाम अछि जे भोर मे गावल जाइत अछि । एही रागक नाम पर एहि रेपर्टरीक नाम असावरी राखल गेल अछि । असावरी नामक कथक नृत्य रेपर्टरीक कथक सुप्रसिद्ध नृत्यांगना शोभना नारायण जी छथि । मूल रूप स’ बिहारक निवासी शोभना जी पद्म सम्मान स’ सम्मानित नृत्यांगना छथि । नृत्यक शिक्षा गुरु पं. बिरजू महाराज जी स’ ग्रहण केलथि ।
हँ ! त’ आब हम सब प्रवेश क’ गेलहुँ एहि मुख्य प्रेक्षागृह मे । आजुका दिन हम सब मैथिल लेल खास अछि । आई एहि भवनक सुव्यवस्थित प्रेक्षागृहक मंच पर विराजमान हेतीह मैथिली भाषी श्रीमती कुमुद झा दीवान । हम सब मैथिली भाषी सौकड़ो के संख्या मे हिनका सुनबा लेल उत्कण्ठित छी । दिल्लीक विभिन्न भाग स’ गणमान्य सुसंस्कृत मैथिलजन प्रेक्षागृह मे उपस्थित छथि ।
सुश्री कुमुद झा दीवान मैथिलजन के सम्मान करैत
लिअ’ शुरू भ’ गेल स्वागत, सम्मान अर्पणक बाद असावरी रेपर्टरीक कथक नृत्य स’ अनुगुंजित हुअ’ लागल प्रेक्षागृह । एकटक सब प्रेक्षक मंचपर नृत्य तालके संयोग स’ बनैत – बिगड़ैत नृत्य संरचना देखवा मे लीन भ’ गेलाह । अद्भुत पद चाल आ शारीरिक भंगिमाक संयोग ।
आब हमर सबहक आसा-आसी समाप्त भेल । मंच पर अपन साजो सामान ल’ उपस्थित भेलीह मैथिल ललना डॉ. कुमुद झा दीवान मूल रूप स’ मिथिलाक मधुबनीक निवासी सुश्री कुमुद झा अपन शास्त्रीय गायन प्रतिभा स’ देशे नहि विदेशो मे अपन एकल प्रस्तुति मे नाम स्थापित केने छथि ।  शास्त्रीय गायन मे सेहो हिनक मजबूत पकड़ ठुमरी एहन क्लिष्ट गायन मे छन्हि । कुमुद जी गायनक संग संग एहि विधाक शोधकार्य मे सेहो लागल छथि । हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत लेल  प्रतिष्ठित सम्मान इन्दिरा गाँधी प्रियदर्शनी एवार्ड-10 स’ सम्मानित सुश्री कुमुद झा अपन गायनक शिक्षा पद्मभूषण छन्नूलालजी मिश्रा, श्रीमती अनिमा दास गुप्ताश्रीमती शांति हीरानन्द जी स’ ग्रहण केने छथि । संगीतक महत्वपूर्ण तानसेन आयोजन, ग्वालियर स’ ल’ क’ नेहरू सेंटर, लंदन तक प्राय: सब महत्वपूर्ण संगीत आयोजन मे अपन उपस्थिति द’ चुकल छथि ।
 
 
ठुमरी । ठुमरीक दू प्रकार; पहिल बोलबाँटक ठुमरी आ दोसर बोल बनावक ठुमरी । बोल बनावक ठुमरीके सेहो दू प्रकार; पहिल पूरब अंग आ दोसर पंजाब अंग । पूरब अंग ठुमरीक सेहो दू भाग; पहिल लखनऊ शैली त’ दोसर बनारसी शैली ।  बनारस शैली मे सेहो एकटा आर अंग जकरा कहल जाइत अछि गया शैली । त’ आजुक श्रोता सुश्री कुमुद झा दीवान स’ पूरब अंगक बनारस शैली आ गया शैलीक ठुमरीक आनंद लेताह ।  
 
अपन सब साजिंदा संग बैसलीह कुमुद जी । अपन उद्गार मे अहू मंच पर सब स’ पहिने अपन मिथिला के मोन पाड़ब हिनक सदाशयता लागल । मंच स’ बेर बेर मैथिल समाज के धन्यवाद देब हिनक महानता अछि । शुरु भेल गायन । पहिल गान  “हमसे जिनु बोलो बलमा...” अपन शुरुआतहि स’ प्रेक्षक के मोहित क’ लेलक । गायन मे उतार चढ़ाव, लय मे माधुर्य आ मुखमंडल पर गीतक भावक प्रेषण अति रमणीय छल । दोसर मध्य लय मे “ न छेड़ो सैंया बाली उमर लड़कैयाँ..”  
 
सब गीत मे शब्द बहुत कम छल मुदा शब्द अपन अभिव्यक्ति मे अलग अलग रूप मे प्रेषित भ’ रहल छल । गायन विलम्बित लय स’ शुरु भ’ आगू बढ़ैत गेल । गीतक प्रत्येक स्वरक पसार अनेको तरह स’ बेर बेर आबि रहल छल । गयन क्रम मे छोट छोट मुरकी, खटका आदिक सुन्दर प्रयोग स’ गायनक गुणवत्ता परिलक्षित भ’ रहल छल ।  एकटा परिपक्व प्रस्तोता जेना कुमुद जी अपन गायनक प्राय: सब शब्द मे नीक आँगिक भंगिमाक पुट स’ आकर्षक छटा प्रसारित क’ रहल छलीह । जखन गायन अपन अंतिम रूप धारण क’र’ लगैत छल तखन संगत करनिहार तबला पर कहरबाक थाप बुझु भाव विभोर क’ दैत छल ।    
एहि स’ पहिने कतेको ठुमरी आयोजन मे गेल छी । मुदा एहि आयोजन मे अपनापन छल । मंचक स्वर अप्पन छल । देसी छल । खाँटी मैथिली स्वर छल । मिथिला नारीक सशक्तिकरणक द्योतक छल । मिथिलाक विदुषीक सम्मानक छल । आदरणिया श्रीमती डॉ. कुमुद झा दीवान जी केँ हार्दिक बधाई ।
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बुधवार, 18 सितंबर 2013

मणिमञ्जरी नाटक मे संगीत : परिकल्पना स’ प्रस्तुति धरि


दीपक ठाकुर
नाटक मणिमञ्जरीक सबस’ कठिन आ मजबूत पक्ष अछि एकर संगीत । विद्यापति रचित गीतक संगीत मैथिली जन मानस मे तेना ने जैड़ि जमौने अछि जे एहि मे बेसी प्रयोग कखनो मान्य नै भ’ सकल अछि । हम अपन सब नाटकमे संगीत लेल कोनो ने कोनो स्थापित संगीत संयोजक केँ अनैत रही मुदा, हमरा कहियो संतुष्टि नै भेटल । पिछला किछु साल स’ मैलोरंगक युवा रंगकर्मी दीपक ठाकुर केँ संगीत रचना आ संगीतक संयोजन दिस बढ़ैत लगाव देख हमरा मोन मे दीपक ठाकुर केँ मणिमञ्जरी लेल संगीत संयोजनक भार सौंपक विचार आयल । संगहि राजीव रंजन झा खूब नीक गायन करैत छथि आ अत्यधिक ऊर्जा स’ भरल युवा छथि आ संगीतक प्रति अति उत्साह आ आकर्षण सेहो । संगहि एहि दुनू रंगकर्मीक बीच नीक केमेस्ट्री सेहो छन्हि । एकर फायदा मैलोरंग के भेटक चाही छल । एहि लेल रंगमंडल प्रमुख मुकेश जी आ वरीष्ठ पार्श्व संगीत ध्वनि संयोजक राजीव मिश्रा स’ विचार विमर्श कयल गेल । तीनू गोटे एहि निर्णय पर पहुँचलहुँ जे ई दुनू गोटे मेहमती त’ छथिए जँ अपना निगरानी मे हिनका सब स’ काज कराओल जाय त’ नीक परिणति आबि सकैत अछि । एहि लेल एकटा कूटनीति स्थापित भेल । जाहि मे हम तीनू गोटे शामिल भेलहुँ । विचार भेल जे ई दुनू व्यक्ति प्रतिक्रियावादी छथि तेँ सब दिन एहि जोड़ी केँ कोनो ने कोनो रूपे उकसायल जाय ताकि हिनका सबहक धनात्मक ऊर्जा सदैब बनल रहैन ।   
 

राजीव रंजन झा

हाँ ! दीपक ठाकुर केँ संगीत सौंपबाक तीनटा ठोस कारण छल । पहिल त’ ई जे अपन युवा साथी पर विश्वास करक चाही । ई लोकनि जँ अपन संस्था मे एहन काज नै क’ सकताह त’ कोना सिखताह आ अपना प्रति विश्वास कोना बढ़तन्हि । दोसर, ई लोकनि हरदम हमर सोचक अनुरूप संगीत करताह आ हरदम रंगकर्मीक बीच रहताह जाहि स’ सब अभिनेता संगीत स’ अपनापन स’ जुड़ताह । संगीत कतौ स’ हुनका लोकनिक लेल थोपल नै बुझायत । तेसर ई जे बाहर स’ व्यक्ति के आनब अत्यधिक अर्थ साध्य आ मानसिक क्लेश दैत रहल अछि । हमर सब रंगकर्मी हरदम हुनका प्रति सेवा भाव स’ समर्पित होयबा लेल बाध्य भ’ जाइत छलाह । जे हमरा किन्नौ नै रुचैत अछि ।  अस्तु ।
 
हँ ! त’ हम अपन विश्वास के मजबूत करैत संगीतक भार दीपक ठाकुर आ राजीव रंजन झा केँ सौंप देलियन्हि । ई दुनू युवा खुशी खुशी एहि अति महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के ल’ संगीत निर्माण कार्य मे लागि गेलाह । एहि बीच विद्यापति गीतक सैकड़ों कैसेट सुनल गेल । नाटक मे गीतक संख्या तीस स’ बेसी छल । कथा क्रम के अनुरूप गीतक तारतम्य जोड़ैत गीतक छटनी केलहुँ । गीतक पाँती मे लयानुरूप उपट – पुलट भेल । प्रतिदिन एकटा गीतक लय दुनू गोटे अनैत गेलाह । गीतक लय पर कतेको बेर घमासान भेल । हिनका दुनू गोटेक परिश्रम कतेको बेर मजाक बनि क’ रहि जाइत छल मुदा धन्यवादक पात्र छथि हमर दुनू रंगकर्मी जे अपन परिश्रम स’ कखनो पाछू नै हटलाह आ नियमित प्रयास करैत रहलाह । संगीत लेल हमर आग्रह छल जे संगीत विद्यापति जीक नव रूप मे हुए आ एहि नव रूप मे रंग संगीतक प्रभाव रहै । डर छल जे प्रेक्षक कहीं विद्यापति संगीतक रस मे सराबोर भ’ नाटकक कथ्य स’ विमुख नहि भ’ जाथि । तेँ एहन आग्रह छल जे प्रेक्षक केँ समानुपात मे संगीत, नाट्य आ अभिनय तीनूक समिश्रणक अनुभूति भेटन्हि ।
संगीत लेल हमर एकटा आर स्वीकारोक्ति अछि । हमर एहि युवा जोड़ी दीपक ठाकुर आ राजीव रंजन झा के संगीत परिकल्पना मे सदैव वाद्ययंत्रक अभाव रहलैन्ह । कहियो हॉरमोनियम वादक नै त’ कहियो तबला या ढोलकक अभाव मुदा तैयो हमर रंगकर्मी मनोज पांडे, संतोष कुमार, अमरजी राय, विपुल आनंद नियमित रुपे कोनो ने कोनो वस्तु के अपन वाद्ययंत्र बना हिनका लोकनि के उत्साहित करैत रहलाह । अंतिम समय मे हमर पुरान रंगकर्मी मो. दाउद राइन दिल्ली आयल आ हॉरमोनियम वादन शुरु केलक । दिन राति हॉरमोनियम पर अभ्यास करैत अपना के अनुकूल क’ लेलक । मो. दाउद सेहो अपन लगनशीलता स’ नतमस्तक होयबाक लेल हमरा बाध्य केलक अछि । भाई अजित कुमार एक दिन एहिना पूर्वाभ्यास देखबा लेल आयल रहैथि । संगीत मे रीदम के अभाव आ सब रंगकर्मीक अदम्य उत्साह हिनका रोकि लेलक । अजित अपन सब ट्यूशन छोड़ि नियमित रूपे हमर रंगकर्मीक संग तबला ल’ बैस गेलाह आ आब हमर संगीत टीम दीपक ठाकुर, राजीव रंजन झा, मो. दाउद राइन, अजित कुमार संग सब रंगकर्मी लोकनि अत्यंत ऊर्जाक संग विद्यापतिक रंग संगीतक आनंद मे सराबोर भ’ पूर्वाभ्यास क’ र’ लागल ।
 

नाटकक संगीत लेल महत्वपूर्ण होइत अछि पार्श्व संगीत ध्वनि । हमर राजीव मिश्रा पार्श्व संगीत ध्वनि मे सिद्धहस्त छथि, ई कहबा मे हमरा कोनो अशोकर्य नहि अछि । हिनका खाता मे एक स’ एक नाटक विद्यमान छन्हि । जल डमरू बाजे नाटक मे हिनक पार्श्व संगीत ध्वनि आइयो हमरा सबके आंदोलित करैत अछि । एहि नाटक मणिमञ्जरी लेल सेहो ई भार राजीव मिश्रा के कान्ह पर छलन्हि । अपन पुरान आदतन रुपे राजीव नियमित पूर्वाभ्यास देखैत छथि आ मंथर गति स’ अपन कार्य निस्पादित करैत छथि । अहू नाटक लेल काछुक चालि स’ चलैत राजीव मिश्रा अंतिम पाँच दिन जगलाह आ अपन कार्यरूप मे काछु स’ खड़हा बनि शुरू भ’ गेलाह । किछु मतभिन्नता, उठा-पटक संग आरोप-प्रत्यारोपक बीच दुनू संगीत टीम [ पार्श्व संगीत ध्वनि आ संगीत संयोजन ] बीच एक रूपता आबि गेल । राजीव मिश्रा एक बेर फेर अपन अनुभव स’ सबकेँ आकर्षित करबा मे कोनो त्रुटि नै रखलाह ।
हम पहिनहियो कहने छी जे हम अपन रंगकर्मीक संगोर आ उत्साह देख स्वयं मोहित होइत रहैत छी । अहू बेर सेहे भेल । ई हमर विश्वास अछि जे एहि प्रस्तुति स’ हमर युवा संगीत संयोजक टीम केँ अपना काजक प्रति अत्यंत विश्वास भेटलन्हि अछि । आब ई लोकनि केहनो परिस्थिति मे आ कोनो तरहक संगीत संयोजनक लेल तैयार भ’ गेल छथि । हमरा एहने परिणामक आवश्यकता छल ।   
 
नाटक मे संगीतक तात्पर्य मानि लेल जाइत अछि जे नाटक मे किछु गीत – नाद होयबाक चाही । मुदा, ठीक एकर उल्टा होइत अछि रंग संगीत । नाटक लेल संगीत मात्र गायन आ वादनक रूप मे रहब कथमपि आवश्यक नहि होइछ । नाटक मे संगीत अपन नव रूप मे पल्लवित होइत अछि । विद्यापति संगीत त’ सब प्रेक्षक नीक जेना सुननहि छथि हुनका फेर स’ वैह गीत वा लय नाटकक माध्यमे सुनायब प्रेक्षक के ठकबाक प्रयास होयत आ ई कार्य अति साधारण सेहो होयत । नाटक मणिमञ्जरी पद्य मे लिखल नाटक अछि । एकर संवाद सेहो बुझू लयात्मके अछि । तेँ आवश्यक छल जे संगीतक ओहन रूप सृजित कयल जाय जे कखन संवाद रूप मे आयत आ कखन गीतक रूप मे ताहि मे फड़ाक करबाक दूरी प्राय: समाप्ते जेना भ’ जाय । संवादो गीत बुझाई आ गीतो संवादे बुझना जाई । एहि नाटक लेल एहने संगीतक सृजन कयल गेल । दीपक आ राजीव रंजनक गायन ओहिना छल जेना पाछू स’ कोनो अभिनेता लय मे अपन संवाद बाजि रहल छथि आ मंच पर उपस्थित अभिनेता कोनो गीत गाबि रहल छथि । एहि तारतम्यक मिलान मे रंगकर्मी के कठिन अभ्यास क’ र’ पड़लन्हि । यैह कारण छल जे प्रेक्षक के संगीत बेसी प्रभावित क’ सकल । संगीतक समय प्रेक्षकक कान मात्र संगीत सुनि रहल छल मुदा आँखि मंच पर उपस्थित अभिताक अभिनय मे एकटक रुकल छल । नाटकक संगीत मंच पर उपस्थित अभिनेता के हुनक मन:स्थिति के कोरबा मे कतहु कमजोर नहि पड़ल । संगीतक लय आ ध्वनि अभिनेताक उल्लास, वियोग आ विरह सब मन:स्थिति के नीक जेना स्थापित करबा मे सहयोगी रहल । संगीत नाटक मे अपन रूप बदलि रंगसंगीतक रूप मे उपस्थित छल तेँ नीक लागल । एहि जोड़ीक संगीत मे हम जे कोनो चित्र बनब’ चाहलहुँ नीक जेना सृजित क’ सकलहुँ । हाँ, संगीत मे किछु कमजोरी छल से हमरा अपना बुझायल जेना महिला स्वरक उपस्थिति कम छल । प्रस्तुतिक समय एक दू ठाम संगीत बेसी लाउड भ’ गेल छल । एहि सब पर विशेष ध्यान देबाक आवश्यकता अछि ।
 
 
 
जतेक वरीष्ठ प्रेक्षक नाटक देखलाह ओ सब लोकनि संगीतक भूरि भूरि प्रसंसा केलन्हि ।  नाट्य प्रस्तुतिक बाद एकटा नाट्य समीक्षक कथन रहैन्हि जे दीपक ठाकुर अपन संगीत के ताहि ऊँचाई पर स्थापित केलन्हि अछि ओकरा तोड़ब आब हिनके बुते कठिन कार्य होयत । हमर एहि नाटक मे समान रूपे अभिनय, नृत्य आ संगीतक समावेश छल । प्रस्तुतिक बाद परिणतिक रूप मे पहिल नंबर पर संगीत रहल, दोसर पर अभिनय आ तेसर पर नृत्य । अपन सब रंगकर्मी केँ हमरा प्रति विश्वासक लेल धन्यवाद ।    

मंगलवार, 10 सितंबर 2013

फूटपाथ : एकटा कोलाज


फूटपाथक एकटा दृश्य
काल्हि दिनांक 06 सितम्बर, 2013 क’ दिल्लीक स्थापित संस्था मिथिलांगनक आयोजनमे जयबाक अवसर भेटल । आयोजन मुक्तधारा प्रेक्षागृह, भाई वीरसिंह मार्ग पर छल । मिथिलांगन संस्थाक वार्षिक आयोजन अछि स्व. व्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’ जीक जयंती समारोह । विगत छ: - सात साल स’ ई आयोजन नियमित रूपे देखबाक अवसर भेटल अछि । संस्था शनै: शनै: एहि आयोजनक गरिमा कम केलक अछि से कहबामे कोनो अशोकर्ज नहि होयबाक चाही । शुरु शुरुमे ई आयोजन खूब धूम धाम स’ दिल्लीक मंडीहाउस स्थित प्रेक्षागृह एल. टी. जी. / राजेन्द्र भवन वाकि श्रीराम सेंटर सन महत्वपूर्ण स्थान पर होइत छल । आयोजनमे उपस्थिति ततेक ने रहैत छल जे बैसबाक स्थान भेटब मुश्किल होइत छल । हलाँकि आइयो हॉलमे सैह हाल रहैत अछि मुदा पहिने हॉलमे पाँच सय आदमी बसैत छल आब त’ हॉले एहन रहैत अछि जे एक सय आदमी आबि जेताह त’ बुझू उग डूब क’र’ लागत । आयोजनमे नृत्य, संगीत आ नाटक तीनू रहैत छल संगहि मणिपद्म जी केन्द्रित छोट छीन संगोष्ठी सेहो होइत छल । हाँ ! ओहि समय संस्था अपन आयोजन सदस्यता शुल्क आ विज्ञापन स’ निकालि लैत छल । मुदा, जहिया स’ ई संस्था मैथिली – भोजपुरी अकादेमीक गोलैसीमे फँसल शनै: शनै: अपन मूल आयोजनक चमक धूमिल क’ लेलक अछि । हम मिथिलांगन के मंच पर एक स’ एक विद्वान के देखने छियन्हि । पद्मसम्मान स’ सम्मानित व्यक्ति सेहो एहि मंच पर उपस्थिति द’ अपना के गौरवांवित अनुभव केलाह अछि । मुदा, आब हिनकर मंचपर अकादेमीक भूतपूर्व सचिव रवीन्द्र कुमार दास सन व्यक्ति के देखि घोर आश्चर्य होइत अछि । मिथिलांगन दिल्ली मे एक स’ एक नीक काज केलक अछि । एक स’ एक उपलब्धि प्राप्त केलक अछि मुदा एखनो अपन आयोजन के निर्धारित समय तक पहुँचब मे साठि मिनट स’ बेसीये पाछू अछि । मिथिलांगक युवा सोच श्री अभय जी, श्री सुन्दरम जी,  श्री संजय चौधरी जीक अनुसार चलक चाहियन्हि । किछु वरीष्ठक सदस्यक लेल निर्णय स’ संस्थाक आयोजन प्रभावित होइत बुझना जाइत अछि ।  अस्तु ।   
 

 मिथिलांगन विगत पाँच छ: साल स’ अपन आयोजनमे मैथिली नाटक जोड़ी अत्यंत प्रसंशनीय काज केलक अछि । अहू बेर श्री मणिपद्म जीक लिखल उपन्यास / कथा फूटपाथ क नाट्य रूपक मंचन भेल । एहि उपन्यास / कथा के नाट्य रूप देलाह अछि श्री प्रदीप बिहारी जी । नाट्य रूप बहुत छिड़ियालय अछि तकरा बहुत हद तक समकालीन बनयबाक प्रयास केलाह अछि निर्देशक ।  नाट्य प्रस्तुतिमे लागल मैथिली रंगमंचक युवा पिढ़ीक उपस्थिति आ हुनक रंगकर्मक प्रति जिजिविशा आह्लादित करैत अछि । संस्थाक पुरान रंगकर्मी त’ मेहनती छथिए मुदा, किछु नव अभिनेता / अभिनेत्री स’ बहुत बेसी आशा जगैत अछि । नाटकमे भाग लेनिहार रंगकर्मी निश्चित रूपे अत्यंत परिश्रम केलाह अछि, हुनका लोकनि लेल एहि क्षेत्रमे उज्ज्वल भविष्यक कामना अछि । सब हमर अनुज छथि आ हम अपन अनुज केँ हरदम आगू बढ़ैत देख हर्षित होइत छी । तेँ हिनका लोकनि केँ सदैव शुभाशीष छन्हि ।

 हाँ ! अपन अग्रजक कार्य प्रणाली पर विचार राखब हम अपन अधिकार बुझैत छी । तेँ भाई संजय जी जे कि एहि नाट्य प्रस्तुतिक निर्देशन केलाह अछि हुनका सँ आग्रह जे युवा रंगकर्मीक शक्ति जे हुनका मिथिलांगन के माध्यमे प्राप्त छन्हि तकर आर बेसी सदुपयोग करथि । हमर विचार अछि जे नाटक मे जँ कास्टिंग नीक स’ कयल जाय त’ आधा नाटक सफल भ’ जाइत छैक । फूटपाथक कास्टिंग मे सुधारक आवश्यकता लागल । नाट्य प्रस्तुति के आरो कसबाक जरूरत छलन्हि । बहुत बेसी बिखराव भ’ गेल अछि । एक दृश्य स’ दोसर दृश्यमे प्रवेश करबाक बीचक समय पर निर्देशक केँ बहुत गम्भीरता स’ सोचक चाहियन्हि । लुल्हाक अभिनय करनिहार अभिनेता अपन पात्र खूब नीक जेना जीब रहल छल ओहि पात्रके पहिल दृश्य मे मुँह खसबाक’ ओकर मुखाभिनय स’ प्रेक्षक के बंचित नहि करक चाही । आन्हर के अभिनय करनिहार अभिनेता भाई संजय जीक संग विगत कतेको साल स’ काज क’ रहलाह अछि । एहन वरीष्ठ अभिनेता पर निर्देशक के विश्वास राखक चाही । हमरा जनैत ई अभिनेता बिना चश्मा के अपन पात्र बेसी नीक जेना प्रभावी बना सकैत छलाह । बिना चश्माक अभिनय एहि स’ बेसी कठिनाह आ अभिनेताक लेल बेसी चुनौतीपूर्ण रहितन्हि । युवा अभिनेता रोहित जे नेताक भूमिका मे छलाह, हिनक अभिनय पक्ष बहुत मजबूत छन्हि, सम्भावनाशील छथि । रोहित नेता स’ बेसी फिट युवा क्रांतिकारी लड़काक भूमिकामे होयतथि । वरीष्ठ अभिनेता भाई केशव जीक संवाद अदायगी खूब नीक छनि जँ हिनक संवाद अदायगी मे नाटकीय तत्व आ शारीरिक संचालन के मिश्रित कयल जाय त’ मैथिली रंगमंच पर एकटा सशक्त चरित्र अभिनेताक उपस्थितिक संभावना अछि । राजेश कर्ण, मुकेश दत्त आदि त’ सशक्त अभिनेता छथिए । सुश्री कल्पना मिश्रा सन सशक्त अभिनेत्रीक उपयोग ओहिना कयल गेल जेना आजुक हिन्दी फिल्म मे कोनो आइटम डॉंस राखल जाइत अछि । जखन कि नाटक एकर माँग नहि करैत अछि । अपन बढ़ैत उम्रक कारणे सुश्री कल्पना जी अपन नृत्य संचालन आ संरचना मे नीक जेना ओझराय गेलीह आ नृत्यक बादक संवाद प्रेषित करबा काल बहुत बेसी हाँफ’ लगलीह जाहि स’ हुनक संवाद आ अभिनय दुनू मर्माहित भ’ गेल । एहि सशक्त अभिनेत्रीक उपयोग अभिनय मे करब बेसी उचित रहिते । हाँ ! साक्षी मिश्रा सेहो प्रभावित केलीह । हिनका स’ सेहो आर मेहनत कराओल जा सकैत छल । मिथिलांगनक ई टीम त’ मजबूत अछि ताहि मे कोनो संदेह नहि ।      
 

एकटा निर्देशक रूपमे संजय भाई फूटपाथमे बहुत विन्दु पर अपन रंगकर्मी स’ चर्चा नहि केने छलाह शायद समय के अभाव भेल हेतन्हि । जेना कि नाटक शुरु होइ स’ पहिने उद्घोषणा कोना हेबाक चाही / दृश्य समाप्त भेलाक बाद कोन अभिनेता किम्हर निकलताह / नाटक समाप्त भेलाक बाद कोना पात्र परिचय होयत आदि आदि । एक - एकटा विंदु पर चर्चा आ विमर्श आवश्यक होइत अछि । खैर... नाटक कोन प्रेक्षागृहमे यानि कतेक पैघ मंच पर भ’ रहल अछि तकरे अनुरूप मंच विन्यास आ दृश्यमे पात्रक उपस्थित होयब सेहो निर्देशन लेल आवश्यक होइत अछि । मुक्तधारा बहुत छोट मंच अछि जाहि पर पात्रक संख्या बहुत बेसी भेने पात्र अपन अभिनयक बारीकी देखेबा मे असमर्थ भ’ जाइत छथि । भाई संजय जी केँ अपन प्रकाश योजना पर सेहो ध्यान देब आवश्यक छन्हि । प्रकाश परिकल्पना आ एकर संचालन बहुत तकनीकी पूर्ण विधा अछि । एहि काजमे भाई अपना के नीक जेना सहज नहि क’ पबैत छथि । भाई सुन्दरम जीक हम प्रसंसक छी । खूब नीक स्वर छन्हि, मुदा हिनक उपयोग सेहो संजय भाई बैलेन्स रूपे नहि क’ सकलाह अछि ।

भाई संजय जी लग बहुत मजबूत आ कर्मठ टीम छन्हि । एहि टीम संग एक स’ एक सुगठित प्रस्तुति कयल जा सकैत अछि । एहि स’ पहिने संजय जी एक स’ एक नाटक निर्देशित केलाह अछि जाहिमे हिनक सबस’ नीक प्रस्तुति छल छुतहा घैल । भाई स’ ओहने नाट्य प्रस्तुतिक अपेक्षा अछि हमरा सबकेँ ।
दिनांक : 07 सितम्वर, 2013 


          

 





गुरुवार, 5 सितंबर 2013

हमर युवा पीढ़ी : अविनाश, रमण कुमर सिंह आ अरुणाभ सौरभ


कविता पाठ करैत युवा कवि श्री अविनाश
 
कविता पाठ करैत युवा कवि श्री रमण कुमार सिंह


कविता पाठ करैत युवा कवि श्री अरुणाभ सौरभ
 
अपन समकालीन युवा पीढ़ीक सक्रियता आ सृजनशीलता स’ प्रफुल्लित होयब आनंदित करैत अछि । संगहि अदृश्य ऊर्जाक संचार सेहो । साहित्यिक सृजनक गप्प होइ वा कि पत्रकारिताक, चलचित्रक माध्यम होइ या कि संगीत नृत्यक माध्यम । कथा लेखन होइ वा कि कविताक सृजन ।
 प्राय: सब विधा मे आजुक युवा पीढ़ीक सशक्त उपस्थिति झलैक रहल अछि । पिछला 27 अगस्त, 2013 क’ एहने युवा सृजनशीलक आयोजन मे जयबाक सू-अवसर भेटल । साहित्य अ...कादेमी, दिल्ली द्वारा युवा साहिति नामक आयोजन प्राय: प्रति महीना कयल जाइत छैक । एहि बेर मैथिली भाषाक हमर युवा कवि लोकनि अपन रचनाक संग उपस्थित छलाह । एहि तीनू युवा मित्र मे श्री अविनाश, श्री रमण कुमार सिंह आ श्री अरुणाभ सौरभ जी आमंत्रित रहथि । प्रथमत: युवा कवि श्री अविनाश अपन रचनाक पाठ केलन्हि । अदौड़ी सन भेल अछि मोन, नद्दीक कात मे, हम छी कमलाकांत आदि रचनाक पाठक संग किछु गीत सेहो अविनाश जी सुनौलन्हि । आब श्री रमण कुमार सिंह जी अपन रचनाक संग अयलाह । जाहि मे मित्र अहाँक पाइर प्रमुख छल । 
 
अंत मे श्री अरुणाभ सौरभ जी अपन कविता रॉकेट स्वप्न स’ रचना पाठ प्रारम्भ केलन्हि । तकरा बाद एक प्रेम पत्रक मादे, एतबेटा नहि, कोका चिरौतना, सम्भवामि युगे, युगे, स्व. पारसमणि झा, शहीद तिलकामाझी आदि आदि कविताक पाठ केलन्हि ।
कविता सुनबाक लेल बहुत कम मैथिली भाषी प्रेक्षागृह मे उपस्थित छलाह मुदा जे छलाह से सुच्चा सांस्कृतिक लोक छलाह । तेँ लोकक कम उपस्थिति आयोजन केँ प्रभावित नहि क’ सकल । अपन समकालीन तीनू युवा रचनाकार के बधाइ ।

रविवार, 1 सितंबर 2013

मायानंद मिश्र का जाना एक सभ्यता का प्रस्थान है : देवशंकर नवीन


प्रो. नामवर सिंह से प्रबोध साहित्य सम्मान ग्रहण करते हुए स्व. प्रो. मायानंद मिश्र
आज मायानन्‍द मि‍श्र अपने पार्थि‍व शरीर से तो नहीं, पर अपनी कीर्ति‍ से हमारे बीच हैं, उनकी कीर्ति‍ हमें सतत प्रेरणा दे, यह प्रार्थना मैं उसी दि‍वंगत आत्‍मा से करता हू 
मैं कब और कैसे मायानन्‍द मि‍श्र का नि‍कटवर्ती हुआ, मुझे याद नहीं आता। मेरे कि‍स आचरण और भक्‍ति‍ के कारण उन्‍होंने मुझसे कहासही अर्थ में मेरे जीवन-संघर्ष, नि‍ष्‍ठा, साहि‍त्‍यि‍क प्रति‍बद्धता के वास्‍तवि‍क उत्तराधि‍कारी महेन्‍द्र(प्रो. महेन्‍द्र, मैथि‍ली वि‍भाग, सहरसा, बि‍हार) और तुम ही हो। उनका यह वक्‍तव्‍य जब मैंने उनके ज्‍येष्‍ठ सुपुत्र वि‍द्यानन्‍द भाई को सुनाया, तो उन्‍होंने कहा किसही तो बोले थे बाबूजी। अपनी सेवाकाल के अन्‍ति‍म दि‍न वे दि‍ल्‍ली आए हुए थे। सीधे मेरे कावेरी हॉस्‍टल, जे.एन.यू., रूम नम्‍बर 231 में पहुचे। कमरे में पाव रखते ही बोलेआइ हमर नोकरीक अन्‍ति‍म दि‍न थि‍क (आज मेरी नौकरी का अन्‍ति‍म दि‍न है)। उनके चेहरे की उस वक्‍त की चमक आज भी जस के तस मेरी आखों में बसी हुई है। दो दि‍न बाद जब वे वापस जाने की तैयारी करने लगे, तो मैंने कहासर, रि‍टायर्ड आप हो चुके, रि‍टायरमेण्‍ट के बाद लोग सन्‍तान के पास जाते हैं। शि‍ष्‍य भी तो सन्‍तान ही होता है। जाइएगा आराम से। बातें मैथि‍ली में हो रही थीं। उन्‍होंने तपाक से कहाहेहौ, से भइए गेलै। देखहक ने। सेवानि‍वृत्तक पहि‍ल दि‍न तोरे संग रहि‍अ' ने (हा, देखो न, वही तो हुआ, सेवानि‍वृत्ति‍ का पह‍ला दि‍न तुम्‍हारे साथ ही बि‍ताया)...। बहुत बात हैं कहने को, अभी तो इतना ही ध्‍यान आ रहा है कि‍ डेढ़ वर्ष पहले मेरे पि‍ता का देहान्‍त हुआ। आज एक बार फि‍र लग रहा है कि‍ मैं पि‍तृशोक में हू
 
एक सभ्‍यता का प्रस्‍थान :
कुल उनासी वर्ष चौदह दि‍नों की आयु पारकर‍ मायानन्‍द मि‍श्र 31 अगस्‍त 2013 को साढ़े चार‍ बजे सुबह हमारे बी से चले गए, उनका यह प्रस्‍थान भारतीय साहि‍त्‍य के लि‍ए, खासकर मैथि‍ली साहि‍त्‍य के लि‍ए एक सभ्‍यता का प्रस्‍थान है, एक परम्‍परा का प्रस्‍थान है। उस सभ्‍यता और परम्‍परा का प्रस्‍थान, जि‍से उन्‍होंने बड़ी संजीदगी से अपने समवर्ति‍यों के साथ कोई साठ बरस पूर्व शुरू कि‍या था। साठ के दशक में स्‍थगन का शि‍कार हुई मैथिली कथा को ललित और राजकमल के साथ उन्‍होंने न केवल अपूर्व समृद्धि दी, बल्‍कि‍ एक नया क्षितिज भी दिया। बड़ी मुश्किल से हरिमोहन झा द्वारा बनाए गए विशाल पाठक वर्ग को इन तीनों की टीम ने कथा-कौशल की नई-नई भंगि‍माओं से परि‍चय कराया। मैथिली कथा अपनी सीमित परिधि से बाहर आई। कथा और उपन्‍यास के अलावा नि‍रन्‍तर रचनाशील मायानन्‍द ने एक तरफ मानवीय संवेदनाओं को स्पर्श करते हुए मैथिली गीत को पुष्‍ट कि‍या, तो दूसरी ओर मैथिली कविता में अपनी विराट् छवि स्थापित की। हरिमोहन झा, यात्री (नागार्जुन), कांचीनाथ झा 'किरण' और उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' के बाद मैथिली उपन्यास लेखन को पूरे दम-खम से समृद्ध करने वाले मायानन्‍द मि‍श्र ने अपनी खास जीवन-दृष्टि से सृजनशीलता के नए-नए रास्ते विकसित किए। इति‍हास, समाज, भाषा (खासकर मातृभाषा), संस्‍कृति‍, और मानवीय आचरण के जरि‍ए उसके मन में प्रवेशउनके चि‍न्‍तन-मनन का प्रि‍य क्षेत्र था।
वि‍राट अध्‍ययन फलक के वि‍शि‍ष्‍ट रचनाकार और अद्भुत मातृभाषानुरागी मायानन्द मिश्र (17.08.1934) का जन्म बिहार के सहरसा जि‍ले के बनैनिया गाव में हुआ। वे वि‍लक्षण राष्‍ट्रीय चेतना और सूक्ष्‍म इति‍हास-दृष्‍टि‍ के रचनाकार थे। मैथिली और हिन्दीदोनों ही भाषाओं में हृद्य और प्रामाणि‍क सोच के वे वि‍लक्षण रचनाकार हैं। दोनों ही भाषाओं में कवि‍, कथाकार, उपन्यासकार, चि‍न्‍तक के रूप में उनकी वि‍शि‍ष्‍ट पहचान है। मंत्रपुत्र उपन्यास के लिए साहित्य अकादेमी सम्मान, ग्रियर्सन सम्मान तथा संपूर्ण साहित्यिक अवदान के लिए प्रबोध सम्मान से सम्मानित रचनाकार मायानन्द मिश्र को उन गिने-चुने रचनाकारों में शुमार कि‍या जाता है, जिन्होंने अपनी हर कृति से साहित्य में एक नया द्वार खोला है। उनकी प्रमुख कृतियां हैं : मैथिली में भागक लोटा, आगि मोम आ पाथर, चन्‍द्रबिन्‍दु (कहानी संग्रह), बिहाड़ि पात पाथर, खोता आ चिड़ै, मन्‍त्रपुत्र, सूर्यास्त (उपन्यास), दिशान्‍तर, अवान्‍तर (कविता संग्रह) हिन्दीमे माटी के लोग सोने की नैया, प्रथमं शैल पुत्री च, मन्‍त्रपुत्र, पुरोहित, स्‍त्रीधन (उपन्यास)।
उन्‍नत चेतना के साथ स्वातन्त्रयोत्तरकालीन मिथिला समाज को गम्भीरतापूर्वक रेखांकित करते हुए मैथिली साहि‍त्‍य में जि‍स प्रखर प्रति‍भाशाली टीम का आगमन हुआ था, उसमें मायानन्‍द मि‍श्र का नाम अगली कतार में सुरक्षि‍त है। आज का मैथि‍ली साहि‍त्‍य यदि‍ अपनी तीक्ष्ण नजरों से परि‍वेश में बहुत कुछ सूक्ष्‍मता से देख पा रहा है, तो इसका श्रेय हमारे इस पूर्वज टीम के प्राथमि‍क उत्‍थान को ही जाता है। तथ्‍य है कि‍ मैथि‍ली कवि‍ता और कहानी में राजनीति‍क चेतना का उदय पहली बार मायानन्‍द के यहा हुआ। स्वातन्त्रयोत्तरकालीन वैज्ञानिक उपलब्धि से वंचित मि‍थि‍ला के आम नागरिक के मन में बीसवीं शताब्दी के छठे दशक से ही मायानन्‍द मि‍श्र गम्‍भीरता से झाकने लगे थे, उन सबके मानसिक उद्वेलन को उनके मौलिक व्यवहारों से जोड़ने लगे थे। व्यवस्था और समाज के पाखण्‍ड को उजागर करना उनके लेखन का मुख्‍य लक्ष्‍य था। शिल्प की ताजगी, चित्रात्मकता, काव्यत्मकता और लयात्मकता उनके लेखकीय कौशल की मौलि‍क वि‍शि‍ष्‍टता थी, जो एक साथ उनकी रचनात्‍मकता में व्‍यंग्‍यात्‍मक बि‍म्‍ब का चमत्‍कार भी भरती थी और भावकों को रोचकता का लोभ भी देती थी।
चन्‍द्रबि‍न्‍दु संग्रह से पहले तो उन्‍होंने अपनी कहानी, कवि‍ता और उपन्‍यास के माध्‍यम से समाज व्‍यवस्‍था की वि‍डम्‍बनाओं पर नजर रखी, बाद के दि‍नों में वे इति‍हास और मानव सभ्‍यता के दुर्ग में प्रवि‍ष्‍ट हुए। मैथि‍ली उपन्‍यास मन्‍त्रपुत्र उसी शृंखला की दूसरी महत्त्‍वपूर्ण कृति‍ है। साहित्य और इतिहास की दीवार तोड़ती कृतियों की शृंखला के चार उपन्‍यास हैं-- प्रथमं शैल पुत्री च, मन्‍त्रपुत्र, पुरोहित, स्‍त्रीधन
इतिहास और ऐतिहासिक तथ्यों की आधारशिला पर मैथि‍ली और हिन्दी में अनेक  कथात्मक कृतियां आती रही हैं। इस तरह के उपन्यासों में अक्सर दो बातें अधिक महत्त्‍वपूर्ण होती हैं -- लेखक की इतिहास दृष्टि और लेखक का सृजन कौशल। इन दोनों दृष्टियों से मायानन्द अपनी इन चारो कृति‍यों में सबसे अलग हैं। मैथि‍ली-हिन्दी के पाठकों के सामने ऐसे विषय पर आज तक जितने उपन्यास आए, अधिकांश के कपोल कल्पना के कारण कृति की ऐतिहासिकता नष्‍ट हो गई है, कपोलकल्पना से कुछ सीमा तक बचाव है भी, उनका आधार रामायण, महाभारत के गढ़न्‍त संस्‍करण अथवा किम्‍बदन्‍ति‍या ही रही हैं। उदारण में कई नाम लि‍ए जा सकते हैं। जबकि मायानंद अपने चारो उपन्यासों में इतिहास की विश्वसनीयता के प्रति पूर्णत: सचेष्ट और निष्ठावान हैं। अपनी सृजनशीलता पर अतिरिक्त तनाव डालकर भी उन्‍होंने ऐतिहासिक सन्‍दर्भों की रक्षा की है, दीगर बात है कि‍ इस कारण कथात्मक स्रोत को जीवन्त रखने में उन्‍हें काफी परेशानी हुई है।
प्राचीन भारत पर लेखक की कथा-योजना का पहला कृति-क्रम 'प्रथमं शैलपुत्री च', दूसरा 'मन्‍त्रपुत्र', तीसरा 'पुरोहित', और चौथा 'स्‍त्रीधन' है। पहले में ईसा पूर्व बीस हजार से ईसा पूर्व अट्ठारह सौ तक के कालखंड को कथा-सूत्र में बाधने का प्रयास किया गया है। मनुष्य द्वारा 'हाथ और माथ' का एक साथ उपयोग, आग का सन्‍धान और संग्राहक संस्कृति का आविर्भाव--ये तीन मानव जाति की बड़ी उपलब्धिया हैं, जो हजारों वर्षों के संघर्ष से प्राप्त हुई। 'प्रथमं शैलपुत्री च' इन्हीं उपलब्धियों की विकास परम्परा को काफी ईमानदारी और निष्ठा के साथ प्रस्तुत करता है।
प्राचीन भारत पर उनका दूसरा कृति-क्रम है 'मन्‍त्रपुत्र' आर्यावर्त की जन्म-कथा है। सरस्वती से यमुना तट तक आर्यों एवं आर्य-संस्कृति के प्रचार-प्रसार की प्रक्रिया और आर्य-अनार्य के सहज मिलन की घटना को चित्रित करने की आकर्षक शैली में प्राचीन इतिहास की स्थितिया सामने आती हैं। कबीलाई जीवन के सामाजिक सिद्धान्तों के आधार पर राजा का निर्वाचन, निष्कासन, पुनराभिषेक प्रथा; विवाह संस्कार, कृषि-कार्य के प्रचार, नई पीढ़ी की प्रगतिशीलता के आगे पुरानी पीढ़ी की रूढ़िवादिता का पराजय, सामाजिक रीति-रिवाज, नारी-जीवन के विस्तृत परिचय, आर्य-अनार्य सम्बन्धों के व्याकरण आदि के मनोरम स्वरूप यहा मिलते हैं। सारांशत: मन्‍त्रपुत्र'  पूर्व वैदिक युग के उत्तरार्द्ध के अन्‍ति‍म चरण की कथा है।
इतिहासपरक इस शृंखला का तीसरा उपन्यास 'पुरोहित' है। इस उपन्यास की काल सीमा उत्तर वैदिक युग का पूर्व ब्राह्मण काल अर्थात् ई.पू. 1200 से ई.पू.1000 है। इस काल खण्‍ड के भारतीय समाज का रेखांकन, आर्य-अनार्य संस्कृति की मिलन प्रक्रिया, सरस्वती नदी के सूख जाने से सरस्वती पूजन के प्रारम्‍भ की तार्किकता इस उपन्यास की बड़ी विशेषता है। यह उपन्यास उस कालखण्‍ड के शिक्षा-कर्म, पौरोहित्य-कर्म, कृषि-कर्म, राज-काज और मानवीय जीवन-दर्शन का स्पष्ट चित्र खींचता है। इस मनोरम कथाकृति से तद्युगीन आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन की जटिल गुत्थियों को सुलझाने में एक दृष्टि स्‍पष्‍ट होती है ।
सूत्र स्मृतिकालीन मिथिला के इतिहास पर आधारित इस शृंखला का चौथ उपन्यास 'स्त्रीधन' मिथिला में राजतन्‍त्र की समाप्ति, जनक वंश के अन्‍ति‍म राजा कराल जनक के  अन्याय, दुराचार, नीतिविरोधी प्रवृत्ति, स्वेच्छाचार और एक कुवारी कन्या के साथ किए गए दुर्व्‍यवहार के कारण उसके पतन की कहानी है। उत्तर वैदिक काल के आरम्‍भ में विभिन्न जनपदों के स्वरूप स्थिर होते होते आर्यीकरण के माध्यम से राज्यों का सीमा विस्तार हुआ और समाज कृषि विकास से वाणिज्य की ओर उन्मुख होने लगा। नगरीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी। वाणिज्य के लिए कैकेय से श्रावस्ती होते हुए चंपा और राजगृह तक की यात्रा जलमार्ग तथा थलमार्ग से की जाती थी। इन्हीं ऐतिहासिक तथ्यों एवं साक्ष्यों के उपयोग से तत्कालीन राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक स्थितियों और सांस्कृतिक विकास का विवरण यहा प्रस्तुत किया गया है। एकपत्नीव्रत आदर्श, सामाजिक दण्‍ड, विवाहोपरान्‍त पति की सम्‍पत्ति में पत्नी के अंश आदि की चर्चा यहा प्रमुखता से की गई है।
ऐतिहासिक विषय होने के बावजूद इन उपन्‍यासों मे अन्‍धविश्वास और पाखण्‍ड को बल नहीं मिलता। उपन्यास का विषय हमें अपने इतिहास में झाकने की प्रेरणा देता है और विषय के साथ भाषा शिल्प का वर्ताव इसे साहित्यिक उत्कर्ष देता है। ऐतिहासिक प्रामाणिकता एवं साहित्यिक उपादेयता--दोनों ही दृष्टि से ये महत्त्‍वपूर्ण उपन्यास हैं।
दरअसल यह श्रेय मायानन्द की वि‍लक्षण भाषा-शैली और शब्द-योजना को जाता है कि‍ शि‍थि‍ल गति‍ के कथासूत्र में भी नि‍रन्‍तर रोचकता बनी हुई है। मैथि‍ली और हिन्दी के ऐसे अनूठे रचनाकार आज हमारे बीच नहीं हैं। उनकी स्‍मृति‍ को कोटि‍श: प्रणाम।
 
 - डॉ. देवशंकर नवीन
Associate Professor
School of Translation Studies & Training
Indira Gandhi National Open University
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