रविवार, 14 जुलाई 2013

विद्यापति रचित "मणिमञ्जरी" सातम दृश्य; [प्रस्तुति : मैलोरंग रेपर्टरी, दिल्ली]


 
हकार

 
मैलोरंग रेपर्टरी द्वारा विद्यापति कविक लिखल नाटक मणिमञ्जरीक मंचन दिनांक 25 अगस्त, 2013 श्रीराम सेंटर, मण्डीहाउस, नई दिल्ली के भव्य प्रेक्षागृह मे सायं 6.30 बजे प्रारंभ होयत । मैथिली भाषाक सबस प्रसिद्ध कवि विद्यापति तीन गोट मैथिली नाट्य कृतिक रचना कयल छथि । मुदा ई अत्यंत आश्चर्य अछि जे आई तक हिनक कोनो नाट्य कृतिक मंचन नहि भेल अछि । आब एकर पाँछा की कारण भ सकैत अछि से कहब कठिन अछि । मैलोरंग रेपर्टरी पहिल बेर विद्यापतिक नाट्य कृतिक मंचन देशक राजधानी दिल्ली मे करत, ई सुखदायी क्षण मे उपस्थित होयबाक लेल अहाँ के सपरिवार हकार अछि ।

 

प्रेक्षागृह मे प्रवेश सायं 6.15 बजे स शुरू भ जायत । जे पहिने औताह हुनका स्थान पहिने देल जायत ।


तेसर अंक

7. दृश्य :


 
  
 
[मित्र माकन्द, राजा चन्द्रसेन]
मित्र माकन्द
:
आश्चर्य ! बहुत समय पर प्रियमित्रक मनोरथ-वृक्ष फड़ल अछि, जेँ मान्या मणिमञ्जरी कलकण्ठिकाक संग प्रमदवन मे आनल गेल छथि । एखन आब रानी पद्मावतीक कोप मात्र विघ्न छन्हि ।
 
 
 
[राजा चन्द्रसेनक प्रवेश]
 
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! पहिनहिँ जेकाँ एखनहुँ भ्रम मे पड़ल आवेग सँ अभिभूत होइत छी । 
 
राजा चन्द्रसेन
:
पहिने सँ एखन की भेद भेल अछि ?
 
मित्र माकन्द
:
हुनका सँ भेँट करबा मे केवल पटरानीक क्रोधटा बाधक अछि ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र ठीके बुझलहुँ, हम ओही तरहक स्थिति मे छी । पहिनहि जेकाँ एखनहुँ हुनक प्राप्ति मे अहीँ कारण छी । मित्र ! यदि पटरानी विरोधिनी नहि होथि ।
 
मित्र माकन्द
:
अनुमान करैत छी जे सुखक हेतु विदा भेल लोकक समक्ष पटरानी होइतीह ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
आबहुँ व्यर्थ संतोष प्रकट कय की फल ? मित्र प्रमदवन चलि प्रिय मणिमञ्जरी के देखबाक उत्कण्ठा भ रहल अछि । 
 
मित्र माकन्द
:
जे आज्ञा मित्र ! चलल जाय प्रदवन ।
 
 
 
[पाजेबक ध्वनि सुनाइत अछि]
 
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र माकन्द ओहि दिस पाजेबक ध्वनि सुनबा मे अबैत अछि, प्रायश: पटरानी पद्मा होयतीह । 
 
मित्र माकन्द
:
मित्र सचेष्ट होयब उचित अछि । हम ता प्रमदवन मे विचरण करैत छी ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] रानी पद्मा हमर अनादर करबाक कारणेँ, स्वभाबेँ लज्जित हृदय भय अनुकूल आचरणक हेतु आयल होइतीह ।
 
 
 
[ रानी पद्माक प्रवेश ]
 
राजा चन्द्रसेन
:
[नत मस्तक भय ]
 
मानिनि मान छोड़ू, चंचल दृगेँ क्रुर दृदय मम हेरू ।
मलिन कलाधर होथु, विहुँसिकय, सुधावर्षि ! मुँह फेरू ॥
 
रानी पद्मावती
:
आर्य माकन्दक हाथ मे केहन पत्र देखैत छियन्हि ?
 
राजा चन्द्रसेन
:
हे देवी ! आई मित्र माकन्द अपनहि गीत रचि पत्र मे लिखने छथि ।
 
मित्र माकन्द
:
अपने हमरा मूर्ख बुझैत छी ?
 
रानी पद्मावती
:
हय ललिता, पत्र पढ़ त । यदि सुनबाक योग्य होइक तँ सुनैत जाइ ।
 
कुन्दलतिका
:
पूर्वोदित अनुराग केँ, झट नहि विसराय पाव ।
 
संतापिनि मरणोन्मुखी, शशि ! कुमुदिनी किअ भाव ॥
 
रानी पद्मावती
:
[क्रोध मे] आर्यपुत्र हम बुझिए गेलहुँ ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
हे प्रिये की बुझलहुँ अहाँ ?
 
रानी पद्मावती
:
नहि किछु नहि । ललिता आगू होअह । चलह एहि ठाम स ।
 
कुन्दलतिका
:
हे स्वामिनि, जायब उचित नहि, स्वामीक आदर करिअन्हु ।
 
रानी पद्मावती
:
[अति क्रोध मे] हय अज्ञानी, तोँ नहि जनैत छह, ई गीत आर्यपुत्रक ओहि जीवित प्रियतमा सँ पठाओल गेल होयत । आर्य माकन्दक पाण्डित्य तँ तोहूँ जनितहि छहुन्ह ।
 
कुन्दलतिका
:
स्वामिनि ! एकरा असम्भव बूझल जाय !
 
रानी पद्मावती
:
हय सोझमतिया ! यदि से नहि तँ ओ पहिल उत्पन्न अनुराग केँ छोड़बाक आग्रह कियैक छन्हि ?
 
मित्र माकन्द
:
हे मान्ये ! एना विपरीत कियैक बुझैत छी ? हम सप्पत खा क कहैत छी जे यदि हम मित्रक आगू ई गीत नहि पढ़ने होइ ।  
 
रानी पद्मावती
:
[हँसि क] ललिता ! आर्य माकन्द जन्मे सँ याज्ञिक छथि तेँ आबह जाइत जाइ । 
 
कुन्दलतिका
:
[स्वगत] कोन गति । [प्रकाश] एम्हर दने आबथु स्वामिनी ।
[प्रस्थान]
 
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र अत्यंत कष्टक अनुभव करैत छी । हिनक क्रोध पराकाष्ठा पर पहुँचि गेल, तेँ आउ जाय पटरानिञेँ केँ प्रसन्न करी ।
 
मित्र माकन्द
:
जे आज्ञा । चल जाय । [प्रस्थान]
 
गीत
:
देवी अपन पैर पर लगलो जे हमरा विलगाय,
कँपैत अधरहि अस्फुट उत्तर दय गेली विसराय ।
केहि विधि से, पुनि ई सुमुखि जे प्रातशीतक रेख,
सदृश विखिन्न होथि से कोना मित्र जाय ई देख ॥ 

  

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें