बुधवार, 3 अप्रैल 2013

अहाँ छी हमर प्रेक्षक, दर्शक नहि...


नाटक देखबा लेल आयल सब लोकनि के प्राय: एक्के रंग बूझि जयबाक प्रचलन अछि । नाटक देखाबय बला घर के नाट्यगृह वा कि प्रेक्षागृह कहल जाइत अछि । तेँ प्रेक्षागृहमे बैसल सब लोकनि केँ प्रेक्षक कहब उचित अछि । एहि ठाम एकटा गभीर प्रश्न ठाढ़ होइत अछि जे ई दू टा शब्दमे की अंतर छैक दर्शक आ प्रेक्षक । जखन कि दूनू गोटे त नाटके देखबाक लेल अयलाह छथि । एहि दूनू शब्दक अर्थ एक्के बूझब सतही ज्ञानक परिणाम होयत ।

मैलोरंग के प्रस्तुति पाँच पत्र देखैत प्रेक्षकगण
 

रामचन्द्र वर्मा अपन शब्दसागर मे दर्शक के फरिछाक लिखै छथि दर्शन करनिहार / देखनिहार / दृष्टा भेलाह दर्शक । संगहि प्रेक्षक के सविस्तार लिखैत छथि नीक जेना देखनिहार छथि प्रेक्षक । अर्थ ई जे सब देखनिहार दर्शक त छथिए आ दर्शको मे नीक जेना देखनिहार प्रेक्षक भेलाह । एहि ठाम नीक जेना शब्द के नीक जेना बुझबाक आवश्यकता अछि ।

 
रंगमंचक हिसाबे व कि कोनो कला लेल गप्प आगू बढ़ायब त लागत जे दर्शक स आगू प्रेक्षकक दरकार बेसी अछि एहि सब माध्यम के । जहिना कोनो कलाक सृजक लोकनि अपन सृजनक गम्भीरताक संग प्रदर्शन करैत छथि ताहिना एहि कला के देखनिहार सेहो ओतबे गम्भीरताक संग ओहि सृजनता मे डूबैत जाइत छथि । ई कर्म रंगमंचमे दोसर कलाक अपेक्षा आरो बेसी अछि । जा धरि नाटक मंचपर होइत अछि एकर दर्शक (प्रेक्षक) नाटकमे आ अभिनेताक संग ओहि कथ्यमे डूबैत रहैत छथि । नाटक समाप्तिक बादे हुनका अपन वास्तविक जीवनक आभास होइत छनि । मंचपर अभिनेता नचैत छथि, संग संग दर्शक (प्रेक्षक) सेहो मने मोन नचैत रहैत छथि । अभिनेता कनैत छथि त दर्शक (प्रेक्षक) के आत्मा सेहो कनैत छनि । अर्थ ई जे मंच पर जे कोनो रस संचारित होइत अछि वैह रसमे लीन रहैत छथि दर्शक (प्रेक्षक) । प्रेक्षागृहमे बैसल जाहि दर्शकमे एहन स्थिति नै उत्पन्न होइत छनि बूझू जे ओ सत्ते दर्शक छथि, प्रेक्षक किन्नहु नहि कहल जा सकैत छथि ।

 
अपन व्यक्तिगत अनुभव कहैत छी, जाहि स्थिति स सब गोटे कहियो ने कहियो रूबरू भेले होयब । नाटक चलैत रहैत अछि अहाँक बगलमे बैसल सज्जन के फोन (मोबाइल) बाजि उठै छनि आ ओ सज्जन मोबाइल पर गप्पो कर लगैत छथि । हिनका ई कनियो आभास नै रहैत छनि जे हमर एहि व्यवहार स बगलमे बैसल सज्जन के कोनो तरहक बाधा होइत हेतनि वा कि मंच पर करुण स्थितिक उपस्थितिमे विघ्न होइत हेतैक । मुदा प्रेक्षागृहमे त अहूँ छी ओहो छथि । एक्के नाटक अहूँ देखै छी आ ओहो देखै छथि त कि हुनको अहाँ अपने एहन दर्शक कहबनि ? वा कि एक गोटे दर्शक भेलाह आ दोसर गोटे प्रेक्षक ? स्वंम उत्तर भेट सकैत अछि ।

 
नाटकक आदि ग्रंथ नाट्यशास्त्र मे भरत मुनि कहने छथि जे नाटक देखनिहार सब लोकनि के दर्शक कहि देनाई उचित अछि कारण अपेक्षित गुण नहियो भेला पर ओहो त नाटक देखिते छथि । मुदा, जे लोकनि नाटकक मर्म तक पहुँचैत छथि वैह नाटकक असली प्रेक्षक छथि ।  

 
किछु गोटेकक कहब छनि, भाई हम एहि नाट्यकलाक गम्भीरता त नै जनैत छी मुदा दर्शक छी तेँ हमरा बजबाक अधिकार त अछिए । ई लोकनि ओहिना बजैत छथि जेना भारतमे स्वाधीनताक अर्थ अछि बजबाक स्वतंत्रता (किछु गोटेक मते) । एहन प्रवृत्तिक व्यक्ति बजबाक शब्दमे आरो स्वतंत्रता अपना हिसाबे ल लैत छथि । बजबाक माने भेलैन देशक राष्ट्रपति के किछु कहि देनाई, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के गरिया देनाई, देशक गौरव के होहकारि देनाई, अपना घरक अग्रज के लुलुआ देनाई । किएक त हम स्वाधीन भारतक स्वतंत्र नागरिक होयबाक कारण किछु बाजि सकैत छी । अही फर्मूला पर हम नाटक देखै छी, दर्शक छी तेँ हम किछु बाजि सकैत छी । बात त ठीक अछि ।

 
मुदा, एहन प्रवृत्तिक व्यक्तिक शब्दकेँ दोसर कतेक महत्व स लैत अछि इहो हम सब नीक जेना जनैत छी । तेँ जरूरी अछि जे अपन स्वतंत्रता आ अधिकारक उपयोग नीक जेना सोचि समझि क करी । रंगकर्म वा कि कोनो कलाक परिणति जखन प्रेक्षकगणक प्रत्यक्ष राखल जाइत अछि ओहि स पहिने ओ कृत्ति कतेको चरण स गुजरैत छैक । हम एकटा नाटक मादे बेसी नीक जेना गप्प क सकैत छी । नाटक कियो लेखक लिखैत छथि । एकटा नाटक लिखैमे कतेको साल लागि जाइत छनि । नाटकक लेखक गर्भमे कथ्य के पोसैत पालैत छथि तखन जा क ओकरा जन्म दैत छथि । एकर बाद कोनो निर्देशक गम्भीरता पूर्वक नाटक के लेखकक दृष्टि स देखैत छथि, बूझै छथि । एहि कृति के जीवंत करबाक लेल कतेको तरहक शिल्पक सहारा लैत छथि । आब ई नाटक 10 15 गोटे अभिनेता / अभिनेत्री / शिल्पी लग जाइत अछि । सब गोटे लगभग 45 50 दिन एक्कै विषय पर नियमित पूर्वाभ्यास करैत छथि । तकरा बाद अपन कथ्य आ अथक परिश्रम के प्रेक्षक लग रखैत छथि ।  जाहि मे किछु लोकनि (दर्शक) एहि लेल आयल रहैत छथि

1.    चल मैथिलक जमाबड़ा हेतैक, कतेको गोटे स भेंट भ जायत ।

2.    चल बहुत दिन भ गेल नाटक देखला, देखियै की करैत जाइत छैक ?

3.    फल्लां कतेको बेर कहलक अछि, एहि बेर ज नै जेबै त नीक नै, चलि जाइत छी ।

4.    देखै छियै क गलती करैत अछि, काल्हि स नीक जेना बोकियेबैनि ।

आदि आदि ।  अपन अपन आँखि आपन अपन चश्मा ।

किछुए गोटे एहन छथि, जिनका जीवनमे नाट्यकर्म जरूरी बुझाइत छनि आ ओ लोकनि नाट्य संवेदना स पूड़ित भ नाटक देखबा लेल अबैत छथि । विगत सात सालक बादो हमरा ई कहबामे कनियो संकोच नै होइत अछि जे एहन आत्मीय प्रेक्षक लोकनिक संख्या अखन तक 50 % नै भेल अछि । मुदा, हिनके लोकनिक उपस्थिति आ वक्तव्य के नाट्यकर्मी अपेक्षा रखैत अछि आ हिनक गम्भीरता स देल गेल विचार के आत्मसात क आगू बढ़ैत अछि । ई अनुपात नियमित बढ़ि रहि अछि से देखि खुशी छी ।

अपन दर्शक सँ आग्रह जे प्रेक्षक बनथु हम सब अहाँक गम्भीर दृष्टिक बाट तकैत छी ।      

 - प्रकाश झा

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