मंगलवार, 9 जुलाई 2013

विद्यापति रचित "मणिमञ्जरी" दोसर दृश्य; [प्रस्तुति : मैलोरंग रेपर्टरी, दिल्ली]


मैलोरंग रेपर्टरी द्वारा विद्यापति कविक लिखल नाटक मणिमञ्जरीक मंचन दिनांक 25 अगस्त, 2013 श्रीराम सेंटर, मण्डीहाउस, नई दिल्ली के भव्य प्रेक्षागृह मे सायं 6.30 बजे प्रारंभ होयत । मैथिली भाषाक सबस प्रसिद्ध कवि विद्यापति तीन गोट मैथिली नाट्य कृतिक रचना कयल छथि । मुदा ई अत्यंत आश्चर्य अछि जे आई तक हिनक कोनो नाट्य कृतिक मंचन नहि भेल अछि । आब एकर पाँछा की कारण भ सकैत अछि से कहब कठिन अछि । मैलोरंग रेपर्टरी पहिल बेर विद्यापतिक नाट्य कृतिक मंचन देशक राजधानी दिल्ली मे करत, ई सुखदायी क्षण मे उपस्थित होयबाक लेल अहाँ के सपरिवार हकार अछि । प्रेक्षागृह मे प्रवेश सायं 6.15 बजे स शुरू भ जायत । जे पहिने औताह हुनका स्थान पहिने देल जायत ।


एहि नाटकक मूल रचनाकार जेना की ज्ञाते अछि विद्यापति छथि । मणिमञ्जरीके सम्पादन डॉ. चन्द्रधर झा कयने छथि । ई पुस्तक मैथिली अकादमी, पटना स प्रकाशित अछि । एहि नाट्यक के आजुक समय मे मंचित करबा लेल पुनर्लेखनक आवश्यक्ता छल । ई कार्य के सम्पादन हम स्वयं [प्रकाश झा] केलहुँ अछि । एहि नाटकक निर्देशन सेहो हमहीं क रहल छी । मैलोरंग रेपर्टरीक लेल एहि प्रस्तुत्तिक प्रबंधन मुकेश झा देख रहल छथि । ध्वनि संयोजन राजीव मिश्रा रहलाह अछि । संगीत संयोजन दीपक ठाकुरराजीव रंजन जाक छनि । वस्त्र विन्यास सुश्री प्रेमलता रहलीह अछि ।      

 
2. दृश्य :

राजा चन्द्रसेन
:
मित्र माकन्द ! स्वप्न मे ओकर पश्चात हम देखल जे अकस्मात अपन सखीक संगे अतिशीतल अपन अवर्णनीय रूप लावण्य सँ सखी सबहक कांतिक तिरस्कार कयनिहारि ओ सरोवर मे अयलीह । 
 
मित्र माकन्द
:
आगू की भेल मित्र ?
 
राजा चन्द्रसेन
:
अकस्मात हुनका देखबाक कारणेँ हमर चित्त अस्थित भ गेल । कोनहुना हुनक प्रभावशालिनी सखी केँ पुछलियन्हि :
 
हे कल्याणी ! ई अहाँक स्नेहक पात्रा कोन कुलक भूषण थिकीह, के पुण्यवान हिनक पिता थिकाह, ई किएक विरह-पिड़ित-हृदया जेकाँ देखि पड़ैत छथि ? 
 
कनकलता 
:
हे आर्य ! हमर ई प्रिय सखी चन्द्रकांत वैश्यक कन्या मणिमञ्जरी थिकीह । ई कहियो रात्रि शेष मे शय्या पर सूतल स्वप्न मे महापुरुष राजा चन्द्रसेन केँ देखलन्हि । ओही दिन स निष्ठुर चन्द्रसेनक पता के नहि पाबि, हुनक विरह व्यथा केँ नहि सकैत, हुनक अभिलाषेँ बढ़ल काम सँ एहि अवर्णनीय अवस्था के प्राप्त कयने छथि ।
 
गीत
:
कयल पसाहनि केर उपेक्षा, व्यंग्य वचनहुक गेल अपेक्षा ।
सखी-सभा-मध्य-विश्राम छोड़ि, कयल एकांत विराम ॥
कतहु कपोल हाथ पर रोपि, हाथहु मे थिरताकेँ लोपि ।
केवल हुनके चिंता-लीन, चेष्टा आन कयल अति छीन ॥ 
 
मित्र माकन्द
:
मित्र अहाँ स्पष्टे किएक नै कहैत छी जे ओ अहींक समागमक इच्छा करैत अहींक बाट तकैत छथि ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
पश्चात, अत्यंत मंदभाग्य हम प्रात:कालीन वाद्य ध्वनि सुनि जागि गेलहुँ आ हमर स्वप्न अधूरे रहि गेल ।
 
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! जँ ओहि मान्या मे यथार्थे एहन भाव छन्हि तखन हुनक समागम दुर्लभ नहि रहत ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
दुर्लभ नहि, ई की कहैत छी मित्र ? कोनो विषय सुलभ नहि मित्र !
की पुनि कोनो वधु पवित्र । ताहू पर रूपक आगर- तादृश-प्रिया-प्रसंग अपार ॥
 
तखन कहू अहीं, एखन आत्माक तुष्टि कोना प्राप्त करी ?
 
मित्र माकन्द
:
चलू मित्र भनसा घर जाय, शक्कर पूआ खाई ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
नहि मित्र, मोन नै रूचैत अछि । अतिशीत चंचल तरंग सँ सम्पृत, चंचल फूलक पराग सँ पूरित, लता सभक मण्डपवला एहि प्रमदवन केँ छोड़ि मनोविनोदक दोसर कोन स्थान होयत ?
 
मित्र माकन्द
:
[स्वगत] ई भूतक लाँघल जेकाँ शून्य हृदय भेल एम्हर-ओम्हर घूमैत अभागलक बेटा हमरहु बताह बनाओत । दोसर कोनो उपाइयो नै अछि ।
 
[प्रकाश] हे मित्र ! एहि मार्गे इम्हर आऊ । देखू, मकरंद सँ मातल भ्रमर, कोकिलक कूँजन, सुन्दर आमक गाछी, हँसैत मालतीक सुगन्धक प्रसार सँ मोहक प्रमदवन मे विचरण कयल जाय । 
 
राजा चन्द्रसेन
:
खेद अछि मित्र, खेद ! मन्दभाग्य हम कतय जाऊ ?
 
हमर प्रिया-रहित एहि वनमे, उचिते मदन सतावय मनमे ।
हमरे सन हुनको नहि वाम, खेदय, से अछि खेद सुठाम ॥
 
प्रियतमाक आकृतिक अनुकरण कयनिहारि लतो हुनका देखबाक कौतुक सँ जेना-तेना हमरा बहटारि रहल अछि ।
 
गीत
:
भवरा चंचल भौंह समान, किसलय देखि अधर हो भान ।
पुष्प-गुच्छ-छवि तुलय अशेष, स्तनक उच्चताकेँ सविशेष ॥
एहि तरहेँ तटलता लखाय, अति प्रिय हुनक शरीर देखाय ।
एहीसँ किछु हो हे मीत ! दुखी हमर मन कने पिरीत ॥
 
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! जखन स्वयं कामदेवे हुनका अहाँक हृदय मे प्रविष्ट करबैत छथिन्ह तखन अनेरे उलहन किएक दैत छिअन्हि ?
 
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र ! केवल वेदनाक हेतु, वास्तविक रूपे नहि ।
 
मित्र माकन्द
:
जँ ई बात छैक तँ हृदय मे कसि केँ बान्हि दिऔन एहि दुष्ट कामदेव केँ ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] आश्चर्य ! एहि मूर्ख के सबटा अपनहि समान बुझि पड़ैत छैक ।
 
[प्रकाश] अहाँ नहि जनैत छी जे भगवान कामदेव अशरीर छथि । 
 
मित्र माकन्द
:
जेनह होथि तेहन रहथु । हुनक विचार सँ कोन फल ? अपने भनसा चलू जतय दही शक्कर खायब ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
मित्र ! हँसीक कोन प्रयोजन ?
 
मित्र माकन्द
:
अहाँ केँ हँसी बुझि पड़ैत अछि; हमरा तँ भूख स मरन समान स्थिति भय रहल अछि ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
फूलक धनु ओ फूले वान, फेँकथि अतनु काम भगवान । 
मन अति चंचल बेधि सताबथि, हा ! हा ! विधि की-की ने कराबथि ॥
 
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! की अहाँ काम विरह सँ व्याकुल छी ? तँ बिलमू कनेक, महारानी के नेने अबैत छियन्हि ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
विरह व्याकुलता की ?
 
 
 
[पद्मावती आ कुन्दलतिकाक प्रवेश]
 
रानी पद्मावती
:
आर्यपुत्र बेर बेर विजयी होथु ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
[स्वगत] एँ, पद्मावती ! आश्चर्य ! मनोरथ प्रियाक आ उपस्थित भेली पद्मा ?
 
[प्रकाश] प्रिये पद्मावती ! आई वसंतक समय मे हमरा मन पाड़ि अहाँ अति सुन्दर कार्य कयल । तेँ आऊ समीपस्थ, वसंतक मधुर माधवी लताक मण्डपमे किछु काल सटि क बैसैत छी ।
 
रानी पद्मावती
:
जे अहाँ के नीक लागए आर्य ।
 
कुन्दलतिका
:
[स्वगत] यावत ई सभ मण्डप मे प्रवेश करैत छथि ताबत हम रानीक पार्वती व्रतक हेतु फूल लोढ़ि लैत छी ।
 
राजा चन्द्रसेन
:
भीतर जकर रसपूर्ण अछि लीला विविध, ई मुख कहू,
अपना समान कहाय से चाहैछ, ओ, की चुप रहू ।
 
रानी पद्मावती
:
आर्य पुत्र ! ई की अभद्र आचरण करैत छी ?
 
राजा चन्द्रसेन
:
प्रिये ! ई की प्रतिकूल व्यवहार करैत छी ?
 
अहाँ अपन लावण्य मात्रयुत गात्र विशेष न देखी,
तेँ हम कहइछि, छोड़ू साहस, एहन पुण्य नहि लेखी ।
 
रानी पद्मावती
:
आर्यपुत्र, ई उचित कहैत छी अहाँ, किंतु कोनो व्रत केँ ठानि ओकरा छोड़ब ठीक नहि, तेँ महाराज एखन हमरा अनुमति दिअ । 
 
राजा चन्द्रसेन
:
प्रिय, व्रत केँ रोकबा मे हम असमर्थ छी, किंतु आगुओ हमर एही तरहेँ ध्यान राखब अहाँ ।
 
रानी पद्मावती
:
कलकण्ठिका ! अहाँ आगू हउ ।
 
[प्रस्थान]
 
गीत
:
कर्णकटु मधुकर रटओ, पुनि हृदयमे हमरा करओ ।
काम वाण प्रहार, सहसा आम्रतरु माँजरि धरओ ॥
प्रत्यंग मे पीयूष भानुक किरण दाह जनावओ ।
यदि चितमे छी अहँ प्रिये तँ जन्म धन्य कहाबओ ॥
 
राजा चन्द्रसेन
:
प्रति दिन कारी भऊँह-युत- , प्रिया वियोग विचार ।
मित्र ! बाहु भूषित हौअय, नोर-मोति बहु धारि ॥
 
मित्र माकन्द
:
हे मित्र ! अपना केँ अधीरताक प्रसार सँ रोकू । की अहाँक सन लोक एहन होइत अछि ? संख्याकालक सूचना भय रहल अछि । तेँ, आउ दुनू गोटए सायंकालिक विधिक हेतु प्रस्थान करी ।
 
 
 
[प्रस्थान]

 

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