दिनांक : 11 मई, 2020
[ नाट्याचार्य महेन्द्र मलंगिया जीक अद्यतन पुस्तक
‘प्रबन्ध संग्रह’ 2019क अंतिम त्रैमासिकमे प्रकाशित भेलन्हि अछि । ]
सिद्धहस्थ
नाटककार महेन्द्र मलंगिया जीक अद्यतन पुस्तक वर्ष 2019 ई. मे प्रकाशित
भेलनि अछि – ‘प्रबन्ध संग्रह’ । पिछला कतेको साल स’ नाटककार मलंगिया जी अपना के शोध दिस उन्मुख क’
लेलाह अछि । तेरह एकाँकीक संग्रह पुस्तक ‘एक टुकड़ा पाप’ नाम स’ प्रकाशित भेल वर्ष 2018ई. मे, त’ कविवर ज्योतिरीश्वर ठाकुर जीक ‘वर्णरत्नाकरक’ तीन कल्लोलधरिक विश्लेषण ‘शब्दक जंगलमे अर्थक खोज’ नामक शोध पुस्तकमे केलनि, जकर प्रकाशन वर्ष 2015 ई. अछि । वर्ष 2009 ई. मे ‘मैथिली
लोकनाट्यक विस्तृत अध्ययन एवं विश्लेषण’ नामक शोध पुस्तक
प्रकाशित भेल छलनि ।
मैथिली साहित्यमे ‘प्रस्तुतिपरक
विधा’क लेल ई अतिआवश्यक छल जे श्री मलंगिया अपना के एहि दिस
मोड़थि । एहि विधा केन्द्रित शोध कार्य बहुत भेल अछि, मुदा जे
व्यक्ति स्वयं ‘प्रस्तुतिपरक विधा’मे
संलिप्त छथि, हुनक शोध दृष्टि आम जनक सोझाँ लगभग नहि-ए जेना
आयल अछि । अधिकांश शोध-प्रबन्ध अकादमिक दृष्टिए लिखल गेल अछि । जे किलिष्ट अछि, बोधगम्य नहि-ए जेना बुझू ।
‘प्रबन्ध संग्रह’ मे कुल उन्नैसटा आलेख समाहित कयल गेल छैक । पुस्तकक प्रारम्भ ‘प्रबन्ध संग्रहक प्रसंगमे’ स’
होइत अछि जाहिमे शब्द -- प्रबन्ध, निबन्ध आ शोध के नीक जेना
बेकछा क’ समझाओल गेल अछि । प्राय: एहि तीनू शब्दक अर्थ प्रथम
द्रष्टा एक्के रंग लगैत अछि, मुदा तीनू एक दोसर स’ कतेक भिन्न अछि से एकरा पढ़ला बाद भाँज लगैत छैक । संगहि सब आलेखक
पूर्वरंग, पूर्वमे छपल सब आलेखक अंतरकथा-व्यथा, कतेको आलेखक एकस्वरताक कारण आदिक विवरण द’ अपन
निर्भीकता आ शोधकार्यपर आत्मविश्वास केँ परिचय देलथि अछि । प्राय: शोधकर्ता अपन
प्रबन्धमे एहन पूर्व खुलासा नहि-ए जेना करैत छथि । एहि संग्रहमे छपल आलेखक रेंज
बहुत पैघ रखलथि अछि मलंगिया सर – पहिल आलेख सन् 1972 ई. मे छपल अछि । एहि प्रकारे
एहि ‘प्रबन्ध संग्रह’ केँ कुल सैंतालीस
सालक शोध संकलन कहल जा सकैत अछि ।
संग्रहित आलेखमे
क्रमश: विद्यापतिक उगना, लोकनाट्यक कसौटीपर सामा-चकेबा, एकटा ठिठुरल शहर
मधुबनी, सामाजिक परिवर्तनमे नाटकक स्थान एवं मैथिली नाटक, प्रतिनायक चूहड़मलक मूल्यांकन, सलहेशक काल निर्धारण, राम – सिया कीर्तन, वर्णरत्नाकरक सम्पादन कार्य चलैत
रहए, मिथिलामे टोना, लोककथाक जन्म आ
विश्लेषण, आँखिक देखल आ कानक सुनक : सलहेश लोकनाट्य, सब गुड़ गोबर भावा, मिथिलाक राम, मैथिलीक पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति, पैण्डोराक
बक्सामे हाथ दैत भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता, भारत – नेपालक
नाट्य संबंध, अंदाजे गीता भगवान उवाच:,
अहाँ सन दोसर देव नहि एवं अडी डीठि वाङ्का पीठी अछि ।
एहि ‘प्रबन्ध
संग्रहक’ सबस’ पुराण शोधालेख ‘विद्यापतिक उगना’ अछि, जे वर्ष
1972 ई.मे तात्कालीन स्थापित पत्रिका ‘मिथिला मिहिर’मे प्रकाशित भेल छल । एहि आलेखमे
मलंगिया जी विद्यापतिक ‘उगना’केँ
सामाजिक मान्यता, शोध मान्यता,
मनोवैज्ञानिक मान्यता आ पूर्वमे उपर्युक्त विंदु आधारित लगभग सब रचनाक संदर्भ लैत
ओकरा व्यावहारिकता आ ओकर अनुक्रमणियताकेँ संयोजित क’
प्रतिस्थापित केलथि अछि । राजा शिवसिंहकेँ युद्धभूमि सँ भागि गेलाक बाद छद्म वेष
बनाक’ विद्यापति संग कोनो गुप्त मंत्रणा होयबाक सूत्र केँ
पकड़लनि अछि । ‘उगना’ नामकरणपर सेहो –
यजुर्वेद स’ ल’ क’ भाषा विज्ञानक कसौटीक संग संग मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण तक अपनौलनि अछि ।
अंतमे विद्यापतिक रचना, ऐतिहासिकताक क्रम, राजनीतिक परिस्थित, मनोवैज्ञानिक कारण तथा कतेको
एहन तथ्यकेँ संदर्भित करैत ‘उगना’केँ
शिवसिंह होयबाक दिस संकेत केलाह अछि । एहि बीच यदा कदा विद्यापतिक रचनापर शोध होइत
रहल अछि, कतेको आलेख प्रकाशित भेल अछि,
मुदा विद्यापतिक रचनाक संग संग हिनक जीवनपर शोध संधानल आलेखक एखनो बहुत अभाव अछिए
। एहि बीच सुखद सूचना अछि, जे प्रो. कलमानन्द विभूति आ प्रो.
देवशंकर नवीन गंभीरता संग विद्यापतिपर शोध क’ रहलाह अछि, हुनकर सबहक शोध प्रपत्र निश्चित एहि आलेखक अगिला पौदान होयत ।
किछु उत्साहित
शोधार्थी सामा – चकेबाकेँ लोकनाट्य कहैत छथि, त’ कियो
लोकनृत्य, लोककथा आदि । जिनका जेना मोन होइत छनि से समा –
चकेबा के तहिना स्थापित केलाह अछि । एहि ल’ क’ समाजमे बहुत भ्रम पसरल छल । एकरा ध्यानमे लैत मलंगिया जी निराकरण दिस
बढ़लैत अछि । सामा –चकेबामे गाओल जाय बला गीतक अध्ययन विश्लेषण केलाह अछि । सामा –
चकेबा के लोकनाट्य माननिहारमे श्री ताराकान्त झा, डॉ.
प्रेमशंकर सिंह, डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’, डॉ. धीरेन्द्र आदि अपन-अपन तर्क देने छथि, जकर पड़ताल सेहो एहि आलेखमे अछि । अंतत: महेंद्र मलंगिया सामा – चकेबा के
मिथिलाक एक पूजनोत्सव मानलनि अछि, जाहिमे बहिन भाइक दीर्घायु
होएबाक कामना करैत छथि ।
कोनो एकटा शहरक बहन्ने
शोधालेख लिखब सेहो रेखाँकित करबाक विषय थिक । कोनो शहर कोना बनैत अछि, की
की ओकर कमजोरी आ गुण थिक से एहि आलेख ‘एकटा ठिठुरल शहर
मधुबनी’ स’ फरिछियाइत अछि । कोनो शहरक
एहन स्थिति कहियाक छल सेहो जनतब होयब एहन आलेख लेल महत्वपूर्ण होइत अछि । जकर अभाव
एहि आलेखमे अछि । मात्र अनुमान लगाओल जा सकैत अछि, जे ई आलेख
‘मिथिला मिहिर’मे छपल छल आ आलेखमे सन्
1981 ई. जनगनाक चर्च होइत अछि, ताहि हिसाबे एहि आलेखमे
वर्णित मधुबनीक स्थिति 1983-86क आसपासक लगैत अछि । आब शहर बहुत बदलि गेल अछि, जँ एक दू पाराग्राफ आर बढाओल जाइत त’ एकर समकालीनता
स’ सेहो अवगत भेल जा सकैत छल । ओना किछु तथ्य जे तहिया छल से आइयो प्रासंगिक
अछिए । जेना – मैथिल लोकनि बेटाक अपेक्षा बेटीकेँ बहुत कम मानैत अछि, नाटकक मामलामे मधुबनी शहर अति भुसकौल अछि, एहिठाम
साहित्यिक पोथी भेटब मुश्किल अछि, अछैत मंदिर आ पूजा पाठ होइतो
सीता अपना नैहरमे मैथिलीए भाषा जकाँ उपेक्षित रहि जाइत छथि आदि आदि ।
‘सामाजिक परिवर्तनमे नाटकक
स्थान एवं मैथिली नाटक’ विषयपर लिखबासँ पहिने मलंगिया सर
समीक्षाक तीनू रूपक चर्चा क’ देने छथि,
जाहिमे कोकिल, काग आ हंस समीक्षा होइत अछि । उपर्युक्त
आलेखलेल काग समीक्षाक रस्ता अपनौलनि अछि । जाहिमे रचनाक केवल दोषपर आँगुर राखल
जाइत अछि । एहन समीक्षा करबामे बहुत खतरा रहैत छैक, जे
मैथिलीमे बहुत कम लोक हिम्मत करैत छथि । अपन शोध आलेखकेँ निर्भीकता पूर्वक बेबाकी
स’ रखबाक कलासँ आकण्ठ डूबल मलंगियाजी मात्र बारह पृष्ठक आलेखमे
लगभग टीसटा नाटक आ बीसटा नाटककारक पड़ताल केलथि अछि । ई आलेख नाटक लिखनिहार लेल पथ
प्रदर्शक सिद्ध होयतनि । रचनाक संबंधमे सब त्रुटिकेँ उजागर केलाक बाद अंतमे इहो कहैत
छथि – “जो देख्या सो लेख्या, मम दोष न दीयताम’ ।
राजा सलहेश केन्द्रित
तीनटा आलेख एहि संग्रहमे संकलित अछि । मलंगिया सरक कहब छनि जे सलहेशक चर्च बिना
चूहरमल्लक नहि भ’ सकैत छैक । ई दुनू दू क्षेत्रक समसामयी राजनेता छलाह । दुनूक बीच प्राय:
राजनीतिक लड़ाई चलैत छलनि । चूहरमल्ल दोसर क्षेत्रक छल, तेँ
मिथिलाके साहित्यमे ओकरा कमजोर देखेबाक लेल प्रतिनायकके रूपमे प्रतिस्थापित क’ देल गेल । संगहि अपन शोधमे सलहेशक काल निर्धारण आठम शताब्दीक पूर्वाद्ध
मानलनि अछि । ‘आँखिक देखल आ कानक सुनल : सलहेश लोकनाट्य’ आलेखमे एकटा लोकनाट्य लेल जतेक तत्त्वक आवश्यकता होइत अछि तकर पड़ताल कयल
गेल अछि ।
‘राम – सिया कीर्तन’ केन्द्रित शोधालेख कतेको गीरह के खोलैत अछि । राम आ सीता संबन्धित कतेको
प्रश्नक उत्तर शोधमे निहित अछि । कतेको प्रश्न सेहो ठाढ़ करैत छथि जेना – विद्यापति
रामके संबंधमे एक्कोटा रचना किएक नहि कयलथि ? मिथिलामे रामक
व्यापकता अठारहम शताब्दीक बाद भेलनि अछि । जनकपुरक स्थापना कोना भेल । आदि आदि ...
मैथिली साहित्यमे शोध
विधा लेल सबस’ दुरूह आ महत्वपूर्ण लक्ष्य, जकरा मलंगियाजी बेधलथि
आ सुधा निकालबाक लेल यश पौने छथि ओ थिक कविवर ज्योतिरीश्वर कृत ‘वर्णरत्नाकर’क अध्ययन आ ओकर शाब्दिक विश्लेषण । एहि
लेल ‘शब्दक जंगलमे अर्थक खोज’ नाम स’ पुस्तक सेहो प्रकाशित छनि । अपन प्रिय विषय केन्द्रित तीन पुस्तकक
समीक्षाक बहन्ने शोधालेख तैयार करबाक कला मलंगियाक एहि तीनू आलेखके अध्ययन सँ अभरैत
अछि । पहिल पुस्तक प्रो. आनंद मिश्र / पं. गोविंद झाक ‘वर्णरत्नाकर’के समीक्षा लेल शीर्षक आलेख अछि ‘वर्णरत्नाकरक
सम्पादन कार्य चलैत रहए’ । दोसर पुस्तक ‘मिथिला का सामाजिक एवं
सांस्कृतिक जीवन’के समीक्षालेल लिखलनि अछि ‘सब गुड़ गोबर भावा’। आ शीर्षक ‘पैन्डोराक
बक्सामे हाथ दैत भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता’ छनि जे डॉ.
भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताक पुस्तक ‘वर्णरत्नाकरमे चित्रित
पूर्वमध्ययुगीन सांस्कृतिक भारत’ लेल लिखलथि अछि । अपन
तर्कमे पहिल पुस्तकके किछु त्रुटिक संग आवश्यक मानलनि अछि,
मुदा बाँकी दुनू पुस्तकके अपन शोध तर्क स’ नीक जेना खारिज क’ देलनि अछि ।
‘प्रबन्ध संग्रह’क बाँकियो आलेख सब शोध प्रक्रियाक तराजूपर तौलल गेल अछि । बहुत दिन बाद ‘प्रबन्ध संग्रह’क कोनो एहन पुस्तक जे रुचिगर लगै, शोध स’ भरल होइ मुदा बोझिल नहि बुझाय, जकरा अपन व्यक्तिगत पुस्तकालयमे आँखिक सोझाँ राखल जाय, से थिक महेंद्र मलंगियाक ई ‘प्रबन्ध संग्रह’ ।
पुस्तकक नाम: प्रबन्ध
संग्रह
लेखक : महेन्द्र
मलंगिया
ISBN: 987-81-931466-2-0.
प्रकाशन वर्ष : 2019;
कुल पृष्ठ : 216; मूल्य : 400 टाका
प्रकाशक : मलंगिया
आर्ट्स, नई दिल्ली – 86.
संपर्क : पॉकेट – बी – 05, मकान नं. 358-359, सेक्टर –
03, रोहिणी, नई दिल्ली – 32.
मो.: 09560306681,
09312919334.
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- डॉ. प्रकाश झा ( पीएच-डी.; नेट; सीनियर
फेलो, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार )
राष्ट्रीय नाट्य
विद्यालय, बहावलपुर हाउस, भगवानदास रोड, नई दिल्ली – 01.
मो. + 91 9811774106,
फोन : 011 23389138.


बहुत सुंदर ।
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