ललका
पाग’क
पुनर्पाठ
देवशंकर नवीन
सबसँ पहिने हमरा लोकनि विचार करी जे जँ
राजकमल चौधरी, पाठ्यक्रममे मैथिली
विषय पढ़निहार’क बीच अति परिचित कथा
‘ललका पाग’ नइँ
लिखने रहितथि त’ की होइतए?...राजकमल चौधरी’क लेखकीय सौरभमे कोनो कमी त’ नइँ अबितए, मुदा पाठ्यक्रम-निर्धारक लोकनि अपस्याँत
भ’ जैतथि। मैथिली पाठ्यक्रममे राजकमल चौधरीकें
संलग्न नइँ करबा लेल ओ लोकनि विवश भ’ जइतथि। कारण, राजकमल जेहन कथा लिखै छलाह, से मैथिल समाज’क बौद्धिक नेता लोकनिक शुद्धतावादी
दृष्टिकोणकें पराभवमे द’ देने छल। समय-साल आ
शैक्षिक परिदृश्यक ओइ देवता लोकनिक सोझाँ ओ एकटा विकराल दुविधा जकाँ ठाढ़ रहथि।
दरअसल मैथिली लेखनमे राजकमलक प्रवेश, ओइ कालक जड़िआएल
धुन्धकें फाड़ैत, विराट आलोकपुंज जकाँ
भेल छल। अँखिगर लोक’क आँखि तेज करैत, भोथगर लोक’क आँखिमे चकचोन्ही लगबैत। अल्प कालहिमे
हुनकर रचनात्मक अवदान श्रेष्ठ कोटिक मानल जाए लागल छल। अइ कारणें ओहि काल’क पाठ्यक्रम-निर्धारक लोकनि अवग्रहमे
छलाह। ‘भए गति साँप छुछुन्नर
केरी’ वला स्थिति छलनि।
छोड़ितथि त’ अपढ़ हेबाक कलंक
लगितनि; रखितथि, से शुचितावादी दृष्टि अनुमति नइँ दै
छलनि, आ न’व पीढ़ी ओइ नीतिवेता लोकनिक रामनामी
चद्दरि’क ओहार त’र संचालित मैथिल दुर्वृत्तिसँ सबेर-सकाल
परिचित भ’ जइतए। एतावता, छोड़िए दितथि, कथी लए पड़ितथि! रहथु ग’ मैथिलीक छात्र-छात्रा लोकनि राजकमल चौधरीक
साहित्यसँ अपरिचित। की बिगड़ि जइतनि हुनका लोकनिक, जँ
नवतुरिआ लोक राजकमल’क नाम नहिएँ जनितए त’?...
अगम पारखी नेतसँ संचालित ओइ सम्पूर्ण तन्त्रक
बौद्धिक पाखण्डकें आजुक पीढ़ी सूक्ष्मतासँ चीन्ह रहल अछि। अलबत्त जाबिर लोक सब
रहथि! छगुन्ता लगै’ए! मैथिल किशोर’क अजोह मुदा जाग्रत चिन्तनशीलतामे
बुढ़ौतीक पापाचार उजागर नइँ भ’ जाए; अथवा नवतुरियाक धरगर आँखिमे कुण्ठित
बुढ़भस कोनो गरें उघार नइँ भ’ जाए; तै लेल प्रपंचपूर्ण ढंगें पाठ्यक्रममे ‘ललका पाग’ रखै
छलाह, जाहिसँ अध्येता लोकनि
बियाह-दान’क विसंगतिमे छेकल रहि
जाए आ राजकमल चौधरी’क चोखगर लेखन दिश
नवतुरिआ वर्ग आकर्षित नइँ होअए। उपयोगी आ सार्थक वस्तुकें वातावरण आ बजारसँ
विस्थापित करबाक ई अचूक विधान थिक। नव विचार’क प्रति
उपेक्षा-वृत्ति आ कछुआ-धर्म’क ई अद्भुत उदाहरण
थिक।...
एक टा प्रसंग मोन पड़ैत अछि। श्रेष्ठ
कथाकार कमलेश्वर ता जीविते छलाह। जामिया मिल्लिया इस्लामिया’क कोनो संगोष्ठीमे हम हुनका सम्मुख
छलहुँ। मोका पाबि प्रश्न क’ देलिअनि। कहलिअनि--
कमलेश्वर जी, आब त’ राजकमल चौधरीकें गत भेना लगभग चारि दशक
भेलै; हुनकर ड’र एखनहुँ अहाँ सभकें भ’ए रहल अछि? किंचित अस्वीकार’क संग ओ प्रतिप्रश्न केलनि--केहन प्रश्न
पूछि रहल छी अहाँ? हम कहलिअनि--सन् 1967सँ आइ धरिक अवधिमे बेहिसाब कथा-संग्रह
हिन्दीमे बहराएल अछि। अहाँ सब राजकमल’क कथा किऐ नइँ संकलित
करै छिऐ? ओ कहलनि-- अहाँ गलत
सोचि रहल छी। हम एना नइँ करै छी। अही मास हम एन.बी.टी. लेल संकलन जमा करब, तै मे राजकमल’क कहानी ल’ रहल छी।...जखन एन.बी.टी.मे पाण्डुलिपि
जमा भेल, त’ देखल, जे
ओइमे तीन पृष्ठक राजकमलक कथा ‘क्षणिक तरंग’ संकलित अछि। हम कमलेश्वरकें फोन केलिअनि--कमलेश्वर
जी, अहाँकें ‘जलते हुए मकान में कुछ लोग’ राजकमल चौधरीक प्रतिनिधि कथा बुझाइ’ए की ‘क्षणिक
तरंग’? ओ कहलनि--निस्सन्देह ‘जलते हुए मकान में कुछ लोग’। हम पुछलिअनि--तखन अहाँ अइ संकलनमे ‘क्षणिक तरंग’ किऐक लेलिऐ अए? ओ कहलनि--‘जलते हुए मकान में कुछ लोग’ कथा हमरा उपलब्ध नइँ भ’ सकल तें! भेटि जाए त’ ओएह कहानी अइमे देब’ चाहब!... ध्यातव्य थिक जे ओइसँ कैक बर्ख
पूर्व सन् 1996मे राजकमल प्रकाशनसँ ‘राजकमल चौधरी:
प्रतिनिधि कहानियाँ’ मे ओ कथा छपि चुकल
छल। आ, ओ संकलन कमलेश्वर सन
श्रेष्ठ कथाकारकें उपलब्ध नइँ भेल हेतनि, से विश्वास करब
असम्भव अछि। तथापि ‘जलते हुए मकान में
कुछ लोग’ कथा हम हुनका उपलब्ध
करा देलिअनि। ई खोध-बेध एकदम निरर्थक त’ नइँ भेल, मुदा एकदम सार्थको नइँ कहि सकै छी। ‘जलते हुए मकान में कुछ लोग’ कथा अन्ततः ओहिमे नइँ छपल। सन् 2004मे ‘स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी कहानियाँ’ शीर्षकसँ प्रकाशित ओइ संकलनमे सामरिक
चातुर्यसँ ‘मछलीजाल’ कथा छपल। संकलनसँ राजकमल चौधरीकें
विस्थापित करब हुनका लेल अइ कारणें सम्भव नइँ छलनि, जे
हम ओइ समयमे ओही संस्थामे कार्यरत रही।...
तें मैथिली’क पुरातनपन्थी लोक’क ओइ चातुरी पर चकित हएब बहुत सार्थक
नइँ अछि। दशक भरि पूर्व धरिक साहित्यिक सामन्त लोकनि राजकमल चौधरीक प्रसंगमे
हिन्दीयहुमे कोनो बहुत उदार दृष्टिकोण नइँ रखने छलाह। मैथिलीमे पाठ्यक्रममे लगब’ लेल कौखन हुनकर कथा ‘साँझक गाछ’ सेहो ठेकनाएल गेल। मुदा, ओहो एकटा अलग प्रकरण थिक। एखन त’ ग’प ‘ललका पाग’ पर
करबाक अछि।
‘ललका पाग’ (वैदेही, कथा
विशेषांक 1955 मे प्रकाशित) राजकमल
चौधरीक प्रारम्भिक मैथिली कथा थिक। ओहिसँ पूर्व मैथिलीमे हुनकर तीन गोट
कथा--अपराजिता (अक्टूबर, 1954), अन्धकार (मई, 1955), फुलपरासवाली (अगस्त, 1955) वैदेही पत्रिका’मे छपि चुकल छल। अइ साक्ष्यसँ ई मानि
लेब उचित नइँ हएत जे राजकमल चौधरी सन् 1954सँ मैथिलीमे लिखब
प्रारम्भ केलनि। प्रकाशनक साक्ष्य पर मैथिलीमे कोनो बात निस्तुकी करब भ्रामक होएत।
तथ्य थिक जे राजकमल चौधरी छठम दशक’क प्रारम्भहिसँ तीव्र
गतिएँ मैथिली आ हिन्दीमे रचनारत छलाह। मुदा सन् 1960
अबैत-अबैत मैथिलीसँ हुनकर मोह टूट’ लगलनि। कलकत्तासँ अपन
मित्र हंसराजक नामे लिखल 25 जून 1960क पत्रमे उल्लेख केलनि जे मैथिलीक
पत्रिकासँ असम्पर्कित छी, आ रहए चाहै छी; अहूँ हिन्दीमे लिखल करू। मैथिलीक मोह
अधिक काल धरि उचित नइँ। मात्र मैथिलीमे लिखने लाभ नइँ। वैदेहीमे जे हमर कथा छपल
अछि, से कृष्णकान्त
बाबूकें हम सन् 1951मे देने छलिअनि (आखर, मई-अगस्त, 1968/पृ.
54)।...
अइ बातक उल्लेख अइ लेल कएल, जे सितम्बर 1960 धरि प्रकाशित हुनकर चौबीस गोट मैथिली
कथामे सँ पन्द्रह गोट कथा ‘वैदेही’ मे प्रकाशित भेल। हंसराजक नामे लिखल
उक्त पत्र लिखबासँ पूर्व सन् 1960मे हुनकर दू गोट कथा ‘कादम्बरी उपकथा’ (मार्च) आ ‘ननदि-भाउज’ (जून) ‘वैदेही’ मे छपल छल। सम्भवतः अही कथा’क प्रसंग ओ सूचना देने हेताह।
तथ्य थिक जे विषय-वस्तुक दृष्टिएँ
राजकमल चौधरीक कथाक वितान, वैदेही मे प्रकाशित ‘किरतनियाँ’ (जनवरी, 1956) कथासँ
पूर्णतः बदलि गेल छल। ‘ललका पाग’ आ ‘अपराजिता’ कथा सन् 1954-55मे
भने छपल हो, मुदा जें कि ‘कादम्बरी उपकथा’ (मार्च) आ ‘ननदि-भाउज’ (जून)क लेखन वर्ष सन् 1951 थिक, तें
सम्भावना व्यक्त करबामे कोनो उजूर नइँ जे ‘ललका पाग’ आ ‘अपराजिता’ क लेखन-काल सन् 1951सँ पूर्व निश्चये रहल होएत।...
हिन्दीमे हुनकर पहिल कविता (बरसात रात
प्रभात) सितम्बर 1956मे ‘नई धारा’ मे, पहिल कथा (सती धनुकाइन) मार्च 1958मे ‘कहानी’ मे आ निबन्ध (भारतीय कला में
सौन्दर्य-भावना) जून 1959मे ज्ञानोदय मे प्रकाशित
भेल। मैथिलीमे हुनकर पहिल कविता ‘पटनियाँ टट्टूक प्रति’ वैदेही, फरवरी
1955 आ पहिल कथा ‘अपराजिता’ वैदेही, अक्टूबर 1954
मे छपल। मुदा लिखित डायरीसँ प्राप्त सूचनानुसार सन् 1949-50मे ओ तीव्रतर गतिएँ रचना क’ रहल छलाह। सन् 1958अबैत-अबैत ओ साहित्य-जगतमे ख्यात भ’ गेल छलाह; आ
मैथिली’क रुग्ण, जर्जर, रूढ़िग्रस्त
रचनाशीलताक पोषक-प्रतिस्थापक लेल आतंक बनि गेल छलाह।...
राजकमल चौधरीक मान्यता रहनि जे श्रेष्ठ
कोटिक कथा-रचना अपन समाप्ति स्थलसँ शरुह होइत अछि। अइ बातक उद्घोषणा चेखब समेत
दुनियाँ भरिक महान-महान रचनाकार सब सेहो कएने छथि। अइ घोषणाक मूल-ध्वनि ई थिक जे
कथा-समाप्तिक बाद ओ कथा भावक’क मोनमे न’व तरहें शुरुह होइत अछि। ओ सम्पूर्ण कथा, रचना’क
शेषांश जकाँ, कोनो सार्थक
आलोचना-विधान जकाँ, विवेकपूर्ण दिग्दर्शक
जकाँ भावककें उद्वेलित करैत रहैत अछि।
अइ कसौटी पर राजकमल चौधरीक प्रसिद्ध कथा
‘ललका पाग’क
जाँच करी। कथा’क अन्तिम भागमे
राधाकान्त’क दोसर विवाहक तैयारी
चलि रहल अछि। ब’र-बरियाती तैयार अछि।
विदा हेबाक घड़ीमे बात फरिछाएल जे ब’र लेल ललका पाग चाही।
खएबा-पीबासँ ल’ कए गाड़ी-घोड़ा, बाजा-गाजा, झाड़-फानूस स’ब कथुक इन्तजाम भ’ गेल छल; मुदा
मैथिल ब्राह्मणक विवाहक सांस्कृतिक संकेत ललका पाग’क
सुरता किनकहु नइँ रहलनि। आब अइ जोख पर अचानकसँ ललका पाग कतएसँ आबए?...समस्याक समाधान कथा’क नायिका तिरू अपन दधीचिवत् त्यागसँ
केलनि। जे ललका पाग पहीरि हुनकर स्वामी राधाकान्त हुनका बियाहि कए सम्मानपूर्वक घ’र अनने रहनि; ओ पाग हुनकर तिरस्कृत जीवन’क सम्बल छल। अपन पराभव’क दिनमे ओ ओहि पागकें प्रतीक-देव बूझि
भरि बर्ख पूजैत रहलीह। मुदा ओइ बेगरताक पहरमे तिरू त्याग’क प्रतिमूर्ति बनि उठलीह। ओइ
प्रतीक-देवता’क अपन खगता त्यागि ओ
ललका पाग राधाकान्तकें द’ देलनि। ओहिसँ पहिने
तिरू अपन स्वामी’क व्यक्तित्वक
प्रशंसा क’ चुकल छलीह। अपन
निर्मल भाव’क मन्तव्य दैत कहि
चुकल छलीह--‘‘सत्ते बड्ड सुन्दर
लगैत छी अहाँ। एक बेर फेर अहींसँ बिआह करबाक इच्छा होइत अछि।’’ पतिसँ उपेक्षा पाबियो क’ जे पत्नी कहिओ अपन पति’क प्रति रुच्छ नइँ भेलीह, कहिओ कोनो उपालम्भ नइँ पोसलनि, तिनका मुँहें एहेन वचन सुनि
राधाकान्तकें भने मजाक बुझाइन, मुदा एकटा उपेक्षित
मैथिलानी’क अपराजेय जीवनी
शक्ति’क ई पराकाष्ठा छल।
कथा’क अन्तमे पतिकें पाग
दैत, दोसर विवाह लेल विदा
करैत पत्नीक ऐतिहासिक त्याग’क परिणति छल। अइ
घटनाक बाद राधाकान्त हत्वाक् भ’ गेल छलाह। कथा’क अन्तिम वाक्य थिक--‘राधा किछु नइँ बाजल। किएक नइँ बाजल?’...
जे किओ सुबुद्ध जन ई बहुचर्चित कथा पढ़ै
छथि, ओ कथाकारे जकाँ
स्वयंसँ आ समक्ष प्रस्तुत सगरो समाजसँ इएह प्रश्न करै छथि--आखिर राधा किएक किछु
नइँ बाजल? जे राधा भरि कथामे
अदगोइ-बदगोइ करैत रहल, बाजिते रहल, से राधा अचानक एकटा छोट सन घटनासँ एते
अवसन्न कोना भ’ गेल? प्रत्येक श्रोता, पाठक, समीक्षक
के चिन्तन-पटल पर उपस्थित ई प्रश्न, कैक टा नव-कथा
उत्पन्न करैत अछि, आ असंख्य प्रश्न’क शृंखला शुरुह करैत अछि। जाहिसँ
कथा-समाप्तिक पश्चात नव-नव कथा प्रारम्भ होइत अछि। कोनो महान कथाकार’क ई श्रेष्ठतम सफलता थिक। मुदा ई सब बात
पछाति, पहिने किछु आओर
प्रसंग...।
निबन्धारम्भ जतएसँ भेल अछि, दू टा प्रसंग सोझाँ अबैत अछि--पहिल ई, जे मैथिली शिक्षाक पुरातनपन्थी सामन्त
लोकनि राजकमल’क रचना-सन्धानसँ
असहजता रखितहु हुनकर कथा ‘ललका पाग’ आ ‘साँझक गाछ’ क पर्याप्त सम्मान केलनि; आ दोसर ई जे राजकमल चौधरी अपन जाहि
रचना-दृष्टिक कारणें महत्त्वपूर्ण छलाह, तकरा नइँ जानि किऐ, मैथिली शिक्षाक प्रस्तावित पाठमे संलग्न
नइँ कएल जाइ छल।...अनुमाने टा कएल जा सकैत अछि जे ई क्रिया पतनशील शैक्षिक आ
साहित्यिक सामन्तशाही’क भयबोध छल।
हानि एतबा अवस्से भेल, जे जाहि त्वरा’क संग मैथिल समाजमे राजकमल’क रचनाशीलताक प्रभाव बीसम शताब्दीक
सातम-आठम दशकमे पसरि जेबाक चाही छल, से अन्तिम दू दशक आ
एकैसम शताब्दीक आइ धरिक समयमे भेल। हर्ज कोनो नइँ, साहित्य
कोनो एलोपैथिक दबाइ नइँ होइत अछि, जे ओकर प्रभाव-काल
शेष भ’ जाएत। राजकमल चौधरीक
समस्त रचना शाश्वत मूल्य’क सर्वकालिक रेचक थिक, ओकर प्रभाव-काल सर्वदा’क लेल सुरक्षित रहत। मुदा, तथ्य थिक जे समाज-व्यवस्था, लोकमानस, समकालीन
राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक व्यूहसँ कोनो भाषाक जाग्रत साहित्य’क सीधा सम्बन्ध होइत अछि। प्रत्येक रचना
अपन शाश्वत-मूल्यक संग-संग समसामयिक मूल्यक दायित्व-वहन सेहो करैत अछि। समसामयिक
मूल्य द्वारा रचनामे अंकित तत्कालीन जनचित-वृत्तिक यथार्थसँ भावककें उद्बुद्ध करैत
अपन परिवेशक प्रति सावधान करैत अछि आ दूरदर्शी चिन्तन-फलक एवं रचना-कौशल’क विलक्षणतासँ ओकर शाश्वत-मूल्य स्थापित
होइत अछि।
आइ राजकमल’क रचना जे क’ रहल अछि, से
अपन शाश्वत-मूल्य’क बलें। अइ रचना सभ’क समसामयिक प्रभावकें फलदायी नइँ होअए
देल गेल। स्वातन्त्र्योत्तर कालक प्रारम्भिक तीन दशक’क जे लोक-मानस छल, से राष्ट्रीय आ क्षेत्रीय स्तर’क असंख्य सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक
घटनाक्रम’क कारणें अन्तिम दू
दशकमे निट्ठाह बदलि गेल। छात्र-आन्दोलन, आपातकाल, मन्दिर-मस्जिद विवाद, जाति-द्रोह आदिक परिणति मिथिले नइँ, सम्पूर्ण राष्ट्र’क युवा-मनकें भविष्यक प्रति सशंकित, आ निजी स्वार्थ लेल दूषित क’ देलक। परिणामस्वरूप राजकमल’क रचना’क
प्रभाव ठीक ओहिना नइँ भ’ रहल अछि, जेना क्रमबद्धताक कारणें आबि सकितए।
अइ विमर्शक अर्थ ईहो नइँ थिक जे ‘ललका पाग’ राजकमल’क कोनो दुर्बल रचना थिक। ई बहुत सबल आ
सार्थक कथा थिक, जकर मूल्यांकन
पाठ-विश्लेषणक आधार पर हएब एखनहुँ धरि शेष अछि। अइ कथा’क उचित मूल्यांकन हेतु एकर रचना-कालक
भारतीय साहित्य आ विश्व-साहित्यमे चलैत विभिन्न आन्दोलन’क लेखा-जोखा करब बहुत आवश्यक होएत। सबसँ
पहिने राजकमल चौधरीक रचना-दृष्टि आ सामाजिक सरोकारकें जानब आवश्यक होएत।
तथ्य थिक जे राजकमल चौधरी अपना समयक
मैथिलीए नइँ सम्पूर्ण भारतीय साहित्यक सर्वाधिक पढ़ल-गूनल लेखक छलाह। दुनियाँ भरिक
साहित्यिक आन्दोलन आ गतिविधिसँ हुनकर परिचय छलनि। सन् 1962-63क भारत-यात्रामे प्रसिद्ध अमेरिकी कवि आ
आहत पीढ़ीक पुरोधा इरविन एलेन गिन्सबर्ग (सन् 1926-1997)क राजकमल चौधरीसँ सघन
साहचर्य भेल छलनि। उल्लेखनीय थिक जे ओइ यात्रामे गिन्सबर्गक संग हुनकर जीवनसंगी आ
आहत पीढ़ीक कवि पीटर ओर्लोव्स्की (सन् 1922-2010)
सेहो
छलाह। ओइ यात्रामे ओ लोकनि किछु मास धरि कलकत्ता आ बनारसमे बितौलनि, दुनू ठामक साहित्यिक रंगतमे अपन विचारसँ
उद्वेलन उत्पन्न केलनि। बंगला’क प्रसिद्ध रचनाकार
शक्ति चट्टोपाध्याय, मलयराय चौधुरी, समीरराय चौधुरी, सुनील गंगोपाध्याय आदिक सम्पर्क सेहो
हुनकासँ भेलनि। ओहिसँ पूर्व अपन प्रसिद्ध कविता ‘हाउल’ लेल गिन्सबर्ग सुविख्यात भ’ गेल छलाह। रचनामे व्यक्त लेखकीय
पक्षधरता आ प्रतिबद्धता’क कारणें
सैन-फ्रांसिस्को पुलिस आ अमेरिकी विधान सन् 1956मे ओइ कविता पर
निषेधाज्ञा लगा देने छल। एलेन गिन्सबर्गक पहचान सैनिक-शासन, आर्थिक-भौतिकवाद आ यौन-दमनक उग्र
विरोधीक रूपमे होइ छल। अपन रचना-कर्मसँ ओ अमेरिकी समाज’क संवेदनाकें उद्वेलित क’ आएल छलाह। आहत पीढ़ीक अन्य महत्त्वपूर्ण
कविगण विलियम एस बरोज (सन् 1914-1997), जॅक करुआक (सन् 1922-1969) आदि’क रचनात्मक उद्यमसँ
सेहो राजकमल चौधरीक गहन परिचय छलनि। ई सम्पूर्ण मण्डल अपना देशक शासकीय व्यवस्थासँ
उबियाएल सृजेता छलाह। ओही दौरान राजकमल चौधरी भारत देश, आ तकर छोट सन भूखण्ड मिथिलाकें देखि रहल
छलाह। दूध मँहक डाढ़ी जकाँ भेटल अधखरू स्वाधीनतासँ भारत’क सामान्य नागरिक क्षुब्ध छल। अपन
खण्डित स्वप्नक भग्नावशेषमे सन्तोष लेल कोनो लुत्ती ताकि रहल छल। ओम्हर
बौद्धिक-वर्ग सत्ता’क निकटवर्ती हेबाक
जोगाड़ बैसब’मे लिप्त भ’ गेल छल। देश पर कर्ज आ सामन्य जनता पर
भूख, अकाल, बेकारी’क
बोझ लदबाक व्यवस्था अपन चाँगुर कसि रहल छल। क्षेत्रीय स्तर पर मैथिल जन अपन
क्षुद्र लिप्सामे लीन आ वृहत् उद्देश्यसँ परांग्मुख छलाह। संवेदनशील सुबुद्ध
नागरिक अइ सदमामे व्यथित आ दायित्व’क निर्वहन’क नैतिकतामे बेचैन छलाह। राजकमल चौधरी
ओही बेचैन वातावरण’क उद्भव छलाह।
हुनकर बेचैनीक एक पक्ष इहो छल जे ओहू
त्रासद क्षणमे मैथिलीक आराध्य लेखक लोकनि मर्यादा’क
छद्म आ अयथार्थ आदर्शवादिताक रक्षामे लिप्त छलाह। रजनी-सजनीक गीत आ सारि-सरहोजिक
कथामे लीन रहबाक प्रथा मैथिलीमे अपन प्रभुत्वक संग स्थापित छल। चन्दा झा आ सीताराम
झा’क प्रगतिकामी धारणाकें पुष्ट करबामे आ
मैथिली साहित्यकें सर्वथा नूतन करबामे तत्पर हरिमोहन झा, कांचीनाथ झा ‘किरण’, वैद्यनाथ
मिश्र ‘यात्री’, रामकृष्ण झा ‘किसुन’क
समस्त प्रयासकें साँसतमे रखैत ओ शुद्धतावादी दृष्टिकोण आँखि तरेर रहल छल। राजकमल चौधरी
अही विकराल समयमे ताल ठोकैत मैथिलीमे प्रविष्ट भेलाह। सत्य थिक जे ओ अपन असाधारण
प्रतिभा, आ अध्ययनशीलताक बलें
विलक्षण जीवन-दृष्टि अर्जित केने आएल छलाह,
मुदा
तें हुनकर साहित्य-सन्धानमे उक्त अग्रज पीढ़ीक अवदानकें नकारल नइँ जा सकैत अछि।
...एतए राजकमल चौधरीक विचारकें फ्रांससँ चलल साहित्यिक आन्दोलन ‘प्रकृतिवाद’ अथवा ‘प्रकृतवाद’ सँ जोड़ि कए देखब उचित लागि रहल अछि।
वैश्विक स्तर पर प्रभावी अइ प्रवृत्ति पर थोड़ेक बात भ’ गेने राजकमल चौधरीक रचना-सन्धानकें
बुझबामे सहयोग भेटि सकैत अछि।
***
मध्यवर्ती उनैसम शताब्दीमे फ्रांस एवं
दुनियाँक अन्य भूभागमे सेहो ‘प्रकृतिवाद’क सुगबुगाहटि भेल, जे ‘यथार्थवाद’क विस्तृत आयाम’क उपयोग करैत सन् 1880-1930 धरिक दशकमे प्रमुख साहित्यिक आन्दोलन’क रूपमे सोझाँ आएल। असलमे ई यथार्थवादक
अग्राभिमुख सोच छल। प्रारम्भमे ई एकटा असंगठित साहित्यिक आन्दोलन जकाँ शुरुह भेल, जाहिमे पात्र-प्रसंग-पर्यावरणक
विश्वसनीयता, सहजता आ दैनन्दिन
व्यवहारिकता’क खगता पर बल देल
गेल। अभिप्राय ई जे कोनो रचनाकार अपन रचनामे जाहि पात्र-प्रसंग-पर्यावरणक जनक होइ
छथि, तकरा संग बलजोरी करब
उचित नइँ थिक; कोनो श्रेष्ठ रचना
लेल अइ तीनू घटक’क सहज विकास अत्यन्त
महत्त्वपूर्ण थिक। प्रत्येक पात्र-प्रसंग-पर्यावरण लेल ओकर मूल पृष्ठभूमि विशिष्ट
आ प्रभावी होइत अछि। ओकरा मूलोछिन्न क’ कए अजरा-जबरदस्ती
सभ्य बनेबाक अथवा सुविधानुसार लेखकीय पाखण्ड थोपबाक उद्यम नइँ करबाक चाही।
सन् 1880सँ
पूर्व फ्रांसमे यथार्थवादक चलन निके-ना छल। प्रकृतिवाद ओकरे विस्तार’क रूपमे प्रकट भेल। एकरा साहित्यिक
आन्दोलनक सूक्ष्म विधान द्वारा बूझल जा सकैत अछि। यथार्थवाद जतए सोझाँमे उपस्थित
कोनो पात्र-प्रसंग-पर्यावरण’क प्रत्यक्ष
परिस्थिति’क वर्णन करैत अछि, ओतहि प्रकृतिवाद, ओहि समस्त अभिक्रियाकें निर्धारित
करैवला घटक सबकें चिन्हबाक उद्यम करैत अछि। आनुवंशिक अथवा पर्यावरणिक परिस्थितिक
कारणें ओहिमे अन्तर्निहित गुणसूत्र’क विज्ञानसम्मत संकेत
दैत अछि।
अपन रचनासँ अलगाव रखैत प्रकृतिवादी
रचनाकार बहुधा तटस्थ द्रष्टा आ मौलिक भोक्ता जकाँ प्रस्तुत होइ छथि। एहिमे स्वतन्त्र
इच्छाक अनिवार्यतः अनुपालन नइँ होइत अछि। अनिवार्यताक समर्थन नियतिवाद’क अधीन होइत अछि। तात्पर्य ई जे
प्रकृतिवादी रचनाकार सामान्यतया अपन पाठक’क नेतृत्व करैत
विश्वास दिअबै छथि जे रचनामे सृजित चरित्रक नियति पूर्वनिर्धारित होइत अछि, आ से ओकर पर्यवस्थिति पर निर्भर करैत
अछि। ओइ प्रसंगमे प्रयासपूर्वक किछु नइँ कएल जा सकैत अछि। एतए कथा’क अन्त कोनो भौंचक आ रोमांचक मोड़सँ कएल
जाइत अछि। प्रकृतिवादी उपन्यास आ कथामे मानव-संघर्षक प्रति प्रकृति सर्वथा
निरपेक्ष रहैत अछि।
कोनो कथाकार अपन रचनामे जाहि चरित्रकें
ठाढ़ करै छथि, से अपन सम्पूर्ण
देवत्व आ दानवीयताक संग समकालीन समाज’क अंग होइत अछि। ओकर
समस्त आचरण’क कोनो ने कोनो
पृष्ठभूमि होइत अछि। रचनाकार अपन रचना’क पात्र’क जनक अवश्य होइ छथि, मुदा तें ओकर चरित्रकें विस्तार देबा
काल मनमानी नइँ क’ सकै छथि। जाहि
कुल-शील-वातावरणमे ओइ चरित्रकें उत्पन्न कएल जाइत अछि, ताहिसँ विच्छिन्न कोनो व्यवस्थामे ओकर
चरित्रांकन कएलासँ घटना आ पात्र’क सहज-सन्धान नइँ भ’ सकैत अछि। प्रकृतिवाद अइ पर स्पष्ट
धारणा रखैत अछि। एकर स्थापना छल जे मानव-चरित्रक निर्माणमे सामाजिक परिस्थिति, आनुवंशिकता आ पर्यावरणक अपरिहार्य
योगदान होइत अछि। प्रतीकात्मकता, आदर्शवादिता अथवा
अलौकिक व्यवहारक संग एतए अत्यधिक विषयबोध’क सम्भावना मान्य
अछि।
‘प्रकृतिवाद’ पदबन्ध’क
उपयोग पहिल बेर विश्वविख्यात फ्रेंच उपन्यासकार, पत्रकार
एमिल जोला (सन् 1840-1902) केलनि। साहित्यमे
पहिनहिसँ व्याप्त यथार्थवादी शैलीक जाहि रूपकें ओ अपनौलनि, से प्रकृतवाद मानल गेल। मानल जाइत अछि
जे पाठक-वर्गकें आश्वस्त करबा लेल अपन उपन्यासमे किछु बेसी आधुनिक बात प्रस्तुत
करैत, ओ न’व विचार प्रतिपादित केलनि। तदनुसार नव
धारणाक कथा-लेखनमे ओ चरित्र आ कथा-भूमिक सृजन लेल वैज्ञानिक पद्धतिक उपयोग पर जोर
देलनि।
जनतब थिक जे प्रकृतवाद निर्ममतासँ
यथार्थक अनावरण करैत अछि। किछुओ झाँपि-दाबि कए राखब ओकरा लेल काम्य नइँ। जीवनक
कठोरतम आ क्रूरतम प्रसंग’क निस्संकोच अंकन ओकर
स्वभाव होइत अछि। साहित्य एवं कला क्षेत्रमे वर्जित-गर्हित बूझल जाइवला प्रसंगकें
अनावृत करबामे प्रकृतवादकें कोनो प्रकारक अवरोध नइँ बुझाइत अछि। अइ धारणाक रचनामे
जीवनक कोनहु कुरूपता आ विरूपतासँ परहेज नइँ देखाइत अछि। प्रकृतिवादी लोकनिकें अपन
रचनामे निम्नतम आ घिनौन विषय धरिकें जगह देबामे कोनो असुविधा नइँ होइ छनि।
एमिल जोला द्वारा प्रवर्तित अइ धारणासँ
सृजन-कौशलकें एकटा वैज्ञानिक पद्धति भेटलै। अइ पद्धतिमे जीवन-जगत, गाम-समाज, खेत-खरिहान, दोकान-अस्पताल, कोट-कचहरी, चौपाल-पंचायत, हाट-बजार--कोनहु ठाम’क कोनहुटा दृश्य साहित्य लेल अस्पृश्य
नइँ मानल गेल। रचनाकार ओइ समस्त आचरणकें अपन रचनाक विषय बना सकै छथि, जे समकालीन परिदृश्यक नागरिक वस्तुतः
करै छथि। प्रकृतवादी रचनाकारक मान्यतानुसार इएह एहेन उद्यम थिक, जकरा बलें साहित्य एवं अन्य कला जनजीवनक
निकट पहुँचैत अछि। गृहस्थ, किसान, व्यापारी, भिखारि, प्रेमी, रकीब, मद्यप, वेश्या, जुआरी; नेता, अफ्सर, पुलिस, पत्रकार, शिक्षक, छात्र; तथा
जीवन-यापन, प्रेम-घृणा, शिक्षा-संस्कार, कृषि-वाणिज्य-सेवा, शासन-शोषण-दंगा, मारि-लड़ाइ, चोरि-बटमारि, पूजा-ठगी...सब किओ आ सब किछु अपन मूल
स्वरूप एवं तार्किक विधान’क संग साहित्यमे
उपस्थित होइत अछि।
अइ धाराक रचनाकार लोकनि चार्ल्स
डार्विनक विकास-सिद्धान्तसँ प्रभावित देखाइ छथि। हुनका लोकनिक सामान्य आस्था छनि
जे व्यक्ति विशेषक आनुवंशिकता एवं सामाजिक वातावरण बहुधा चरित्र-निर्माणक प्रमुख
घटक होइत अछि। यथार्थवाद प्रत्यक्ष परिस्थिति’क वर्णन करैत निकलि
जाइत अछि, मुदा प्रकृतिवाद, ओहि समस्त अभिक्रियाक मूल धरि जेबाक
उद्योग करैत अछि। पात्र’क एक-एक आचरण आ
प्रसंग’क एक-एक सूत्र, जाहि आनुवंशिक अथवा पर्यावरणिक
परिस्थितिसँ संचालित होइत अछि, तकरा सोझाँ अनैत अछि।
प्रकृतिवादी लोकनिक मानब छनि जे किओ अनेरे नइँ सद्पात्र आ कुपात्र होइत अछि; कोनो घटना अनेरे नइँ उपस्थित भ’ जाइत अछि। तें आनुवंशिक सूत्र’क संकेत बिना कोनो रचनाक पात्र अथवा
प्रसंग’क चित्र अपूर्ण थिक; आ ओइ परिस्थितिमे रचनाक अनुशीलन पात्र आ
प्रसंग’क प्रति अनाचार होएत।
फ्रांसीसी उपन्यासकर एमिल जोला (सन् 18840-1902), अलफॉन्से दौदे (सन् 18840-1897), जॉरिस कार्ल हाइस्मन्स (सन् 1848-1907), हेनरी रेने अलबर्ट गुइ दे मोपासाँ (सन् 1850-1893), अंग्रेजी उपन्यासकार थॉमस हार्डी (सन् 1840-1928), हिन्दी-मैथिली’क उपन्यासकार राजकमल चौधरी सहित दुनियाँ
भरिक अनेक महान लेखक’क रचनामे अइ तथ्यक
अवलोकन कएल जा सकैत अछि। एमिल जोला’क पूर्ववर्ती
फ्रांसीसी उपन्यासकार गुस्ताव फ्लौवेयर (सन् 18821-1880)क रचना सेहो अही
धारणा पर केन्द्रित छल। ई बात भिन्न जे अइ पद्धतिकें प्रतिष्ठा दिअएबामे जोला’क भूमिका अग्रणी भेल। एमिल जोला’क उपन्यास, ‘ला सुमुआ’मे
नशाखोरीक पाछू सम्पूर्ण परिवारकें नष्ट-भ्रष्ट केनिहार एकटा मद्यपक जीवन-दशा’क यथातथ्य वर्णन अछि। हुनकर आनहु रचनामे
अइ तथ्यक अवलोकन कएल जा सकैत अछि।
एकटा युवा वेश्याक जीवन पर केन्द्रित
प्रकृतिवादी धारणाक अपन पहिले उपन्यास मार्थे (सन् 1876) द्वारा
जाॅरिस कार्ल हाइस्मन्स, एमिल जोला’क संज्ञानमे अएल छलाह। हुनकर परवर्ती
कृति सभमे सेहो अइ धारणाक वहन भेल। थाॅमस हार्डी (सन् 1840-1928)क प्रसिद्ध उपन्यास टेस आॅफ द’ डीउर्बरविल्स (ए प्योर वुमन फेथफुली)
उदार दृष्टिकोणसँ रचित जीवन’क कटु यथार्थक चित्र
थिक।
यूरोप आ अमेरिका’क किछु आओर प्रकृतिवादी रचनाकार
छथि--एडिथ व्हार्टन (सन् 1862-1937), फ्रांक नाॅरिस (सन् 1870-1902), स्टीफन क्रेन (सन् 1871-1900), थ्योडोर ड्रीजर (सन् 1871-1945), अब्राहम काहन (सन् 1860-1951), एलेन ग्लास्गो (सन् 1873-1945), डैविड ग्राहम फिलिप्स (सन् 1867-1911), जॅक लॉण्डन (सन् 1876-1916), चाल्र्स डिकेन्स (सन् 1812-1870), विक्टर मेरी ह्यूगो (सन् 1802-1885), थॉमस स्टीर्न्स इलिएट (सन् 1888-1965) आदि।
व्याप्त व्यवस्थाक प्रति मनुष्यक हताशा’क संज्ञान लेब प्रकृतिवादी चिन्तनक
प्राथमिक सोपान छल। अगत्या रचनामे गरीबी, वंशवाद, हिंसा, पूर्वाग्रह, रुग्णता, भ्रष्टाचार, वेश्यावृत्ति, क्रूरता, नृशंसता, घृणा...जीवनक समस्त निष्ठुर कलुषादि
उपस्थित होइत गेल। अइ प्रसंगकें कनेक बेसी स्पष्ट करबा लेल फ्रांसीसी विचारक लुइस
बर्नार्ड बोनज्याँ (सन् 1804-1871) जॉरिस कार्ल
हाइस्मन्स’क दोसर उपन्यास द’ सिस्टर्स वतार्द (The Sisters Vatard) सँ उद्धरण देने छथि; जाहिमे मृत्यु-भयसँ त्रस्त एकटा पचास
वर्षीया तिरस्कृत-उपेक्षित-अपमानित स्त्रीक क्षण भरिक रूपकसँ वस्तुस्थितिक
भयावहता स्पष्ट भेल अछि--‘‘पचास वर्षीया ओ धोंछी
बुढ़िया, असगरे घोलटल, चान’कें मुँह दूसैत, अपन सूखल टाँगकें तौलैत, हड्डी में लटकल चमरीकें खौंझसँ
रगड़ैत...।’’ अभिप्राय ई, जे दृश्य केहनो विकृत अथवा वीभत्स हो; जँ ओ परिवेशमे घटित अछि, त’
ओकर
रूपांकन साहित्यहुमे ओतबे मौलिकतासँ हेबाक चाही। मानव-जीवनक दुख-दुविधा दिश अइ
तरहें अतिशय केन्द्रित रहबाक कारणें प्रकृतिवादी रचनाकारक निरन्तर आलोचना सेहो कएल
गेल।
जोला अपन प्रसिद्ध लेख ‘दी एक्सपेरिमेण्टल नॉवेल’ (सन् 1880)मे
विस्तारसँ विचार करैत रचनाकारकें पूर्वनिश्चित सिद्धान्त आ नैतिक आग्रहसँ मुक्त
रहबाक, तटस्थ भावें
विषय-वस्तु आ रचना-प्रक्रियाक परीक्षण करबाक सलाह देने छथि। रचनामे सर्वथा
विवाद-रहित निष्कर्ष अही पद्धतिसँ सोझाँ आबि सकैत अछि।
जोलाक स्पष्ट मान्यता छलनि जे आजुक
परिस्थितिमे कोनो महान पात्रक रचना असम्भव अछि। तें ओ सतत् ‘टाइप’ चरित्रक
विरोध केलनि। ‘टाइप’ चरित्र गढ़बाक बेगरतामे हुनका बरमहल पात्रक
स्वाभाविकता नष्ट होइत देखाइत छलनि। जबर्दस्ती चरित्र गढ़लासँ रचना’क पात्र, अपन
स्वभाविकतासँ थम्हि नइँ पबैत अछि। सम्भवतः अही कारणें एमिल जोला, आ अही कारणें राजकमल चौधरी अपन कोनो
रचनामे ‘टाइप’ चरित्र गढ़बाक चेष्टा नइँ केलनि। अपन पात्र’क जनक होइतहु, राजकमल कोनहुँ पात्र’क भागय-विधाता नइँ भेल छथि। जे किछु
करबाक भेलनि से समस्त कौशलसँ पात्र’क प्रवेश-कालहिमे क’ नेने छथि, चरित्र-विकास’क क्रममे ओ कतहु बलजोरी नइँ केने छथि।
प्रकृतवाद’क आग्रही रचनाकार’क रचना-विधानमे प्राकृतिक सौन्दर्य
अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होइत अछि। मुदा एतए स्वच्छन्दतावाद आ यथार्थवाद’क सम्पोषण’क भ्रम नइँ हेबाक चाही। प्रकृतवादी
रचनाकार विषय-वस्तुक चित्रणमे विरूपित, विडम्बनापूर्ण, अवसादमय आ जुगुप्स पद्धतिक उपयोग करै
छथि। ई पद्धति अइ बात पर जोर दैत अछि जे साहित्यकें स्वच्छन्दतावादी आ यथार्थवादी
धारणाक विरोधमे चीन्हल जाए। ‘यथार्थवाद’ मनुष्य एवं जीवनकें ओकर सम्पूर्णतामे
देखबाक आग्रही होइत अछि, जखन कि ओकर खण्डित
स्वरूपकें जीवन-शास्त्रीय दृष्टिसँ देखब समीचीन होइत अछि। समग्रतामे देखबाक
हलतलबीसँ खण्ड-खण्ड जिनगी’क रोमांचक उल्लास, अवसाद अथवा आन-आन अनिवार्य तथ्य बहुधा
उपेक्षित रहि जाइत अछि। व्यवस्था’क बसातमे सामान्य
मनुष्य’क असंख्य उल्लास
अनेरो उड़िया जाइत अछि। व्यवस्थाकें ओकर पीड़ा’क संज्ञान नइँ होइ
छै। व्यवस्था हाथी होइत अछि, हाथीकें खैंक नइँ गड़ै
छै, खैंक गड़बाक पीड़ा
मामूली जीवन जिबैत मामूली मनुष्ये टा बूझि सकैत अछि। सामान्य मनुष्यक
जीवन-व्यवस्थामे छोट-छोट उल्लास-अवसाद, स्नेह-द्वेष, जय-पराजय, रंग-उमंग, मनोरथ-हताशा बहुत पैघ-पैघ अर्थ रखैत
अछि। साधारण जनजीवन’क अइ फूक सन उल्लास, आ खैंक सन पीड़ा’क संज्ञान प्रकृतिवादहिसँ सम्भव अछि।
क्षीणकाय भौतिक सामथ्र्य, मुदा उग्र
मनोत्तेजनाक सामान्य मनुष्य’क अइ वृत्तिकें
प्रकृतिवादी लेखक ग’रसँ देखैत आएल छथि। ओ
अनुभव करैत रहल छथि जे प्रकृति एवं अन्य बाह्य शक्ति मानवीय स्वाधीनता लेल बाधक
होइत अछि; ई दुनू विधान मनुष्यक
संकल्प-शक्तिकें सीमित करैत अछि। जें कि मनुष्यमे एकर अतिक्रमण करैत अपन बाट
फरिछेबाक क्षमता नइँ होइत अछि; मनुष्यक विवेक सीमित
भ’ जाइत अछि, आ
समाजक प्रति ओकर नैतिक दायित्व कम होइत जाइत अछि।
प्रकृतिवाद मनुष्यक आचरणकें ‘काम’
आ
‘भूख’क आदिम वृत्तिसँ
संचालित मानैत अछि। तें भरिसक ओ लोकनि मानव-स्वभावक चित्रणमे पशु-प्रतीकसँ कोनो
परहेज नइँ करै छथि।
प्रसिद्ध अमेरिकी चिन्तक जाॅर्ज वाॅल्टन
लुकाच (सन् 1944)क सहमति अइ तथ्यसँ
अनर्गल नइँ अछि, जे प्रकृतिवादी
रचनाकार समाजकें एकटा सुसंगत एकाइ मानै छथि। तें ओ समाजक आवयविक एकताकें खण्डित
करै बला समस्त प्रसंग’क विरोध करै छथि। जखन
कि यथार्थवादी दृष्टि समाजक असंगति मात्र पर ध्यान दैत अछि।
जोला कहै छथि जे यथार्थवादी रचनाकार अपन
पात्रकें प्रयासपूर्वक पैघ आ महान बनेबाक आग्रह रखै छथि, प्रकृतिवादी रचनाकार से किन्नहुँ नइँ
करताह, ओ मामूली मनुष्यक
मामूली जीवन’क चित्रणकें अपन
लक्ष्य मानै छथि।
इंगलैण्ड’क
पुनरुत्थान काल’क सर्वाधिक
प्रतिष्ठित कवि, नाटककार आ
साहित्य-चिन्तक जाॅन ड्राइडेन (सन् 1631-1700)
नाटक
पर अपन मन्तव्य दैत कहलनि जे ओ मानव-प्रकृति’क यथातथ्य जीवन्त
प्रतिबिम्ब होइत अछि। नाटक लेल कहल गेल ई बात,
साहित्य’क स’ब विधा’क श्रेष्ठ रचना पर लागू होइत अछि। ध्यान
देबाक थिक जे अइ पंक्तिमे प्रयुक्त चारि गोट पद--‘मानव-प्रकृति’, ‘यथातथ्य’, ‘जीवन्त’, ‘प्रतिबिम्ब’--अत्यन्त मूल्य-बोधित (Value Loaded) अछि। अइमे सँ एकहु उपक्रम’क दुर्बलतासँ रचना सार्थक नइँ भ’ सकैत अछि। अइमे ओहन मानव-प्रकृति’क गप नइँ भेल अछि, जेहन ओ रचनाकारकें देखाइ छै; मानव-प्रकृति’क यथातथ्य, आ जीवन्त प्रतिबिम्ब’क गप भेल अछि।
***
मैथिली-प्रेमी लोकनि लेल गौरव’क बात थिक जे राजकमल चौधरी दुनियाँ भरिक
अइ समस्त उर्ध्वमुखी साहित्यिक गतिविधिसँ गहनतासँ परिचित छलाह; आ अपन रचना-कर्मसँ मैथिली साहित्यकें
विश्व-साहित्यसँ कान्ही-मिलान’क गुणवत्ता द’ रहल छलाह।
अइ समस्त कसौटी पर ‘ललका पाग’ कथा’क परीक्षणसँ विलक्षण बात सभ सोझाँ अबैत
अछि। कथा-वस्तुमे कमलपुरक स्वर्गीय पण्डित टेकनाथ झा’क परम निश्छल पुत्री त्रिपुराक विवाह
शुभ लग्नमे चण्डीपुरक रामसागर चौधरीक पुत्र डाक्टरी-विद्या पढ़ैत राधाकान्तसँ
सम्पन्न होइत अछि। सासुर आबि, त्रिपुरा आँगनक
पछुआरमे बाड़ी, आ बाड़ीक पछुआरमे
पोखरि देखि बड़ प्रसन्न होइ छथि। ढरल रातिमे हो-हल्ला शान्त भेलाक बाद तिरू अपन
सासुसँ पोखरिमे हेलबाक हुनकर अवगति पर एकटा निर्मल सन प्रश्न करै छथि। भोरे-भोर
सगरो गाम अनघोल मचि जाइत अछि जे राधा चौधरीक स्त्री दू-तीन बजे रातिमे बुढ़बन
पोखरिमे नंगटे नहाइ छलीह। राधाकान्त तिरूसँ रुष्ट होइ छथि। अपन सतमाइक भतीजीसँ
दोसर विवाह करबा लेल तैयार होइ छथि। विवाह’क इन्तजाम चलि रहल
अछि। अपन पति’क दोसर विवाह’क इन्तजाममे तिरू सेहो सक्रिय छथि। अही
अवसर पर रहस्योद्घाटन होइत अछि, जे ब’र लेल ललका पाग चाही। आब एहेन घड़ीमे पाग
कतएसँ आबए? खबासिन आबि कए
राधाकान्तकें समाद दै छनि जे तिरू हुनका बजा रहल छनि। ओ तिरू’क कोठलीमे जाइ छथि। तिरू अपन बक्सासँ
अपन विवाहक ललका पाग निकालि क’ राधाकान्तकें दै छनि।
हुनका स्मरण अबै छनि जे इएह पाग पहिरि कए ओ तिरूसँ विवाह करए कमलपुर गेल छलाह। ओ
सोचए लगै छथि, कानए लगै छथि, हतप्रभ आ हतवाक् भ’ जाइ छथि।
कथा त’ एतबे
अछि। ग’र सए देखला पर अइ
कथावस्तुमे त’ एहेन कोनो बात नइँ
अछि, जे किनको लेल
विचारणीय होअए! तखन लोक, कथा किऐ
पढ़ए!...राजकमल चौधरी’क कथा-लेखन’क विलक्षणता एतहि बुझबाक थिक। सामान्य
आँखिएँ लोककें जतए किछु नइँ देखाइ छै, राजकमल’क कथन-भंगिमा ओतहु सब बात स्पष्ट देखा
देत, जेना ओइ प्रसंगकें
ओरिया क’ कोनो सूक्ष्मदर्शीक
अवलोकन-पटल पर राखि देल गेल हो, आ दृश्य-ताल समायोजित
क’ देल गेल हो। एक-एक रेशा स्पष्टतः
परिलक्षित। कथामे अइ विलक्षणता’क समावेश बुनावट’क कारणें होइत अछि। घटनाक्रम’क शृंखलाबद्ध प्रगति आ सृजित पात्र’क चारित्रिक विकास’क कारणें होइत अछि।
ध्यातव्य थिक जे राजकमल चौधरीक पीढ़ीसँ
पहिनेक मैथिली कथामे, बल्कि आनहुँ भारतीय
भाषा’क कथा-साहित्यमे निरन्तर
कथाकार बजै छलाह, कथावाचक बजै छलाह।
बाद’क समयमे स्थितिमे
परिवर्तन आबि गेल। कथा स्वयं बाजए लागल, कथा’क एक-एक पात्र, पात्रा’क
आचरण आ घटना-प्रसंग बाजए लागल। पहिनेक कथामे विवरण’क
प्रयोजन कथामे माँसलता अनबा लेल होइ छल, बाद’क कथामे विवरण, कथाकें सार्थकता देब’ लेल होअए लागल। कथा’क एक-एक शब्द, यति,
विराम, ध्वनि-संकेत...ओइ कथाक अनिवार्य अंग
होअए लागल। (ललका पाग) आलोच्य कथाक पाठ-विश्लेषण करैत स्पष्ट होइत अछि, जे कथाकार पहिले अवतरणमे मैथिल स्त्री’क गार्हस्थ जीवन’क समस्त दैनिक आचरण’क सूक्ष्मतर विवरण दै छथि आ पहिले
पंक्तिमे कहै छथि--‘‘मैथिल स्त्रीकें
चिन्हबामे कोनो भ्रम नइँ भ’ सकैत अछि।’’ तदुपरान्त मैथिल स्त्री’क पहिचान’क
परिचय-सूत्रक संकेत देल गेल अछि। उल्लिखित समस्त पहिचान ओहि कोटिक मैथिल स्त्री’क थिक, जे
अपन समस्त परम्परा-रक्षण वृत्ति’क संग घ’र-परिवार सम्हारै छथि, श्रम करै छथि, सामाजिक रूढ़िक पालन करै छथि, सखी-बहिनपासँ प्रेम करै छथि, प्रकृति आ मानवीयतासँ अनुराग रखै छथि, आचार-विचार’क पोषण करै छथि...। फेर दोसर अवतरण’क
मात्र एक पाँतीमे कहै छथि--‘‘त्रिपुरा वा त्रिपुर
वा तिरू एही वर्ग’क मैथिल कन्या छलीह।’’ अर्थात्, अपन
पात्र’क सृजन-कालहिमे
राजकमल चौधरी प्रकृतवाद’क समस्त सावधानी अपना
लेलनि। तें मध्य कथामे जाकए हुनका तिरू’क कोनो आचरणमे बलजोरी
नइँ करए पड़लनि। अइ विवरणमे एक अर्थें अहू बात’क घोषणा अछि, जे सुच्चा मैथिल स्त्री’क आचरण इएह थिक, चननपुरवाली, अर्थात् रामसागर चौधरीक द्वितीया, अर्थात् राधाकान्त’क सतमाइ, आ
तिरूक सतौत सासु, एक जोड़ी मैथिल
युवक-युवती’क जीवनकें सुड्डाह
करैवाली दुष्ट स्त्रीक आचरण, मैथिल स्त्री’क आचरण कदापि नइँ भ’ सकैत अछि।
एतए समग्रताक जगह खण्ड-खण्ड
जीवन-यथार्थकें देखबाक रोमांचक पद्धति कथाकार अपनौने छथि। प्रस्तावना जकाँ सबसँ
पहिने मैथिल स्त्री’क पारिभाषिक वक्तव्य
दैत तिरू’कें सोझाँ अनलनि आ
पहिले उठानक मात्र चारि वाक्यसँ तिरू’क अतीत-वर्तमान’क अथाह कुण्ड; कोसिकन्हा क्षेत्र’क अनन्त आपदा, जीवन-रक्षा लेल पलायित झिंगुरनाथ’क असीम अवसाद कें जीवन्त, आ उग्राभिमुख क’ देलनि। त्रिपुरा एखन अपन ‘‘पण्डित पिताक, गायक खुरहुसँ पैघ आ चाकर महा-ब्राह्मणी
शिखासँ खेलएबाक योग्यो नइँ भेल छलीह कि विष्णुलोकसँ पुराण बाँचबाक निमन्त्रण पाबि
चल गेला। तखन रहि गेलीह तिरू’क अबला माइ, तिरू’क
अग्रज झिंगुरनाथ आ तिरू आ कौसिकीक बाढ़ि, मलेरियाक प्रकोप, पड़ोसियाक उपराग आ की-की नइँ।
किछुए वर्षमे पेटमे पिल्ही, देहमे घाव-फोसरी, आँखिमे सेर-दू सेर काँची नेने, फाटल-चीटल फराकमे नेटा-पोटा पोछैत, खरिहाने-खरिहान, गाछिए-गाछी बउआइवाली तिरू, बाँसक नबका कोपर सन कोमल, कविश्रेष्ठ बाणभट्टक श्यामांगी नायिका भ’ गेलीह।
बापक गोलोकवासी हेबाक ठीक एगारह वा दस
वर्षक उपरान्त जखन झिंगुरनाथ झा गाम घुरलाह,
तँ
मुनहारि साँझ भ’ गेल छलैक।’’
पितृहीन भेलाक बाद’क दस-एगारह बर्खक अवधिमे तिरू कोना
नेनपनसँ किशोरावस्थामे आबि गेलीह? प्राण-रक्षा’क अनिवार्य संसाधन’क ओरिआओन लेल तिरू’क माइ जीवन-ज्वालाक कोन-कोन परिताप
भोगलनि? रने-बने बौआइत
झिंगुरनाथ कोन-कोन घाट’क पानि पीलनि?...समस्त अवसाद आ करुणाकें कथाकार उक्त
चारिए टा वाक्यमे जाहि तरहें पोछि-पाछि कए रखलनि अछि, से चकित करैत अछि। काव्यमय भाषा आ
सूक्ष्म चित्रात्मकताक कारणें ई विवरण एगारह बर्ख’क
ओइ अझेल जीवन-दशाकें निके-ना जीवन्त करैत देखाइत अछि। समस्त साहित्य-अध्येता अइ
बातसँ आश्वस्ति रखै छथि जे काव्यमयता आ चित्रात्मकता राजकमल चौधरी’क गद्यक विशिष्ट पहचान थिक। अपन अही
कौशलमे व्यंग्यात्मक रूपक भरैत ओ वर्णित प्रसंगकें जीवन्त आ प्रभावी करै छथि। उल्लिखित
उद्धरणकें अखियासि कए पढ़ी, त’ अबिचंक लगबैबला पेण्ंिटग देखबाक बोध
हएत। पण्डित टेकनाथ झा’क गत भेलाक बाद एगारह
बर्ख धरि हुनकर विधवा’क की हाल भेल, झिंगुरनाथ कोना-कतए-की करैत रहलाह, तिरू’क
माइ दुनू माइ-धी’क प्राण-प्रतिष्ठा आ
मान-मर्याादा’क रक्षामे की-की भोगलनि; पिल्ही, घा-घोस, काँची-पिच्ची, नेटा-पोटाक दुस्सह जुगुप्साकें पार करैत
तिरू नबका कोपर सन श्यामांगी नायिका कोना भ’
गेलीह, अइ बीच तिरू’क विवाह’क
प्रसंग कोन उद्योगें मुख्य भ’ गेल--कोनो बात’क विस्तारमे कथाकार नइँ गेल छथि। मुदा
अइ एगारह बर्ख’क सम्पूर्ण दारुण
परिस्थिति सहजहि सोझाँ उपस्थित देखाइत अछि। घनघोर अभाव आ अनाहूत व्याधिक अछैत
वयःसन्धिक सनेस कोन तरहें कोनो तरुणीकें रूप-लावण्यसँ भरि दैत अछि; तकर सन्तुलित आ मर्यादित विवरण अइ
उद्धरण’क इतर किछु नइँ भ’ सकैत अछि।
एतए विचारणीय थिक, जे ई विवरण किऐ? कथा’क मूल भाव त’ तिरू’क
वैवाहिक जीवन’क परिताप थिक! तखन अइ
विवरण’क की प्रयोजन? प्रयोजन अछि! तिरू’क चारित्रिक सुदृढ़ता आ शील-संस्कार’क आभाकें ई विवरण पुष्ट करैत अछि।
आनुवंशिक तेजस्विता, लालन-पालन’क पद्धति, अभावहुमे
मान-मर्यादा’क संग जीवन-संघर्ष
करबाक कौशल, लक्षित उद्देश्य दिश
नेत-नियम-नैतिकतासँ बढ़बाक साहस, विवेक-रक्षा हेतु
एकाग्र रहबाक तल्लीनता...तिरू’मे जाहि तरहें भरल छल, तकर सम्पूर्ण संकेत अही विवरणमे अछि।
पैघ अन्तराल’क अति संक्षिप्त ई
कैप्सूल उज्ज्वल चरित्र’क स्त्री-पात्र तिरू’कें अगाध शक्ति आ शौर्य दैत अछि। आगू’क कथा-प्रसंग तिरू’क जीवनमे जे-जे विडम्बना अनैत अछि, तकर निमेरा तिरू अपन अही शक्ति आ
संस्कार’क सहयोगसँ करैत अछि।
आगू’क प्रसंगमे तिरू’क चरित्र-चित्रण करैत कथाकार कहै छथि--‘‘राधाकें रहनि क्रोध, तिरूकें रहनि अभिमान। तें ई मनोमालिन्य
बढ़िते गेल।...तिरू बड्ड सोझ छलीह। स्वभावसँ लजकोटरि, आ
चंचल सेहो। चुप्पे रहि सभ किछु सहैत रह’वाली। तिरू भोरे उठि
स्वामी आ ससुरक हेतु चाह बनाबथि, फेर भानस-भात करथि, फेर पूजा-गृह नीपथि-पोतथि, सासुक पैर जाँतथि आर फेर भनसा घर वा
कतहु, कोनो कोनमे कनैत, छटपटाइत सूति रहथि। इएह थिक मैथिल स्त्रीक
जीवन।’’ कथामे तिरू’क प्रवेश करबितहि जँ उक्त विवरण नइँ आबि
गेल रहितए, त’ आगू जाकए कथाकारकें अपनहि द्वारा सृजित
पात्र’क आचरणमे बलधकेली कर’ पड़तनि। एतए तिरू’क जाहि सहनशीलता आ स्वाभिमान’क उल्लेख भेल अछि, से ओही मर्यादित लालन-पालन आ
विवेक-सम्मत शील-संस्कारक परिणति थिक। उल्लिखित प्रारम्भिक विवरण कथाकें विस्तार
देबाक कोनो अवांछित बहाना नइँ, बल्कि सृजित पात्र’क चारित्रिक वैशिष्ट्यकें सम्पुष्ट
करबाक दूरन्देशी आ रचनात्मक कौशल थिक। कथा’क विकास’क अगिला चरणमे जखन तिरू’क ससुर, वृद्ध
जमीन्दार, रामसागर चौधरी समस्त
सम्पति बेटाक नामे सौंपि हरिद्वार-वास हेतु जाए लगलाह त’ तिरू लेहाज त्यागि अपन ससुरसँ
पहिले-पहिल निवेदन केलनि--‘‘हमरो हरिद्वार नेने
चलू। अहँक सेवा करैत प्राण देब। हमरा आओर किछु नइँ चाही। एत’ नइँ रहब...।’’ अइ निवेदन पर जखन ससुर हँसैत कहलकनि--‘‘कनियाँ, अहाँक
स्थान इएह आँगन थिक। अहाँक चचरीए एहि ठाम सँ बहरेबाक चाही, जीवित देह नइँ।’’ त’
‘‘बताहि
जकाँ चिचिआइत तिरू भनसा घर दिश भागि एलीह आ धरती पर बिहारिमे उखड़ल गाछ जकाँ खसि
पड़लीह, मरैत गाय जकाँ
अहुरिया कटैत, पानिसँ बहराएल माछ
जकाँ छटपट करैत।’’
तिरू’क
इहो चर्या कथाक ओइ प्ररम्भिक विवरणक सहज विकास थिक। जाहि अभाव आ शील-शिक्षा’क अनुशासनमे हुनकर भरण-पोषण भेल छलनि, सएह हुनकर धैर्य आ बुद्धिमत्ता’क कारण छलनि। निरन्तर चुप रहैत, स’ब किछु सहैत, तिरू जनै छलीह, जे हुनकर सम्पूर्ण अधोगतिक मूल कारण
थिकीह हुनकर सासु। उद्यमपूर्वक हुनका परित्यक्ता बनेनिहारि स्त्री’क संग हुनकर जीवन निर्वाह कोना हेतनि!
तैं तिरू अपन ससुर’क संग हरिद्वार जाए
चाहै छलीह।
रचना’क
शीर्षक देबाक राजकमल चौधरी’क कौशल अत्यधिक
सन्दर्भित रहैत अछि। ‘ललका पाग’ अइ कथा’क
केन्द्र थिक। अही संस्कृतिपरक रूपकसँ अइ कथामे विशिष्टता आएल अछि। मिथिलामे पाग
मर्यादा’क प्रतीक मानल जाइत
अछि। ललका पाग’क उपयोग भने वैवाहिक
प्रयोजनमे होइत हो, मुदा सम्मानित आ
पारम्परिक विचार’क मैथिल ब्राह्मण आ
मैथिल कायस्थ ओहुना पाग पहिरै छथि। ‘पाग खसब’ अथवा ‘पाग
ऊँच हएब’ सन मोहाबरामे पाग’क अर्थगर्भिता देखल जा सकैत अछि। सत्य
थिक जे पाग सम्पूर्ण मिथिलाक सभ जातिक मान-मर्यादाक प्रतिनिधित्व नइँ करैत अछि; मुदा इहो सत्य थिक जे अइ शब्द’क मोहाबरा पर सब जातिक अधिकार अछि।
लोक-व्यवहारमे अएलाक बाद ई शब्द अपन जातीय पहचान बिसरि कए सार्वजनिक अर्थ ग्रहण क’ लैत अछि। जाति-पाँजिक व्यवस्थामे राजकमल
चौधरी’क कहियो कोनो रुचि
नइँ रहलनि; मुदा जें कि अइ कथा’क माध्यमे हुनका समकलीन मिथिलाक
ब्राह्मण-समुदायक कुरीति, सामन्ती-मनोवृत्तिक
भग्नावशेष, ओछ कामना’क पूर्ति हेतु दानवता’क शिखर चढ़ैत आचरण पर चोट करबाक छलनि; स्त्रिायहि द्वारा परिवार’क आन स्त्री पर होइत अत्याचारकें उजागर
करबाक छलनि; तें सम्भवतः राजकमल चौधरी
अइ सांस्कृतिक रूपक’क उपयोग केलनि अछि।
जातिगत कुत्सित आचरणकें बेपर्द करबाक उद्यम एतए स्पष्ट देखइत अछि।
मिथिलामे बहुविवाह’क खिस्सा-पिहानी सुनल जाइत रहल अछि।
गरीबीक कारणें कतोक असमर्थ पिता उच्चकुलोद्भवताक दोहाइ दैत अपन काँच-कुमारिकें
अधेर जमीन्दारसँ बियाहि दै छलाह; आ शुष्कहिमे जमीन्दार
साहेब’क सरोकारी भ’ जाइ छलाह। एम्हर मोनसँ क्षुद्र, पौरुषसँ अशक्य, आडम्बरसँ परिपूर्ण जमीन्दार साहेब
अकाल-दुष्कालमे दुनियाँ छोड़ि दै छलाह। रहि जाइ छलीह दैहिक परिताप भोगैत हुनकर
विधवा--कटाहि सौतिनसँ दतकथा करैत, बहसल सतौत’क कुदृष्टि सहैत, शेष जीवन’क
गणना करैत।...राजकमल चौधरी’क कतोक मैथिली रचनामे
अइ प्रसंग’क वीभत्स चित्र अंकित
अछि। मुदा कतोक बेर एकर विपरीत सेहो होइ छल,
जकर
दुष्परिणाम अइ ‘ललका पाग’ कथामे उजागर भेल अछि। बहुपठित आ बहुज्ञ
हेबाक कारणें मैथिल जनपद’क समस्त
रीति-कुरीतिसँ राजकमल परिचित छलाह। जाति-पाँजिक मैथिल दुर्वृत्तिक गहन जानकारी
छलनि। मैथिल-मानस’क छद्म-पाखण्डकें
सूक्ष्मतासँ जनै छलाह। मैथिल-समाजक समस्त चक्रचालि’क
सूचना छलनि। ‘आदिकथा’ उपन्यास आ ‘ललका पाग’, ‘सहस्रमेनका’, ‘कादम्बरी उपकथा’, ‘एकटा चम्पाकली एकटा विषधर’ कथा अइ सन्दर्भमे अवलोकनीय थिक। बीसम
शताब्दी’क पाँचम दशक
बितैत-बितैत (‘ललका पाग’ क सृजनकाल) मिथिलामे सामन्ती आचरण
अशोथकित भ’ गेल छल, मुदा दुर्वृत्तिक शेषांश तैयो हथोरिया
मारि रहल छल। चननपुरबाली ओही दुर्वृत्तिक उदारण छथि। जाहि घर’क जमीन्दारिन कहबै छथि, ओही घर’क
सर्वनाश कर’मे ओ लिप्त देखाइ
छथि।
सांस्कृतिक रूपक, आ व्यंग्य-विधान’क घातक प्रहार राजकमल चौधरीक गद्य’क मूल स्वभाव थिक। जाहि सांस्कारिक
ध्वनिक कारणें अइ कथा’क शीर्षक ‘ललका पाग’ राखल
गेल, से थिक
मैथिल-ब्राह्मण समाजमे पाग’क मर्यादा। आ, स्पष्ट देखाइत अछि, जे ओइ मर्यादा’क मर्दनमे किओ कोनो कलछपन नइँ केलनि; वृद्ध जमीन्दार रामसागर चौधरी तँ मैदाने
छोड़ि पड़ा गेलाह; शेष लोकनि अपन बुत्ता
भरि उदारतापूर्वक अइ मान-मर्दनमे योगदान देलनि। षड्यन्त्र’क जननी चननपुरबाली, अर्थात् राधाकान्त’क सतमाइ, डाक्टरी-विद्या’क अध्येता आ तिरू’क ब’र राधाकान्त, भोला मास्टर, चननपुरबालीक भाइ डाक्टर शम्भू बाबू, शम्भू बाबूक पत्नी, राधाकान्तक समस्त मित्र-मण्डली... स’ब किओ अइ पाग’क मर्यादाकें मटियामेट कर’मे लीन छथि। ध्यातव्य थिक जे ई स’ब किओ पागे टा नइँ, अपन पदेन गरिमा धरिसँ परांग्मुख छथि।
चननपुरबालीक मातृत्व सुखा गेलनि; राधाकान्त, हुनकर नवतुरिया मित्र, आ शम्भू बाबूक डाक्टरी-विद्या घोसरि
गेलनि, भोला मास्टर’क शिक्षण-धर्म बिला गेलनि, शम्भू बाबूक पत्नी अपन बेटीकें
सौतिया-डाह’क छाहरि देबा लेल
बित्र्त भ’ गेलीह...जाहि पदेन
सरोकारसँ समाज मानवीय बनैत अछि, तकर उपयोग ई लोकनि
पाग’क मर्यादा ध्वस्त
करबामे, सांस्कृतिक पहिचान’क संग खेलौड़ करबामे केलनि। जाहि पाग’क महिमा बखानैत हिनका लोकनिक मुँह नइँ
दुखाइ छनि, तकर अर्थवत्ता समाप्त
करैत हिनका लोकनिकें कोनो संकोच नइँ भेलनि। कोनो हिंस्र वृत्तिक अधीन ई लोकनि
मानव-मूल्यक हत्यामे लीन रहलाह आ एसकर तिरू एत्ते रास नरहन्ता’क आघात सहैत रहलीह।
तिरू लेल राधाकान्तक आकलन छलनि जे ओ ‘‘महींस जकाँ परिश्रम क’ सकैत छथि। रात-दिन बरतन-बासन माँजि सकैत
छथि। मोटरीक मोटरी नूआ साफ क’ सकैत छथि आ कनेको मुख
मलीन नहि करतीह। आकाशमे चान उगल कि नइँ, गाछीमे कोइली कुहकल
कि नइँ, मौलसिरि आ भालसरि
फुलाएल कि नइँ, मोनमे विद्यापतिक
कोनो गीत बिहारि बनि हहाएल कि नइँ--तहिसँ कोनो मतलब नइँ, कोनो आकर्षण नइँ। राधा मोने मोन निश्चय
क’ लेलक जे कोनो महींससँ प्रेम नइँ कएल जा
सकैत अछि।’’
पति,
सासु, आ सगरो समाज’क मोनमे तिरू लेल एहेन निरीह आ अभद्र
छवि अंकित हेबाक एकमात्र कारण थिक तिरू’क सहनशीलता। जें कि ओ
एते दूर धरि स’ब किछु सहैत रहलीह; ओइ अपराध लेल दण्डित आ लांछित होइत
रहलीह, जे ओ कहिओ नइँ केलनि; तें हुनकर ई छवि निर्मित भ’ गेल। मुदा सहनशीलताक फेरमे तिरू’क चरित्रकें कथा’क रचना-कौशल दुर्बल नइँ होअए देलक अछि।
तिरू’क कोठरीसँ बहरेलाक
पश्चात् ‘‘पूरे एक वर्ष धरि
राधा, तिरू’क कोठरीमे नइँ गेल; बारहो मास बीत गेल। साओनक झुलुआ टूटि
गेल। भादवक अन्हरिया राति, बरखाक झटका समाप्त
भेल। अगहनक सिहकी देहकें जरबैत रहल। पूसक जाड़ प्राणक भार बनि गेल। फागुनक भाँग
पीने भेर भेल वायु आ फगुआक गीत...तिरू कनैत रहलीह...चननपुरवालीक विजय भेलनि।’’ सतमाइ’क
प्रेरणासँ ओही तिरू’क कोठरीमे जाकए एक
राति राधाकान्त पुछलखिन्ह--‘‘हम दोसर बिआह क’ रहल छी।...की कहैत छी? अहाँकें दुःख तँ नइँ हएत?’’ त’
स्थिर
दृष्टिएँ राधा दिश तकैत तिरू बजलीह--‘‘नीके होएत। अहाँक
कुलमे तँ दू बिआह लिखले अछि। हमरा किएक दुःख होएत?’’ ई
जवाब फेरसँ बहुत पैघ विमर्श ठाढ़ करैत अछि। तिरू’क
ई वक्तव्य राधाकान्त’क वंश परम्पराक दारुण
विडम्बना दिश इशारा करैत अछि। ई उतारा देखबामे जतेक सहज लगैत हो, मुदा एकर प्रभावान्विति बहुत विराट अछि।
गरज ई, जे दोसर विवाहक फेरमे
जाहि तरहें अपन सम्पूर्ण अस्मिता बिसरा कए अहाँक जमीन्दार पिता बकरी जकाँ मेमिआइत
रहलाह, अहूँकें तहिना
मेमिआएब लिखल अछि। अर्थात् अहाँ सन कापुरुषकें पत्नी नइँ, कोनो शासिका चाही। मुदा हीनमति राधाकान्त तिरू’क
ओइ छोट सन उतारा’क ध्वन्यार्थ नइँ
निकालि सकल।
तिरू’क
चरित्रकें उज्ज्वलताक शिखर धरि ल’ जेबाक विधान कथाकारक
विलक्षण रचना-कौशलक साक्षी थिक। धैर्यवती आ धीरमति तिरू डेग-डेग पर बौद्धिक
कुशाग्रताक परिचय देने छथि। राधाकान्तक दोसर विवाह’क
प्रस्ताव सुनि तिरू आहत अवश्य भेलीह; मुदा पराजित नइँ
भेलीह। नियति, प्रकृति, आ विपरीत वातावरण’क समस्त प्रहारकें सहैत रहलीह; निरस्त्रा अभिमन्यु जकाँ जीवन’क महाभारत लड़ैत, चारू भर पसरल दानवीयताकें नष्ट करबाक
उद्योग करैत रहलीह। यद्यपि ‘‘कमलपुरक तिरू मरि
चुकल छलीह। गाममे बाड़ी-झाड़ी घुमैत रहैवाली,
दोसरक
खेतसँ साग आ परोड़ तोड़ैवाली तिरू मरि चुकल छलीह। आ जन्म ल’ रहल छलीह एकटा नव तिरू। छौंड़ी नइँ पूर्ण
स्त्री। मैथिल स्त्री, जे जीवन भरि सहैत
रहैत अछि, बजैत अछि किछु नइँ, किछुओ नइँ।’’ मुदा ओही तिरूकें दैत्याचारिणी सासु जखन
‘हड़ाशंखिनी’ कहलकनि, त’ ओ उग्र भ’ उठली, आ सासु लग सटैत बजलीह--‘‘अहाँ हमर सासु छी। तें किछु नइँ कहैत
छी। नहि तँ...।’’ आ सासु ड’रें कँपैत पड़ेलीह।
मान-मर्यादा, नेत-नियम, धर्म-नैतिकता, तर्क-निष्ठा...सबहक पाग खसबैत अइ कथा’क नागरिक जाहि अमानुषिकता’क अभिकर्ता बनल अछि, हुनकर समस्त आचरण तिरू’क चारित्रिक शौर्य’क ठठरी पर ठाढ़ अछि। एते रास दानवीय
शक्तिसँ संघर्ष करैत एसगर तिरू अन्तमे आबि पाग’क मर्यादा स्थापित
करै छथि। चमत्कृत ढंगसँ मानव-मूल्यक स्थापना करैत कथा’क अन्त होइत अछि। मोनमे विराट
प्रश्नाकुलता उघैत भावक लोकनि व्यग्र होइ छथि। भावककें चमत्कारिकताक बोध जतेक भ’ जाए,
मुदा
सद्परिणाम’क संग मानव-मूल्यक
स्थापना करैत कथा’क अन्त हैब, कथाकार सामाजिक सरोकार’क संकेत थिक, जाहिमे ई स्पष्ट होइत अछि जे समस्त
प्रतिकूलता’क अछैत, मनुष्यकें मानवीय विवेक-रक्षण’क प्रेरणा देब, समकालीन साहित्यक नैतिक दायित्व हेबाक
चाही।
तथ्य थिक जे स्वातन्त्र्योत्तरकालीन
मिथिलाक प्रारम्भिक दू दशक राजकमल चौधरी’क सक्रियताक चरम समय
छल। आचार आ अनुशासन’क ओटमे मैथिल नौजवान’क रीढ़-विहीन प्रवृत्ति हुनका अनसोहाँत
लगै छलनि। मनसा-वाचा-कर्मना ओइ आचार-पालन पर ओ बेसी काल खैंझाएले रहैत छलाह। एक
ठाम ओ स्पष्ट लिखने छथि--‘‘हमरा परिवारक
ब्राह्मण संस्कारमे दीक्षित करबा लेल पिताजी लग कुल तीन गोट पद्धति छलनि--आज्ञा, उपदेश, मारिपीट।
हमर पिताजीकें ओ आज्ञाकारी(मूर्ख) छौंड़ा सर्वाधिक प्रिय छलै, जे अपन पिताजीक कारण जहाजक डेक पर पाथर’क मुरूत जकाँ अचल ठाढ़ रहल, आ आगि लगला पर जड़ि-पजड़ि कए छाउर भ’ गेल। हम ओइ छौंड़ासँ...मुक्त होअ’ चाहै छी (स्थान-काल-पात्र/युसुत्सा, अगस्त, 1967)।’’
पारम्परिक दृष्टिएँ आज्ञाकारिता
मानव-सभ्यता’क नीक गुण मानल जाइत
अछि; कोनो बेजाए नइँ; मानल जाए; मुदा
अन्ध-आज्ञाकारिता कोनो तरहें प्रशंसित नइँ भ’
सकैत
अछि। विवेकहीन आ तर्क-निरपेक्ष आज्ञाकारिता सब अर्थें दुर्वृत्ति आ सहज नागरिक
जीवन लेल घातक थिक। एहने आज्ञाकारिताक ओटमे असंख्य विकृति पोनकैत अछि। अइ बात’क वस्तुनिष्ठतासँ राजकमल चौधरी निके-ना
परिचित छलाह। ओ रूढ़ि-विरोधी छलाह, परम्परा-विरोधी नइँ।
रूढ़ि जड़ होइत अछि, परम्परा गतिशील।
थिरता अथवा जड़ता, परम्पराक स्वभाव नइँ
होइत अछि। ओकर सन्दर्भ आ पद्धति क्रमशः समय,
समाज
आ स्थिति विशेषक अनुकूल बदलैत रहैत अछि। राजकमल सदैव परम्पराक संशोधित स्वरूपमे
विश्वास रखलनि। रचना-सन्दर्भ’क विवरण, चरित्रांकन आ चित्रांकनमे ई भाव हुनका
ओतए सगरे देखाइत अछि।
व्यवस्थित समाज’क सभ्य निर्मितिमे हुनकर अगाध आस्था
छलनि। समकालीन समाज’क आचार-विचारमे ओ
स्पष्ट देखि रहल छलाह जे शील, संस्कार, लोकाचार, आज्ञा-पालन
आ अनुशासन’क नाम पर किशोरी आ
नवयुवती’क पवित्र एवं
निद्र्वन्द्व चरित्रकें सहज रूपें विकसित नइँ होअए देबाक विधिवत उद्योग चलि रहल
अछि। ओकरामे किछु न’व करबाक सदिच्छा आ
सम्भावना छै, मुदा तकरा नष्ट करबाक
व्यवस्थित पद्धति कायम अछि। अइ कृत्यमे परिवार’क पूर्ववर्ती पीढ़ीक स्त्रीगण
पुरुख समाजक क्रूर प्रतिनिधि जकाँ काज करैत अछि। क्रूरतामे ओ बेसी काल
पुरुख-वर्गकें पाछू छोड़ि दैत अछि। कसाइ जकाँ व्यवहार करैत अछि। राजकमल अपन समाजमे
ओहेन व्यवस्थाक कामना रखै छलाह, जे अइ किशोरी आ
नवयुवतीक सम्भावनाकें उजागर करए, ओकर न’व बोधकें विकसित हेबाक अवसर दिअए; ओकर उन्नत भाव’क दमन-मर्दन नइँ करए।
अनुशासन-प्रियताक ई पालो किशोर आ नवयुवक’क कान्ह पर सेहो राखल जाइ छल; मुदा जें कि पुरुख नवतुरिया स्थापित
रूढ़िकें सहजतासँ स्वीकारि लै छल, पुरना पीढ़ी ओकर उपयोग
अपना पक्षमे करै छल, आ बदलामे ओकरा मलकि क’ किछु एम्हर-ओम्हर करबा’क छूट सेहो दैत छल। किछु पुरुषवादी
वर्चस्व सेहो रहै छल। विवेकशून्य आ चिन्तनविहीन ओ पीढ़ी एतबहिमे प्रफुल्लित आ
गौरवान्वित रहै छल। रूढ़ि-खण्डन’क कोनो उद्वेग, किछु न’व
करबाक कोनो उत्साह हुनकामे नइँ देखाइ छल। भरल जवानीमे शिथिल वैचारिक शृंखला’क एहन नवतुरिआ लेल राजकमल चौधरी’क व्यंग्य-कटाक्ष आ निराश भाव’क अंकन श्रेष्ठ उदाहरण थिक।
उक्त भावें कथाकार ‘ललका पाग’ क
एक-एक पात्र’क चित्रण खोंइचा
छोड़ाकए केने छथि। ध्यान देबाक थिक जे ओ स्त्री-वर्ग’क न’व तूरकें कतहु स्खलित
नइँ होअए देने छथि। कामख्या, जे आधुनिक बोध’क नवयुवती छथि, सम्पूर्ण कथामे ओ भौतिक रूपें अनुपस्थित
छथि, मुदा सर्वत्र उपस्थित
छथि। चननपुरवालीक सम्पूर्ण व्यूह-रचना हुनकहि नाम’क
सहयोगसँ भेल अछि। मुदा अन्त-अन्त धरि कथासँ अनुपस्थित आ व्यूहसँ निरपेक्ष रखैत
कथाकार हुनकर चरित्रकें स्खलित हेबासँ बचा नेने छथि।
कथा’क समस्त
घटना-प्रसंगमे कथाकार इहो स्थापित केलनि अछि जे घटना’क नायक’क
दुर्बलता देखिए कए कोनो अमानवीय तत्त्व ओकरा समर्थन दैत अछि। अमानवीय तत्त्व’क अपन कोनो सुदृढ़ मान्यता नइँ होइत अछि।
जे भोला मास्टर भरि गाम’क जीवन आँट केने रहैत
अछि। अपन कुटिल-चालिसँ फूसि-फासि, भ्रामक समाचार भरि
गाम पसारने फिरैत अछि, राधाकान्त’क दोसर विवाहक प्रसंगकें परिणति धरि
अनबामे प्राणपनसँ जुटल रहैत अछि; ओएह भोला, राधाकान्तक मोन बदलला पर अचानक उनटा मोड़
ल’ लैत अछि। आ, शेष समस्त पात्र पतनुकान ल’ लैत अछि। समकालीन साहित्य अही पद्धतिएँ
समाज’क संचित चित्तवृत्तिक
वाहक, आ सांस्कारिक धरोहर’क परिशोधक होइत अछि।
कथा’क अन्त भेलाक बाद
प्रत्येक भावक राधाकान्तक मनोवृत्ति पर कुपित होइ छथि। ओ अइ प्रश्नसँ आक्रान्त रहै
छथि जे-- राधाकान्तक कानमे जखन ई बात पड़लनि जे हुनकर नवविवाहित पत्नी घ’र-पछुआरक पोखरिमे नंगटे नहाइ छलीह; त’
डाक्टरी-विद्या
सन श्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त करैत मिथिला’क ओइ नौजवान’क मोनमे ई प्रश्न किऐ नइँ अएलनि, जे ई बात सम्भव कोना भेल होएत? रातिए खन तिरू द्विरागमन कराकए आएल छथि।
अधरतिया धरि मुँहदेखौनक बीध-बाध चलल, तकर बाद हमरहि संगें
ओ कोबरमे सूतल रहलीह। फेर ओ पोखरिमे हेल’ लेल कखन चलि गेलीह? उच्च शिक्षार्जनमे रत एकटा मैथिल
युवककें एतबा तर्क-बुद्धि किऐ नइँ भेलनि?
चननपुरवसलीसँ तिरू’क एकटा छोट सन प्रश्न छलनि --‘‘माइ,
अहाँकें
पोखरिमे हेल’ अबैत अछि?’’ अइ मिसिया भरिक प्रश्नकें सन्तानसुलभ
जिज्ञासा, चंचलता अथवा जटिल
आचार-संहितासँ निरपेक्ष एकटा नव बाला’क उत्सुकता बूझि ओ
अण्ठा किऐ नइँ देलनि? प्रात होइत सगर गाम
अइ बातकें दावानल जकाँ धधकएबाक दुष्टता एकटा मातृ-स्थानीय स्त्री’क हृदयमे कोना जनमि सकल? एकटा अजोह मेमना’क घेंट उतारै लेल एते भयानक तरुआरि
उठएबाक नृशंसता चननपुरवालीसँ कोना कएल गेलनि।
डॉ. शम्भू, आ हुनकर पत्नी, अर्थात् कथामे सर्वत्र अनुपस्थित
नवयुवती कामाख्या’क बाप-माइ कोन
ज्ञानें अपन बेटी लेल दूती ब’रक षड्यन्त्रमे लिप्त
भेलथि? भोला मास्टर वृत्तिसँ
शिक्षक होइतहु भरि कथामे किऐक नीच आचरण करैत रहलाह? कथा’क अन्तमे भोला मास्टर राधाकान्तकें कहै
छनि--‘‘राधा भाइ, उठ’,
चिन्ता
जुनि कर’, पुरुषक माथक ललका पाग
तँ स्त्री होइत छैक। से तँ तोरा संगमे छ’हे। तखन तों किएक
कनैत छह...!’’ राधाकें ‘भाइ’
सम्बोधन
देनिहार भोला मास्टरकें कथाक प्रारम्भिक अंशमे तिरू लेल महापातकीय वचन बजै काल अइ
सरोकार आ अपन वृत्तिक गरिमा किऐ नइँ मोन रहलनि?
जँ
सत्ते कोनो स्त्री अपन पुरुख’क माथ’क ललका पाग होइत अछि, त’
सौंसे
कथामे सब मिलिकए किऐ राधा’क माथसँ ओ पाग उतारबा’क व्यूह रचैमे बेहाल रहथि?...असंख्य प्रश्न’क अम्बार लागि जाइछ। अइ समस्त रोष’क अछैत भावककें कतहु कथा’क सहजता आ घटना-प्रसंग’क विश्वसनीयता खण्डित आ सन्देहास्पद नइँ
लगै छनि।
‘ललका पाग’ कथा स्वातन्त्र्योत्तरकालीन प्रारम्भिक
दशक’क मिथिलाक सामान्य
जनजीवन’क चित्रपट थिक, जतए नागरिक जीवन’क सहज-वृत्ति सूक्ष्मता आ सहजतासँ अंकित
अछि। वस्तुतः ओ समय अइ तरहें जटिल भ’ गेल छल; जे रचनाकार लोकनि समकालीन संघर्षमय जीवन’क दर्शक बनि रहि गेल छल। अफसर, पुलिस, पत्रकार, नेता, शिक्षक, वणिक, पुरोहित...सब
किओ अपनहिमे लीन छल। स’ब किओ अप्पन कृत्यकें
महान आ सार्थक, तथा दोसरकें भ्रष्ट आ
निरर्थक साबित करैत प्रसन्न होइत छल। स्वयंकें समय’क
देवता आ युग-संचालक प्रमाणित करबाक उद्यममे लागल छल। अपन युक्ति आ उद्यमकें
श्रेष्ठतम बुझनिहार नागरिक, लोभ आ ईष्र्या’क आगिमे एते बेसी दग्ध छल, जे मान-मर्यादा, नीति-निष्ठा, तर्क-विवेक...सब किछु अपन अर्थ हेरा
चुकल छल। सांस्कृतिक संकेतक झालि टा बजाएब पर्याप्त मानैत छल; ओकर अनुरक्षणमे अपन समस्त भूमिकासँ
परांग्मुख छल। अपन क्षुद्र लिप्सा’क प्रतिपूर्ति हेतु
सुविधानुसार तर्क बनबैत छल। सम्बन्ध-मूल्य,
नीति-मूल्य, व्यवहार-मूल्य, समस्त मूल्यसँ निरपेक्ष समाज, मात्र अपन ध्येयक अनुकूल सिद्धान्त गढ़ैत
छल। रचनाकार अइ समस्त विडम्बनाक सोझाँ घटना-प्रसंग’क
प्रेक्षक टा भ’ सकै छल। समय, समाज-व्यवस्था, आ प्रकृति’क सोझाँ घटनाक चरित-नायक बेबस रहै छल।
आनुवंशिकता, शील, संस्कार, आ
अर्जित जीवन-दृष्टिक कारणें ओ अनैतिक भ’ नइँ सकै छल; आ अनैतिकता ओकरा बकसै लेल राजी नइँ छल।
प्रकृतवादी रचना अइ भयावह यथार्थकें सूक्ष्मतासँ, आ
सम्पूर्ण घनत्वक संग अंकित करबा लेल जे पद्धति अपनबै छल, तकर चरित-नायक कोनो अतिमानव नइँ भ’ सकै छल। ओइ विकराल परिस्थितिक नायक कोनो
दैवी-चमत्कारसँ फूक मारि कए समस्त जंजालकें समाप्त करैत आगू नइँ बढ़ि सकै छल; ओ अइ दुष्टाचरण’क खाधि-खन्दक, झाड़-झंखारकें कटैत-पंगैत, अपना लेल कोनो बाट निकालैत आगू बढ़ि सकै
छल। एहेन सामाजिक परिदृश्यमे कोनो महान नायक/नायिका’क
चमत्कारी चरित्र द्वारा अलौकिक लीला’क वर्णन असम्भव छल; ओहि परिवेशमे मामूली लोक’क खण्ड-खण्ड जिनगी टा दृष्टिगोचर छल।
जें कि स’ब समय’क साहित्य अन्ततः समकालीन समाज’क विवेचित-विश्लेषित क्रिया-कलाप’क चित्र होइत अछि; राजकमल चौधरी’क कथा समकालीन नागरिक-परिदृश्य’क अही विकृति, रुग्णता, आ
पराभवसँ भरल देखाइत अछि। कोनो समाज’क उत्थान’क लेल नवतुरियाकें उताहुल आ विवेकशील
देखब सहज सुबुद्धिक कामना होइत अछि। कारण, मध्यवर्ती पीढ़ी पुरान
मनःस्थितिक जड़ताकें नवतुरिए तोड़ैत अछि आ किशोर-वयकें नवतुरिए प्रेरणा दैत अछि। से
राजकमल चौधरी नइँ देखि रहल छलाह। फलस्वरूप हुनका सबसँ बेसी क्रोध समकालीन समाज’क पुरान आ न’ब पीढ़ीक पुरुष समुदाय पर उठै छलनि।
राजकमल चौधरी समेत ओहि कालक समस्त सचेत रचनाकार कोनो तुलसीदास’क रामराज्य’क प्रतिस्थापन’क अपेक्षा त’ नइँ करै छलाह, मुदा सहज मानवीय विवेक’क अपेक्षा कोनो अनर्गलो नइँ छलनि! तें
तामस जाइज छल, आ अइ तामसमे कोनो
लेखक सौंसे समाजकें कुकुर जकाँ लाठी’क हाथें खेहारियो नइँ
सकै छलाह। रचनात्मक कर्मसँ समाज-सुधारमे अपन पक्ष राखब, आ योगदान देब हुनकर धर्म छलनि। से ओ
केलनि। राजकमल’क समस्त कथा, कविता अथवा अन्य चिन्तनमे इएह क्रोध
विभिन्न तरहें व्यक्त भेल अछि।
‘ललका पाग’ कथा विकृत मानसिकता’क रक्तबीजी नागरिक-समुदाय, रीढ़विहीन नवयुवक’क कायरता,
पराजित आ प्रायश्चितपूर्ण मनोवृत्तिक वृद्ध,
ईर्ष्याक
आगिमे जड़ैत दुष्टवृत्तिक प्रौढ़ा आदिक कुत्सित कृत्यक त्रासद कथा थिक; जे सामान्य जनजीवन’क खण्ड-खण्ड जिनगी’क स्पष्ट चित्र सोझाँ अनैत अछि; साहित्यक सामान्य पाठककें प्रभावी ढंगसँ
अपन समाजोन्मुखी धारणामे जोड़बाक प्रयास करैत अछि। प्रदूषित समाजक नागरिक-परिदृश्यक
परिशोधनक धारणासँ रचित राजकमल चौधरी’क साहित्यकें अही
अर्थमे एकटा रेचक जकाँ पढ़ल जेबाक चाही, आ तदनुसार ओकर
मूल्यांकन हेबाक चाही। ओना पाठ विश्लेषण’क आधार पर एखनहुँ अइ
कथामे बहुत किछु रहि गेल अछि, जकर विवेचन युग-सम्मत
होएत।
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