बुधवार, 17 जुलाई 2013

विद्यापति रचित "मणिमञ्जरी" दसम दृश्य; [प्रस्तुति : मैलोरंग रेपर्टरी, दिल्ली]

हकार

मैलोरंग रेपर्टरी द्वारा विद्यापति कविक लिखल नाटक मणिमञ्जरीक मंचन दिनांक 25 अगस्त, 2013 श्रीराम सेंटर, मण्डीहाउस, नई दिल्ली के भव्य प्रेक्षागृह मे सायं 6.30 बजे प्रारंभ होयत । मैथिली भाषाक सबस प्रसिद्ध कवि विद्यापति तीन गोट मैथिली नाट्य कृतिक रचना कयल छथि । मुदा ई अत्यंत आश्चर्य अछि जे आई तक हिनक कोनो नाट्य कृतिक मंचन नहि भेल अछि । आब एकर पाँछा की कारण भ सकैत अछि से कहब कठिन अछि । मैलोरंग रेपर्टरी पहिल बेर विद्यापतिक नाट्य कृतिक मंचन देशक राजधानी दिल्ली मे करत, ई सुखदायी क्षण मे उपस्थित होयबाक लेल अहाँ के सपरिवार हकार अछि ।

 

प्रेक्षागृह मे प्रवेश सायं 6.15 बजे स शुरू भ जायत । जे पहिने औताह हुनका स्थान पहिने देल जायत ।

 
चतुर्थ अंक

  10. दृश्य :

 
 
[लड़ाईक दृश्यक उपरांत]
 
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र, अकस्माद उपस्थित व्यवधानक कारणेँ क्षण भरिक हेतु हटल असंतुष्ट कामज्वर हमरा लग पुन: लौटि आयल ।
 
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! दुष्ट महिसाक विनाश स्म हम सभ आबि गेल छी । पटॅरानी आब हमरा सभक प्रति प्रतिकूल आचरण नहि करतीह ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
आश्चर्य ! डरपोक होयबाक कारणेँ डेराइत छी, जे एतवहि सँ अहाँ अपना केँ भाग्यवान कहैत छी ।
 
 
 
[प्रियवद कंचुकी के प्रवेश] 
 
प्रियवद कञ्चुकी  
:
महाराज ! महारानी निवेदन करैत छथि जे आर्यपुत्रक स्नेहक अवहेलना करबाक समय सँ हुनका धैर्य नहि रहि रहल छन्हि तेँ अपनेक चरनक दर्शन हेतु आबि रहलीह अछि ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
देवी केँ हमरा मे बड़ पैघ स्वाभाविक दया छन्हि । हुनका कहबनि जे हुनक कृपाक हेतु ई दास प्रार्थी अछि ।
 
प्रियवद कञ्चुकी  
:
जे आज्ञा महाराज । [प्रस्थान]
 
मित्र माकन्द
:
मित्र, हम पहिनहि कहल जे महारानी प्रतिकूल नहि रहतीह ।
 
[नचैत छथि] 
 
 
 
[महारानी पद्माक प्रवेश]
 
रानी पद्मावती
:
सखी, आर्यपुत्रक स्मरन कय उत्कंठित भग गेल छी । पैर पर खसल हुनक मान नहि रखबाक लाज सँ हमर हृदय आक्रांत भय रहल अछि ।
 
कुन्दलतिका
:
लाज वय्र्थ, स्वामीक समीप जाउ ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
महारीनक हेतु स्वागत ।
 
रानी पद्मावती
:
आर्यक चरन-युगलक दर्शन सँ हम प्रसन्न छी । कुन्दलतिका...
 
कुन्दलतिका
:
स्वामी ! स्वामिनिक निवेदन करैत छथि जे स्री स्वाभावक लघुताक कारणेँ हुनका सँ जे अपराध भेल तकरा आर्यपुत्र आब क्षमा करथ्य ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
लतिका, हम अपराधे नहि मानैत छी, जे क्षमा करी ।
 
कुन्दलतिका
:
आओर ई जे मणिमञ्जरी हुनक छोट बहीन तुल्य छथिन्ह तेँ हुनका पर कोनो क्रोध नहि, आर्यपुत्र सुखपूर्वक हुनका संग बिहार करथु ।
 
मित्र माकन्द
:
[वेग मे] आश्चर्य ! महारनी उदारचरिता छथि ।
 
[महारानी सँ] महारानी अहाँ अपनहि हाथे मित्र केँ मणिमञ्जरी दिऔन्हि ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] वाह मित्र, वाह । अवसर पर चतुत कार्य कयने छह ।
 
रानी पद्मावती
:
आर्य माकन्द ! नीक विचारलहुँ । हमर बहिनि आनलि जाथि, हमरहु एहिमे उत्कण्ठा अछि।
 
मित्र माकन्द
:
महारानीक आदेशक अनुकूल कयल जाय ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
जँ अनुमति दी तँ एहि माधवीलता मण्डपकेम बैसबाक उत्सव सँ कृतार्थ कयल जाय ।
 
रानी पद्मावती
:
जे रुचैन महाराज केँ, सेह कयल जाय ।
 
 
 
[मणिमञ्जरीक प्रवेश]
 
रानी पद्मावती
:
हय मणिमञ्जरी, एतय बैसह ।
 
मणिमञ्जरी
:
हम प्रणाम करैत छी ।
 
रानी पद्मावती
:
आर्यपुत्रक वहुमान्या होथु आयुष्मती ।
 
मित्र माकन्द
:
[स्वगत] एहि मे महारानीक वाणीक परिश्रम व्यर्थ ।
 
रानी पद्मावती
:
[मणिमञ्जरीक हाथ राजाक हाथ मे राखि] आर्यपुत्र, ई बहिनी मणिमञ्जरी अहाँक हाथमे देल जाइत छथि ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
स्वति ! देवी, अहाँक प्रसन्नाताक ई परिणाम हमरा अनुगृहित कय रहल अछि ।
 
गीत
:
सज्जन होथु निरापद राजा, विजयी होथु प्रजारंजनमे ।
व्राह्मण सब कल्याण पाबि ई, व्याकुलता नहि राखथु मनमे ।।
उचित समय पर बरिसथु जलदो, वर्णाश्रम सब होथु सुचित्त ।
धान्य सबहि सँ शोभित धरती, रहथु सदा सब सुखक निमित्त ॥

 

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