हमरा त’ बड्ड अशोकर्य होइत अछि, जे अपने लोकनि बिना पढ़ने, मात्र आलेखक हेडिंग देखिए क’ अंदाजा लगा लैत छियै, जे ई आलेख फल्लां विषयपर होयत । एहि हेडिंगमे ‘अविचल’ आ ‘वीणा’ मात्र दूटा शब्द के आधार पर कोना अहाँ लोकनि कहि सकैत छी जे ई लेख पक्का ‘साहित्य अकादमी’ स’ संबंधित होयत ?
हयौ...
हम ‘वीणा’ रूपी एहि साहित्यिक
समाज स’ बहिष्कृत त’ नहिए ने छी । अपने
लोकनिक ‘वीणा’ रूपी विश्वासपर हमहूँ ‘अविचल’ रहबाक प्रमाण देबे करब । तेँ ठीके ई आलेख
वर्तमान साहित्य अकादमीए पर थिक । अहिसँ पहिने साहित्य अकादमी सम्मानपर हमर लिखल
एकटा टिप्पणी सेहो अहाँ सबके मोन होयत । शीर्षक छल – पंगु
दृष्टिए ‘पंगु’ के निहारैत पंगु
साहित्य समाज ।
आब जे
अहाँ सब ई कहब जे एहि नवका लेखकक शीर्षक ओही तर्जपर – ‘वीणाक शिखा सँ ‘स्मरणगाथाक’ रसास्वादन
करैत साहित्य समाज’ होबाक चाही त’ बाबू
हमरा माफ़ क’ दिय’ । एहि बेर हम ई
शीर्षक नहिएटा राखब । एहि बेर रहत - अविचल वीणा बाजि उठल ।
हँ...
त’ नबका साहित्य अकादमीक अनुवाद पुरस्कारक चर्च-वर्च
खूब भ’ रहल अछि । एकर कतेको कारण छैक – बाला साहेब ठाकुर जीक मराठी मानुषक मातृभाषाक उपन्यास, जकर लेखक छथि गोनी बाबा (सावधान - गोनू झा बला नहि) यानी गो.नी. दांडेकर ।
तकर अनुवाद केनिहारि चण्डीगढ़ निवासी स्व. शिखा गोयल जी; जतक
मूल भाषा पंजाबी अछि । कहल जा सकैत अछि जे ई कृति मराठी, पंजाबी
आ मैथिलीक तिलासंक्रांतिक खिच्चैड़ थिक आ ताहि पवित्र खिच्चैड़ के सम्मान नहि देल
जाय, ई सम्भव त’ नहिए होबाक चाही । ई
पोथी अपन मूल भाषामे सम्मान त' अर्जित कयने अछिए । तेँ एकर
कथ्य नीक हेबे करत । रहल एकर अनुवादक भाषा मैथिलीक उत्कृष्ठ्ताक त' से निर्णायक लोकनि पढ़नहि हेताह । शिखा जी कहादनि छ: साल पहिने स्वर्गवासी
भ’ गेलीह त' अवश्ये ई पोथी कम स'
कम सात साल पहिने अनूदित भेल होयत । सुनै छी जे शिखा जीक पतिक
हिसाबे ओ कहियो साहित्य रचना स' जूड़ल नहि रहलीह, मुदा तैयो हुनका नाम स' अनूदित ई पोथी साहित्य
अकादमी स्वयं प्रकाशित कयने अछि । कोनो मैथिली पत्र पत्रिकामे कहियो हुनक रचना
प्रकाशित नहि भेल । मुदा एक्के फुक्के चानी बला कहाबत के चरितार्थ करनिहारि स्व.
शिखाक विद्वता केँ साहित्य अकादमीए चिन्हलक । ओ बेचारी एक मात्र पोथी अनुवाद क'
देवलोक दिस प्रस्थान क' गेलीह तेँ हुनक
स्मरणके ‘माधुरी’ सुगंध संग ‘अमर’ रखबाकलेल साहित्य अकादमी ‘बासुकी’ बनि हुनक ‘स्मरणगाथा’
केँ मैथिली साहित्य समाजक ‘अशोक’ स्तम्भपर टिकली-सिंदुर लगा स्थापित केलक अछि । एहन उत्कृष्ठ काज करनिहारक
अहिबात अजर रहनि, अमर रहनि, अविचल रहनि
से कामना मैथिलीक सभ साहित्यकार केँ करक चाहियनि ।
एक एहि
पोथीक सम्मान स’ मैथिली सम्मानित भेलीह अछि, मराठी
सम्मानित भेलीह अछि, पंजाबी सम्मानित भेलीह अछि । एतबे नहि
एहि पृथ्वीलोक संग – संग स्वर्गलोक सेहो आइ प्रसन्नचित्त भेल
अछि । तेँ एहि अदभुत कर्म लेल अमरनाथ बाबूक, बासुकीनाथ बाबूक,
माधुरी देवीक, अशोक बाबूक आ अंतमे पूर्व
संयोजिका परम आदरणिया वीणा ठाकुर जीक मैथिल साहित्य समाज चरण वंदन करथु, माथा टेकथु, सम्मानक पांतिक अगिला मेम्बर हेतु लोलुप
बनल रहथु ।
जाहि
साहित्य अकादेमीक स्थित – परिस्थिति पर सबकियो चुप्पी सधने छलाह तकर तार आई
मात्र एकटा उत्कृष्ठ निर्णय स’ तरंगित भ’ गेल अछि, झंकृत भ’ गेल अछि ।
तेँ एहन स्थितिक लेल कहब जे ‘अविचल वीणा बाजि उठल’ उचित अछि, सत्य अछि, समिचीन
अछि । एहि लेल स्वर्ग लोकमे बैसल शिखा जीकेँ बधाई छनि, पृथ्वी लोकमे
बैसल हुनक सर-संबंधी केँ बधाई छनि, दुनू नाथ बंधु
यथा - अमरनाथ जी व बासुकीनाथ जीकेँ बधाई छनि, निर्णायक
मंडलमे एक मात्र महिला निर्णायक श्रीमती माधुरी झा द्वारा स्वर्गलोग स’ समगोत्री शिखा गोयल जी केँ हेरनिहारि तथाकथित विदुषी केँ अषीम बधाई छनि । आ अंतमे अपन कार्यकालमे एक स’ बढ़ि क’ एक निर्णय करैनिहार आदरणीय डॉ. अशोक अविचल सर
केँ हृदय सँ बधाई छनि ।
एहि सब
महान विभूति केँ मैथिली साहित्यलेल ऐतिहासिक कर्म करबाक लेल अबै बला पीढ़ी हरदम मोन
रखतनि । मैथिलीमे एकटा कहाबत छै – कुकर्मिये नाम कि सुकर्मिये
नाम । हिनको सबहक नाम हेबे करतनि । ई अबै बला पीढ़ीपर अछि, जे
हिनका लोकनिक कर्म के पहिने की लगौताह – ‘सु’ वाकि’ कु’ । अगिला सालक
साहित्य अकादेमीक सम्मान तक विराम ।
- प्रकाश झा
( पीएच-डी.; नेट; सीनियर फेलो, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार
)
प्रकाशन प्रभारी; राष्ट्रीय नाट्य
विद्यालय, भगवानदास रोड, नई दिल्ली – 01.
मो. + 91 9811774106, फोन : 011 23389138.
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