शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

‘कुछ लिखा ही नहीं’ कहकर सबकुछ लिख देना

डॉ. प्रकाश झा  

शतपर्णी 
सुखद संयोग ही है की पिछले लगभग दो–तीन वर्षों में किसी–न–किसी सार्वजनिक पटल पर यदा–कदा श्रीनारायण झा रचित काव्य–कृति पढ़ने का सुअवसर प्राप्त होता रहा है । पर, अभी–अभी एक साथ श्री झा रचित  लगभग एक सौ कविता पढ़ने का अवसर भी मिला ।  

सफल कविता उसे ही कहा जाता है, जो हृदय तथा मस्तिष्क दोनों को स्पंदित कर दे, भले ही बात वर्तमान का करे पर प्रभाव दूरगामी हो । साहित्य सृजन सदा से ही सामाजिक व्यवस्था के मंगलकारी परिवर्तन का कारण बनता रहा है । इस प्रकार साधारण जनसमूह के जीवनयापन से इस सृजन का गंभीर संबंध बन जाता है । जब साहित्य रचना समकालीन समाज का अनुषंगी बनाकर रची जाती है, तो वह निश्चित ही महत्वपूर्ण और कालजयी हो जाती है ।

ऐसी ही काव्य रचना श्रीनारायण झा के कलम से अवतरित हुई लगती है । इनकी रचना में मानव जीवन और प्रकृति के छोटे–से– छोटे क्षण को भी भाषा और भाव की भंगिमा का जामा पहनाकर प्रस्तुत किया गया है । जैसे, रोड पर मोटर गाड़ी के नीचे आकर मरे एक कुत्ते के पास बैठे उसके छोटे से असहाय बच्चे की तस्वीर देखकर कलम से निकले एक–एक शब्द पाठक के लिए कर्णभेदी गूंज में बादल जाती है, जब वह सुनता है – “नहीं पापा ! नहींऐसे न जाओ । उठो पापा !”…   


पुस्तक में संकलित कविता के प्राय: प्रत्येक छंद का संगीत समतल और सरल है । पंथी रे शीर्षक की पंक्ति किस नगरी से आया पंथीकिस नगरी है जाना रे !कभी आपको बांग्ला के बाउल संगीत की झलक दे जाती है, तो कभी निर्गुण का भान यह कहते हुए की - जाने भी दो, जो कुछ मेरे साथ हुआ सब अच्छा था ।

अतीत और आधुनिक दोनों का स्वाद और चमक मौजूद है इनकी काव्य रचना में । सहज संप्रेषणीयता इनकी रचना का प्रथम व्याकरण है । उपदेशात्मक अवगुण से दूर, सहजता से आपके मन में कब प्रवेश पा जाती है पता ही नहीं चलता ।

आमजन जिस तरह की भाषा आसानी से समझते, बोलते हैं उसका निखरा हुआ काव्यमय रूप का स्वाद यहाँ प्राप्त होता है । जब आप तेज हवा से गुजरते हैं, तो ऐसी ही भाषा से रूबरू होते है - “बचे हैं हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई उड़ा के ले गई वो प्यार, बहुत तेज हवा  या फिर - “इस दुनियाँ ने जाने कैसे कैसे सबक सिखाये रे ! पूनम और अमावस दोनों ही हमको दिखलाये रे! बेहद सजग और जागृत सामाजिक एवं व्यक्तिगत चेतना से लवरेज कविता रचते हैं श्री झा । 



ऐसा कभी नहीं लगता की श्रीनारायण झा रचित काव्य ज़बरदस्ती लिखा गया है वा किसी अनुरोध वा आयोजन के लिए हड़बड़ी में शब्दों को पिरोया गया है । प्राय: सभी कविता मन के विस्तार के साथ स्वत:स्फूर्त शब्दों का घरौंदा लगता है । कोई भी कविता बोझिल नहीं लगती । कविता ऐसी जो आपके मन:स्थिति में सुंदर चित्र सृजित करती रहे । प्रत्येक पंक्ति मन को उद्वेलित एवं तरंगित करती रहे, कविता का एक एक शब्द ऐसा जो प्रेम, द्वंद एवं अपनत्व का सुगंध इर्द–गीर्द बिखेरती रहे । इनकी काव्य रचना का शिल्प बहुत ही खुला – खुला सा अपनापन लिए हुए है ।

व्यक्तिगत सी लगती रचना अपने भीतर सफ़ेद सत्य को इस तरह गर्भित की हुई है की वह व्यक्तिवाचक से निकल कर समूहवाचक संज्ञा का रूप धारण कर लेती है और अपनी मौन गर्जना से पाठक के हृदय पर प्रहार किए बिना नहीं रह पाती, जब आप दिवंगत’, ‘अगर ऐसा हुआ होता’, ‘अर्धांगिनी’, ‘चाँद और तुम’, ‘असफल दांपत्य की राह से गुजरते हैं ।

 

काव्य कृति के अंत में कवि अपने सुखानुभूति से अस्तित्वबोध के साथ पूरी समग्रता से नियति को ही आदमी की दास्तांमानते हैं और मालिक से’, ‘अवरुद्ध कंठहो आह्वान करते हुए विदाई के साथ कहते हैं कि कुछ लिखा ही नहीं । यही सहजता इन्हें अप्रतिम बना देता है ।


मुझे पूरा विश्वास है कि यह काव्य कृति हिन्दी के पाठकों के मानसिक संवेदना को उद्वेलित करेगा । अपने श्रेष्ठ अग्रज श्रीनारायण झा जी को उनके इस प्रथम पुष्प कुछ लिखा ही नहीं के लिए बहुत बहुत बधाई ।   


डॉ. प्रकाश झा

(सहायक संपादक, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, नई दिल्ली) 

-          04.05.2021 

                  

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