मैलोरंग रेपर्टरी
द्वारा विद्यापति कविक लिखल नाटक मणिमञ्जरीक मंचन दिनांक 25
अगस्त, 2013 क’ श्रीराम सेंटर, मण्डीहाउस, नई
दिल्ली के भव्य प्रेक्षागृह मे सायं 6.30 बजे स’
प्रारंभ होयत । मैथिली भाषाक सबस’ प्रसिद्ध कवि विद्यापति तीन गोट
मैथिली नाट्य कृतिक रचना कयल छथि । मुदा ई अत्यंत आश्चर्य अछि जे आई तक हिनक कोनो
नाट्य कृतिक मंचन नहि भेल अछि । आब एकर पाँछा की कारण भ’
सकैत अछि से कहब कठिन अछि । मैलोरंग रेपर्टरी पहिल बेर विद्यापतिक
नाट्य कृतिक मंचन देशक राजधानी दिल्ली मे करत, ई सुखदायी क्षण मे उपस्थित होयबाक
लेल अहाँ के सपरिवार हकार अछि । प्रेक्षागृह मे प्रवेश सायं 6.15 बजे स’
शुरू भ’
जायत । जे पहिने औताह हुनका स्थान पहिने देल जायत ।
द्वितीय अंक
4.
दृश्य :
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[राजा चन्द्रसेन, मित्र माकन्द तथा परिजनक प्रवेश]
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राजा चन्द्रसेन
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मित्र ! व्रतक समाप्ति मे देवीक प्रणामक निर्वाह कयल ।
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मित्र माकन्द
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आब आगू की आज्ञा अछि मित्र ?
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राजा चन्द्रसेन
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बहुत काम पीड़ा अछि, तेँ आउ प्रमदवन जाय कोनो एकांत स्थान मे
बैसी, जतय निश्चिंत रूपेँ मणिमञ्जरी प्रियाक वर्णन सुख सँ मन बहलाबी ।
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मित्र माकन्द
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जे अहाँ केँ रूचै मित्र, सैह कयल जाय । [प्रमदवन मे प्रवेश]
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राजा चन्द्रसेन
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मधु टपकैत रसाल लत, हिलबय जे स्वच्छन्द ।
पवन, सेहो नहि मन हमर, करय कने सानन्द ॥
मित्र अहीं कहू जे कोन प्रकारेँ आनन्ददायिनी हुनका प्राप्त करी
?
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मित्र माकन्द
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मित्र अहाँ अति बेदनायल छी । तावत एहि ठाम विलमू, अहाँक समागमक
उपाय हम सोचैत छी ।
[स्वगत] जा धरि हिनका कोनो दोसर कर्म मे नै
ओझरायब, ई हमरा कनियो आँखि नै झपकाब’ देताह ।
[प्रकाश] मित्र ! अहाँ एहि चित्र पट्ट पर अप्पन
प्रियाक चित्र पारू आ हुनके देख देख मन बहलाबू ।
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गीत
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हुनक संगम पूर्ति-मनोरथेँ,
मथल चित्त न शांति पबैछ ई ।
न पुनि चित्र पटो बिच चित्रकेँ,
लिखि सकै छी, करै छिअ यत्न की ?
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[रानी पद्मावती तथा कुन्दलतिका के
प्रवेश]
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रानी पद्मावती
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हय लतिका कह’ कह’ की ई
सत्ये थिक, जे कोनो आन स्त्रीक ध्यान हृदय मे करैत ओकरे विरह सँ आर्यपुत्र झीण
भय रहल छथि ?
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कुन्दलतिका
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हे स्वामिनी हमरा फूसि कहि क’ की होयत ? हम महाराजक प्रियमित्र माकन्दक मुँहे सुनल जे
राजकार्यक पुछारी कय महाराज पुन: प्रमदवनहिँ जयताह । तेँ जे हम कहल से स्वामिनी
स्वयं देखि लेल जाय ।
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रानी पद्मावती
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तोहर विचार नीक छहु, तेँ चल’ हमरा प्रमदवन ल’ चल’
।
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कुन्दलतिका
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एम्हर आउ स्वामिनी, यैह थिक प्रमदवन ।
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रानी पद्मावती
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लतिका, तोँही पहिने आगू भय केँ बूझह जे स्वामि कोन ठाम छथि ?
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कुन्दलतिका
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देखू देखू स्वामिनी ! महाराजक अवस्था देखू ।
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रानी पद्मावती
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नहि देखैत छियैन्ह, तेँ स्थिर भय कहह जे कोन ठाम आर्यपुत्र छथि
?
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कुन्दलतिका
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स्वामिनी ! ई जे आगू मे अशोकक गाछ देखि पड़ैत अछि तकर
दक्षिण-पश्चिम कोण मे अपन मित्रक संग महाराज विरह वेदनाक निवारणक हेतु शीतोपचार
मे लागल छथि ।
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रानी पद्मावती
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लतिका, तोँ ठीकेँ देखलह ।
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कुन्दलतिका
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स्वामी ओतहि छथि, तेँ स्वामिनी हुनका समीप जाथु ।
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राजा चन्द्रसेन
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[स्वगत] एँ की ई पद्मावती थिकीह ? अहो... एहि
कष्ट केँ धिक्कार । दु:खक संग दु:ख लागले रहैत अछि ।
[प्रकाश] प्रिय पद्मावती, आबू, एहि आसन पर बैसि
हमरा कोर केँ अहाँ शोभित करू ।
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रानी पद्मावती
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हे, सौभाग्यवान ! हम अहाँक कोर मे चढ़बाक योग्य नहि छी ।
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राजा चन्द्रसेन
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[स्वगत] गुप्तो बात प्राय: रानी जानि गेलीह ।
हिनका मनाब’ पड़त ।
[प्रकाश] रानी अहाँ एना नहि बाजू ।
यदि मन हमर आन-जनि लागल, अहाँ बुझै छी हे सरले ।
हरि ! हरि! विषम भाग्य स’ मारल, हम भेलहुँ पुनि निश्चित मरले ॥
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रानी पद्मावती
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मुँह मात्र सँ मधुर भाषी, अहाँक कहब उचित, यदि विरह वेदनाक
निवारणक हेतु शीतोपचार नहि होइत रहैत तखन ।
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राजा चन्द्रसेन
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:
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[स्वगत] धिक्कार, मित्र ई प्रमादी छथि, फेर
मनेबाक प्रयास करैत छी ।
[प्रकाश] रानी, विपरित शंका व्यर्थ थिक । आई हम
वाटिका मे घुमबाक परिश्रम सँ शिथिल-शरीर भय, विश्रामक हेतु लता मण्डप मे आयल छी
।
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रानी पद्मावती
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अनिष्ट सँ हृदयक रक्षा करब उचिते थिक । लतिका, एहि ठाम आब हमरा
रहला सँ आर्यपुत्र केँ बाधा होइत छन्हि, तेँ आबह, जाइत जाई ।
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कुन्दलतिका
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स्वामिनी, एम्हर द’ क’
आउ... ।
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[दुनूक प्रस्थान]
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राजा चन्द्रसेन
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[स्वगत] तमसायले चलि गेलीह । जे रुचैन्हि से
करौथ ।
[प्रकाश] मित्र, प्रिय रानी पद्मा से हो क्रुद्ध
भ’ गेलीह आ प्रिय मणि
सेहो नै भेटलीह ।
एहन विषम स्थिति मे की कयल कयल जाय मित्र ?
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मित्र माकन्द
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:
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हे मित्र संयोग सँ बसंतराज हमर कर देनिहार छथि । तेँ हुनक
श्रीपुरनामक नगर पत्र लिखि ककरो पठाय दियौन ।
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राजा चन्द्रसेन
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:
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मित्र एहि हेतु पहिनहि हम प्रियंवद कञ्चुकी केँ पठाय चुकल छी ।
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मित्र माकन्द
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:
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[स्वगत] सभ व्यवस्था पहिनहि केने छथि ।
[प्रकाश] तखन तँ उचिते कर्तव्य कयल अछि मित्र ।
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राजा चन्द्रसेन
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:
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सत्य तँ ई थिक जे ओहू हेतु माँगब लज्जाजनक बुझैत, हमरा कनेको
उत्साह नहि अछि ।
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मित्र माकन्द
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:
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हे मित्र ! ओहि माननीयाक प्रति अनुरोधक पद लिखने छियन्हि की
नहि ?
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राजा चन्द्रसेन
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:
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ओहि समय हुनक अनुस्मरणक उल्लास सँ किछुए पद लिखलहुँ ।
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मित्र माकन्द
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:
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पद केहन अछि, से सुनबा लेल हमर कान उत्कण्ठित अछि ।
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राजा चन्द्रसेन
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:
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हे हमर मनकेँ विनोद देनिहारि, हम एतय अहाँकेँ देखबाक कौतुक सँ
ओहि अवस्था के प्राप्त भेलहुँ; अहाँ कियैक ने कनेको उनमुनाइत छी ?
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गीत
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:
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चन्दहिँ निन्दि, न चन्दनो सहि सकै, माला
न देखै कने
शय्या पै नलिनी दलो दलित हो-प्रत्यंग
आलोड़ने ।
तापो जे विराहाग्नि सोँ अहँक हो से
आर्द्र पद्मानिलेँ,
शांतो भेल, परंतु चण्डि ! कनिको नै छी
अहाँ चञ्चले ॥
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मित्र माकन्द
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:
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हे मित्र, आब व्याकुलता व्यर्थ थिक । शीघ्रे हुनका संग समागम
होयत ।
[स्वगत] हिनक अभिलाषा-पूर्ण तन्द्राक वेग बहुत
दूर धरि बढ़ि गेल छन्हि, तेँ आन दिशिकेँ हिनका घुमबैत छी ।
[प्रकाश] हुनक रूपसम्पत्ति केहन छन्हि ?
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राजा चन्द्रसेन
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:
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मित्र, ई नीक प्रस्ताव कयल । ओ असाधारण रमणीयता थिकीह ।
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मित्र माकन्द
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:
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अहाँक सन श्रेष्ठक अनुरागे हुनक असाधारण रमणीयताक प्रमाण थिक ।
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राजा चन्द्रसेन
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:
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रतिक कथा नहि, शची वृथा छथि उर्वशिओ के चर्चा व्यर्थ
एहि सँ बढ़ि सुषमा नहि जगमे ककरो, जे उपमा नै समर्थ ॥
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मित्र माकन्द
|
:
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हे मित्र, हमर स्नानक समय बीति रहल अछि तेँ एखन आश्रम जाइत छी
।
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राजा चन्द्रसेन
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आह... दिन एतेक उपर चढ़ि आयल ? आश्चर्य ? चलू मित्र... हमरो महल
ल’ चलू ।
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[सबहक प्रस्थान]
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