शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

समृद्ध मैथिली रंगमंचक समकालीन विहंगावलोकन


किछु दिन पहिने एक संग दूटा पत्रिका पढ़बाक मौका भेटल । दुनू पत्रिका मैथिली रंगमंच पर केन्द्रित । मुदा, पत्रिका पढ़लाक बाद मोन बिचलित भेल । पत्रिका त आजुक समयक अछि । एकर पाठक सेहो आजुक समयक छथि । कोनो पत्रिकाक मूल त आजुक समय आ दृष्टिक प्रस्तुतिकर्ता होइत अछि मुदा एहि दुनू पत्रिकामे छपल आलेख निराधार आ समकालीन स्थिति स कोनो सम्बन्ध नहि रखैत अछि । पत्रिका भले ही अपना गर्भमे रंगमंच के रखने होई मुदा एकर प्रकाशित रूप रंगमंचक घोर विरोधी अछि ।
पत्रिकामे जतेक आलेख रंगमंच पर अछि अधिकांश नकारात्मक सोचके आगू बढ़बैत छैक । सब आलेखक शीर्षके ऊर्जाहीन अछि रंगमंचक संबंधमे किनको प्रतिबद्धताक अभाव देखाइत छनि त कियो भित्ति देखैत छथि । किनको मैथिली रंगमंचक चिंता देखाइत छनि त कियो मैथिली रंगमंचक पटाक्षेप क देलाह अछि । रंगमंचमे किनको समस्ये समस्या सूझैत छनि त किनको एहि मे आधुनिकता नै देखाइत छनि । कियो भोतहा डॉक्टर बनि मैथिली रंगमंचक उंटा साँस गनैत छथि त कियो महिलाक स्थिति पर अपन तापमान बढ़ा रहल छथि । रंगकर्मी के आई आर्थिक स्वतंत्रता भेट रहल छै त हिनका लोकनि के अपन अर्थ पर संकट देखार भ रहल छनि । अहाँ अपना कर्म स पाई कमाउ से नीक रंगकर्मी अपना कर्म स पाई कमेताह त प्रश्नवाचक निशान । ई छनि तथाकथित समालोचकक समकालीन दृष्टि जिनका कान्ह पर समाजक प्रसस्तिकरणक जिम्मेदारी छनि । 
एहि स ठीक विपरित अछि आजुक मैथिली रंगमंच । युवा रंगकर्मी रंगकर्मक प्रति अपन प्रतिबद्धता स सराबोर छथि । एहन उदाहरण एक नै सैकड़ोमे अछि । रंगमंचके भित्ति देखेनिहार के अपन नव नव प्रयोग देखा रहल छथि मैथिली रंगकर्मी । उम्रक अपन अंतिम मैच खेलनिहार के भले ही मैथिल रंगमंचक चिंता आरो दुखित करैत होइन मुदा अखुनका मैथिली रंगमंच आब अपन समृद्धिक उदाहरण बनि रहल अछि, दोसर विधाक लेल । मैथिली रंगमंचक पटाक्षेप करनिहार लोकनि प्रेक्षागृह दिस समय पर आबथु आ मैथिली रंगमंचक उषाकाल के देखथु । मैथिली रंगमंचक समस्याक चिंता कयनिहार महानुभाव के बूझक चाही जे आजुक मैथिली रंगमंच हुनकर पारिवारिक  / सामाजिक चिंता के मंचपर नियमित प्रेषित क रहल अछि ।
ई हमरा घोर आश्चर्य लगैत अछि जे हम सब एना व्यक्तिवादिता दिस किएक बढ़ि रहल छी ? रंगमंच त अछिए समूहक कार्य । एहि मे सामुहिकता अछि । ई कखनो व्यक्तिवादिता स ग्रसित नै भ सकैत अछि । व्यक्तिवादी रचनाशील व्यक्ति कहियो रंगमंच के नीक दृष्टि स नै देखलाह अछि । उदाहरण स्वरूप हम अपन अनुभव कहैत छी । हमरा कतेको फोन अबैत अछि हम फल्लां बाबू बजैत छी, अहाँ सबहक कार्यक जानकारी भेटैत रहैत अछि । अहाँ लोकनि नीक जेना लागल छी । ई कहू जे एखन कोन कोन नाटक सब नव आयल अछि ? वाकि किछु मैथिलानीक नाम कहू जे एखन नाटक क रहलीह अछि ? वाकि एहि साल कोन कोन नव नाटक भेल अछि ?  आदि आदि । कारण पुछलाक बाद ज्ञात होइत अछि जे एहि विद्वान के मैथिली रंगमंच विषय पर होइ बला कोनो सेमिनारमे आलेख पढ़बाक छनि / किनको नाटक पर पुस्तक छपि रहल छै तै मे आलेख पठेबाक छनि आ नै त कोनो पत्रिका के कोनो कोन मे रंगमंच पर चारि पाँती लिखबाक छनि । हमर नाम हुए, हमरा किछु अर्थालाभ हुए, हमरा रंगमंचोक अनुभव अछि, एही बहन्नी कतौ यात्राक मौका भेट जाय आदि आदि व्यक्तिगत सोच चाहे हम एहि विधाके जनैत छी वा नै । एहन सोच किएक बढ़ि रहल अछि उपर्युक्त विद्वतगण मे ? बुझलौं जे अपने महान कवि छी, महान सम्पादक छी, महान कथाकार निबंधकार छी तकर माने ई त नै जे अपने आनो विधा पर अपन सिद्धहस्ता स्थापित करबे करी ।
हाँ, किछु व्यक्ति छथि जिनका बहुमुखी प्रतिभा छनि त ओ हुनकर लेखनी मे देखार होइत छनि । ओ लोकनि एना निराशवादी आ आरोप प्रत्यारोप मे अपन उर्जा नै प्रवाहित करैत छथि । किछु लेखक कनी बुधियार अपना आलेखमे किछु संस्थानक नामों लिखलाह अछि मुदा सब नाम गलती छनि । हिन्दी मे कहाबत छै अकल बढ़ाने के लिए नकल की आवश्यक्ता होती है, नकल करने में भूल हुई तो सकल बिगड़ जाती है । सैह स्थिति आलेख पढ़ला बाद होइत अछि । अपना जीवनमे कहियो रंगमंचक सम्पर्कमे अयलाह । पाछू स हुथकेला पर अपन पाट कोहुना केलाह आ आब ओकरे स्वर्णयुग मानि आजुक रंगमंचक स्थिति पर विचारो देबाक लेल सबस आगू बैसताह । एहन प्रवृत्ति पर रोक लागक चाही ।           
जे तथाकथित विद्वतजन लोकनि आजुक समयमे स्वयं नाटके के आधुनिक नहि मानैत छथि, एहि विधा स जुड़ल व्यक्तिके एखनो हीन भावना स देखैत छथि वैह लोकनि साहित्य अकादेमीक सेमिनारमे मैथिली नाटकक आधुनिकतापर अपन आलेख पढ़ैत छथि । आब एहना स्थितिमे नाट्य विधा स जुड़ल रंगकर्मी लोकनि हिनक एहन प्रदूषित आलेखक पन्ना के रद्दीमे बेचताह ताहिमे ककर गलती ?
आजुक समयमे एहन आलेख किएक लिखल जा रहल अछि तकरो किछु जबरदस्त कारण छैक । पहिने कोनो गामक युवा लोकनि वा शहरक युवा पूजा पाबनिमे अपन आ किछु तथाकथित गणमान्य लोकनिक मोनक रंजन करबाक लेल नाटक क लैत छलाह । फेर साल भरि अपन आन - आन काज धंधा देखैत छलाह । नाटक देखबाक लेल बेर - बेर अनुनय विनय करैत छलाह । आब एकर ठीक उल्टा स्थिति भ रहल अछि । आजुक युवा एहि क्षेत्रमे अपन कैरियर बना रहल छथि तेँ समुचित प्रशिक्षण ल रहलाह अछि । खुशामद क अपन नाटक देखबा लेल सादर आमंत्रण देताह ताहि स जरूरी होइत अछि एहि विधाक विशेषज्ञ के किएक नहि देखेताह जाहि स हिनकर प्रशिक्षणक उचित प्रतिफल भेटत । एहना स्थिति मे लिखार लोकनि त तामसमे एहिना एहि रंग विधाक अर्थी निकालताह ।   
हमरो स प्रश्न कयल जा सकैत अछि जे मैथिली रंगमंच पहिने स समृद्ध भेल अछि तकर की प्रमाण ? - आजुक मैथिल युवा लोकनि एहि क्षेत्रमे नीक जेना स्थापित भेलाह अछि । हमरा लग एहन युवाक संख्या पचास स बेसी अछि । एहि विधामे प्रशिक्षण देनिहार लगभग सब संस्थानमे एक स दू टा मैथिली भाषी प्रशिक्षण ल रहलाह अछि । अर्थ ई जे लगभग पचास युवा एहि विधाक प्रशिक्षुत छथि । लगभग नौ टा युवा एखन भारत सरकार स एहि विधामे छात्रवृत्ति प्राप्त क रहल छथि । पाँच गोटे के जूनियर फेलोशिप भेट रहल छनि आ एक गोटे के सीनियर फेलोशिप । हमरा ज्ञानमे पाँच विश्वविद्यालयमे मैथिली रंगमंच विषय के केन्द्रमे पी. एच. डी. शोध कार्य चलि रहल अछि । की, एहना स्थिति के मैथिली रंगमंचक समृद्धि नै मानल जयबाक चाही ?  
नकारात्मक प्रवृत्तिक व्यक्तिक कथन हेतनि जे बेसी नाटक मंचपर किएक नै देखाइत अछि ? श्रीमान नाटक मंचन देखला बाद यैह लोकनि बेचारे अभिनेता लोकनि के दसटा नसीहत ठोकि दैत छलाह । जखन कोनो गप्प होयत कि अपने गप्प क लगैत छलाह । कतेको बेर आग्रह केलाक बाद ई लोकनि प्रेक्षागृह तक टघरैत छलाह । प्रस्तुतिक बाद बेचारे रंगकर्मी हिनका लोकनि स आशीर्वचन सुनबा लेल नतमस्तक रहैत छलाह । हिनका लोकनिक एक्के ब्रह्म वाक्य हम जे ई नाटक केने रही त एहन महान काज भेल रहै, तूँ सब हरबरी मे क लैत छह, आरो मेहनति कर बेचारे रंगकर्मी मुँह लटकौमे स्व-स्थानम् गच्छ । जखन कि सत्य रहैत अछि एकर ठीक उल्टा । परिणाम भेल जे धीरे - धीरे रंगकर्मी लोकनि हिनका लोकनि के आग्रह पाती छोड़ि देलाह । एकर अर्थ ई लगाओल जा रहल अछि जे नाटक होइते नै छैक । किएक त नाटक शुरू होइ स पहिने आब दीप नै जरैत छैक, भाषणबाजी नै होइत छैक, अनाप सनाप विचार गोष्ठी नै राखल जाइत अछि । जे आम प्रेक्षक छथि ओ लोकनि खूब नीक जेना नाटक ग्रहण करैत छथि आ हॉल भरल रहैत अछि । ई तथ्य हम आजुक कतेको संस्थाक प्रमुख लोकनि आ रंगकर्मी स गप्प केलाक बाद लिखि रहल छी । 
मैथिली रंगमंच मैथिलीक कोनो आन विधा स बेसी मजबूत भेल अछि । एकरा सहर्ष स्वीकार करक चाही । एहि विधा स जुड़ल व्यक्ति मानसिक आ आर्थिक दुनू रूपे अत्यधिक समृद्ध भेलाह अछि । आम मैथिलजनमे कोनो विधा स बेसी लोकप्रिय भेलाह अछि मैथिल रंगकर्मी । मैथिली रंगमंच मिथिलाक संस्कृति आ साहित्य दुनू के आगू अनबामे अग्रणी काज क रहल अछि । आग्रह जे मैथिली रंगमंचक समृद्धि के अकानू । मैथिली रंगमंचक लेल अहाँक लेखनी आ तर्कमे विहंगम दृष्टि रखबाक प्रयोजन अछि । 
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2 टिप्‍पणियां:

  1. मैथिली रंगमंच पर अपन अल्प ज्ञान लs क एकटा आलेख हमहूँ लिखने छी, देखल जाओ. दोसर इ आरोप सरासर गलत अछि जे;जे रंगमंच पर खाली ओ लिख सकैत अछि जे एहि विद्या मे पारंगत अछि, मैलोरंग क नाटक देखैत देखैत हमहूँ सभ एतबा बुझी गेलोंउ की रंगमंच पर लिख सकैत छी.
    http://www.esamaad.com/regular/2012/10/11009/

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  2. उपरका आलेख मे मात्र दू पत्रिका मे छपल लेखक संदर्भ मे आलेख अछि. ई बात त' अहाँक सत्य अछि जे विधाक पारंगते टा नीक जेना नै लिख सकैत छथि मुदा नीक लिखबा लेल विधाक पूर्ण जानकारी भेनाई त' आवश्यके अछि. अधकचरा ज्ञान स' लिखल आलेख नव पीढ़ीके भटकाबैत अछि. ई अहाँक विद्वता अछि जे मैलोरंगक नाटक देखैत देखैत अहाँ रंगमंचपर नीक लिख सकैत छी. एहि मे एकटा त' स्वीकृति अछि ने जे नाटक पर लिखबा लेल देखब जरूरी छैक. की बिना देखने अहाँ पहिने नीक जेना लीख सकैत रही ??? आजुक स्थिति यै अछि. ई आलेख हुनके सब लेल छैन जे साल मे एक्कोटा नाटक नै देखैत छथि...

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