| सुन्दर संयोग मे अभिनेता संतोष कुमार |
| सुन्दर संयोग मे प्रवीण, अनिल एवं नीरा |
एहि सँ कनी
आरो आगू बढ़ी । जँ रंगमंच के मैथिली साहित्यकार लोकनि साहित्यक कोनो विधा हेबाक
प्रमाणपत्र दैत छथिन त’ ओहू सभ विधा मे नाट्यकर्म अन्य दोसरा
सँ बेसी फलदायी अछि । तकर सबूत देबाक आवश्यकता हमरा नहि बुझना जाइत अछि । एहि
एक्कैसम शताब्दी मे होमाक बादो जँ किछु तथा कथित गणमान्य व्यक्ति मे शंका व्याप्त
छनि तँ हुनका समक्ष हम किछु तथ्य, किछु उदाहरण आ किछु प्रश्न प्रस्तुत करबाक
प्रयास करैत छियनि, जाहि सँ हुनका सभहक
बीच नाट्यविधाक लेल व्याप्त भ्रम दूर भ’ सकनि ।
किनको द्वारा
ई कहि हीन देखायब जे रंगमंचमे कोनो तरहक जॉब नहि छैक, नाट्यकला केँ पेट भरबाक
सामर्थ्य नहि छैक आदि आदि । ई एहि क्षेत्र के गंभीरता सँ अध्ययन नहि होबाक परिणाम
थिक । हम आइ एतेक तक कहि सकैत छी, जे एहि तरहक भ्रम केँ मिथिला समाज मे प्रचारित
करब एकटा सोचल समझल रणनीति मानल जयबाक चाही । मिथिला मे एहन तरहक काज बेसी संख्या
मे ओहन व्यक्ति द्वारा भ’ रहल अछि जे अपना आप केँ साहित्यकार
घोषित केने छथि ।
आजुक समय मे
कियो सज्जन पूर्णरूपेण ई दावा नहि क’ सकैत छथि जे ओ अपने
(वा कोनो फलां धारे बाबू) मात्र कविता वा कथा वा उपन्यास लिखी क’
अपन आ अपन परिवारक भरन-पोषण करैत छथि ।
एकर ठीक
विपरीत अछि रंगविधा । एकटा व्यक्ति जँ रंगकर्मी छथि वा कि कहियो कम-सँ-कम एक्को
महीनाक लेल सघन रूप सँ रंगकर्म केने छथि त’ हुनकर जीवनक प्राय:
सभ क्षेत्र मे एकर प्रभाव देखार भ’ जाइत अछि । ई हुनकर
जीवनक अंतिम क्षण तक संग रहैत अछि । जँ ओ
रंगकर्मी छलथि / छथि त’ ओ छात्रक नजरि मे एकटा नीक शिक्षको
हेताह से गारंटी अछि । ओ एकटा अनुशासित अधिकारी, नीक वक्ता, नीक प्रवक्ता, नीक
अधिवक्ता वाकि नीक नेता हेताह से कहल जा सकैत अछि । एकटा शिक्षक जँ अभिनय करताह त’
ओ नीके करताह से किन्नौ नहि मानल जा सकैत अछि । एकटा अधिकारी वा प्रोफेसर नीके
नाटक लिखताह / नीके अभिनय करताह / नीके निर्देशन करताह तकर संभावना नगन्ये मात्र
होयत ।
उपर्युक्त
तथ्य जँ कनियो सत्य लगैत अछि त’ कहल जाओ जे कोन विधा महत्वपूर्ण अछि
जीवनक लेल; रंगकर्म वा कि कोनो दोसर ? हँ रंगकर्म ततेक ने अनुशासन सिखबैत छैक जे ओ
रंगकर्मी अपन जीवनो मे आवश्यक्ता स’ बेसी अनुशासित भ’
जाएत अछि । तकर प्रभाव अखन तक मिथिला मे साफ उल्टा भेलैक अछि । कियो किम्हरो स’
अबैत अछि आ एक सिंह नाट्यकर्म केँ मारि चलि जाएत अछि । ई कतौ स’
उचित नहि । बिडम्बना त’
ई अछि जे जाहि विधा पर ई लोकनि अपन अपन तर्क-वितर्क वाकि कुतर्क करैत छथि ओहि समूह
मे पहिने सँ रंगकर्म सँ जूड़ल व्यक्ति केँ बजायब आ हुनकर सहमति वा अहमति लेबाक कोनो
प्रयोजनो नै महसूस करैत छथि । बंद कोठली मे निर्णय लैत छथि आ सम्पूर्ण समाजक पाई
सँ बनल संस्था सभ सँ मोटगर-मोटगर ग्रंथ छापि नुका रहैत छथि । एहन लोकनि केँ
लेशमात्र ग्लानि नहि होइत छनि जे नबका पीढ़ी के ओ की द’
रहल छथिन वा जहिया कहियो नवका सभहक समक्ष
सत्य ओतैत तखन एहि सभ ग्रंथ पर छपल नामक प्रति ओ सभ की प्रतिक्रिया करतैक । ओ पीढ़ी
आजुक पीढ़ी सँ बेसी प्रतिक्रियावादी हेतैक से हमरा सभ के मोन राखक चाही ।
रंगकर्म एकटा
एहन कला अछि जाहिमे सबस’ बेसी जोर होइत अछि ई जे ‘अपना
आप के चिनहू/बूझू/जानू’ । जीवनोक यैह मूल मंत्र अछि । अहाँ
अपना आप केँ, अपन सामर्थ्य केँ जतेक नीक जेना बूझब अहाँ ओतेक सफल होयब अपन जीवनमे
। तेँ अति आवश्यक अहि जे सभ व्यक्तिकेँ एहि बिधा सँ जूड़ि लाभ उठाबय चाहियनि ।
मिथिला
समाजमे रंगकर्मक महत्ताके प्रचारित प्रसारित करबाक अति आवश्यकता अछि । एहि दिस सभ
विद्वानकेँ आगू अएबाक चाहियनि ।
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[ नोट : ई आलेख 2009 मे लिखल गेल छल ]
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