शुक्रवार, 22 मई 2020

मलंगिया जीक शोधदृष्टि


दिनांक : 11 मई, 2020    

- डॉ. प्रकाश झा
[ नाट्याचार्य महेन्द्र मलंगिया जीक अद्यतन पुस्तक ‘प्रबन्ध संग्रह’ 2019क अंतिम त्रैमासिकमे प्रकाशित भेलन्हि अछि । ]   

सिद्धहस्थ नाटककार महेन्द्र मलंगिया जीक अद्यतन पुस्तक वर्ष 2019 ई. मे प्रकाशित भेलनि अछि – प्रबन्ध संग्रह । पिछला कतेको साल स नाटककार मलंगिया जी अपना के शोध दिस उन्मुख क लेलाह अछि । तेरह एकाँकीक संग्रह पुस्तक एक टुकड़ा पाप नाम स प्रकाशित भेल वर्ष 2018ई. मे, कविवर ज्योतिरीश्वर ठाकुर जीक वर्णरत्नाकरक तीन कल्लोलधरिक विश्लेषण शब्दक जंगलमे अर्थक खोज नामक शोध पुस्तकमे केलनि, जकर प्रकाशन वर्ष 2015 ई. अछि । वर्ष 2009 ई. मे मैथिली लोकनाट्यक विस्तृत अध्ययन एवं विश्लेषण नामक शोध पुस्तक प्रकाशित भेल छलनि ।
  
मैथिली साहित्यमे प्रस्तुतिपरक विधाक लेल ई अतिआवश्यक छल जे श्री मलंगिया अपना के एहि दिस मोड़थि । एहि विधा केन्द्रित शोध कार्य बहुत भेल अछि, मुदा जे व्यक्ति स्वयं प्रस्तुतिपरक विधामे संलिप्त छथि, हुनक शोध दृष्टि आम जनक सोझाँ लगभग नहि-ए जेना आयल अछि । अधिकांश शोध-प्रबन्ध अकादमिक दृष्टिए लिखल गेल अछि । जे किलिष्ट अछि, बोधगम्य नहि-ए जेना बुझू ।   

प्रबन्ध संग्रह मे कुल उन्नैसटा आलेख समाहित कयल गेल छैक । पुस्तकक प्रारम्भ प्रबन्ध संग्रहक प्रसंगमे होइत अछि जाहिमे शब्द -- प्रबन्ध, निबन्ध आ शोध के नीक जेना बेकछा क समझाओल गेल अछि । प्राय: एहि तीनू शब्दक अर्थ प्रथम द्रष्टा एक्के रंग लगैत अछि, मुदा तीनू एक दोसर स कतेक भिन्न अछि से एकरा पढ़ला बाद भाँज लगैत छैक । संगहि सब आलेखक पूर्वरंग, पूर्वमे छपल सब आलेखक अंतरकथा-व्यथा, कतेको आलेखक एकस्वरताक कारण आदिक विवरण द अपन निर्भीकता आ शोधकार्यपर आत्मविश्वास केँ परिचय देलथि अछि । प्राय: शोधकर्ता अपन प्रबन्धमे एहन पूर्व खुलासा नहि-ए जेना करैत छथि । एहि संग्रहमे छपल आलेखक रेंज बहुत पैघ रखलथि अछि मलंगिया सर – पहिल आलेख सन् 1972 ई. मे छपल अछि । एहि प्रकारे एहि प्रबन्ध संग्रह केँ कुल सैंतालीस सालक शोध संकलन कहल जा सकैत अछि ।             

संग्रहित आलेखमे क्रमश: विद्यापतिक उगना, लोकनाट्यक कसौटीपर सामा-चकेबा, एकटा ठिठुरल शहर मधुबनी, सामाजिक परिवर्तनमे नाटकक स्थान एवं मैथिली नाटक, प्रतिनायक चूहड़मलक मूल्यांकन, सलहेशक काल निर्धारण, राम – सिया कीर्तन, वर्णरत्नाकरक सम्पादन कार्य चलैत रहए, मिथिलामे टोना, लोककथाक जन्म आ विश्लेषण, आँखिक देखल आ कानक सुनक : सलहेश लोकनाट्य, सब गुड़ गोबर भावा, मिथिलाक राम, मैथिलीक पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति, पैण्डोराक बक्सामे हाथ दैत भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता, भारत – नेपालक नाट्य संबंध, अंदाजे गीता भगवान उवाच:, अहाँ सन दोसर देव नहि एवं अडी डीठि वाङ्का पीठी अछि ।


एहि प्रबन्ध संग्रहक सबस पुराण शोधालेख विद्यापतिक उगना अछि, जे वर्ष 1972 ई.मे तात्कालीन स्थापित पत्रिका मिथिला मिहिरमे प्रकाशित भेल छल । एहि आलेखमे  मलंगिया जी विद्यापतिक उगनाकेँ सामाजिक मान्यता, शोध मान्यता, मनोवैज्ञानिक मान्यता आ पूर्वमे उपर्युक्त विंदु आधारित लगभग सब रचनाक संदर्भ लैत ओकरा व्यावहारिकता आ ओकर अनुक्रमणियताकेँ संयोजित क प्रतिस्थापित केलथि अछि । राजा शिवसिंहकेँ युद्धभूमि सँ भागि गेलाक बाद छद्म वेष बनाक विद्यापति संग कोनो गुप्त मंत्रणा होयबाक सूत्र केँ पकड़लनि अछि । उगना नामकरणपर सेहो – यजुर्वेद स भाषा विज्ञानक कसौटीक संग संग मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण तक अपनौलनि अछि । अंतमे विद्यापतिक रचना, ऐतिहासिकताक क्रम, राजनीतिक परिस्थित, मनोवैज्ञानिक कारण तथा कतेको एहन तथ्यकेँ संदर्भित करैत उगनाकेँ शिवसिंह होयबाक दिस संकेत केलाह अछि । एहि बीच यदा कदा विद्यापतिक रचनापर शोध होइत रहल अछि, कतेको आलेख प्रकाशित भेल अछि, मुदा विद्यापतिक रचनाक संग संग हिनक जीवनपर शोध संधानल आलेखक एखनो बहुत अभाव अछिए । एहि बीच सुखद सूचना अछि, जे प्रो. कलमानन्द विभूति आ प्रो. देवशंकर नवीन गंभीरता संग विद्यापतिपर शोध क रहलाह अछि, हुनकर सबहक शोध प्रपत्र निश्चित एहि आलेखक अगिला पौदान होयत ।   

किछु उत्साहित शोधार्थी सामा – चकेबाकेँ लोकनाट्य कहैत छथि, कियो लोकनृत्य, लोककथा आदि । जिनका जेना मोन होइत छनि से समा – चकेबा के तहिना स्थापित केलाह अछि । एहि ल समाजमे बहुत भ्रम पसरल छल । एकरा ध्यानमे लैत मलंगिया जी निराकरण दिस बढ़लैत अछि । सामा –चकेबामे गाओल जाय बला गीतक अध्ययन विश्लेषण केलाह अछि । सामा – चकेबा के लोकनाट्य माननिहारमे श्री ताराकान्त झा, डॉ. प्रेमशंकर सिंह, डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन’, डॉ. धीरेन्द्र आदि अपन-अपन तर्क देने छथि, जकर पड़ताल सेहो एहि आलेखमे अछि । अंतत: महेंद्र मलंगिया सामा – चकेबा के मिथिलाक एक पूजनोत्सव मानलनि अछि, जाहिमे बहिन भाइक दीर्घायु होएबाक कामना करैत छथि ।  

कोनो एकटा शहरक बहन्ने शोधालेख लिखब सेहो रेखाँकित करबाक विषय थिक । कोनो शहर कोना बनैत अछि, की की ओकर कमजोरी आ गुण थिक से एहि आलेख एकटा ठिठुरल शहर मधुबनी फरिछियाइत अछि । कोनो शहरक एहन स्थिति कहियाक छल सेहो जनतब होयब एहन आलेख लेल महत्वपूर्ण होइत अछि । जकर अभाव एहि आलेखमे अछि । मात्र अनुमान लगाओल जा सकैत अछि, जे ई आलेख मिथिला मिहिरमे छपल छल आ आलेखमे सन् 1981 ई. जनगनाक चर्च होइत अछि, ताहि हिसाबे एहि आलेखमे वर्णित मधुबनीक स्थिति 1983-86क आसपासक लगैत अछि । आब शहर बहुत बदलि गेल अछि, जँ एक दू पाराग्राफ आर बढाओल जाइत त एकर समकालीनता स सेहो अवगत भेल जा सकैत छल ।  ओना किछु तथ्य जे तहिया छल से आइयो प्रासंगिक अछिए । जेना – मैथिल लोकनि बेटाक अपेक्षा बेटीकेँ बहुत कम मानैत अछि, नाटकक मामलामे मधुबनी शहर अति भुसकौल अछि, एहिठाम साहित्यिक पोथी भेटब मुश्किल अछि, अछैत मंदिर आ पूजा पाठ होइतो सीता अपना नैहरमे मैथिलीए भाषा जकाँ उपेक्षित रहि जाइत छथि आदि आदि ।

सामाजिक परिवर्तनमे नाटकक स्थान एवं मैथिली नाटक विषयपर लिखबासँ पहिने मलंगिया सर समीक्षाक तीनू रूपक चर्चा क देने छथि, जाहिमे कोकिल, काग आ हंस समीक्षा होइत अछि । उपर्युक्त आलेखलेल काग समीक्षाक रस्ता अपनौलनि अछि । जाहिमे रचनाक केवल दोषपर आँगुर राखल जाइत अछि । एहन समीक्षा करबामे बहुत खतरा रहैत छैक, जे मैथिलीमे बहुत कम लोक हिम्मत करैत छथि । अपन शोध आलेखकेँ निर्भीकता पूर्वक बेबाकी स रखबाक कलासँ आकण्ठ डूबल मलंगियाजी मात्र बारह पृष्ठक आलेखमे लगभग टीसटा नाटक आ बीसटा नाटककारक पड़ताल केलथि अछि । ई आलेख नाटक लिखनिहार लेल पथ प्रदर्शक सिद्ध होयतनि । रचनाक संबंधमे सब त्रुटिकेँ उजागर केलाक बाद अंतमे इहो कहैत छथि – “जो देख्या सो लेख्या, मम दोष न दीयताम   

राजा सलहेश केन्द्रित तीनटा आलेख एहि संग्रहमे संकलित अछि । मलंगिया सरक कहब छनि जे सलहेशक चर्च बिना चूहरमल्लक नहि भ सकैत छैक । ई दुनू दू क्षेत्रक समसामयी राजनेता छलाह । दुनूक बीच प्राय: राजनीतिक लड़ाई चलैत छलनि । चूहरमल्ल दोसर क्षेत्रक छल, तेँ मिथिलाके साहित्यमे ओकरा कमजोर देखेबाक लेल प्रतिनायकके रूपमे प्रतिस्थापित क देल गेल । संगहि अपन शोधमे सलहेशक काल निर्धारण आठम शताब्दीक पूर्वाद्ध मानलनि अछि । आँखिक देखल आ कानक सुनल : सलहेश लोकनाट्य आलेखमे एकटा लोकनाट्य लेल जतेक तत्त्वक आवश्यकता होइत अछि तकर पड़ताल कयल गेल अछि ।   
        
राम – सिया कीर्तन केन्द्रित शोधालेख कतेको गीरह के खोलैत अछि । राम आ सीता संबन्धित कतेको प्रश्नक उत्तर शोधमे निहित अछि । कतेको प्रश्न सेहो ठाढ़ करैत छथि जेना – विद्यापति रामके संबंधमे एक्कोटा रचना किएक नहि कयलथि ? मिथिलामे रामक व्यापकता अठारहम शताब्दीक बाद भेलनि अछि । जनकपुरक स्थापना कोना भेल । आदि आदि ...
  
मैथिली साहित्यमे शोध विधा लेल सबस दुरूह आ महत्वपूर्ण लक्ष्य, जकरा मलंगियाजी बेधलथि आ सुधा निकालबाक लेल यश पौने छथि ओ थिक कविवर ज्योतिरीश्वर कृत वर्णरत्नाकरक अध्ययन आ ओकर शाब्दिक विश्लेषण । एहि लेल शब्दक जंगलमे अर्थक खोज नाम स पुस्तक सेहो प्रकाशित छनि । अपन प्रिय विषय केन्द्रित तीन पुस्तकक समीक्षाक बहन्ने शोधालेख तैयार करबाक कला मलंगियाक एहि तीनू आलेखके अध्ययन सँ अभरैत अछि । पहिल पुस्तक प्रो. आनंद मिश्र / पं. गोविंद झाक वर्णरत्नाकरके समीक्षा लेल शीर्षक आलेख अछि वर्णरत्नाकरक सम्पादन कार्य चलैत रहए । दोसर पुस्तक  मिथिला का सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवनके समीक्षालेल लिखलनि अछि सब गुड़ गोबर भावा। आ शीर्षक पैन्डोराक बक्सामे हाथ दैत भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता छनि जे डॉ. भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताक पुस्तक वर्णरत्नाकरमे चित्रित पूर्वमध्ययुगीन सांस्कृतिक भारत लेल लिखलथि अछि । अपन तर्कमे पहिल पुस्तकके किछु त्रुटिक संग आवश्यक मानलनि अछि, मुदा बाँकी दुनू पुस्तकके अपन शोध तर्क स नीक जेना खारिज क देलनि अछि ।  

प्रबन्ध संग्रहक बाँकियो आलेख सब शोध प्रक्रियाक तराजूपर तौलल गेल अछि । बहुत दिन बाद प्रबन्ध संग्रहक कोनो एहन पुस्तक जे रुचिगर लगै, शोध स भरल होइ मुदा बोझिल नहि बुझाय, जकरा अपन व्यक्तिगत पुस्तकालयमे आँखिक सोझाँ राखल जाय, से थिक महेंद्र मलंगियाक ई प्रबन्ध संग्रह   


पुस्तकक नाम: प्रबन्ध संग्रह
लेखक : महेन्द्र मलंगिया
ISBN: 987-81-931466-2-0. 
प्रकाशन वर्ष : 2019; कुल पृष्ठ : 216; मूल्य : 400 टाका
प्रकाशक : मलंगिया आर्ट्स, नई दिल्ली – 86.
संपर्क  : पॉकेट – बी – 05, मकान नं. 358-359, सेक्टर – 03, रोहिणी, नई दिल्ली – 32.
मो.: 09560306681, 09312919334.
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- डॉ. प्रकाश झा ( पीएच-डी.; नेट; सीनियर फेलो, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार )
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हाउस, भगवानदास रोड, नई दिल्ली – 01.
मो. + 91 9811774106, फोन : 011 23389138.




सोमवार, 20 अप्रैल 2020

विद्यानंद झाक सृजन ‘बिछड़ल कोनो पिरीत जकाँ’

प्रकाश झा


 वर्तमान समयमे मैथिली साहित्य रचनामे मैथली कविता रचनाक बहुलता अछि । सातटा रचनाकारमे छ:टा कवि छथि त एकटा साहित्यक अन्य विधामे रचना क रहलाह अछि । सियाराम झा सरस जीक पाँति छन्हि- “सात भाग नोरक सागरमे एक भाग मुस्कान जिनगी ।” तहिना छ:टा रचनाकारके नोरक सागर कहबाक हमरा हिम्मत त नहिए अछि, मुदा ई प्रश्न उठय लागल अछि, जे की काव्य रचना करब एतेक हल्लुक विधा होइछ, जे सातटा रचनाकारमे छटा काव्य सृजक बनि जाथि ? हमरा सभ केँ पढ़ाओल गेल छल जे शुरुआतीमे जुआनीक उन्मादक उठान-कालमे जखन प्रेमक वंशी मधुर मधुर सुरमे तान देब लगै छै तखन कविता निकलितेटा छैक । एकटा मास्साब कहने रहथि जे आदम्य मनोभावनाक सद्य:स्फुरण कविता थिक । मात्र तुकबंदी क लेब, मात्रा जोड़िक छंद बना देब मात्र कविता नहि होइछ । कविक अपन – अपन दृष्टि होइत छैक आ सभक लेखनी ओकर अपन स्वाभाविक अनुकरण करैत छैक, अपन आत्माभिव्यक्तिए रचनाकारक लेखनी स निकसैत छैक । मुदा ई त पुरान बात भेल । 
मुदा वर्तमानमे जखन छ्बोक रचनाकेँ सातम व्यक्ति छोड़ि छ्बो एक दोसराक भूरि भूरि प्रसंसा करैत होथि । दू चारी गोष्ठीमे हिनक रचना पाठ भैए जाइत छन्हि, टोले टोल विद्यापति पर्व समारोह होइत छैक जाहिमे धरोहि लागल कविमे एकटा हिनको आमंत्रण रहिते छन्हि, सरकारी आयोजन स्वतन्त्रता दिवस- गणतंत्र दिवसमे सेहो कोनो ने कोनो जोगाड़े कियो महिला होबाक कारण त कियो जातिगत आधारपर पहुँचिते छथि, विज्ञापन लेल छपाइत अनियमित पत्र-पत्रिकाक भोलामास्टर सन् अवैतनिक संपादक सेहो छपिते छन्हि । आ नै त फेसबुक पर हजारो हजार लाईक भेटिए जाइत छन्हि त आब की एकटा कवि होयबा लेल बच्चाक जान त नाहिए ने लेल जेतैक ?

एहना स्थितिमे अपन काव्यज्ञानपर शंका उचिते बुझना जाइत छैक । कारण, वर्तमानमे त बहुमते स सब किछु तौलाइत छैक ने । दिल्ली त राजधानीए थिक, तेँ उपर्युक्त छ: मे स पाँच दिल्लीए के होबक चाही । चूँकी ई राजधानी छैक आ एहिठाम प्रधानमंत्री जी रहैत छथि, तेँ  एहि ठामक पाँचो काव्यसृजक बाँकी ठाम स बेसी भेल्यू बला हेताह से सब गोटे के मानहि पड़त । हमहुँ सैह मानैत छी, उचित अछि काछु जेना अपन खोह स निकलक गरदनिके सुटका लेल जाय । तेँ ई जनैत जे नीके लिखने होयताह से सोचि अनुरागे काव्य पढ़ब के नमस्कारे क लैत छी । अस्तु...

एहना स्थितिमे हमरा भेटल बिछड़ल कोनो पिरीत जकाँ । कविताक संग अपन पुरान पिरित जकाँ हमहूँ एहि काव्य संग्रहके कोरोनाक वैश्विक लॉकडाउनमे मोनक लॉक खोलबाक लेल चाभी जेना ग्रहण केलहुँ । तकर कतेको कारण छल । पहिल, ई काव्य संग्रह विद्यानंद झाजी सस्नेह उपहार स्वरूप देने छलाह । दोसर, एहि काव्य रचनापर हरेकृष्ण झा, रामलोचन ठाकुर, उदयचन्द्र झा विनोद’, कुणाल, कथाकार अशोक, नारायण जी, केदार कानन सन वरिष्ठ साहित्यकार लोकन्हि अपन मनतव्य देने छथि त युवातूरमे सदन झा, विकास वत्सनाभ, धरणीधर नारायण सिन्हा, शारदा झा, अरुणाभ सौरभ सन युवा सेहो अपन अपन अभिव्यक्ति देलन्हि अछि । तेँ आश्वस्थ होइत काव्यक रसास्वादन लेल बैस गेलहुँ । प्रारम्भ स अन्तधरि साठियो कविता पढ़लाक बाद इएह निष्कर्ष बनल, जे स्व. हरेकृष्ण झा मात्र सत्रह पाँतिमेउत्सवक घड़ी मैथिली कविताक लेल शीर्षक स लिखने छथि । एहि पुस्तक लेल समीचीन समीक्षा छन्हि । अस्तु...

पुन: हमरा मोन पड़लाह वर्तमान सातमे ओ छटा कविहौआ लोकन्हि– की, हुनका लोकन्हि लग एहन एहन रचना कृति नहि पहुँचलन्हि अछि ? वा कि हुनका सबहक मन:स्थिति एहन रचनाक गंभीरता तक पहुँचते नहि छन्हि ? कतौ ने कतौ प्रश्नवाचक चिह्न त छैक ।

 श्री विद्यानन्द जीक कविता कखनो नहि लगइत अछि, जे ज़बरदस्ती लिखायल अछि वा कोनो अनुरोध वा आयोजन लेल हड़बाड़ीमे लिखल गेल होइ । प्राय: सब कविता मोनक विस्तार संग शब्द संकलित कयने अछि । कोनो कविता बारह पृष्ठ धरि विस्तार पौने अछि त कोनो मात्र आठ शब्दमे परिपूर्ण भ गेल अछि । कविता एहन  जे आँखिक आगू सम्पूर्ण चित्र ठाढ़ क दिए । कविताक पाँति एहन जे मन:स्थिति के उद्वेलित क दिए आ कविताक एक एक शब्द एहन जे अप्पन आ अपनत्वक सुगंध दैत बुझना जाय । किछु कविताक शीर्षक जेना – बरखा केँ सुनैत, ओछौन फूलक, जीवन खाली आमे जामुन टा तँ नइँ होइ छै, ओ चिड़ै बन चाहै छलीह, बैगनी रंगक बुस्सट, मुइल लोक केँ टेलीफोन आदि । उपर्युक्त शीर्षक पाठक केँ अनायास अपना दिस खींचैत अछि । एक एक शब्द अपन लगैत अछि ।     

अपन कवितामे विद्यानंद जी गामक माटि-पानि स विश्वक घटना – परिघटना के एक संग अपन कवित स तेना मिश्रण करैत छथि, जे दुनू के फराक करब मुश्किल होइछ । अपन खाँटी मैथिल शब्द लबान के मोन पाड़ैत समकालीन बाजारवाद पर अद्भुत शब्द प्रहार छन्हि नइँ लीखल रहै छै / पैकेट वा ठोंगा पर / जाहि मे बेसाहि बेसाहि / अबैत अछि आब अन्न / घर मे हमर अहाँ सबहक / कटनीक तारीख / आकि दौनीक दिन / कहिया ओसाओल गेल / आ सुखैल गेल कहिया / लीखल रहै छै मात्र / पैक करबाक तारीख...  


अपन बैगनी रंगक बुस्सट के बहन्ने कवि सम्पूर्ण वैश्विक स्थिति – परिस्थितिस पाठकक हृदय के झकझोड़ैत विवसक अपन आहार्य स स्नेह उत्पन्न क दैत छथि । मुइल लोक केँ टेलीफोन वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, विकास आदिक स्थितिक जानकारी विद्यानंद जीए द सकैत छथि ।      

जखन हिनक कलम राजनीतिक परिपेक्ष दिस बढ़इ छन्हि त सरकार आ वर्तमान राजनीति पर सेहो प्रहार करैत अछि आ से खूब संधानि क करैत अछि । ओकर मोंसि सोनितो स बेसी टुहटुह लाल भ जाइत छन्हि । तानाशाहक परिभाषा दैत छथि – मुदा / कैक टा धनपतिक धन / कैक टा सेनाक बल / रहितहुँ / डेरायल रहैत अछि तानाशाह... । निपत्ता शब्द के लोकल स ग्लोबल बनबैत कहैत छथि – एही सबहक बीच /  निपत्ता होइत छथि नजीब / जनिका ताकि नइँ पबैत छनि  / एक टा विश्वशक्ति देशक सरकार / सरकारक पुलिस... ।

भाइ आ बहीन के एक्के गाछक दू ठाढि स संज्ञपित करैत कवि बसातक सिहकी, कनियाँ पुतरा, आमक झक्का, खड़होरि, सेमार, पोखरि, फटलाहा सीरक, रौदी, दाही, कुचरैत कौआ, पूसक कनकनी, हिचुकी, बकौर संग डी.एन.ए ., ट्रेन, मोबाइल के जोड़ैत जखन बहीन लेल कहैत छथि – गेली एहन ठाम लागि जाइत छलनि देसाँस जत तखन कोनो सहृदय पाठक आद्रित भेने बिना नहि रहि सकैत छथि ।       

अंतत: विद्यानन्द जी वर्तनाम समयक अनिवार्य कवि छथि । हिनक रचना आम पाठक स बेसी जरूरी हुनका सभ लेल छन्हि, जे रचनाशीलतामे संलग्न छथि । सर ! एत्तेक गंभीरता संग रचना करबाक लेल बहुत बहुत आभार । 



बिछड़ल कोनो पिरीत जकाँ

रचनाकार : विद्यानंद झा


कुल पृष्ठ : 144.  मूल्य : 300/-

अंतिका प्रकाशन प्रा. ली.

शालीमार गार्डेन, एक्सटेंशन – II

गाज़ियाबाद, उ. प्र. – 201005। 



                  

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

कोरोनाक लॉकडाउनमे ‘सूर्यमुखी’क फुलायब




प्रकाश झा



किछुए दिन पहिने मैथिली लिटरेचर फ़ेस्टीवल-2019मे आरसी प्रसाद सिंह जीक सूर्यमुखी पुस्तकपर नजरि पड़ल । मैथिली अकादमी, पटना स 1981 ई.मे  प्रकाशित  एहि काव्य कृति केँ खरीद खुशी खुशी घर अनने रही । एहि बीच एक दू बेर पढ़बा लेल नियार कयबो कयलहुँ, मुदा लागल, जे एहि कृति के हड़बड़ीमे नहि पढ़ल जा सकैत अछि, तेँ पुस्तक कतेको महीना स टेबलपर रखले छल । एहि कोरोनाक लॉकडाउन नीक जेना घर बैसा देलक । जखन सौंसे दुनिया त्राहिमाम क रहल अछि तेहना समयमे सूर्यमुखीक फुलायब हृदयक आँखिके कतेक शीतलता प्रदान करतइ से ओ लोकन्हि अवश्य जनताह, जे सूर्यमुखीक फुलायल थोंकाके काहियो नीक स निहारने हेताह ।



कविवर आरसी प्रसाद सिंह जीक लिखल कथा हिन्दी पाठ्यपुस्तकमे पढ़ने रही, मुदा हिनक काव्यक रसास्वादन सेहो मैथिलीमे पढ़ब हमर पहिल अनुभव छल । एक स एक समीक्षक, समालोचक एहि काव्यक विश्लेषण कयने हेताह, मुदा हमर अनुभव रौदायल बटोहीकेँ कागजी नेबो देल सरबत पियब सन अछि ।



पुस्तकक प्रवेशिका सात भागमे बाँटल छैक । जाहिमेँ कवि महोदय स्वयम् लिखइत छथि जे- “हम हिंदीसँ मैथिलीमे आयल छी ।” स्वयम् केँ मैथिलीमे अयबाक लेल बहुत सुंदर कथाक प्रसंग लिखने छथि । एहि लेल हुनका स्व. अमरनाथ झाक ओ भाषण सेहो प्रेरित केलकन्हि जे अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलनक मंचसँ अध्यक्षीय भाषणमे निर्भीकता पूर्वक ओ बाजल छलाह जे मैथिली हमर मातृभाषा अछि आ हिन्दी राष्ट्रभाषा    



पोथीमे कुल 61टा  कविता आ 36टा मुक्तक संग्रहित अछि । सन् 1981 ई.मे  प्रकाशित एहि पुस्तकमे आरसी प्रसाद सिंह जी, जे किछु लिखलाह अछि, से आजुक समयमे सेहो अक्ष्ररस: ओहिना अछि । अपन रचना मे श्री सिंह लगभग सभ विषय केन्द्रित काव्य रचलथि अछि – जेना प्रकृति, समाज, युवा, देशभक्ति, मातृभूमि मिथिला, नैतिकता, आत्मचिन्तन, जन-जागरण आदि आदि । कविता चेतना-तरंगमे रंगमंच के केन्द्रित करैत लिखाइट छथि :  रंग-मंच पर उतरी गेल नट अनंग । छूबि गेल आइ कोस चेतना-तरंग ? । तहिना जखन सनातन पुरुष रचइ  छथि  बिना क्रिया पद केँ मात्र शब्दक संयोजन स सुंदर बिम्ब उभरि जाइत अछि :  ग्राम, नगर, पाथ, हमर मनोरथ, कला, सभ्यता, संस्कृति-ग्राहक । आगम, निगम, काव्य, स्मृति, दर्शन, नाटक, नृत्य केर संवाहक । आ जखन प्रकृति लेल शब्द गढ़इ छथि त हिनक कलम स निकलैत अछि : वर्षा-ऋतु आयल पुनि, नाचि उठल मन-मयूर । धानक नामक उपयोग तेना करैत छथि जे अगल बगल गमागमाय लागत :
आँगन मे हमर सुआपंखी गमकाइत धान । देसक एकता लेल हिनक विचार छन्हि : आइ भारत-भारती सम्पूर्ण, भारतवर्ष – भरिमे, भरी रहल अछि भावना, हम एक छी, हम एक छी । युवा तूरलेल लिखैत छथि : पुरा लै छै अपन प्रण रोपि, जे हठ ठानै छै ! युवा जे क्रांति – जीवी रक्त, की अवरोध मानै छै ! आ यौवन के परिभाषित करबा लेल कहैत छथि : अनंगक अंग, केशक रंग, ने आसंग – दर्शन छै ! मन: स्थिति जे परिस्थिति – मुक्त, तकरे नाम यौवन छै ! युवामे क्रांतिक जोश संग ललकारा दैत - मैथिलीक क्रान्ति – पूत जागी रहल छै ! करू वा मरूक लगन लागि रहल छै !  जखन मिथिलाक समाज अकाल ग्रस्त छल तखन कविक वेदना सेहो प्रकट होइट छन्हि : मंच पर शोकांत नाटक, अश्रु – विगलित भ रहल अछि । के एहन निर्मम विधाता, क्रूर अभिनय क रहल अछि ॥



एहि प्रकारे देखल जाय त आरसी प्रसाद सिंह जी अपन वर्तमानमे भ रहल सम्पूर्ण सामाजिक, राजनीतिक परिवर्तन, घटना – परिघटनाक लेल अपन काव्य रचना केलन्हि अछि ।




हिनक रचना मे मैथिली भाषा आ मिथिलाक ग्राम्य जीवन मे प्रचलित लोकोक्तिक सेहो खूब नीक जेना उपयोग केलथि अछि : लोकोक्तिक प्रयोग हिनक भाषामे आरो बेसी अपनत्वके भिजा देलक अछि । बहुतो लोकोक्तिमे किछू निम्न अछि : 1. सूरदास बुझतै घी तखने, जखन पात पर गड़गड़ेतै तखने, 2. बाड़िक पटुआ तीत, 3. गूड़क मारी जनै छै धोकरे, 4. ऊँच भ गेल बांह स खत्ता, 5. मोन चंगा, कठौती मे गंगा,  6. आगि लगे पर कूप खुनै-ए,  7. भोजक बेरमे कुम्हर रोपै आदि आदि ।  



अपने लोकन्हि स सेहो आग्रह जखन समय भेटय त आरसी प्रसाद सिंह जीक काव्य कृति सूर्यमुखी अवश्य पढ़ी ।





सूर्यमुखी

रचनाकारा : आरसी प्रसाद सिंह


प्रकाशक : मैथिली अकादमी, पटना

तृतीय संस्करण : 2011

मूल्य : 60/- टाका

कुल पृष्ठ : 157

शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

शताब्दी प्रवासक बाद घर घूरल ‘हरिश्चन्द्रनृत्यं’



दरणीय डॉ. नरेन्द्र झा जीक सत्प्रयाससँ ‘रामभद्रशर्माकृत हरिश्चन्द्रनृत्यं मल्लकालीन मैथिली नाटक’क पुस्तक प्राप्त भेल । पुस्तकक सांगोपांग प्रथमद्रष्टा अध्ययन कयल । अंत तक जाइत – जाइत मोन चकित होइत रहल जे- की, कियो व्यक्ति 46 वर्ष धरि कोनो एक पाँति के सूत्र बना एकाग्रचित्त रहि सकैत छथि ? ओहि एक पाँति संग निरंतर अपन शोध प्रक्रिया प्रवाहित राखि सकैत छथि ? जखन कि जीवनक आन – आन जरूरी जिम्मेदारीकेँ बखूबी निभाबैतो रहलथि अछि । वर्ष 1973 ई. मे कतौ पढ़ल पाँति जे- “भारतेन्दु हरिश्चन्द्रक लिखल नाटक ‘सत्य हरिश्चन्द्र नाटक’पर 1651 ई. मे रचित ‘हरिश्चन्द्र नाट्यम्’ (नृत्य) नामक मैथिली नाटकक प्रभाव अछि” – तकर अंन्वेषणमे अपन जीवनक 46 वर्ष लगा, समुद्र मंथनक’ मणिदीप निकालताह आ अपन भाषा संग नव पीढ़ीक माथ ऊँच करेताह । एहन महान व्यक्ति; अंवेषक डॉ. रामनंद झा ‘रमण’केँ मैथिली नाटक व रंगमंच दिसस’ शत – शत नमन । हिनका संदर्भमे सर्वश्री पं. गोविन्द झाक कहब छन्हि – “प्रस्तुत पुस्तकक एकमात्र हस्तलेख जर्मनीमे सुरक्षित छल । ऑगस्त कॉनरेडी साहेब विवेचनात्मक भूमिका संग 1891 ई. मे प्रकाशित करौलन्हि तकरा गवेषनापरायण डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’ अपन घरक एहि पुस्तककेँ सए वर्षक दीर्घ प्रवाससँ 1991 ई. मे अपन घर घुराए अनलनि ।” रमण सर अपने सत्ते लगाड़ी आ कर्मनिष्ठ छी ।

संदर्भ अछि विश्वम्भर फॉण्डेशन, राँचीसँ डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’ जीक (संकलन-सम्पादन) हालहिमे प्रकाशित पोथी ‘रामभद्रशर्माकृत हरिश्चन्द्रनृत्यं’ (मल्लकालीन मैथिली नाटक) । एहि पोथीक पहिल संस्करण 1891 ई. मे जर्मनीस’ प्रकाशित भेल, ई एकर दोसर संस्करण थिक, जे 2019 ई. मे प्रकाशित भ’ आई हमरा सबहक समक्ष साकार उपस्थित अछि ।

आइ – काल्हि क्रोनोलॉजीक बहुत चर्च छैक, त’ एहि पुस्तकके सेहो क्रोनोलॉजीमे देखल जा सकैत अछि । 1651 सालमे एकर रचना भेल, 1891 सालमे एकर प्रथम प्रकाशन जर्मनीमे भेल, 1991 सालमे ई पुन: मिथिलाधाम वापस आयल, लगभग 368 साल बाद 2019 सालमे ई अपन मूल भाषा मैथिलीक भ’ प्रकाशित भेल अछि । आब एकर मंचन जहिया होयत तकर दिनांक निश्चितक’ एहि नाटकक चक्रकेँ पूर्ण कयल जा सकत ।
  
जखन पुस्तक हमरा हाथ लागल तखने उंटा पुनटा क’ देखल । मुद्रकपर तामसो उठल, जे लगभग 200 पेजक सामग्रीकेँ गोंजि – गाँजिक’ मात्र 125 पेजमे ठाँसि देलक अछि आ कोनोटा सबहेडिंग बोल्ड नहि अछि । पाठकक मोनमे कोनो आकर्षण नहि उपजैत अछि । बल्कि बोझिल बुझाइत अछि । 1891 ई. मे छपल पहिल संस्करणकेँ देखियोक’ नबका संस्करणकेँ छापक चाही छल । भारतक मुद्रण आब एतेक पाछू त’ नहिए अछि । संगहि जखन एहि 125 पेजक पेपरबैक पोथीक दाम (मूल्य) 500/- टाकापर ध्यान गेल तखन छगुंता आर बेसी भ’ गेल । मुदा, पुस्तकमे छपल आलेखक गुणबत्ता आ ऎतिहासिक महत्वकेँ अकानलहुँ त’ उपरका सभ अवगुण क्षम्य भ’ गेल ।

पुस्तकक पहिल पाठ ‘मल्लकालीन मैथिलीक एक नाटक’ शीर्षकमे श्री रमणजी कतेको प्रकारें चर्च-वर्च करैत ‘हरिश्चन्द्रनृत्यं’केँ केन्द्रमे रखैत छथि । एकर रचना ललितपुर/पाटन शाखाक श्रीसिद्धिनरसिंहमल्लके आशीर्वादस’ रामभद्र शर्माद्वारा 1651 ई. मे भेल - से स्थापित करैत छथि । एहि पुस्तकक अंवेषण प्रक्रिया आ एकर ऑगस्त कॉनरेडीद्वारा जर्मनमे सम्पादित तथा संयोगसँ फ्रेंच भाषाक कोपेनहेगेन विश्वविद्यालयमे हिन्दीक प्राध्यापक डॉ. रेन्नर एलमारसँ भेटब, हिनकाद्वारा जर्मन भूमिकाक अंग्रेजी अनुवाद करब, फेर तकर मैथिली अनुवाद प्रक्रिया आदि अत्यंत रोचक आ मारुख अछि ।

संगीतशास्त्रक मर्मज्ञ स्व. प्रो. आनन्द मिश्र ‘हरिश्चन्द्रनृत्यं’मे संगीत विषयस’ दोसर पाठ लिखथि अछि । प्रो. मिश्र अपन तीन पेजक आलेखमे नीक जेना स्थापित केलाह अछि, जे एहि नाटकमे उत्तर आ दक्षिण भारतीय संगीत – दुनू पद्धतिक प्रयोग भेल अछि । जे नाटकक विशालताक परिचायक छैक ।

पं. गोविन्द झा तेसर अध्यायमे ‘हरिश्चन्द्रनृत्यं’ आ ओकर भाषापर फरिछाक’ चर्चा केलथि अछि । जाहिमे नाटककार, आश्रयदाता, लिपि, भाषा वैविध्य, भाषाक स्थितिमे-  आक्षरिकी, सर्वनाम, क्रियापद, अंविति आदिपर भाषाविद् दृष्टिए विवेचन केलाह अछि  । नाटकमे प्रयुक्त किछु रोचक शब्द जेना – विजय, बहिआ, नौड़ी, बेगार, नफर, मजूरी, कोड़ा, दोकड़ा, गरि आदिक वर्णन सेहो केलाह अछि । नाटकक सामान्य परिचय आ मैथिली अनुवादकक वक्तव्य सेहो सविस्तार लिखलाह अछि ।


ऑगस्त कॉनरेडी साहेबद्वारा जर्मनमे सम्पादित आलेखक डॉ. रेन्नर एलमारद्वारा अँग्रेजीमे कयल गेल अनुवाद सेहो पुस्तकमे मुद्रित भेल अछि ।  अंतमे नाटकक नवरूप आ मूलरूप दुनू छापल गेल अछि । एहि ठाम इहो कहि दी जे वर्तमान रूपक मुद्रणक अभिकल्पन बहुत खराब अछि, जाहि स’ बहुत रास भ्रम उत्पन्न हेबाक संभावना छैक, ओत्तहि मूल रूपक मुद्रण अपेक्षाकृत सुन्दर आ बोधगम्य । 

बहुत दिनक बाद हमरा सबकेँ खासक’ मैथिली नाटकसँ जुड़ल लोककेँ एकटा एहन पोथी हाथ लागल अछि, जकर महत्व अकानब कठिन अछि । जखन हमर अग्रज एतेक मेहनतस’ हमर हेरायल नाट्यकृतिकेँ जर्मनीसँ वापस आनि देलाह अछि त’ आब रंग संस्था आ रंग निर्देशक लोकन्हि अपन कर्तव्यकेँ शिरोधार्य करैथ आ एकर मंचन वर्तमान स्वरूपमे राखि अवश्य करथि । तखने ई कृति सम्पूर्णता ग्रहण करत ।  एकबेर पुन: प्रकाशक नवीन कुमार झा आ सम्पादक डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’ संगहि डॉ. नरेन्द्र झा केँ हृदय स’ आभार । 

पुस्तकक नाम :   रामभद्रशर्माकृत हरिश्चन्द्रनृत्यं (मल्लकालीन मैथिली नाटक)
सङ्कलन-सम्पादन : डॉ. रमानन्द झा ‘रमण’
दाम : 500 टाका.
कुल पृष्ठ : 125.
प्रकाशक : विश्वम्भर फॉण्डेशन, 03 ए, कुंज विहार, अरगोड़ा, हिनू, राँची, झारखण्ड-02.
मो. : 09471711557. ई-मेल: bishwambherfoundation7591@gmail.com

      
- प्रकाश झा
( पीएच-डी.; नेट; सीनियर फेलो, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार )
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भगवानदास रोड, नई दिल्ली – 01.
मो. + 91 9811774106, फोन : 011 23389138.


कुल शब्द : 713.