बुधवार, 18 सितंबर 2013

मणिमञ्जरी नाटक मे संगीत : परिकल्पना स’ प्रस्तुति धरि


दीपक ठाकुर
नाटक मणिमञ्जरीक सबस’ कठिन आ मजबूत पक्ष अछि एकर संगीत । विद्यापति रचित गीतक संगीत मैथिली जन मानस मे तेना ने जैड़ि जमौने अछि जे एहि मे बेसी प्रयोग कखनो मान्य नै भ’ सकल अछि । हम अपन सब नाटकमे संगीत लेल कोनो ने कोनो स्थापित संगीत संयोजक केँ अनैत रही मुदा, हमरा कहियो संतुष्टि नै भेटल । पिछला किछु साल स’ मैलोरंगक युवा रंगकर्मी दीपक ठाकुर केँ संगीत रचना आ संगीतक संयोजन दिस बढ़ैत लगाव देख हमरा मोन मे दीपक ठाकुर केँ मणिमञ्जरी लेल संगीत संयोजनक भार सौंपक विचार आयल । संगहि राजीव रंजन झा खूब नीक गायन करैत छथि आ अत्यधिक ऊर्जा स’ भरल युवा छथि आ संगीतक प्रति अति उत्साह आ आकर्षण सेहो । संगहि एहि दुनू रंगकर्मीक बीच नीक केमेस्ट्री सेहो छन्हि । एकर फायदा मैलोरंग के भेटक चाही छल । एहि लेल रंगमंडल प्रमुख मुकेश जी आ वरीष्ठ पार्श्व संगीत ध्वनि संयोजक राजीव मिश्रा स’ विचार विमर्श कयल गेल । तीनू गोटे एहि निर्णय पर पहुँचलहुँ जे ई दुनू गोटे मेहमती त’ छथिए जँ अपना निगरानी मे हिनका सब स’ काज कराओल जाय त’ नीक परिणति आबि सकैत अछि । एहि लेल एकटा कूटनीति स्थापित भेल । जाहि मे हम तीनू गोटे शामिल भेलहुँ । विचार भेल जे ई दुनू व्यक्ति प्रतिक्रियावादी छथि तेँ सब दिन एहि जोड़ी केँ कोनो ने कोनो रूपे उकसायल जाय ताकि हिनका सबहक धनात्मक ऊर्जा सदैब बनल रहैन ।   
 

राजीव रंजन झा

हाँ ! दीपक ठाकुर केँ संगीत सौंपबाक तीनटा ठोस कारण छल । पहिल त’ ई जे अपन युवा साथी पर विश्वास करक चाही । ई लोकनि जँ अपन संस्था मे एहन काज नै क’ सकताह त’ कोना सिखताह आ अपना प्रति विश्वास कोना बढ़तन्हि । दोसर, ई लोकनि हरदम हमर सोचक अनुरूप संगीत करताह आ हरदम रंगकर्मीक बीच रहताह जाहि स’ सब अभिनेता संगीत स’ अपनापन स’ जुड़ताह । संगीत कतौ स’ हुनका लोकनिक लेल थोपल नै बुझायत । तेसर ई जे बाहर स’ व्यक्ति के आनब अत्यधिक अर्थ साध्य आ मानसिक क्लेश दैत रहल अछि । हमर सब रंगकर्मी हरदम हुनका प्रति सेवा भाव स’ समर्पित होयबा लेल बाध्य भ’ जाइत छलाह । जे हमरा किन्नौ नै रुचैत अछि ।  अस्तु ।
 
हँ ! त’ हम अपन विश्वास के मजबूत करैत संगीतक भार दीपक ठाकुर आ राजीव रंजन झा केँ सौंप देलियन्हि । ई दुनू युवा खुशी खुशी एहि अति महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के ल’ संगीत निर्माण कार्य मे लागि गेलाह । एहि बीच विद्यापति गीतक सैकड़ों कैसेट सुनल गेल । नाटक मे गीतक संख्या तीस स’ बेसी छल । कथा क्रम के अनुरूप गीतक तारतम्य जोड़ैत गीतक छटनी केलहुँ । गीतक पाँती मे लयानुरूप उपट – पुलट भेल । प्रतिदिन एकटा गीतक लय दुनू गोटे अनैत गेलाह । गीतक लय पर कतेको बेर घमासान भेल । हिनका दुनू गोटेक परिश्रम कतेको बेर मजाक बनि क’ रहि जाइत छल मुदा धन्यवादक पात्र छथि हमर दुनू रंगकर्मी जे अपन परिश्रम स’ कखनो पाछू नै हटलाह आ नियमित प्रयास करैत रहलाह । संगीत लेल हमर आग्रह छल जे संगीत विद्यापति जीक नव रूप मे हुए आ एहि नव रूप मे रंग संगीतक प्रभाव रहै । डर छल जे प्रेक्षक कहीं विद्यापति संगीतक रस मे सराबोर भ’ नाटकक कथ्य स’ विमुख नहि भ’ जाथि । तेँ एहन आग्रह छल जे प्रेक्षक केँ समानुपात मे संगीत, नाट्य आ अभिनय तीनूक समिश्रणक अनुभूति भेटन्हि ।
संगीत लेल हमर एकटा आर स्वीकारोक्ति अछि । हमर एहि युवा जोड़ी दीपक ठाकुर आ राजीव रंजन झा के संगीत परिकल्पना मे सदैव वाद्ययंत्रक अभाव रहलैन्ह । कहियो हॉरमोनियम वादक नै त’ कहियो तबला या ढोलकक अभाव मुदा तैयो हमर रंगकर्मी मनोज पांडे, संतोष कुमार, अमरजी राय, विपुल आनंद नियमित रुपे कोनो ने कोनो वस्तु के अपन वाद्ययंत्र बना हिनका लोकनि के उत्साहित करैत रहलाह । अंतिम समय मे हमर पुरान रंगकर्मी मो. दाउद राइन दिल्ली आयल आ हॉरमोनियम वादन शुरु केलक । दिन राति हॉरमोनियम पर अभ्यास करैत अपना के अनुकूल क’ लेलक । मो. दाउद सेहो अपन लगनशीलता स’ नतमस्तक होयबाक लेल हमरा बाध्य केलक अछि । भाई अजित कुमार एक दिन एहिना पूर्वाभ्यास देखबा लेल आयल रहैथि । संगीत मे रीदम के अभाव आ सब रंगकर्मीक अदम्य उत्साह हिनका रोकि लेलक । अजित अपन सब ट्यूशन छोड़ि नियमित रूपे हमर रंगकर्मीक संग तबला ल’ बैस गेलाह आ आब हमर संगीत टीम दीपक ठाकुर, राजीव रंजन झा, मो. दाउद राइन, अजित कुमार संग सब रंगकर्मी लोकनि अत्यंत ऊर्जाक संग विद्यापतिक रंग संगीतक आनंद मे सराबोर भ’ पूर्वाभ्यास क’ र’ लागल ।
 

नाटकक संगीत लेल महत्वपूर्ण होइत अछि पार्श्व संगीत ध्वनि । हमर राजीव मिश्रा पार्श्व संगीत ध्वनि मे सिद्धहस्त छथि, ई कहबा मे हमरा कोनो अशोकर्य नहि अछि । हिनका खाता मे एक स’ एक नाटक विद्यमान छन्हि । जल डमरू बाजे नाटक मे हिनक पार्श्व संगीत ध्वनि आइयो हमरा सबके आंदोलित करैत अछि । एहि नाटक मणिमञ्जरी लेल सेहो ई भार राजीव मिश्रा के कान्ह पर छलन्हि । अपन पुरान आदतन रुपे राजीव नियमित पूर्वाभ्यास देखैत छथि आ मंथर गति स’ अपन कार्य निस्पादित करैत छथि । अहू नाटक लेल काछुक चालि स’ चलैत राजीव मिश्रा अंतिम पाँच दिन जगलाह आ अपन कार्यरूप मे काछु स’ खड़हा बनि शुरू भ’ गेलाह । किछु मतभिन्नता, उठा-पटक संग आरोप-प्रत्यारोपक बीच दुनू संगीत टीम [ पार्श्व संगीत ध्वनि आ संगीत संयोजन ] बीच एक रूपता आबि गेल । राजीव मिश्रा एक बेर फेर अपन अनुभव स’ सबकेँ आकर्षित करबा मे कोनो त्रुटि नै रखलाह ।
हम पहिनहियो कहने छी जे हम अपन रंगकर्मीक संगोर आ उत्साह देख स्वयं मोहित होइत रहैत छी । अहू बेर सेहे भेल । ई हमर विश्वास अछि जे एहि प्रस्तुति स’ हमर युवा संगीत संयोजक टीम केँ अपना काजक प्रति अत्यंत विश्वास भेटलन्हि अछि । आब ई लोकनि केहनो परिस्थिति मे आ कोनो तरहक संगीत संयोजनक लेल तैयार भ’ गेल छथि । हमरा एहने परिणामक आवश्यकता छल ।   
 
नाटक मे संगीतक तात्पर्य मानि लेल जाइत अछि जे नाटक मे किछु गीत – नाद होयबाक चाही । मुदा, ठीक एकर उल्टा होइत अछि रंग संगीत । नाटक लेल संगीत मात्र गायन आ वादनक रूप मे रहब कथमपि आवश्यक नहि होइछ । नाटक मे संगीत अपन नव रूप मे पल्लवित होइत अछि । विद्यापति संगीत त’ सब प्रेक्षक नीक जेना सुननहि छथि हुनका फेर स’ वैह गीत वा लय नाटकक माध्यमे सुनायब प्रेक्षक के ठकबाक प्रयास होयत आ ई कार्य अति साधारण सेहो होयत । नाटक मणिमञ्जरी पद्य मे लिखल नाटक अछि । एकर संवाद सेहो बुझू लयात्मके अछि । तेँ आवश्यक छल जे संगीतक ओहन रूप सृजित कयल जाय जे कखन संवाद रूप मे आयत आ कखन गीतक रूप मे ताहि मे फड़ाक करबाक दूरी प्राय: समाप्ते जेना भ’ जाय । संवादो गीत बुझाई आ गीतो संवादे बुझना जाई । एहि नाटक लेल एहने संगीतक सृजन कयल गेल । दीपक आ राजीव रंजनक गायन ओहिना छल जेना पाछू स’ कोनो अभिनेता लय मे अपन संवाद बाजि रहल छथि आ मंच पर उपस्थित अभिनेता कोनो गीत गाबि रहल छथि । एहि तारतम्यक मिलान मे रंगकर्मी के कठिन अभ्यास क’ र’ पड़लन्हि । यैह कारण छल जे प्रेक्षक के संगीत बेसी प्रभावित क’ सकल । संगीतक समय प्रेक्षकक कान मात्र संगीत सुनि रहल छल मुदा आँखि मंच पर उपस्थित अभिताक अभिनय मे एकटक रुकल छल । नाटकक संगीत मंच पर उपस्थित अभिनेता के हुनक मन:स्थिति के कोरबा मे कतहु कमजोर नहि पड़ल । संगीतक लय आ ध्वनि अभिनेताक उल्लास, वियोग आ विरह सब मन:स्थिति के नीक जेना स्थापित करबा मे सहयोगी रहल । संगीत नाटक मे अपन रूप बदलि रंगसंगीतक रूप मे उपस्थित छल तेँ नीक लागल । एहि जोड़ीक संगीत मे हम जे कोनो चित्र बनब’ चाहलहुँ नीक जेना सृजित क’ सकलहुँ । हाँ, संगीत मे किछु कमजोरी छल से हमरा अपना बुझायल जेना महिला स्वरक उपस्थिति कम छल । प्रस्तुतिक समय एक दू ठाम संगीत बेसी लाउड भ’ गेल छल । एहि सब पर विशेष ध्यान देबाक आवश्यकता अछि ।
 
 
 
जतेक वरीष्ठ प्रेक्षक नाटक देखलाह ओ सब लोकनि संगीतक भूरि भूरि प्रसंसा केलन्हि ।  नाट्य प्रस्तुतिक बाद एकटा नाट्य समीक्षक कथन रहैन्हि जे दीपक ठाकुर अपन संगीत के ताहि ऊँचाई पर स्थापित केलन्हि अछि ओकरा तोड़ब आब हिनके बुते कठिन कार्य होयत । हमर एहि नाटक मे समान रूपे अभिनय, नृत्य आ संगीतक समावेश छल । प्रस्तुतिक बाद परिणतिक रूप मे पहिल नंबर पर संगीत रहल, दोसर पर अभिनय आ तेसर पर नृत्य । अपन सब रंगकर्मी केँ हमरा प्रति विश्वासक लेल धन्यवाद ।    

3 टिप्‍पणियां:

  1. bahut badhiyaaaa eak ta teem ke l k chalnai bahut kathin kaj aachi . se kaj prakash ji aaha k rahl chi .i bahut garv ke bat aachiiiiiiiiiiiii. bhagwati mailorang ke sab team ke ahina khush swast rakhaittttttt.

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  2. aalekh mailorangak yuva sabhak soch aa parikalpana ke
    nik dhange chinhit karaichh......prakash bhai ken aalekh lel badhai....

    KISLAY KRISHNA

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  3. हमर आलेख पढ़बाक लेल अहाँ सब के धन्यवाद । अहाँ सबहक स्नेह हमरा लिखबाक लेल आ नव नव सृजन लेल प्रेरित करैत अछि । एक बेर फेर धन्यवाद ।

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