सोमवार, 15 जुलाई 2013

विद्यापति रचित "मणिमञ्जरी" आठम एवं नवम दृश्य; [प्रस्तुति : मैलोरंग रेपर्टरी, दिल्ली]





हकार

मैलोरंग रेपर्टरी द्वारा विद्यापति कविक लिखल नाटक मणिमञ्जरीक मंचन दिनांक 25 अगस्त, 2013 श्रीराम सेंटर, मण्डीहाउस, नई दिल्ली के भव्य प्रेक्षागृह मे सायं 6.30 बजे प्रारंभ होयत । मैथिली भाषाक सबस प्रसिद्ध कवि विद्यापति तीन गोट मैथिली नाट्य कृतिक रचना कयल छथि । मुदा ई अत्यंत आश्चर्य अछि जे आई तक हिनक कोनो नाट्य कृतिक मंचन नहि भेल अछि । आब एकर पाँछा की कारण भ सकैत अछि से कहब कठिन अछि । मैलोरंग रेपर्टरी पहिल बेर विद्यापतिक नाट्य कृतिक मंचन देशक राजधानी दिल्ली मे करत, ई सुखदायी क्षण मे उपस्थित होयबाक लेल अहाँ के सपरिवार हकार अछि ।

प्रेक्षागृह मे प्रवेश सायं 6.15 बजे स शुरू भ जायत । जे पहिने औताह हुनका स्थान पहिने देल जायत ।


चतुर्थ अंक 

  8. दृश्य :

 
कुन्दलतिका
:
की सखी, कुशल छी ?
 
कलकण्ठिका
:
कुशल कतय सँ रहब ?
 
कुन्दलतिका
:
से कियेक ?
 
कलकण्ठिका
:
सखी, पटरानी सँ रक्षाक हेतु मणिमञ्जरीक परिचारिकाक रूप मे गुप्त रूपे हमरे नियुक्त कयल गेल अछि । स्वामिनिक अपराध सँ शंकित भय आत्मा क्षणो भरि स्थित नहि रहैछ ।
 
कुन्दलतिका
:
हे सखी ! आब अहाँ निश्चिंत रहू । कारण, आइ स्वामी कृपा कय स्वामिनीक मानग्रंथि छोड़ओलन्हि अछि, आओर स्वामिनि बजलीह अछि जे मणिमञ्जरी हुनक छोट बहिनि जेना थिकीह तेँ हुनका पर कोनो क्रोध नहि ।
 
कलकण्ठिका
:
हे सखी, की ई बात सत्य थिक ?
 
कुन्दलतिका
:
की प्रिय सखी केँ हम मिथ्या कहब ?
 
कलकण्ठिका
:
हँ, एकर कोनो प्रतीकार नहि अछि ई जानि पटरानी एना बजलीह अछि; अन्यथा ओहि तरहेँ दु:खी मन एना कोना प्रसन्न होइतन्हि ? हे सखी अपन काजक सिद्धिक हेतु जाथु, हमहूँ आब नि:शंक भय जाइत छी ।
 
कुन्दलतिका
:
[प्रस्थान]
 

  9. दृश्य :



राजा चन्द्रसेन
:
मित्र माकन्द, प्रियतमा केँ बिनु देखनहि तखन घुमि अयलहुँ ताहि हेतु पश्चाताप कनेको नहि छुटैत अछि, तेँ आउ ओतय जाय हुनक सत्कार करी ।
 
मित्र माकन्द
:
जे अहाँ के रूचय सेह करू राजन ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
फेर स प्रमदवन दिस प्रस्थान कयल जाय ।
 
गीत
:
चिर विरही नयनेँ हम देखब, चन्द्रमुखी दयिता केँ रेखब ।
एहि आनन्द-बाढ़ि मन विह्वल, सकल बाहरी विषयहिँ बिसरल ॥
ओहि मनोरथ आनलि धनिकेँ, कय उदेस हम चललहुँ बनिकेँ ।
तखनहिँ जड़िसँ धैर्य उपाड़ि, भीतर उठय बिकार पछाड़ि ॥
 
मित्र माकन्द
:
इएह आबि गेलहुँ ।
 
कलकण्ठिका
:
हे सखि, अहाँक प्रिय वस्तु हम देखाय रहल छी ।
सखी, पहिल-पहिल प्रिय-दर्शनक हेतु अहाँ हमर पारितोषित धारैत छी । 
 
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र इएह थिकीह प्रिय मणिमञ्जरी ।
 
एहन पहिने कतौ नहि देखल, ई लावन्यक सम्पत्ति थिकीह ।
[चिबुक उठाय] अपन अधीन कमल नयने ! हे प्रिये ! अनुग्रह मानिनाहर ।
 
हमरा पद्मावती प्रेमरत-जानि, करू नहि कठिन प्रहार ॥
 
 
[नेपथ्य मे हल्ला] 
 
मणिमञ्जरी
:
[भय स कम्पैत] रक्षा करथु महाराज, रक्षा करथु ।
 
[महाराजक देह मे लेपटि जाइत अछि]
 
राजा चन्द्रसेन
:
[स्पर्श सुखक अनुभव]
 
गीत
:
की थिक चानन केर प्रवाह ? की थिक चन्द्रकिरण संचार?
सकल अंगमे जलकण सरबे, चन्द्रकांतमणि की साकार ?
काम-सिद्ध केर की थिक कृत्या ? सकल विश्वकेम वश केनिहारि /
किंवा भीतर करथि महोत्सव, सुन्दरनयना ई सुकुमारि ?
 
 
 
[घबड़ायल पुरुष प्रतिहारीक प्रवेश]
 
प्रतिहारी
:
स्वामी ! एक दुष्ट महिषा हमरा सभसँ रोकल गेलहुँ मेदा देववनकेँ उजाड़बामे लागल अछि । एकर निवारणमे अपनहि समर्थ छी ।
 
मित्र माकन्द
:
रे वनचर, जो हमरा आज्ञा सँ सेनापति के कहुन्ह जे एकरा अपना दुष्टताक फल देथि ।
 
प्रतिहारी
:
जे आज्ञा स्वामी ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] आश्चर्य, ई डर हमर मित्र थिक ।
 
 
 
[हल्ला आरो बढ़ि जाइत अछि]
 
राजा चन्द्रसेन
:
ई प्रसंग की एतेक बढ़ि गेल ? हम अपनहि एहि दुष्ट केँ दुश्चेष्टाक फल प्राप्त कराय दियैक । की अहूँ संग चलब ?
 
मित्र माकन्द
:
[थरथर कँपैत] ओतय जाय यदि दुष्ट महिषाक सींघ सँ बेधा जाइ तँ की होयत ?
 
राजा चन्द्रसेन
:
ओकरा बाद की होयत से त अहाँ जनिते छी ।
 
[दुनूक प्रस्थान]
 
मणिमञ्जरी
:
मन्दभाग्या हम हिनक अनुराग सँ मारल गेलहुँ । हे कलकण्ठिका ... 
 
कलकण्ठिका
:
हे सखि, आउ एहि लता मण्डप मे कामविषयक लिखना लिखि मनोविनोद करी ।
 
 
 
[प्रस्थान]

 

 

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