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संदर्भ : ई आलेख हुनका लेल अछि जे लोकनि रंगमंच व्यक्तिगत कारण स’
छोड़लथि आ आरोप दोसरा पर लगबैत छथि । आलेख किनको पर व्यक्तिगत नै अछि, एहन प्रकारक मानसिकता
पर केन्द्रित अछि ]
आदरणीय लोकनि
अपन आजुक आमदनी के अपन व्यक्तिगत अधिकार बूझैत छथि मुदा रंगकर्म स’
जूड़ल व्यक्तिक आमदनीक हिसाब सेहो राख’ चाहैत छथि । एहना
स्थिति मे आंतरिक व्यथित भेनिहार के सावधान होयबाक आवश्यकता छनि । आगू अबै बला
भविष्य रंगमंचक स्वर्णिम भविष्य अछि । आब रंगकर्मी सेहो नीक घर खरीद सकैत छथि, कार
पर भ्रमण क’
सकैत छथि, हिनको धिया पुता नीक ठाम शिक्षा दीक्षा ल’ सकैत छनि
। तेँ एहि बीमारी स’
छुटकारा पयबाक लेल एक मात्र इलाज अछि । रंगकर्मम् शरणम् गच्छामि...।
रंगकर्म स’
लोक जुड़ैत छथि अपन व्यक्तिगत आपेक्षा वाकि आकांक्षा स’
। किनको सिनेमामे पर्दा पर जीबैत अभिनेता आकर्षित करैत छनि त’
किनको अपन साहित्यिक पात्र के मंचपर जीबैत देखबाक लोभ रहैत छनि । किनको संगी अनैत
छनि त’
कियो एही कर्म के अपन जीवनक लक्ष्य बनेबाक दृढ़ संकल्प एहि विधामे खींच अनैत छनि ।
किछु
समयोपरांत ; जीवनक विभिन्न ज्वार –
भाटाक सामना करैत एहि विधामे तन्मयताक संग सक्रिय रहैत छथि । अपन उम्रक संग बढ़ैत
बेगरता / आवश्यकता वा एहि क्षेत्रक कर्तव्यनिष्ठा आ माँगक प्रतिबध्यताक अपन सीमा
के नीक जेना अकानि एहि विधा स’ अपना के शनै: शनै: फराक क’
लैत छथि । मुदा, जा धरि एहि विधा मे संलग्न रहैत छथि ता धरि जे किछु सिखैत छथि तकर
नीक जेना दोहन दोसर विधा मे करैत छथि । अर्थात, अतिशीघ्र दोसर विधामे संबलता
प्राप्त करैत छथि । कियो डॉक्टर, कियो मास्टर, कियो इंजीनियर, कियो सी.ए. कियो
प्रोफेसर [अपना मिथिला मे लेक्चरार के नेम प्लेट पर सेहो प्रोफेसरे देखल जाइत
अछि], कियो किरानी त’ कियो बड़ा बाबू, कियो पत्रकार त’
कियो सम्पादक आदि आदि बनि जाइत छथि । जीवनक सब भौतिक सुख पयबाक लेल हठ्ठा स’
खुजल बरद जेना घरमुँहा भ’ जाइत छथि ।
किछु साल धरि
हिनक कोनो तरहक व्यक्तिगत बृद्धिक सूचना नै प्राप्त होइत अछि । सूचना ई भेटइत अछि –
नीक नौकरी प्राप्त क’ लेलाह अछि वा नीक ठाम विवाह भ’
गेलन्हि अछि < नीक ठाम जमीन खरीद लेलाह अछि < चारिपहिया गाड़ी भ’
गेलन्हि अछि < घर बान्हि लेलाह अछि < आब दू – महला ठोकि
लेलाह अछि < संतान के दिल्ली / मद्रास मे पढ़बैत छथि < पाइ द’
क’
कोनो प्राइवेट कॉलेज स’ एम.बी.ए. / बी.सी.ए. करा रहल छथि <
बेटा के कोनो विदेशी कम्पनीमे नौकरी लागि लेलन्हि अछि < घर के दुनू परानी चुप
चाप ओगरि क’
बैसल रहैत छथि आदि आदि...
उपर्युक्त सब
भैतिक सुख प्राप्ति केलाक बाद हिनका लोकनि के नीन्द खूजैत छनि कि चेहा क’
उठै छथि आ तखन मोन पड़ैत छनि मंच – बजबाक लेल / भुकबाक लेल । संयोग देखू,
तखने अपन विशाल हबेलीक आगू टाँगल लेटर बॉक्स मे भेटैत छनि कोनो सम्पादक पत्र । एहि
स’
आसान काज की ? न हींग लगे न फिटकीरी... । बैसल बैसल किछु लिखू, सौंसे दुनिया नाम
पसरि जायत, वर्तमान डिजिग्नेशन संग । आब
लिखताह की ? त’
ओही विधा पर जकरा तिलांजलि देने छलाह : नाटक / मैथिली नाटक / मैथिली रंगमंच । नाटको
मे सबस’
आसान कोन काज ? हम एहि कारण छोड़लहुँ त’ हमरा फल्लां ( जे
लोकनि एखन तक लागल छथि ) भगा देलाह । एहने सन अनर्गल प्रलाप । किछु पत्रिका एहने
एकालाप / प्रलाप वाकि बुद्धिहीनता स’ ग्रसित आलेखक संकलन
बनि निकलि रहल अछि । अधिकांश लोकनि अपन आलेख मे मैथिली रंगमंचक ह्रास स’
उठैत छथि आ भंगिमा के संग आजुक मैथिली रंगशीर्ष श्री कुणाल जी पर
अपन डिप्रेशन / फ्रशटेशन उतारि दैत छथि । ( हम एहि ठाम भंगिमाक वर्तमान
आंतरिक स्थिति वा कि श्री कुणाल जीक व्यक्तिगत सबंध पर किछु नै लिखि रहल छी
मुदा जे नाम बेर बेर आलेखक सृजक लोकनि लेलाह अछि ताहि के संदर्भ मे चर्चा क’
रहल छी । ) तामस ई जे जहिना हम छोड़लहुँ ई लोकनि किएक नै छोड़लाह, किएक लागल रहलाह ।
वर्तमान रंगकर्मी जे हमरा भगौड़ा कहत ताहि स’ पहिने हम स्वयं
किएक ने आरोप लगा दी । आई रंगमंचक नाम पर किएक हिनके सबहक नाम होइत अछि ? आजुक
युवा पीढ़ी किएक हिनके सबहक गुणगान करैत छथि ? तेँ एही लोकनि पर प्रहार कयल जाय ।
जाहि समय ई लोकनि रंगमंच छोड़लाह ताहि समयक अपन व्यक्तिगत स्थ्ति परिस्थितिक चर्चा
किएक करताह ? जे लोकनि सब किछु त्यागि एहि विधा के अपनैलन्हि एक पेरिया पर रौद /
बसात, बाढ़ि पानि मे उघारे देहे रंगपथ पर अग्रसर रहलाह तिनके पर आरोप प्रत्यारोप ।
एहि ठाम रंगदृष्टि स’ कठघरा मे ई लोकनि स्वयं ठाढ़ छथि । एहि
लेल कतेको तर्क अछि ।
एहि सत्यता स’
किन्नौ नहि नकारल जा सकैत अछि जे सूर्यक रोशनी के सूप स’
झाँपल नै जा सकैत छैक । तहिना कोनो प्रतिभा के सेहो समाप्त नै कयल जा सकैत छैक । ई
भ’
सकैत अछि जे प्रतिभा किछु समय लेल दबि जाय मुदा ओकरा आगू अयबा स’
कियो रोकि नै सकैत छैक । एकटा विद्वानक कथन छनि जे कोनो समूहमे आकर्षण स’
बहुत व्यक्ति जूड़ैत छथि मुदा समयानुसार अकर्मन्य व्यक्ति ओहि समूह स’
फराक हुअ’
लगैत छथि । बाद मे एहि सब अकर्मन्य व्यक्तिक सेहो एकटा संगोर बनि जाइत छैक आ एही
अकर्मन्यक संगोर स’
सकर्मी समूह के अदृश्य उर्जा सेहो प्राप्त होइत छैक । ई उक्ति अक्षरस: सत्य बैसैत
अछि मैथिली रंगमंचक संदर्भमे । आई जे लोकनि एहन कलुशित भावना मोनमे रखैत छथि हुनको
स’
हमर बाल प्रश्न अछि जे अहाँ जँ एतेक समृद्ध आ प्रतिबद्ध रही त’
जूड़ल रहितौं रंगकर्म स’ । दोसरे ठाम रंगमंच स्थापित क’
लितहुँ अपना मोनक अनुसार । जँ भंगिमा वा कि श्री कुणाल जी स’
द्वेस छल त’
हिनका लोकनि स’
पैघ लकीर सृजित करितौं । मत्त भिन्नता भेल भंगिमा स’, श्री कुणाल
जी स’
कि रंगकर्म स’?
ई आरोप –
प्रत्यारोप नीक नहि । गंभीर रंगकर्मी वा कि अबै वला रंगपीढ़ी अहाँक मानसिकता के नीक
जेना आँकलित क’
सकैत छथि ।
हम स्वयं
एकटा उदाहरण छी । आई मैलोरंग निश्चित रूपे हमर रंगदृष्टिक प्रतिफल अछि । मैलोरंग
हमर आ हमरे सन सन रंगकर्मीक प्रतिबद्धताक परिणति अछि मैथिली रंगमंचक प्रति । हमरा
कतेको मैथिली मंच स’ हटाओल गेल । कतेको मंच स’
हम स्वयं हटलहुँ तेँ कि हम रंगकर्म छोड़ि देलहुँ ? आकि ओहि सब मंच या व्यक्ति पर हम
आरोप प्रत्यारोप करी ? हमरा जनैत ई उचित नहि अछि । हमरो संग कतेको गोटे काज केलाह
अछि, अखनो तक प्रतिबद्ध रंगकर्मी संग छथि । कतेको गोटे एहिना अपन व्यक्तिगत कारण स’
छोड़िक’
चलि गेलाह । हुनको लोकनि स’ एहने प्रलाप हमरो सुनबा मे अबैत अछि ।
एहन प्रलापीक संख्या काल्हि आरो बढ़त, ताहू स’ हम रंगमंच स’
विचलित त’
नहि भ’
जायब । हमर एकटा मित्र के विश्वास छनि जे “
मैलोरंग रहै, चाहे सैलोरंग रहै, चाहे फैलोरंग रहै –
प्रकाश छथि त’
नाटक हेब्बे करतै ।”
हमरा प्रति एहन विश्वासक हम आभीरी छी । की, एहन विश्वास अहूँ लोकनिक प्रति
नहि होयबाक चाही छल ?
कतेको एहन
उदाहरण हमरा सबहक समक्ष अछि । श्री अमिताभ बच्चन के इलाहाबाद रेडियो ध्वनि परीक्षा
मे अनुतीर्ण क’
देने रहैन्हि, अभिनेता मनोज वजपेयी के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय चयन नै केने
रहैन्हि । तेँ कि ई लोकनि एहि विधा के छोड़ि देलाह ? रंगमंच विशुद्ध कला थिक । ई
कला अत्यंत कठोर छैक । हंस बनि क्षीर पानि के बिलगाबै मे माहिर अछि रंगविधा । अपने
कोन दिस छी से स्वयं आँकि सकैत छी ।
- प्रकाश झा
Bahut neek prakash bhaijee.
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