नाटक देखबा
लेल आयल सब लोकनि के प्राय: एक्के रंग बूझि जयबाक प्रचलन अछि । नाटक देखाबय बला घर
के नाट्यगृह वा कि प्रेक्षागृह कहल जाइत अछि । तेँ प्रेक्षागृहमे बैसल सब लोकनि
केँ प्रेक्षक कहब उचित अछि । एहि ठाम एकटा गभीर प्रश्न ठाढ़ होइत अछि जे ई दू टा
शब्दमे की अंतर छैक – दर्शक आ प्रेक्षक । जखन कि दूनू गोटे त’
नाटके देखबाक लेल अयलाह छथि । एहि दूनू शब्दक अर्थ एक्के बूझब सतही ज्ञानक परिणाम
होयत ।
| मैलोरंग के प्रस्तुति पाँच पत्र देखैत प्रेक्षकगण |
रामचन्द्र
वर्मा अपन शब्दसागर मे दर्शक के फरिछाक’ लिखै छथि –
दर्शन करनिहार / देखनिहार / दृष्टा भेलाह दर्शक । संगहि प्रेक्षक के सविस्तार लिखैत
छथि –
नीक जेना देखनिहार छथि प्रेक्षक । अर्थ ई जे सब देखनिहार दर्शक त’
छथिए आ दर्शको मे नीक जेना देखनिहार प्रेक्षक भेलाह । एहि ठाम ‘नीक
जेना’
शब्द के नीक जेना बुझबाक आवश्यकता अछि ।
रंगमंचक
हिसाबे व कि कोनो कला लेल गप्प आगू बढ़ायब त’ लागत जे दर्शक स’
आगू प्रेक्षकक दरकार बेसी अछि एहि सब माध्यम के । जहिना कोनो कलाक सृजक लोकनि अपन
सृजनक गम्भीरताक संग प्रदर्शन करैत छथि ताहिना एहि कला के देखनिहार सेहो ओतबे
गम्भीरताक संग ओहि सृजनता मे डूबैत जाइत छथि । ई कर्म रंगमंचमे दोसर कलाक अपेक्षा
आरो बेसी अछि । जा धरि नाटक मंचपर होइत अछि एकर दर्शक (प्रेक्षक) नाटकमे आ
अभिनेताक संग ओहि कथ्यमे डूबैत रहैत छथि । नाटक समाप्तिक बादे हुनका अपन वास्तविक
जीवनक आभास होइत छनि । मंचपर अभिनेता नचैत छथि, संग संग दर्शक (प्रेक्षक) सेहो मने
मोन नचैत रहैत छथि । अभिनेता कनैत छथि त’ दर्शक (प्रेक्षक)
के आत्मा सेहो कनैत छनि । अर्थ ई जे मंच पर जे कोनो रस संचारित होइत अछि वैह रसमे
लीन रहैत छथि दर्शक (प्रेक्षक) । प्रेक्षागृहमे बैसल जाहि दर्शकमे एहन स्थिति नै
उत्पन्न होइत छनि बूझू जे ओ सत्ते दर्शक छथि, प्रेक्षक किन्नहु नहि कहल जा सकैत
छथि ।
अपन व्यक्तिगत
अनुभव कहैत छी, जाहि स्थिति स’ सब गोटे कहियो ने कहियो रूबरू भेले
होयब । नाटक चलैत रहैत अछि अहाँक बगलमे बैसल सज्जन के फोन (मोबाइल) बाजि उठै छनि आ
ओ सज्जन मोबाइल पर गप्पो कर’ लगैत छथि । हिनका ई कनियो आभास नै रहैत
छनि जे हमर एहि व्यवहार स’ बगलमे बैसल सज्जन के कोनो तरहक बाधा
होइत हेतनि वा कि मंच पर करुण स्थितिक उपस्थितिमे विघ्न होइत हेतैक । मुदा
प्रेक्षागृहमे त’
अहूँ छी ओहो छथि । एक्के नाटक अहूँ देखै छी आ ओहो देखै छथि त’
कि हुनको अहाँ अपने एहन दर्शक कहबनि ? वा कि एक गोटे दर्शक भेलाह आ दोसर गोटे
प्रेक्षक ? स्वंम उत्तर भेट सकैत अछि ।
नाटकक आदि
ग्रंथ नाट्यशास्त्र मे भरत मुनि कहने छथि जे “नाटक
देखनिहार सब लोकनि के दर्शक कहि देनाई उचित अछि कारण अपेक्षित गुण नहियो भेला पर
ओहो त’
नाटक देखिते छथि । मुदा, जे लोकनि नाटकक मर्म तक पहुँचैत छथि वैह नाटकक असली
प्रेक्षक छथि ।”
किछु गोटेकक
कहब छनि, भाई हम एहि नाट्यकलाक गम्भीरता त’ नै जनैत छी मुदा
दर्शक छी तेँ हमरा बजबाक अधिकार त’ अछिए । ई लोकनि
ओहिना बजैत छथि जेना भारतमे स्वाधीनताक अर्थ अछि ‘बजबाक’
स्वतंत्रता (किछु गोटेक मते) । एहन प्रवृत्तिक व्यक्ति ‘बजबाक’
शब्दमे आरो स्वतंत्रता अपना हिसाबे ल’ लैत छथि । बजबाक
माने भेलैन –
देशक राष्ट्रपति के किछु कहि देनाई, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के गरिया देनाई,
देशक गौरव के होहकारि देनाई, अपना घरक अग्रज के लुलुआ देनाई । किएक त’
हम स्वाधीन भारतक स्वतंत्र नागरिक होयबाक कारण किछु बाजि सकैत छी । अही फर्मूला पर
हम नाटक देखै छी, दर्शक छी तेँ हम किछु बाजि सकैत छी । बात त’
ठीक अछि ।
मुदा, एहन
प्रवृत्तिक व्यक्तिक शब्दकेँ दोसर कतेक महत्व स’ लैत अछि इहो
हम सब नीक जेना जनैत छी । तेँ जरूरी अछि जे अपन स्वतंत्रता आ अधिकारक उपयोग नीक
जेना सोचि समझि क’
करी । रंगकर्म वा कि कोनो कलाक परिणति जखन प्रेक्षकगणक प्रत्यक्ष राखल जाइत अछि
ओहि स’
पहिने ओ कृत्ति कतेको चरण स’ गुजरैत छैक । हम एकटा नाटक मादे बेसी
नीक जेना गप्प क’
सकैत छी । नाटक कियो लेखक लिखैत छथि । एकटा नाटक लिखैमे कतेको साल लागि जाइत छनि ।
नाटकक लेखक गर्भमे कथ्य के पोसैत – पालैत छथि तखन जा क’
ओकरा जन्म दैत छथि । एकर बाद कोनो निर्देशक गम्भीरता पूर्वक नाटक के लेखकक दृष्टि
स’
देखैत छथि, बूझै छथि । एहि कृति के जीवंत करबाक लेल कतेको तरहक शिल्पक सहारा लैत
छथि । आब ई नाटक 10 – 15 गोटे अभिनेता / अभिनेत्री / शिल्पी
लग जाइत अछि । सब गोटे लगभग 45 – 50 दिन एक्कै विषय पर नियमित
पूर्वाभ्यास करैत छथि । तकरा बाद अपन कथ्य आ अथक परिश्रम के प्रेक्षक लग रखैत छथि
। जाहि मे किछु लोकनि (दर्शक) एहि लेल आयल
रहैत छथि –
1.
चल’
मैथिलक जमाबड़ा हेतैक, कतेको गोटे स’ भेंट भ’
जायत ।
2.
चल’
बहुत दिन भ’
गेल नाटक देखला, देखियै की करैत जाइत छैक ?
3.
फल्लां कतेको बेर
कहलक अछि, एहि बेर ज’ नै जेबै त’
नीक नै, चलि जाइत छी ।
4.
देखै छियै क’
त’
क’
त’
गलती करैत अछि, काल्हि स’ नीक जेना बोकियेबैनि ।
आदि आदि । अपन अपन आँखि आपन अपन चश्मा ।
किछुए गोटे
एहन छथि, जिनका जीवनमे नाट्यकर्म जरूरी बुझाइत छनि आ ओ लोकनि नाट्य संवेदना स’
पूड़ित भ’
नाटक देखबा लेल अबैत छथि । विगत सात सालक बादो हमरा ई कहबामे कनियो संकोच नै होइत
अछि जे एहन आत्मीय प्रेक्षक लोकनिक संख्या अखन तक 50 % नै भेल अछि । मुदा, हिनके
लोकनिक उपस्थिति आ वक्तव्य के नाट्यकर्मी अपेक्षा रखैत अछि आ हिनक गम्भीरता स’
देल गेल विचार के आत्मसात क’ आगू बढ़ैत अछि । ई अनुपात नियमित बढ़ि
रहि अछि से देखि खुशी छी ।
अपन
दर्शक सँ आग्रह जे प्रेक्षक बनथु हम सब अहाँक गम्भीर दृष्टिक बाट तकैत छी ।
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सुन्दर आलेख, निश्चित रूपेण हमरा सभक दर्शक से प्रेक्षक बने पड़त.
जवाब देंहटाएंdhanyawad bhai saheb....
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