किछुए साल पहिने हमर सबहक किछु ओजस्वी मित्र लोकनि भारत सरकारक संस्था साहित्य अकादेमी के पंगु संस्था घोषित करैत एकटा तथाकथित सशक्त संस्था ‘समानांतर साहित्य अकादेमीक’ निर्माण केलनि । अफरातफरी मे पंगु भेल साहित्य अकादेमीक ‘पंगु सम्मान’ के निम्न स्तरीय कहि नकारैत, एकटा सबल सम्मान ‘समानांतर साहित्य अकादेमी सम्मान’ के घोषणा कयल गेल । एहन सबल आ निश्पक्ष प्रथम ‘समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान’ स’ सम्मानित भेल रहथि आदरणीय श्री जगदीश प्रसाद मण्डल । हमरा जनैत एहि समानान्तर अकादेमीके शायद दोसर मैथिली साहित्यकार फेर नहि भेटलनि, जिनका एतेक पैघ सम्मान स’ सम्मानित कयल जानि । श्री जगदीश बाबू पहिल आ अंतिमे बुझू ।
जहिया भारत
सरकारक पंगु घोषित साहित्य अकादेमीक अकादेमी सम्मान लेल श्रीमान जगदीश प्रसाद
मण्डल जीक नामक घोषाणा भेलनि त’ अनयासे मोन पड़ि गेल समानांतर साहित्य
अकादेमी संस्था द्वारा प्रदत्त हिनक सम्मान । विचार अभरल जे जाहि साहित्यकार केँ
एतेक पैघ सम्मान प्राप्त भैये गेल छलनि से आब तथाकथित पंगु साहित्य अकादेमीक ई
तुच्छ सन सम्मान किएक आ कोना लेताह ? अही पंगु सम्मानक एवज मे त’ हिनका मैथिली साहित्यक
सबस’ पैघ सम्मान स’ स्म्मानित कयल गेल
छलनि । ई त’ ओहिना भेल जेना शहनाई वादक पं. बिस्मिल्ला खान
के जखन सैंसे विश्व स’ सम्मान भेट गेलनि, देशक सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ तक भेट गेलनि तखन हुनका ‘बिहार सम्मान’ देलकनि । तेहने दोसर उदाहरण ई सम्मान लागल ।
मुदा हौ बाबू
! हद्द त’
तखन समाचार पढि क’ लागल जे पूर्वमे घोषित ‘पंगु साहित्य अकादेमी’ श्रीमान जगदीश प्रसाद मण्डल
जी केँ हुनकर लिखल ‘पंगु’ उपन्यासे के
सम्मान देलकनि अछि । मतलब दूटा पंगु एक संग सोझा आयल ।
पूर्वमे
साहित्य अकादेमी सम्मान के घोषणा स’ दू – तीन मास पहिने आ घोषणाक
दू – तीन मास बाद धरि साहित्य समाजमे एहि सम्मानक धम्मक रहैत छल । पुरजोर गहमा
गहमी । कियो रुष्ठ त’ कियो प्रसन्नचित्त । कियो ताल ठोकथि त’
कियो अप्पन सशक्त रचना केँ आद्र दृष्टिए तकैत । अलगम – अलग साहित्य
खेमा मे अलग अलग समीकरण पर चर्च वर्च । अनकर सोंगर पर नाम कमेनिहार साहित्यकार
लोकनि सेहो अपन कांख तर बैसाखी फँसा, तनि क’ ठाढ़ भ’ निर्णायक लोकनि के होलियाबैत रहैत छलाह ।
कतेक गोटे त’ हुनकर होलियेनाइक भाषा के कारण मैथिली
साहित्यकार द्वारा चानन लगा साहित्यिक खेमा के उच्च पद पर आसीन तक भ’ जाइत छलाह । मुदा, एहि बेर सब चुप्प... नि:शब्द । पूर्व
जेना – तेना किछुओ नहि भान लागल । फेसबुक सन साहित्यिक अखाड़ा रणभूमि पर सेहो पंगु
बनल पहलवान सब ‘पंगु’ लेल बधाई शब्द स’
कनी आगू ‘अशेष बधाई’
मात्र तक पहुँच सकलाह । एहन चुप्पी किएक ? यदि आइ सम्मानक आगा कथाकार अशोक,
सुभाष चंद्र यादव, श्रीनिवास, तारानंद वियोगी, प्रो. देवशंकर ‘नवीन’, वीभा रानी, महेंद्र
मलंगिया, महेंद्र नारायण राम, वीरेंद्र
मल्लिक आदि मे स’ किनको नाम रहितनि तखन की साहित्यक मार्केट
गरमायल नहि रहितै ? कियो ब्राह्मणवाद कहितथि, कियो पचपनियाँ, त’ कियो चमचयि,
त’ कियो झाँपन आदि आदि संज्ञा संग सोझाँ
अबितथि । सेहो सब चुप्प... ।
मुदा, ‘पंगु’क रचनाकारक सोझाँ सभ गोटे पंगुए बुझि पड़लाह । समानांतर साहित्य अकादेमी के
सृजक लोकनि सेहो पंगु बनि पंगु साहित्य अकादेमीक सम्मान ल’ तृप्त
भ’ गेलाह । समांनांतर सम्मानक गाँझ आब कोठी कान्ह पर... । ई ‘पंगु’ शब्द अपन व्यापकता मे कतेको गोटेक पंगुपन के
देखार क’ देल ।
अही बेर
हिंदी भाषा लेल साहित्य अकादेमी सम्मान हथियेनिहार श्री दया प्रकाश सिंहा जी राजा ‘अशोक’ लेल अपन टिप्पणी स’ बेस चर्चा अर्जित कयलनि । अतनुसार
साहित्य अकादेमीक मैथिली भाषारूपी रथ के समंवक श्री अशोक सर एवं हुनकर सारथी लोकनि
तेहन ने समधानि क’ अविचल झटहा फेकलाह से सम्पूर्ण मैथिली
साहित्य समाज नीक जेना पंगु बनि अपन पुआरक गद्दा स’ उठि नहि
सकलाह । गजब शॉट लागल... ।
एहि पंगु स’ पंगुआयल
फगुआक माहौल मे एकटा विंदु आरो स्थापित भेल अछि । वर्तमान मे मैथिली साहित्यक
स्थापित साहित्यकार, जिनका हाथमे मैथिलीक सबस’ पैघ झंडा छनि यानि साहित्य अकादेमीक मैथिली परिषदक कंवेनर प्रो. अशोक
अविचल जी सत्यापित क’ देलनि अछि जे ई पंगु उपन्यास बाबा
यात्री जीक बलचनमा स’ दू धाप आगूक रचना थिक । एहि तथ्य के
गीरह बान्हि, अपना बाँहि पर जंतर बना लटकालौथ पहलवान
साहित्यकार लोकनि आब । हिनका सबहक सबटा रचना पंगु बनि गेलनि अछि आब । आजुक तारिख स’
हिनक रचना श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीक रचना ‘पंगु’ स’ तौलल जेतनि । जेना प्रो. अशोक अविचल जीक रचना ‘पंगु’ स’ पाछू छ्नि आ कि ‘पंगु’ स’ आगू । तहिना आनो
साहित्यकार लोकनिक रचना सेहो ।
एखन तक
पंगु... पंगु... पंगु पढैत पढैत अहूँ लोकनि पंगुआ लेल होयब । तेँ सबस’ एक
बेर आग्रह जे तथाकथित पंगु साहित्य अकादेमी स’ सम्मानित एहि ‘पंगु’ उपन्यास के अवश्य पढी । हँ ! हिनकर पोथी बाजारमे
नहि भेटत, विशेष आग्रह कयला बादे एकर प्रिंट निकालल जायत आ
तखने अपनेक हाथ आओत ई ‘पंगु’ उपन्यास ।
‘पंगु’ उपन्यास के सम्मान देला बाद साहित्य अकादेमी आ ‘पंगु’ लेल सम्मान ग्रहण क’ क’ श्री
मंडल जी ‘समामांतर साहित्य अकादेमी’ के
अवश्य पंगु घोषित क’ देलाह अछि ।
जय हो ‘पंगु’ उपन्यासक, जय तो ‘पंगु’क रचनाकारक, जय हो ‘पंगु’
के चयनकर्ताक, जय हो ‘पंगु’
रूपे पूर्व मे घोषित साहित्य अकादेमीक, जय हो
आब ‘पंगु’ बनल समानांतर साहित्य
अकादेमीक आ अंतमे जय हो ‘पंगु’ बनल
मैथिली साहित्यकारक ।
अस्तु; हमरा
व्यक्तिगत रूपे ने आदरणीय श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक विद्वता पर कोनो शंखा अछि,
ने आदरणीय श्री अशोक अविचल जी आ सम्मान चयन कर्ता पर कोनो शंखा अछि
आ ने ‘पंगु’ उपन्यासक पात्रता पर संदेश
अछि । हँ ! समानांतर साहित्य अकादेमी आ ओहि स’ उपजल स्थिति –
परिस्थिति पर अवश्य दृष्टि अछि ।
आब हम अपना
पर पंगु वाण प्रहार स’
बचबाक लेल सेहो पंगु कवच धारण क’ लैत छी ।
उम्मीद अछि ओ लोकनि जे एखनो तक अपना के एहि ‘पंगु’पन स’ सुरक्षित रखने छथि से अवश्य वक्र दृष्टिए कोनो
ने कोनो ईमोज़ी रखताह ।
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