सोमवार, 8 जुलाई 2013

विद्यापति रचित "मणिमञ्जरी" पहिल दृश्य; [प्रस्तुति : मैलोरंग रेपर्टरी, दिल्ली]


मैलोरंग रेपर्टरी द्वारा विद्यापति कविक लिखल नाटक मणिमञ्जरीक मंचन दिनांक 25 अगस्त, 2013 श्रीराम सेंटर, मण्डीहाउस, नई दिल्ली के भव्य प्रेक्षागृह मे सायं 6.30 बजे प्रारंभ होयत । मैथिली भाषाक सबस प्रसिद्ध कवि विद्यापति तीन गोट मैथिली नाट्य कृतिक रचना कयल छथि । मुदा ई अत्यंत आश्चर्य अछि जे आई तक हिनक कोनो नाट्य कृतिक मंचन नहि भेल अछि । आब एकर पाँछा की कारण भ सकैत अछि से कहब कठिन अछि । मैलोरंग रेपर्टरी पहिल बेर विद्यापतिक नाट्य कृतिक मंचन देशक राजधानी दिल्ली मे करत, ई सुखदायी क्षण मे उपस्थित होयबाक लेल अहाँ के सपरिवार हकार अछि । प्रेक्षागृह मे प्रवेश सायं 6.15 बजे स शुरू भ जायत । जे पहिने औताह हुनका स्थान पहिने देल जायत ।
 
एहि नाटकक मूल रचनाकार जेना की ज्ञाते अछि विद्यापति छथि । मणिमञ्जरीके सम्पादन डॉ. चन्द्रधर झा कयने छथि । ई पुस्तक मैथिली अकादमी, पटना स प्रकाशित अछि । एहि नाट्यक के आजुक समय मे मंचित करबा लेल पुनर्लेखनक आवश्यक्ता छल । ई कार्य के सम्पादन हम स्वयं [प्रकाश झा] केलहुँ अछि । एहि नाटकक निर्देशन सेहो हमहीं क रहल छी । मैलोरंग रेपर्टरीक लेल एहि प्रस्तुत्तिक प्रबंधन मुकेश झा देख रहल छथि । ध्वनि संयोजन राजीव मिश्रा रहलाह अछि । संगीत संयोजन दीपक ठाकुरराजीव रंजन जाक छनि । वस्त्र विन्यास सुश्री प्रेमलता रहलीह अछि ।      
 
 
 
प्रथम अंक [ स्वप्न निवेदन]

1. दृश्य :

 

आकाशवाणी
:
आनन्द मंथर, नवोत्सुकताक भावेँ
साम्मुख्य गेल, पुनि लज्जित जे स्वभावेँ ।
ओ कर्णफूल घुमबैत, उमा-महेश
दृष्टि प्रपात, हरओ सब विघ्नलेश ॥
 
नट
:
बेसी आडम्बर व्यर्थ । सभाक आज्ञा भेल अछि जे आइ विद्यापति कविक मणिमञ्जरी नाटकक मंचन कयल जाय । तेँ पहिने प्रिया केँ बजाय संगीतक आयोजन करैत छी ।
आँई यै... ! कनेक एम्हर आउ ने .... ।
नटी
:
आज्ञा दिअ आर्य । आब हमरा कोन काज मे लगयबाक कृपा कयल अछि ?
नट
:
आर्ये ! भगवान जगन्नाथक यात्राक प्रसंग मे अनेक दिस रहनिहार चतुर लोकक मण्डली सँ ई सभा शोभित अछि । हिनका सबहक समक्ष हमरा लोकनि अभिनय करबाक प्रयास कयल अछि ।
नटी
:
आर्य ! झूठ जुनि बाजू । अपन अपन काज स निवृत्त भेलाक बाद आ हमर सबहक प्रति प्रेमक कारणे दिल्लीक विभिन्न भाग मे रहनिहार कला प्रेमी लोकनि स ई प्रेक्षागृह भरल अछि ।
नट
:
आ हा...हा...हा... एना हमरा लज्जित नै करू आर्ये । से त हम जनैत छी । हम त एखन विद्यापतिक नाटक मणिमञ्जरी मे लिखल पाँती बाजि रहल छी । 
नटी
:
मुदा आर्य ! नाटक मंचन त आजुक समय मे दिल्ली मे भ रहल अछि तेँ किछु त जोर-तोड़ करैये पड़त ।
नट
:
आर्ये... मोन मे आयल सब गप्प बाजब उचित नै होइत छैक । किछु गप्प गुप्तो त रह दिअ 
नटी
:
हाँ...! त ठीक अछि । समय अवश्य बदलि गेल अछि मुदा आइयो स्थिति ओहिना छैक ।
नट
:
एना नै ने बाजू, आइयो बेसी प्रेक्षक पुरुषे छथि । ई गप्प हिनका सबके खराब लगतन्हि ।
नटी
:
से किएक ? हम त बेसी दोषी स्त्रीए के कहैत छियन्हि । स्त्री लोकनि धन के आकर्षण मे तहियो गलती केलथि आ आइयो करैत छथि ।  
 
नट
:
आ... हा...हा...अहाँ सबटा काज शुरु होइ स पहिने भण्डुल करबाक फेर मे रहैत छी । छोड़ू ई बतकट्टी । वंदना प्रारम्भ करू ।
नटी
:
अबैत जाइ जाउ... वंदना प्रारम्भ करी ।
 
सब कलाकार
:
रसक धार मग्न चित्त, बुध जनक सुखनिमित्त ।
श्रेष्ठ कविक बानि लेल, ई हमर काव्य भेल ॥
काव्य-मार्ग-विज्ञलोक, ध्यान देथु से कतोक ।
नाटिका हमर नव्य, जाहि सञो बनए भव्य ॥
कलाहीन पुनि दोषाकर ओ, अधिक विकास विहीन ।
बाल-उदित इन्दु सम देखथु, सज्जन नाट्य नवीन ॥
 
नट
:
हे सभासद लोकनि । त हम सब प्रारम्भ करी नाटक मणिमञ्जरी ?
आकाशवाणी
:
हमरो लोकनि के मन एहि नवीन नाटक केँ देखबाक हेतु उत्कण्ठित अछि, तेँ अहाँक अनुरोध स्वीकार कयल ।
नट + नटी
:
हम सब अनुगृहित भेलहुँ ।
नटी
:
चन्द्रमा केँ छोड़ि आन कुमुदिनी केँ जे अलंकृत करैत छथि-से छथि राजा चन्द्रसेन ।
नट
:
हे... आर्ये ! मणिमञ्जरीक विरह मे म्लान, रससुधाक सरोवर मे डूबल हृदयश्रेष्ठ राजा चन्द्रसेन एकांतवास लेने छथि । 
नटी
:
आर्य ! ओ स्त्री धन्या थिकीह जनिका कामदेव सन शरीरधारी चन्द्रसेनो हृदय मे स्थान देने छथि ।
नट
:
प्रिये ! चाहैत छथि, ई की कहैत छी ? ई कहू, जिनक विरह व्यथा सँ राज भवन के छोड़ि, उद्यानक, कात मे अपन मित्र केँ संग ल व्यथित भेल देखा रहल छथि ।
नटी
:
लगैत अछि, मित्र माकन्दक संगे किछु विचार करैत महाराज एही दिस आबि रहल छथि । चलू, आब अपनो सब नेपथ्यक कार्य सम्पन्न करी ।
 
 
 
[प्रस्थान]

 

 

 

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