शनिवार, 13 जुलाई 2013

विद्यापति रचित "मणिमञ्जरी" पाँचम दृश्य; [प्रस्तुति : मैलोरंग रेपर्टरी, दिल्ली]


हकार

मैलोरंग रेपर्टरी द्वारा विद्यापति कविक लिखल नाटक मणिमञ्जरीक मंचन दिनांक 25 अगस्त, 2013 श्रीराम सेंटर, मण्डीहाउस, नई दिल्ली के भव्य प्रेक्षागृह मे सायं 6.30 बजे प्रारंभ होयत । मैथिली भाषाक सबस प्रसिद्ध कवि विद्यापति तीन गोट मैथिली नाट्य कृतिक रचना कयल छथि । मुदा ई अत्यंत आश्चर्य अछि जे आई तक हिनक कोनो नाट्य कृतिक मंचन नहि भेल अछि । आब एकर पाँछा की कारण भ सकैत अछि से कहब कठिन अछि । मैलोरंग रेपर्टरी पहिल बेर विद्यापतिक नाट्य कृतिक मंचन देशक राजधानी दिल्ली मे करत, ई सुखदायी क्षण मे उपस्थित होयबाक लेल अहाँ के सपरिवार हकार अछि । प्रेक्षागृह मे प्रवेश सायं 6.15 बजे स शुरू भ जायत । जे पहिने औताह हुनका स्थान पहिने देल जायत ।

 
 
 
तेसर अंक

5. दृश्य :


प्रियवद कञ्चुकी 
:
लगैत अछि माननीय वसंतराजक नगर आबि गेल छी । आश्चर्य ! भाग्यवान भेलहुँ ।

 
राज दरबार मे बिना आज्ञाक प्रवेश करब उचित नहि अछि । एतहि किछु काल धरि राजाक समीप जयबाक अवसरक प्रतीक्षा करैत छी । एहि घरक अंत:पुर मे परिचर सभ मिलि उत्तम ओछाओन करबामे लागल अछि । निश्चित रूपेँ ई बैसिकीक तैयारीक समय होयबाक चाही । एही ठाम राजाक अयबाक प्रतीक्षा करैत छी ।
 
 
 
[राजा, मंत्री तथा आवश्यक परिजनक प्रवेश]
 
प्रतिहारी
:
स्वामी ! महाराज चन्द्रसेनक पठाओल एक सज्जन दुआरि पर ठाढ़ छथि, हुनका आनल जाय वा कि रोकि देल जाय ? 
 
राजा वसंतराज
:
शीघ्र प्रवेश कराओल जाय ।
 
प्रतिहारी
:
जे आज्ञा स्वामी ।
 
 
 
[प्रवेश; प्रियवद कञ्चुकी ]
 
प्रियवद कञ्चुकी 
:
[स्वगत] आश्चर्य ! सभाक बैसबाक क्रम बड़ रमणीय अछि ।
 
राजा वसंतराज
:
एहि आसन पर अहाँ बिराजमान हउ ।
श्रीमान चन्द्रसेन कुशल छथि !
 
प्रियवद कञ्चुकी 
:
प्रतिदिन बढ़ैत अपनेक मित्रता सँ कुशल छथि । हे राजन ! महाराज चन्द्रसेनक एकटा विशेष संदेश छन्हि, से अपनेक सुनबाक योग्य अछि ।
 
राजा वसंतराज
:
सावधान छी, ओ माननीय की आज्ञा देने छथि ।
 
प्रियवद कञ्चुकी 
:
महाराज चन्द्रसेन नमस्कार पूर्वक, अपनेकेँ सूचित करैत छथि जे, तत्काल, पूर्ण मित्रताक संग चन्द्रकांतक ओहि कन्यारूप रत्नकेँ अपने पठाय दिअ, ओकर पारितोषिक रूपेँ एहि सालक कर छोड़ि देल जायत
 
राजा वसंतराज
:
आहा... ई त उत्तम विचार अछि । मुदा, एहि हेतु कन्याक पिता श्री चन्द्रकांत केँ बजाओल जाय । प्रतिहारी जाह, चन्द्रकांत वैश्य केँ आदर सहित दरबार मे नेने अबियौन ।
 
प्रतिहारी
:
जे आज्ञा महाराज ।
 
 
 
[चन्द्रकांतक प्रवेश]
 
चन्द्रकांत
:
महाराज विजयी होथु ।
 
राजा वसंतराज
:
[स्वगत] पहिने ओही राजाक नाम सँ हिनका हम उत्साहित करी ।
 
[प्रकाश] चन्द्रकान्त ! महाराज श्री चन्द्रसेन अहाँकेँ सूचित करैत छथि - 
 
चन्द्रकांत
:
की आज्ञा दैत छथि ?
 
राजा वसंतराज
:
ई, जे अहाँक कन्यारत्न मणिमञ्जरी सँ...
 
चन्द्रकांत
:
आश्चर्य ! आश्चर्य !! ई त बड्ड पैघ कृपा थिक ।
 
राजा वसंतराज
:
[प्रियवद कञ्चुकी सँ] तेँ अपने एखन गेल जाओ, हम ओहि भेनिहारि राजपत्नीकेँ शीघ्रे पहुँचबाय देब, अथवा ओ त प्राय: अपनहुँ केँ देखबाक हेतु इष्ट होइतीह ? 
 
प्रियवद कञ्चुकी 
:
विशेष की, अपने सर्वज्ञे छी ।

 
राजा वसंतराज
:
चन्द्रकांत ! अहाँ हिनका अपना ओहिठाम पहुँचाय दिऔन्हि ।
 
चन्द्रकांत
:
जे आज्ञा राजन ! एहि बाटेँ, अहाँ आउ ।
 

 

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