26
दिसम्बर, 2012
गाम
नइ सुतैए
लेखक
: महेन्द्र मलंगिया
पंचकोसी,
सहरसा
निर्देशन
: उत्पल झा
गाम नइ सुतैए
असामाजिक
कार्यों में व्याप्त युवकों से परेशान किसी एक ग्राम प्रदेश के कत्थ को समेटे हुए
है गाम नइ सुतैए. चोरी – डकैती, हत्या आदि कर्म एवं सामाजिक
अनुशासन का उलंघन करना इन युवकों का मुख्य कर्म बन गया है. गाँव के कोई भी व्यक्ति
डर के कारण इन युवकों से अपने आप को दूर रखना ही बेहतर समझते हैं. स्थिति यहाँ तक
पहुँच जाती कि स्वयं पिता भी मंदिर जाकर भगवान से अपने बेटे के लिए 'मौत' की ही दुआ माँगते हैं. गाँव की ऎसी स्थिति का कारण क्या है ? इस प्रश्न के उत्तर के लिए जब गम्भीरता से विचार किया जाता है तो हमारे देश की सरकार ही पूर्ण रूप से दोषी करार दी जाती है, जो भ्रष्ट नेताओं द्वारा
संचालित है. वह डिग्री तो देती है पर नौकरी नहीं दे पाती. परिणामत: प्रत्येक वर्ष
लाखों युवक बेरोजगार होते जा रहे हैं. इन्हीं बेरोजगार युवकों का उपयोग नेतागण अपने
लिए करते हैं. यही वजह है कि पुलिस एवं बाहुबलियों के बीच मैसेरे भाई जैसा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है. इस स्थिति में आम आदमी भागवान के भरोसे
ही अपनी जिन्दगी जीते हैं. पर, जब सहशीलता का सब्र टूटता है तो सभी ग्रामीण एकजूट
हो कर जोरदार विरोध करते हैं. इस संघर्ष से गाँव में अशांति आ जाती है. यही स्थिति
नाटक के नामकरण गाँव सोता नहीं [ गाम नै सुतैए ] को सार्थक बनाता है.
प्रस्तुति मैथिली भाषा में आयोजित है.
आप इस नाट्य प्रस्तुति को देखने के लिए आमंत्रित हैं.
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