| अनिल मिश्रा तथा नीरा झा |
बीसवीं
शताब्दी के शुरुआत में जीवन झा ने मैथिलीनाट्य साहित्य के परम्परा में
अभूतपूर्व क्रांति की शुरुआत की । कीर्तनिया नाट्य परम्परा के नींव पर जीवन झा ने
प्रथम आधुनिक नाटक सुन्दर संयोग की रचना किया । जीवन झा (1848 -
1912) को कविवर की उपाधि से सम्मानित किया गया था । अपनी रचनाओं में जीवन झा
ने मिथिला के परम्परा को साथ लेते हुए आधुनिक रूप में सृजित किया है । इनकी रचनाओं
में तात्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक सामाजिक स्थिति का विश्लेषण मिलता
है । उस समय मिथिला में वैवाहिक स्थिति एक विकराल समस्या के रूप में फैल चुका था ।
जीवन झा ने अपनी नाट्य रचना के केन्द्र में इसी वैवाहिक समस्या को रखा । मिथिला
समाज में तिलक –
दहेज प्रथा, जाति – पाँजि के नाम पर कन्या पर हो रहे
अत्याचार एवं अन्य सामाजिक कू-प्रथा पर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में अपनी
आलोचनात्मक दृष्टिकोण से अपनी नाट्य रचना की । सामाजिक पृष्ठभूमि को आधार बनाकर
मैथिली में नाट्य-लेखन का शुभारम्भ जीवन झा से ही होता है । कविवर जीवन झा ने
तीन सम्पूर्ण नाटक;
| ज्योति झा एवं बबीता प्रतिहस्त |
सुन्दर
संयोग (1904),
सामवती
पुनर्जन्म,
नर्मदा
सागर सट्टक
की
रचाना किया । वस्तुतः इन नाटकों में मिथिला समाज में व्याप्त विश्वास एवं संस्कार
की प्रतिविम्ब मिलता है । प्राय: सभी नाटकों में विवाह समस्या में व्याप्त वासना, प्रेम, मिलन
तथा विरह वेदना को आपने कथ्य बनाया है । इन समस्याओं का समाजशास्त्रीय एवं
भाषाशास्त्रीय अध्ययन आज भी आपेक्षित है । नाटक में मनोरंजन एवं जीवन की गम्भीर
समस्याओं को समान अनुपात में प्रस्तुत किया गया है ।
प्रथम आधुनिक नाटक : सुन्दर संयोग
सुन्दर
संयोग नाटक मनोरंजन के साथ ही जीवन के गम्भीर
समस्याओं के बीच सामाजिक द्वन्दों को उभारा है, जो की आज के संदर्भ में भी उतना ही
प्रासंगिक है जितना अपने रचना काल के समय था । नाटक का मूल कथ्य मिथिला के
परम्परागत कुलीनप्रथा को प्रदर्शित करता है । समाज में व्याप्त जाति-पाँजि, दहेज
प्रथा, बहु-विवाह तथा पत्नी-परित्याग जैसे विकृतियों को समेटा गया है ।
लगभग
एक घंटा तीस मिनट का यह संभावित नाटक मिथिला के पारम्परिक नाट्य शैली, नृत्य शैली
एवं पारम्परिक संगीत से भरा पुरा है । लगभग एक सौ सात साल पहले लिखे गए इस नाटक की
प्रस्तुति रोमांचक अनुभूति प्रदान करेगा ।
प्रथम आधुनिक नाटक सुन्दर संयोग : प्रस्तुति प्रक्रिया
एक
सौ सात साल पहले कविवर जीवन झा द्वारा रचित प्रथम आधुनिक नाटक सुन्दर संयोग के
मंचन का शोध प्रमाण अभी तक व्याप्त नहीं हो सका है । पर अपने कत्थ एवं शिल्प के
रूप में इस नाट्य कृत्ति को प्रथम आधुनिक मैथिली नाटक से सम्मानित किया जा चुका है
। पर, आश्चर्य यही है कि विगत एक सौ सालों में इसका मंचन नहीं हो सका था । अत: अब
यह आवश्यक हो गया था कि इस नाट्य कृत्ति का मंचन किया जाय तथा इसके शिल्प पर एक
बार फिर शोध कार्य को आगे बढ़ाया जा सके ।
·
सुन्दर संयोग को
मंचित करने के लिए इसके आलेख को आज के संदर्भ में एक बार फिर से पुर्णलेखन किया
जाना अति आवश्यक होगा था ताकि प्रेक्षक इसके समकालीनता को अपने साथ आत्मसाथ कर सके
।
·
नाटक के आलेख में
तात्कालीन भाषा का समुचित उपयोग किया गया है । अत: यह भी आवश्यक था कि आलेख में
उपयोग किए गए उन शब्दों के समान अर्थ वाले वर्तमान शब्दों का अधिक से अधिक उपयोग
हो ताकि अभिनेता के साथ प्रेक्षक भी आसानी से समझ सकें ।
·
नाटक में प्रयुक्त
नाट्य शैली के वर्तमान स्वरूप को रखना भी आवश्यक था । इसके लिए मिथिला के विभिन्न गाँवों में
प्रस्तुत हो रहे नाट्य शैलियों के प्रस्तुति कर्ता के साथ रंगमंडल के अभिनेताओं को
प्रशिक्षण देना अति आवश्यक था । इस प्रक्रिया से ही लोक शैली एवं आधुनिक नाटक का एक
समिश्रण तैयार हो सका ।
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मैलोरंग द्वारा मंचित इस नाटक को देखने का अवसर मिला। सुंदर प्रस्तुति। वैचारिकता से भरपूर यह नाटक दर्शक को सोचने पर मजबूर करता है। इसी तरह के नाटक के मंचन होने चाहिए ना कि 'ओरिजनल काम' जैसे भद्दे नाटक।
जवाब देंहटाएंहार्दिक बधाई एवम शुभकामना !!
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