प्रकाश झा
वर्तमान परिदृश्यमे कहल जा सकैत अछि जे
– वीणाक टूटल तारक कर्कस ध्वनि सँ कछमछाइत साहित्यक स्तम्भपर विराजमान अशोक चक्र ‘उड़न-छू’ होइत ‘खुरचन’मे आश्रय लेलाह
अछि । वा इहो कि सालो स’ कछमछाईत खुरचन भाई, अकादमीक सम्मान ल’ उड़न-छू भेलाह । आ से जँ नहि त’
शेरक तरबाक त’र दबल अशोक चक्र ‘उड़न-छू’ भय खुरचनमे प्रविष्ठ भेल । अपनेकेँ जे मोन
हुए से कहि सकैत छियैक । मुदा, एहि बेर हमरा ई ‘खुरचन भरि सम्मान’ लगैत अछि । हम कारण अवश्य कहब... मुदा साहित्यकार लोकनि
सार्वजनिक स्वीकार नहि करी से आग्रह । अपनेक सार्वजनिक स्वीकृति अकादमीक लिस्ट सँ
नाम बाहर करबा लेल पर्याप्त प्रमाण होयत । अस्तु...
जहिया अकादमीक अनुवाद पुरस्कार सँ
तरंगित अविरल वीणाक झंकार, अकादमीक सर्वे-सर्वाक कर्ण परिसरमे प्रविष्ठ भेल रहनि, तहिए सँ अकादमीक चक्रधारी केँ एहि स्थिति – परिस्थिति सँ ‘कछमच्छी’ लागि गेल रहनि । मुदा, वर्तमानमे साहित्यिक वीणाक टूटल तारक तरंग सँ मुक्ति पायब ओहिना अछि, जेना दावानलमे खुरचन सँ पानि ढ़ारब । मुदा, तैयो एहि
बेरक लुक्खी (गिलहरी) प्रयास सँ प्रदत्त, युवा आ बाल साहित्य
सम्मान, समुच्चा साहित्य अकादमीक आगामी संभावित विभिन्न सूची
नामधारी लोकनिमे, खुरचनक मुँहमे स्वाति नक्षत्रक बूंदक सन
अवतरित भेल छनि । एहन लोकनि जहिना अनुवाद पुरस्कार लेल अपन बधाई शब्दकेँ जाहि
तीव्र वेगसँ धरती लोकसँ ‘ऊड़न-छू’ क’
स्वर्ग लोक पठेने रहथि, एहि बेर ओकर दुन्ना
स्पीड सँ एहि मृत्वलोकक सोसल साईट पर हन-हना देलनि अछि । चारूकात वीणाक तानपर राग
मल्हार गनगना रहल अछि । वातावरण सुरभित पुष्पित भेल अछि । साहित्य चक्रधारी अपन
अविचल मुस्की संग अपन नगरीक गोवर्धन पर्वतपर बैसि, हत्प्रभ
भेल पुरस्कृत रचनाकारक किंमकर्तव्यविमुढ़ भेल मुद्राक अवलोकन क’ रहल छथि, क्षण – प्रतिक्षण अवतरित विभिन्न मुद्रा
रेखा के निहारि रहल छथि, ‘आब कहू मोन केहन लगैए’ गीत गुनगुना रहल छथि ।
एहि बेर एक्के झपतल्लामे सभ चितंग ।
सम्मान लेनिहार चितंग । सम्मान पर टीका – टिप्पनी करनिहार चितंग । सम्मानित
रचनाकारक रचना कर्मक एहन बलि प्रदान किएक ? मुदा,
सम्मान रूपी भगवतीक आगू बाजि रहल ढोल – पिपहीक एहि कोलाहलमे रचनाकारक चित्कार केँ, के सुनत ? आइ नहि त’ काल्हि, जिनक रचना मूल अकादमी सम्मानसँ सम्मानित होबाक चाही छलनि, तिनक रचना केँ बाल रचनाकारक ‘खुरचन भरि सम्मान’ द’ चक्रधारी कोना नहि मुस्कीएताह ? रचनाकार कोना नहि विस्मित हेताह ?
रचनाकार आब चुप्पी साधि लिखैत रहथु… कलमक
तरुआरि भँजैत रहथु... ‘खुरचन भरि सम्मान’ ल’ अपन गाँज घर करथु । अकादेमिक अगिला कोनो सम्मानक
आस छोड़ि देथु । यैह सत्य अछि, यैह महाजनक निर्णय अछि ।
प्रसंग दू –
हेल्लो... मैं अकादमी से । जी कहिए...
। सर... प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी कुछ माँगना है आपसे... । माँगना है ? क्या
? अच्छा ओ... खुरचनभाई…। जी.... । हा...हा...हा... क्या करेंगी लेकर, सम्मान तो मिलेगा नहीं फिर क्यों... । सर, हमें भी
आश्चर्य होता है कि यह कौन सी किताब है, जो सालों से आती रही
है, पर सम्मानित नहीं हो पाती है... ।
अकादमीक जूड़ी वर्ष 2015-16 सँ ‘खुरचनभाइक
कछमच्छी’ के पढैत रहलाह, गुनैत रहलाह,
ऊँच – नीच सोचैत रहलाह । छ: – सात वर्ष बाद यानी 2022 मे हुनका
सबकेँ ज्ञात भेलन्हि, जे ई त’ नीक
व्यंग्य छै, सम्मान देबाक चाही । ओहिना जेना जनश्रुति अछि, जे कोनो सरदारजी चुटुक्का सुनलाक छ: – सात दिन बाद हँसैत अछि । तहिना ‘खुरचनभाइक कछमच्छी’क व्यंग्य अकादमीक जूरी छ: – सात
वर्ष बाद बुझि सकलाह अछि । एहि छ: – सात सालमे लेखक बेचारे यूवा स’ एक बच्चाक पिता भ’ गेलाह । लेखनमे सेहो युवा सँ आब
पकठोस भ’ गेलाह । आनंदक समय बीत गेला बाद ‘खुरचन भरि सम्मान’ ल’ आनंदित
होइत हेताह । कखनो अपना केँ, कखनो अपन खुरचनभाइकेँ आ कखनो
अकादेमी के देखैत हेताह । किछु नव सृजन करबाक लेल उद्यत होइत हेताह ।
‘खुरचन भरि सम्मान’ अर्पित क’ क’, ‘खुरचन भरि
सम्मान’ ग्रहण क’ क’, एहि ‘खुरचन भरि सम्मान’क लेन –
देन देखैत मुग्ध छी हम, दग्ध छथि किछु साहित्य समाज, मस्त छथि किछु साहित्य समाज । जूरीक सूची देखि चिंतित छथि साहित्य समाज ।
दुखमोचन झा, मुनींद्र झा, राजन सिंह
जीक मैथिली अवदान हेरि रहल अछि साहित्य समाज । किछुए दिन बाद दू भागमे बँटि जायत ई
साहित्य समाज । किछु गोटे अपन नाम कटेता त’ किछु गोटे अगिला
सेमिनारमे अपन नाम लिखेबे करताह । फेर नवम्बरमे ‘खुरचन भरि
सम्मान’ बॉटल जायत । खाली सिंहासन पर कोनो बधिया कयल छागड़ बैसाओल जायत ।
सम्मानित पुस्तक ‘उड़न-छू’
के रचनाकार आदरणीय श्री वीरेंद्र काका केँ आ ‘खुरचनभाइक
कछमच्छी’क लेखक प्रिय अनुज श्री नवकृष्ण ऐहिक यानी रुपेश
त्योंथ केँ हृदय सँ बधाई ।
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