शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

मलंगिया नाट्य महोत्सव [ तीसरा दिन ]


28 दिसम्बर, 2012
ओकरा आँगनक बारहमासा
लेखक : महेन्द्र मलंगिया  
मिथिला नाट्यकला परिषद, जनकपुर, नेपाल 
निर्देशन : रमेश रंजन

 
ओकरा आँगनक बारहमासा
 
ओकरा आँगनक बारहमासा में बिहार के मिथिलांगन क्षेत्र में रह रहे दलित समुदाय के मजदूरों के साल भर यानी बारह महीने की दयनीय आर्थिक विप्पन्नता की स्थिति का चित्रण है. यह चित्रण उस समय का है जब दिन भर की मजदूरी मात्र तीन किलो (लगभग) धान वा कोई दूसरा अन्न मिलता था. मजदूरी का कार्य भी प्रति दिन नहीं मिलता. उसी मजदूरी में कपड़ा लत्ता, दवाई दारू, मर मसाला खरीदना कठिन ही नहीं बल्कि असभंव था. अत: बिछावन के बदले में पुआल पर सोना, मालिकों से फटा पुराना कपड़ा माँगना, दो चार सेर अन्न याकि दो चार रुपया के लिए हाथ फैलाना उनकी नियति हो गई थी. जिसका उदाहरण नाटक का मुख्य पात्र मल्लर है. जैसे मरुभूमि में मृग पानी के तलाश में अपस्यांत हो कर मर जाता है वैसे ही इस समाज के लोग धन कमाने के लिए शहर जाते हैं और खाली हाथ लौट आते हैं. ऎसी विकराल परिस्थिति में कम उम्र में ही मल्लर जैसे लोग जो कि परिवार का मुखिया होता है, मर जाता है. इस दयनीय स्थिति में भी गाँव के मालिक उनकी बहु बेटियों की इज्जत हरण के लिए ललायित रहते हैं.

बीमार मल्लर जब मरनासन्न अवस्था में होता है तो उसकी एक ही इच्छा है कि वह छौंक लगी दाल चावल खाता, पर उसकी यह अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं हो पाती. इतना ही नहीं मरने के बाद जमीन, लकड़ी एवं नगदी के अभाव में मल्लर के मुँह में मुखबती मात्र लगा कर नदी में भँसा दिया जाता है. यही है उस दलित समुदाय के लगभग प्रत्येक परिवार का बारह महीना.    

 

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