मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

सामा चकेबा


मिथिला में भाई-बहन के बीच प्रगाढ़ता का एक मात्र पूजनोत्सव

                 नास्ति भ्रातृसमो बन्धुर्नास्ति भ्रातृसमं सुखम्।
                धन्यास्ता: कृत कृत्याश्च यासाभ्भ्रता सहोदरे॥
                                                                         -  पद्म पुराण

अर्थात्, भाई जैसा वन्धु दूसरा नहीं होता है । ऎसे ही भाई जैसा सुख भी दूसरा नहीं । वह धन्य तथा कृत-कृत होता है, जिसको सहोदर भाई होता है ।
                  यत्प्रसादा दहं मुक्ता सभ्राता मम जीवतु।
                                                                         - पद्म पुराण
अर्थात्, जिनके (भाई) कृपा से मैं मुक्त हुई हूँ मेरा वह भाई जीए।

लगभग पन्द्रह दिनों तक चलने वाला पूजनोत्सव सामा-चकेबा सम्पूर्ण भारत वर्ष का एक मात्र ऎसा पर्व है, जो भाई-बहन के बीच के संबंध के प्रगाढ़ता को दर्शाता है।


सामा चकेबा खेलाइत मैथिलानि
सामा-चकेबा मिथिला के प्रसिद्ध पूजा छठ के खड़ना (पंचमी) के रात्रि से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा के रात्रि तक चलता है। इस पूजनोत्सव में मुख्य रूप से नवविवाहिता तथा अविवाहित युवतियाँ भाग लेती हैं। इस अवसर पर चिकनी मिट्टी का सामा, चकेबा, चुगला, सतभैंया, ठोलिया, खड़रुचि, झांझी कुत्ता, बनतितर, वृन्दावन आदि बनाया जाता है। जैसे-जैसे दिन बीतता है उसी अनुरूप मुर्तियों को भी सजाया जाता है। पहले दिन गीले मिट्टी से मुर्तियों को आकार दी जाती है, फिर उसे रंगा जाता है, वस्त्रआभूषण से सजाया जाता है। और यह पूरी प्रक्रिया गीतों के लय के साथ चलता रहता है। बाँस से बने डाला (चँगेरा) में इन सभी मूर्तियों को सजाया जाता है। जो युवतियाँ खुद नहीं बना पाती वो कुम्हार के घर से बना-बनाया खरीद लाती हैं।
प्रथम दिन सामा का जन्म होता है। जन्म के बाद प्रत्येक दिन युवतियाँ रात में खाना-पीना से निश्चिंत होने के बाद एक साथ मिल-बैठकर सामा तथा भाई सम्बन्धित गीतों को गाती हैं। युवतियों द्वारा बैठना एक गोल घेरा में होता है। आँगन से सभी युवती अपने माथे पर डाला लेकर बाहर को जाती हैं। एक निश्चित स्थान पर बैठकर गीतों के साथ सामा खेलती हैं। वृंदावन का जराना तथा चुगला को झड़काना भी इसी क्रम में आता है। तत्पश्चात, युवतियाँ गीत गाते हुए ही अपने आँगन को वापस आती हैं। अंतिम दिन सामा का भसान होता है। इसे बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है। इसी दिन सामा श्राप मुक्त हुई थी। इस समय समूचे गाँव की युवतियाँ नए-नए/साफ वस्त्र पहन, सज-धज कर एक खाली खेत या मैदान में जमा होती हैं। गीतों की गूँज वातावरण को मोहित बना देती है। सभी डाला को गोल में रखा जाता है। कुछ युवतियाँ मोहक गीत गाती रहती है और उसके लय पर बाकी युवतियाँ कदम-ताल मिलाकर नृत्य करती हैं। यह एक लोक नृत्य का रूप धारण कर लेता है। युवतियों की अलग-अलग टोलियाँ होती हैं और गीत तथा नृत्य का अघोषित प्रतियोगिता-सी चलने लगती है। देर रात को युवतियाँ पूर्णिमा के उजाले में सामा का विसर्जन करती है। पुन: अपने-अपने भाइयों को नए धान का चूरा तथा नए ईख से बने गुड़ उनके गमछी या फाँड़ा में देती हैं। फिर खाली डाला लेकर बटगबनी गाते हुए अपने अपने घर को वापस आती हैं। 

इस तरह देखा जाय तो यह पर्व सामा-चकेबा मिथिला का एक कृषि उत्सव जैसा ही है। इस मधुरता के समाज मिथिला में सामा के साथ देवता की तरह व्यवहार किया जाता है।

इस पूजनोत्सव का कथानक कुछ इस तरह है:

श्री कृष्ण और जाम्बती की बेटी साम्बा (सामा) थी। प्रकृति प्रेमी साम्बा प्राय: घूमने-फिरने जंगल जाया करती थी। जंगल में ही रह रहे मुनि कुमार चारुवक्य से उसे प्रेम हो गया। वह प्रत्येक दिन जंगल में चारुवक्य से मिला करती थी। इधर कृष्ण का सामंत चुड़क था। चुड़क भी अंदर ही अंदर साम्बा को चाहता था। उसे साम्बा का चारुवक्य से इस तरह मिलना जुलना अच्छा नहीं लगता था। एक दिन उसने साम्बा और चारुवक्य के संबंध की खबर पिता श्री कृष्ण को बढ़ा चढ़ा कर कह सुनाया। इतना सुनते ही कृष्ण क्रुद्ध हो गए। साथ ही अपनी प्यारी बेटी साम्बा को श्राप दे दिया तुम चकबी चिड़ै (एक प्रकार की चिड़िया) बन जाओ और जंगल में ही विचरती रहो। श्राप के साथ ही साम्बा चकबी बन गई, पर, उसने भी चूड़क को श्राप दे ही दी - जिस मुँह से तुमने हमारी चुगली (शिकायत) की है, कलियुग में हमरी बहनें तुम्हारे उसी मुँह को झड़काएगी (जलाएगी)। इस श्राप से चुड़क तिलमिला उठा। साम्बा से बदला लेने के लिए सोचने लगा।


इधर साम्बा के वियोग में चारुवक्य बहुत दुःखी रहने लगा। साम्बा से पुनरमिलन के सारे रास्ते बंद देखकर चारुवक्य ने औढ़रदानी महादेव के तपस्या में लीन गया। तपस्या से महादेव प्रसन्न होकर चारुवक्य से वरदान माँगने को कहे। वरदान में चारुवक्य ने अपने को चकबा बना देने को कहा। भगवान महादेव के एवमस्तु के परिणाम स्वरूप चारुवक्य मुनिकुमार से चकबा चिड़ै बन गया तथा साम्बा के साथ चकबा-चकबी के रूप वृन्दावन में रहने लगा।

यह जान कर की साम्बा और चारुवक्य दोनों जंगल में फिर से एक साथ चकबा-चकबी के रूप में रहने लगा है चुड़क को यह अच्छा नहीं लगा उसने वृन्दावन जैसे सुन्दर जंगल में ही आग लगा दिया ताकि आग के साथ दोनों ही जल कर मर जाय। पर, अचानक ही बारिश शुरु हो जाती है और आग बूझ जाती है।

इधर साम्बा का भाई साम्ब, जब अपनी शिक्षा पुरी कर गुरुकुल से लौटता है तो अपनी बहन के चकबी बन जाने के कारण उदास रहने लगाता है। वह अपने बहन साम्बा को फिर से मानव रूप में लाने के लिए अपने पिता श्री कृष्ण से अनुनयविनय करता है। अंत में कृष्ण ने भी द्रवित होकर साम्ब को अपनी बेटी साम्बा के मुक्ति का मार्ग बताया। उसी अनुसार साम्ब ने द्वारिका के स्त्रियों से आग्रह कर अपनी प्यारी बहन को मानव रूप में पुन: पाने के लिए वैसा ही करवाया जैसा कि श्री कृष्ण ने कहा था, अर्थात सामा बनाकर रँगा गया, उसे डाला में सजाया गया, पुन: खेत में खेला गया। इस क्रम में ही वृन्दावन के मूर्ति  को जलाकर चूड़क के मुँह को झड़काया भी गया। इसके बाद ही भाई साम्ब की बहन साम्बा (सामा) तथा बहनोई (चारुवक्य) कार्तिक धवल पूर्णिमा की रात अपने मानव रूप को प्राप्त हुए। उसी दिन से तथा उसी विधि से आज भी मिथिला समाज में युवतियों द्वारा सामा-चकेबा का खेल-खेला जाता है।

सामा-चकेबा में गाए-जाने वाले गीत कई प्रकार के होते हैं। आँगन में गाने वाले गीतों में सामा के अवतार तथा भाई-बहन सम्बन्धी गीत गाए जाते हैं। जैसे :
अएलै कातिक मास हे, सामा लेल अवतार
कानि-खिझि चिठिया लिखौलनि फल्लों बहिनों
भेजलनि हजमाक हाथ ।

(कार्तिक का महीना आया है, सामा अवतार ली है। रूठकर रोकर फल्लीं (किसी बहन का नाम) बहन चिट्ठी लिखवाकर , हजाम के हाथ भिजबायी है।)

इसी तरह दूसरा :

सामा खेल गेलियै हौ भैया, फल्लां भैयाक टोल ।
डलबा हेराय गेलै हौ भैया, बिछिया लए गेल चोर॥

(सामा खेलने गई फल्लां (किसी भाई का नाम) भैया के टोल (मुहल्ला) में। हे भैया डाला भुला गई, बिछिया (एक प्रकार का गहना) कोई चोर ले गया)

भाई-बहन संबंधी कुछ और भी गीत आँगन में गाए जाते हैं। गाए जाने वाले गीतों की संख्या गीतगाइन के मन, समय तथा भाइयों के संख्या पर निर्भर करता है। यदि गाने का मन तथा समय है तो अधिक से अधिक गीतों में भाइयों के नामों को भरा जाता है, पर, यदि समय तथा मन नहीं है तो कुछ ही गीतों में भाइयों के नामों को भर कर समाप्त कर दिया जाता है।

अब बारी होती है बटगबनी की। बटगबनी यानी रास्ते में गाए जाने वाले गीत। यह आँगन और सामा खेलने के स्थान के बीच होती है। इसे दो बार गाया जाता है। पहली बार आँगन से खेलने के स्थान पर जाने के समय और फिर दूसरी बार वहाँ से वापस आँगन आने के समय। इस बटगबनी में अधिकांश गीत विद्यापति के होते हैं। आँगन से निकलने समय:

डाला ल बाहर भेली बहिनों से फल्लीं बहिनो
फल्लां भैया लेल डाला छीन, सुनु हे राम सजनी ...

सामा खेलते समय:

साम-चक साम-चक अबिह हे... अबिह हे...
कूर खेत में तू बैसिह हे ... बैसिह हे ...

वृन्दावन में आग लगाने के बाद :

वृन्दावन में आगि लागल केओ ने मिझाबै हे ...
हमरो से फल्लां भैया सेहे मिझाबै हे ...

चुगला के मुँह झड़काने के बाद:

चुगिला करे चुगिलपन बिलाइ करे म्याउँ ...
ला चुगिला के फाँसी दियाऊ ...  

 इसी तरह कई और गीतों को गाया जाता है। सामा-चकेबा में जितने भी गीत गाए जाते हैं वो सभी भाई-बहन के बीच का है, जो अलग-अलग स्थिति का चित्रण करता है। यह विशुद्ध रूप से एक पूजनोत्सव है, जिसमें बहन अपने भाई के दीर्घायु होने की कामना करती है। मिथिला की महिलाएँ सामा को नियम-निष्ठा से देखती हैं तथा देवता के रूप में पूजती हैं।
 


- सिमटता संसार के अगस्त, 2003  अंक में यह आलेख छप चुका है । पर्व कॉलम में पृष्ठ संख्या 37 पर।

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1 टिप्पणी:

  1. बेहतरीन , ज्ञानप्रद और अत्यधिक जरुरी लेख.अपने कल्चर और समाज को समझने के लिए .साधुवाद

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