गुरुवार, 11 जुलाई 2013

विद्यापति रचित "मणिमञ्जरी" चारिम दृश्य; [प्रस्तुति : मैलोरंग रेपर्टरी, दिल्ली]

मैलोरंग रेपर्टरी द्वारा विद्यापति कविक लिखल नाटक मणिमञ्जरीक मंचन दिनांक 25 अगस्त, 2013 श्रीराम सेंटर, मण्डीहाउस, नई दिल्ली के भव्य प्रेक्षागृह मे सायं 6.30 बजे प्रारंभ होयत । मैथिली भाषाक सबस प्रसिद्ध कवि विद्यापति तीन गोट मैथिली नाट्य कृतिक रचना कयल छथि । मुदा ई अत्यंत आश्चर्य अछि जे आई तक हिनक कोनो नाट्य कृतिक मंचन नहि भेल अछि । आब एकर पाँछा की कारण भ सकैत अछि से कहब कठिन अछि । मैलोरंग रेपर्टरी पहिल बेर विद्यापतिक नाट्य कृतिक मंचन देशक राजधानी दिल्ली मे करत, ई सुखदायी क्षण मे उपस्थित होयबाक लेल अहाँ के सपरिवार हकार अछि । प्रेक्षागृह मे प्रवेश सायं 6.15 बजे स शुरू भ जायत । जे पहिने औताह हुनका स्थान पहिने देल जायत ।
 

द्वितीय अंक

4. दृश्य :

 

 
 
[राजा चन्द्रसेन, मित्र माकन्द तथा परिजनक प्रवेश]
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र ! व्रतक समाप्ति मे देवीक प्रणामक निर्वाह कयल ।
मित्र माकन्द
:
आब आगू की आज्ञा अछि मित्र ?
राजा चन्द्रसेन
:
बहुत काम पीड़ा अछि, तेँ आउ प्रमदवन जाय कोनो एकांत स्थान मे बैसी, जतय निश्चिंत रूपेँ मणिमञ्जरी प्रियाक वर्णन सुख सँ मन बहलाबी ।
मित्र माकन्द
:
जे अहाँ केँ रूचै मित्र, सैह कयल जाय । [प्रमदवन मे प्रवेश]
राजा चन्द्रसेन
:
मधु टपकैत रसाल लत, हिलबय जे स्वच्छन्द ।
पवन, सेहो नहि मन हमर, करय कने सानन्द ॥
 
मित्र अहीं कहू जे कोन प्रकारेँ आनन्ददायिनी हुनका प्राप्त करी ?
 
मित्र माकन्द
:
मित्र अहाँ अति बेदनायल छी । तावत एहि ठाम विलमू, अहाँक समागमक उपाय हम सोचैत छी ।
[स्वगत] जा धरि हिनका कोनो दोसर कर्म मे नै ओझरायब, ई हमरा कनियो आँखि नै झपकाब देताह ।
[प्रकाश] मित्र ! अहाँ एहि चित्र पट्ट पर अप्पन प्रियाक चित्र पारू आ हुनके देख देख मन बहलाबू ।
 
गीत
:
हुनक संगम पूर्ति-मनोरथेँ,
मथल चित्त न शांति पबैछ ई ।
न पुनि चित्र पटो बिच चित्रकेँ,
लिखि सकै छी, करै छिअ यत्न की ?
 
 
 
[रानी पद्मावती तथा कुन्दलतिका के प्रवेश]
रानी पद्मावती
:
हय लतिका कह कह की ई सत्ये थिक, जे कोनो आन स्त्रीक ध्यान हृदय मे करैत ओकरे विरह सँ आर्यपुत्र झीण भय रहल छथि ?
कुन्दलतिका
:
हे स्वामिनी हमरा फूसि कहि क की होयत ? हम महाराजक प्रियमित्र माकन्दक मुँहे सुनल जे राजकार्यक पुछारी कय महाराज पुन: प्रमदवनहिँ जयताह । तेँ जे हम कहल से स्वामिनी स्वयं देखि लेल जाय ।
रानी पद्मावती
:
तोहर विचार नीक छहु, तेँ चल हमरा प्रमदवन ल चल
कुन्दलतिका
:
एम्हर आउ स्वामिनी, यैह थिक प्रमदवन ।
रानी पद्मावती
:
लतिका, तोँही पहिने आगू भय केँ बूझह जे स्वामि कोन ठाम छथि ?
कुन्दलतिका
:
देखू देखू स्वामिनी ! महाराजक अवस्था देखू ।
रानी पद्मावती
:
नहि देखैत छियैन्ह, तेँ स्थिर भय कहह जे कोन ठाम आर्यपुत्र छथि ?
कुन्दलतिका
:
स्वामिनी ! ई जे आगू मे अशोकक गाछ देखि पड़ैत अछि तकर दक्षिण-पश्चिम कोण मे अपन मित्रक संग महाराज विरह वेदनाक निवारणक हेतु शीतोपचार मे लागल छथि । 
रानी पद्मावती
:
लतिका, तोँ ठीकेँ देखलह ।
कुन्दलतिका
:
स्वामी ओतहि छथि, तेँ स्वामिनी हुनका समीप जाथु ।
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] एँ की ई पद्मावती थिकीह ? अहो... एहि कष्ट केँ धिक्कार । दु:खक संग दु:ख लागले रहैत अछि ।
[प्रकाश] प्रिय पद्मावती, आबू, एहि आसन पर बैसि हमरा कोर केँ अहाँ शोभित करू ।
रानी पद्मावती
:
हे, सौभाग्यवान ! हम अहाँक कोर मे चढ़बाक योग्य नहि छी ।
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] गुप्तो बात प्राय: रानी जानि गेलीह । हिनका मनाब पड़त ।
[प्रकाश] रानी अहाँ एना नहि बाजू ।
यदि मन हमर आन-जनि लागल, अहाँ बुझै छी हे सरले ।
हरि ! हरि! विषम भाग्य स मारल, हम भेलहुँ पुनि निश्चित मरले ॥
रानी पद्मावती
:
मुँह मात्र सँ मधुर भाषी, अहाँक कहब उचित, यदि विरह वेदनाक निवारणक हेतु शीतोपचार नहि होइत रहैत तखन ।
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] धिक्कार, मित्र ई प्रमादी छथि, फेर मनेबाक प्रयास करैत छी ।
[प्रकाश] रानी, विपरित शंका व्यर्थ थिक । आई हम वाटिका मे घुमबाक परिश्रम सँ शिथिल-शरीर भय, विश्रामक हेतु लता मण्डप मे आयल छी ।
रानी पद्मावती
:
अनिष्ट सँ हृदयक रक्षा करब उचिते थिक । लतिका, एहि ठाम आब हमरा रहला सँ आर्यपुत्र केँ बाधा होइत छन्हि, तेँ आबह, जाइत जाई ।
कुन्दलतिका
:
स्वामिनी, एम्हर द आउ... ।
 
 
 
[दुनूक प्रस्थान]
 
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] तमसायले चलि गेलीह । जे रुचैन्हि से करौथ ।
[प्रकाश] मित्र, प्रिय रानी पद्मा से हो क्रुद्ध भ गेलीह आ प्रिय मणि सेहो नै भेटलीह ।
एहन विषम स्थिति मे की कयल कयल जाय मित्र ? 
मित्र माकन्द
:
हे मित्र संयोग सँ बसंतराज हमर कर देनिहार छथि । तेँ हुनक श्रीपुरनामक नगर पत्र लिखि ककरो पठाय दियौन ।
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र एहि हेतु पहिनहि हम प्रियंवद कञ्चुकी केँ पठाय चुकल छी ।
मित्र माकन्द
:
[स्वगत] सभ व्यवस्था पहिनहि केने छथि ।
[प्रकाश] तखन तँ उचिते कर्तव्य कयल अछि मित्र ।
राजा चन्द्रसेन
:
सत्य तँ ई थिक जे ओहू हेतु माँगब लज्जाजनक बुझैत, हमरा कनेको उत्साह नहि अछि ।
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! ओहि माननीयाक प्रति अनुरोधक पद लिखने छियन्हि की नहि ?
राजा चन्द्रसेन
:
ओहि समय हुनक अनुस्मरणक उल्लास सँ किछुए पद लिखलहुँ ।
मित्र माकन्द
:
पद केहन अछि, से सुनबा लेल हमर कान उत्कण्ठित अछि ।
राजा चन्द्रसेन
:
हे हमर मनकेँ विनोद देनिहारि, हम एतय अहाँकेँ देखबाक कौतुक सँ ओहि अवस्था के प्राप्त भेलहुँ; अहाँ कियैक ने कनेको उनमुनाइत छी ?
 
गीत
:
चन्दहिँ निन्दि, न चन्दनो सहि सकै, माला न देखै कने
शय्या पै नलिनी दलो दलित हो-प्रत्यंग आलोड़ने ।
तापो जे विराहाग्नि सोँ अहँक हो से आर्द्र पद्मानिलेँ,
शांतो भेल, परंतु चण्डि ! कनिको नै छी अहाँ चञ्चले ॥
 
मित्र माकन्द
:
हे मित्र, आब व्याकुलता व्यर्थ थिक । शीघ्रे हुनका संग समागम होयत ।
[स्वगत] हिनक अभिलाषा-पूर्ण तन्द्राक वेग बहुत दूर धरि बढ़ि गेल छन्हि, तेँ आन दिशिकेँ हिनका घुमबैत छी ।
[प्रकाश] हुनक रूपसम्पत्ति केहन छन्हि ? 
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र, ई नीक प्रस्ताव कयल । ओ असाधारण रमणीयता थिकीह ।
मित्र माकन्द
:
अहाँक सन श्रेष्ठक अनुरागे हुनक असाधारण रमणीयताक प्रमाण थिक ।
राजा चन्द्रसेन
:
रतिक कथा नहि, शची वृथा छथि उर्वशिओ के चर्चा व्यर्थ
एहि सँ बढ़ि सुषमा नहि जगमे ककरो, जे उपमा नै समर्थ ॥
मित्र माकन्द
:
हे मित्र, हमर स्नानक समय बीति रहल अछि तेँ एखन आश्रम जाइत छी । 
राजा चन्द्रसेन
:
आह... दिन एतेक उपर चढ़ि आयल ? आश्चर्य ? चलू मित्र... हमरो महल ल चलू । 
 
 
 
[सबहक प्रस्थान]

 

 

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