बुधवार, 1 मई 2013

मानसिक समृद्ध समाजक प्रतिफल होइछ समृद्ध रंगकर्म



सुन्दर संयोग मे अभिनेता संतोष कुमार

















 
सब कला मे श्रेष्ठतम कला मानल गेल अछि रंगकर्म के । से आइ नै, प्राचीने काल स’। इहो कोनो खास सभ्यतामे नै बल्कि विश्वक सब सभ्यता मे । जँ रंगकर्म केँ कला सँ संज्ञापित कयल जाय त सिवाय रंगकला के दोसर कोनो  कला - चाहे ओ चित्रकला होइ वा संगीतकला वा नृत्यकला; अपना छोड़ि दोसर कोनो प्रोफेशन मे (आजुक समय मे सेहो ) सपोर्टिभ नहि होइत छैक । सभ कला मात्र सीमित क्षेत्रक लेल उपयुक्त होइछ संगहि व्यक्तिगत बेसी । मुदा रंगकर्म व्यक्तिगत स’ बेसी सामाजिक होइछ, तेँ रंगकर्म के आन कोनो दोसर कला मे श्रेष्ठ कला मानल गेल अछि ।
 हमरा समाजक समाजशास्त्रीक ई अंभिज्ञता या अज्ञानता बूझी, जे सर्व साधारण तक एहि कलाक विशेषता केँ नहि प्रचारित क’ एकर विपरित प्रचार प्रसार कयल गेल । परिणाम हमरा सभहक समक्ष अछि, जे आइ विश्व के एक्कैसम शताब्दी मे होबाक बाबजूद, सूचना तंत्रक क्रांतिक होबाक बादो हमर समाज रंगकला सँ जीविकाक प्रश्न करैत अछि वा एहि क्षेत्रक जानकारीमे अपन असमर्थता देखबैत अछि । आखिर एहन स्थिति किएक ? ई सवाल हमर अपन समाजशास्त्री आ समाजक अगुवा माननिहार लोकनि स’ अछि ।

 
नाटक वा रंगमंचक संदर्भमे मिथिला समाजक अधिकांश व्यक्ति अखनहु तक अत्यंत असमनजसमे छथि । ई विधा कतेको रास तर्क कुतर्क स’ घेरल अछि । जिनका जतेक कम ज्ञान छनि ओ ओतेक ज्ञानिक अभिनय क’ एहि विधा के अपना हिसाबे तोड़ि-मड़ोरि क’ समाजक आगू प्रस्तुत करैत छथि । एहि रंग विधाक प्रकृति की अछि, ई कोन व्याकरणक आधार पर चलैत अछि एहि स’ संबंधित बहुत थोड़  तथ्य उजागर भेल अछि वा ई कही जे ओहि दिस कम्मे लोकनि के ध्यान गेलन्हि अछि । रंगमंच के आइयो गम्भीरता स’ नहि लेल जा रहल अछि । जे किछु लिखल वा कहल गेल सेहो ततेक ने शास्त्रीय भ’ क’ जे ओ आरो बुझौबलि बनि समाजक बीच व्याप्त रहि गेल ।
सुन्दर संयोग मे प्रवीण, अनिल एवं नीरा
एहि सँ कनी आरो आगू बढ़ी । जँ रंगमंच के मैथिली साहित्यकार लोकनि साहित्यक कोनो विधा हेबाक प्रमाणपत्र दैत छथिन त ओहू सभ विधा मे नाट्यकर्म अन्य दोसरा सँ बेसी फलदायी अछि । तकर सबूत देबाक आवश्यकता हमरा नहि बुझना जाइत अछि । एहि एक्कैसम शताब्दी मे होमाक बादो जँ किछु तथा कथित गणमान्य व्यक्ति मे शंका व्याप्त छनि तँ हुनका समक्ष हम किछु तथ्य, किछु उदाहरण आ किछु प्रश्न प्रस्तुत करबाक प्रयास करैत छियनि, जाहि सँ  हुनका सभहक बीच नाट्यविधाक लेल व्याप्त भ्रम दूर भ सकनि । 

 

किनको द्वारा ई कहि हीन देखायब जे रंगमंचमे कोनो तरहक जॉब नहि छैक, नाट्यकला केँ पेट भरबाक सामर्थ्य नहि छैक आदि आदि । ई एहि क्षेत्र के गंभीरता सँ अध्ययन नहि होबाक परिणाम थिक । हम आइ एतेक तक कहि सकैत छी, जे एहि तरहक भ्रम केँ मिथिला समाज मे प्रचारित करब एकटा सोचल समझल रणनीति मानल जयबाक चाही । मिथिला मे एहन तरहक काज बेसी संख्या मे ओहन व्यक्ति द्वारा भ रहल अछि जे अपना आप केँ साहित्यकार घोषित केने छथि ।

 

आजुक समय मे कियो सज्जन पूर्णरूपेण ई दावा नहि क सकैत छथि जे ओ अपने (वा कोनो फलां धारे बाबू) मात्र कविता वा कथा वा उपन्यास लिखी क अपन आ अपन परिवारक भरन-पोषण करैत छथि ।

 

अहाँ सभ हमरा जनतब केँ कनि फरिछा सकैत छी त कहू जे कवि / कथाकार / उपन्यासकार / नाटककार / शिल्पकार / चित्रकार आदि लोकक अपन एहि कलामे महारथ हेबाक केहन प्रभाव हुनकर समसामयिक काज पर पड़ैत छनि ? की एकटा नीक कवि नीक शिक्षक भ सकैत छथि तकर कोन गारंटी अछि । एकटा नीक कथाकार नीक अधिकारी हेबे करताह से के कहि सकैत अछि ? एकटा नीक शिल्पकार वा की चित्रकार नीक वक्ता, प्रवक्ता, अधिवक्ता वाकि नेता हेताह से के दाबा संग कहि सकैत छथि  ? प्राय: ई देखल गेलैक अछि ओ मैथिलीए मे नहि दोसरो-दोसरो भाषा मे जे एकटा शिक्षक जँ कविता लिखता त नीके लिखताह, एकटा प्रवक्ता कथा लिख देलाह त ओ नीके होयत, एकटा अधिकारी कोनो फोटो बनेलाह त सभ स पैघ चित्रकार कहाब लगताह । आ मैथिली मे प्रोफेसर साहेब (जे किनको प्रासाद स एहि पद पर आसीन छथि, कोनो प्रतियोगिता परीक्षा वा की यू.जी.सी. आदि स चयनित नहि भेल छथि ) त सफेद कागज पर किछु घँसियो देताह त समीक्षक वा हुनके समगोत्री लोकनिकेँ ओहि मे आर्ट / कविक प्रखरता / कथाक गंभीर कथ्य / उपन्यासक जटिलता / नाटक मे प्रयोगात्मक्ता देखा जाइत छनि ।

 

एकर ठीक विपरीत अछि रंगविधा । एकटा व्यक्ति जँ रंगकर्मी छथि वा कि कहियो कम-सँ-कम एक्को महीनाक लेल सघन रूप सँ रंगकर्म केने छथि त हुनकर जीवनक प्राय: सभ क्षेत्र मे एकर प्रभाव देखार भ जाइत अछि । ई हुनकर जीवनक अंतिम क्षण तक संग रहैत अछि ।  जँ ओ रंगकर्मी छलथि / छथि त ओ छात्रक नजरि मे एकटा नीक शिक्षको हेताह से गारंटी अछि । ओ एकटा अनुशासित अधिकारी, नीक वक्ता, नीक प्रवक्ता, नीक अधिवक्ता वाकि नीक नेता हेताह से कहल जा सकैत अछि । एकटा शिक्षक जँ अभिनय करताह त ओ नीके करताह से किन्नौ नहि मानल जा सकैत अछि । एकटा अधिकारी वा प्रोफेसर नीके नाटक लिखताह / नीके अभिनय करताह / नीके निर्देशन करताह तकर संभावना नगन्ये मात्र होयत ।

 

उपर्युक्त तथ्य जँ कनियो सत्य लगैत अछि त कहल जाओ जे कोन विधा महत्वपूर्ण अछि जीवनक लेल; रंगकर्म वा कि कोनो दोसर ? हँ रंगकर्म ततेक ने अनुशासन सिखबैत छैक जे ओ रंगकर्मी अपन जीवनो मे आवश्यक्ता स बेसी अनुशासित भ जाएत अछि । तकर प्रभाव अखन तक मिथिला मे साफ उल्टा भेलैक अछि । कियो किम्हरो स अबैत अछि आ एक सिंह नाट्यकर्म केँ मारि चलि जाएत अछि । ई कतौ स उचित नहि ।  बिडम्बना त ई अछि जे जाहि विधा पर ई लोकनि अपन अपन तर्क-वितर्क वाकि कुतर्क करैत छथि ओहि समूह मे पहिने सँ रंगकर्म सँ जूड़ल व्यक्ति केँ बजायब आ हुनकर सहमति वा अहमति लेबाक कोनो प्रयोजनो नै महसूस करैत छथि । बंद कोठली मे निर्णय लैत छथि आ सम्पूर्ण समाजक पाई सँ बनल संस्था सभ सँ मोटगर-मोटगर ग्रंथ छापि नुका रहैत छथि । एहन लोकनि केँ लेशमात्र ग्लानि नहि होइत छनि जे नबका पीढ़ी के ओ की द रहल छथिन वा जहिया कहियो नवका  सभहक समक्ष सत्य ओतैत तखन एहि सभ ग्रंथ पर छपल नामक प्रति ओ सभ की प्रतिक्रिया करतैक । ओ पीढ़ी आजुक पीढ़ी सँ बेसी प्रतिक्रियावादी हेतैक से हमरा सभ के मोन राखक चाही ।   

 

रंगकर्म एकटा एहन कला अछि जाहिमे सबस बेसी जोर होइत अछि ई जे अपना आप के चिनहू/बूझू/जानू । जीवनोक यैह मूल मंत्र अछि । अहाँ अपना आप केँ, अपन सामर्थ्य केँ जतेक नीक जेना बूझब अहाँ ओतेक सफल होयब अपन जीवनमे । तेँ अति आवश्यक अहि जे सभ व्यक्तिकेँ एहि बिधा सँ जूड़ि लाभ उठाबय चाहियनि ।

                       

मिथिला समाजमे रंगकर्मक महत्ताके प्रचारित प्रसारित करबाक अति आवश्यकता अछि । एहि दिस सभ विद्वानकेँ आगू अएबाक चाहियनि ।

 

 

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[ नोट : ई आलेख 2009 मे लिखल गेल छल ]
 

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