शनिवार, 18 अप्रैल 2020

कोरोनाक लॉकडाउनमे ‘सूर्यमुखी’क फुलायब




प्रकाश झा



किछुए दिन पहिने मैथिली लिटरेचर फ़ेस्टीवल-2019मे आरसी प्रसाद सिंह जीक सूर्यमुखी पुस्तकपर नजरि पड़ल । मैथिली अकादमी, पटना स 1981 ई.मे  प्रकाशित  एहि काव्य कृति केँ खरीद खुशी खुशी घर अनने रही । एहि बीच एक दू बेर पढ़बा लेल नियार कयबो कयलहुँ, मुदा लागल, जे एहि कृति के हड़बड़ीमे नहि पढ़ल जा सकैत अछि, तेँ पुस्तक कतेको महीना स टेबलपर रखले छल । एहि कोरोनाक लॉकडाउन नीक जेना घर बैसा देलक । जखन सौंसे दुनिया त्राहिमाम क रहल अछि तेहना समयमे सूर्यमुखीक फुलायब हृदयक आँखिके कतेक शीतलता प्रदान करतइ से ओ लोकन्हि अवश्य जनताह, जे सूर्यमुखीक फुलायल थोंकाके काहियो नीक स निहारने हेताह ।



कविवर आरसी प्रसाद सिंह जीक लिखल कथा हिन्दी पाठ्यपुस्तकमे पढ़ने रही, मुदा हिनक काव्यक रसास्वादन सेहो मैथिलीमे पढ़ब हमर पहिल अनुभव छल । एक स एक समीक्षक, समालोचक एहि काव्यक विश्लेषण कयने हेताह, मुदा हमर अनुभव रौदायल बटोहीकेँ कागजी नेबो देल सरबत पियब सन अछि ।



पुस्तकक प्रवेशिका सात भागमे बाँटल छैक । जाहिमेँ कवि महोदय स्वयम् लिखइत छथि जे- “हम हिंदीसँ मैथिलीमे आयल छी ।” स्वयम् केँ मैथिलीमे अयबाक लेल बहुत सुंदर कथाक प्रसंग लिखने छथि । एहि लेल हुनका स्व. अमरनाथ झाक ओ भाषण सेहो प्रेरित केलकन्हि जे अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलनक मंचसँ अध्यक्षीय भाषणमे निर्भीकता पूर्वक ओ बाजल छलाह जे मैथिली हमर मातृभाषा अछि आ हिन्दी राष्ट्रभाषा    



पोथीमे कुल 61टा  कविता आ 36टा मुक्तक संग्रहित अछि । सन् 1981 ई.मे  प्रकाशित एहि पुस्तकमे आरसी प्रसाद सिंह जी, जे किछु लिखलाह अछि, से आजुक समयमे सेहो अक्ष्ररस: ओहिना अछि । अपन रचना मे श्री सिंह लगभग सभ विषय केन्द्रित काव्य रचलथि अछि – जेना प्रकृति, समाज, युवा, देशभक्ति, मातृभूमि मिथिला, नैतिकता, आत्मचिन्तन, जन-जागरण आदि आदि । कविता चेतना-तरंगमे रंगमंच के केन्द्रित करैत लिखाइट छथि :  रंग-मंच पर उतरी गेल नट अनंग । छूबि गेल आइ कोस चेतना-तरंग ? । तहिना जखन सनातन पुरुष रचइ  छथि  बिना क्रिया पद केँ मात्र शब्दक संयोजन स सुंदर बिम्ब उभरि जाइत अछि :  ग्राम, नगर, पाथ, हमर मनोरथ, कला, सभ्यता, संस्कृति-ग्राहक । आगम, निगम, काव्य, स्मृति, दर्शन, नाटक, नृत्य केर संवाहक । आ जखन प्रकृति लेल शब्द गढ़इ छथि त हिनक कलम स निकलैत अछि : वर्षा-ऋतु आयल पुनि, नाचि उठल मन-मयूर । धानक नामक उपयोग तेना करैत छथि जे अगल बगल गमागमाय लागत :
आँगन मे हमर सुआपंखी गमकाइत धान । देसक एकता लेल हिनक विचार छन्हि : आइ भारत-भारती सम्पूर्ण, भारतवर्ष – भरिमे, भरी रहल अछि भावना, हम एक छी, हम एक छी । युवा तूरलेल लिखैत छथि : पुरा लै छै अपन प्रण रोपि, जे हठ ठानै छै ! युवा जे क्रांति – जीवी रक्त, की अवरोध मानै छै ! आ यौवन के परिभाषित करबा लेल कहैत छथि : अनंगक अंग, केशक रंग, ने आसंग – दर्शन छै ! मन: स्थिति जे परिस्थिति – मुक्त, तकरे नाम यौवन छै ! युवामे क्रांतिक जोश संग ललकारा दैत - मैथिलीक क्रान्ति – पूत जागी रहल छै ! करू वा मरूक लगन लागि रहल छै !  जखन मिथिलाक समाज अकाल ग्रस्त छल तखन कविक वेदना सेहो प्रकट होइट छन्हि : मंच पर शोकांत नाटक, अश्रु – विगलित भ रहल अछि । के एहन निर्मम विधाता, क्रूर अभिनय क रहल अछि ॥



एहि प्रकारे देखल जाय त आरसी प्रसाद सिंह जी अपन वर्तमानमे भ रहल सम्पूर्ण सामाजिक, राजनीतिक परिवर्तन, घटना – परिघटनाक लेल अपन काव्य रचना केलन्हि अछि ।




हिनक रचना मे मैथिली भाषा आ मिथिलाक ग्राम्य जीवन मे प्रचलित लोकोक्तिक सेहो खूब नीक जेना उपयोग केलथि अछि : लोकोक्तिक प्रयोग हिनक भाषामे आरो बेसी अपनत्वके भिजा देलक अछि । बहुतो लोकोक्तिमे किछू निम्न अछि : 1. सूरदास बुझतै घी तखने, जखन पात पर गड़गड़ेतै तखने, 2. बाड़िक पटुआ तीत, 3. गूड़क मारी जनै छै धोकरे, 4. ऊँच भ गेल बांह स खत्ता, 5. मोन चंगा, कठौती मे गंगा,  6. आगि लगे पर कूप खुनै-ए,  7. भोजक बेरमे कुम्हर रोपै आदि आदि ।  



अपने लोकन्हि स सेहो आग्रह जखन समय भेटय त आरसी प्रसाद सिंह जीक काव्य कृति सूर्यमुखी अवश्य पढ़ी ।





सूर्यमुखी

रचनाकारा : आरसी प्रसाद सिंह


प्रकाशक : मैथिली अकादमी, पटना

तृतीय संस्करण : 2011

मूल्य : 60/- टाका

कुल पृष्ठ : 157

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