शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

अविचल वीणा बाजि उठल

हमरा तबड्ड अशोकर्य होइत अछि, जे अपने लोकनि बिना पढ़ने, मात्र आलेखक हेडिंग देखिए कअंदाजा लगा लैत छियै, जे ई आलेख फल्लां विषयपर होयत । एहि हेडिंगमे अविचलवीणामात्र दूटा शब्द के आधार पर कोना अहाँ लोकनि कहि सकैत छी जे ई लेख पक्का साहित्य अकादमीसंबंधित होयत ?

 

हयौ... हम वीणारूपी एहि साहित्यिक समाज सबहिष्कृत तनहिए ने छी । अपने लोकनिक वीणारूपी विश्वासपर हमहूँ अविचलरहबाक प्रमाण देबे करब । तेँ ठीके ई आलेख वर्तमान साहित्य अकादमीए पर थिक । अहिसँ पहिने साहित्य अकादमी सम्मानपर हमर लिखल एकटा टिप्पणी सेहो अहाँ सबके मोन होयत । शीर्षक छल पंगु दृष्टिए पंगुके निहारैत पंगु साहित्य समाज ।

 

आब जे अहाँ सब ई कहब जे एहि नवका लेखकक शीर्षक ओही तर्जपर – ‘वीणाक शिखा सँ स्मरणगाथाकरसास्वादन करैत साहित्य समाजहोबाक चाही तबाबू हमरा माफ़ कदिय। एहि बेर हम ई शीर्षक नहिएटा राखब । एहि बेर रहत - अविचल वीणा बाजि उठल ।

 

हँ... तनबका साहित्य अकादमीक अनुवाद पुरस्कारक चर्च-वर्च खूब भरहल अछि । एकर कतेको कारण छैक बाला साहेब ठाकुर जीक मराठी मानुषक मातृभाषाक उपन्यास, जकर लेखक छथि गोनी बाबा (सावधान - गोनू झा बला नहि) यानी गो.नी. दांडेकर । तकर अनुवाद केनिहारि चण्डीगढ़ निवासी स्व. शिखा गोयल जी; जतक मूल भाषा पंजाबी अछि । कहल जा सकैत अछि जे ई कृति मराठी, पंजाबी आ मैथिलीक तिलासंक्रांतिक खिच्चैड़ थिक आ ताहि पवित्र खिच्चैड़ के सम्मान नहि देल जाय, ई सम्भव तनहिए होबाक चाही । ई पोथी अपन मूल भाषामे सम्मान त' अर्जित कयने अछिए । तेँ एकर कथ्य नीक हेबे करत । रहल एकर अनुवादक भाषा मैथिलीक उत्कृष्ठ्ताक त' से निर्णायक लोकनि पढ़नहि हेताह । शिखा जी कहादनि छ: साल पहिने स्वर्गवासी भगेलीह त' अवश्ये ई पोथी कम स' कम सात साल पहिने अनूदित भेल होयत । सुनै छी जे शिखा जीक पतिक हिसाबे ओ कहियो साहित्य रचना स' जूड़ल नहि रहलीह, मुदा तैयो हुनका नाम स' अनूदित ई पोथी साहित्य अकादमी स्वयं प्रकाशित कयने अछि । कोनो मैथिली पत्र पत्रिकामे कहियो हुनक रचना प्रकाशित नहि भेल । मुदा एक्के फुक्के चानी बला कहाबत के चरितार्थ करनिहारि स्व. शिखाक विद्वता केँ साहित्य अकादमीए चिन्हलक । ओ बेचारी एक मात्र पोथी अनुवाद क' देवलोक दिस प्रस्थान क' गेलीह तेँ हुनक स्मरणके माधुरीसुगंध संग अमररखबाकलेल साहित्य अकादमी बासुकीबनि हुनक स्मरणगाथाकेँ मैथिली साहित्य समाजक अशोकस्तम्भपर टिकली-सिंदुर लगा स्थापित केलक अछि । एहन उत्कृष्ठ काज करनिहारक अहिबात अजर रहनि, अमर रहनि, अविचल रहनि से कामना मैथिलीक सभ साहित्यकार केँ करक चाहियनि ।

 

एक एहि पोथीक सम्मान समैथिली सम्मानित भेलीह अछि, मराठी सम्मानित भेलीह अछि, पंजाबी सम्मानित भेलीह अछि । एतबे नहि एहि पृथ्वीलोक संग संग स्वर्गलोक सेहो आइ प्रसन्नचित्त भेल अछि । तेँ एहि अदभुत कर्म लेल अमरनाथ बाबूक, बासुकीनाथ बाबूक, माधुरी देवीक, अशोक बाबूक आ अंतमे पूर्व संयोजिका परम आदरणिया वीणा ठाकुर जीक मैथिल साहित्य समाज चरण वंदन करथु, माथा टेकथु, सम्मानक पांतिक अगिला मेम्बर हेतु लोलुप बनल रहथु ।

 

जाहि साहित्य अकादेमीक स्थित परिस्थिति पर सबकियो चुप्पी सधने छलाह तकर तार आई मात्र एकटा उत्कृष्ठ निर्णय सतरंगित भगेल अछि, झंकृत भगेल अछि । तेँ एहन स्थितिक लेल कहब जे अविचल वीणा बाजि उठल उचित अछि, सत्य अछि, समिचीन अछि । एहि लेल स्वर्ग लोकमे बैसल शिखा जीकेँ बधाई छनि, पृथ्वी लोकमे बैसल हुनक सर-संबंधी केँ बधाई छनि, दुनू नाथ बंधु यथा - अमरनाथ जी व बासुकीनाथ जीकेँ बधाई छनि, निर्णायक मंडलमे एक मात्र महिला निर्णायक श्रीमती माधुरी झा द्वारा स्वर्गलोग ससमगोत्री शिखा गोयल जी केँ हेरनिहारि तथाकथित विदुषी केँ अषीम बधाई छनि । आ अंतमे अपन कार्यकालमे एक सबढ़ि कएक निर्णय करैनिहार आदरणीय डॉ. अशोक अविचल सर केँ हृदय सँ बधाई छनि ।

 

एहि सब महान विभूति केँ मैथिली साहित्यलेल ऐतिहासिक कर्म करबाक लेल अबै बला पीढ़ी हरदम मोन रखतनि । मैथिलीमे एकटा कहाबत छै कुकर्मिये नाम कि सुकर्मिये नाम । हिनको सबहक नाम हेबे करतनि । ई अबै बला पीढ़ीपर अछि, जे हिनका लोकनिक कर्म के पहिने की लगौताह – ‘सुवाकिकु। अगिला सालक साहित्य अकादेमीक सम्मान तक विराम ।

  

- प्रकाश झा

( पीएच-डी.; नेट; सीनियर फेलो, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार )

प्रकाशन प्रभारी; राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, भगवानदास रोड, नई दिल्ली – 01.

मो. + 91 9811774106, फोन : 011 23389138.

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